By पुष्यमित्र

पहले यह सब सोशल मीडिया के चुटकुलों से शुरू हुआ. बाप तो आखिर बाप होता है. मामला क्रिकेट का था तभी मामला इतना नॉन सीरियस था. कोई दूसरा स्पोर्ट्स या गेम होता तो स्थिति यह नहीं होती. क्रिकेट को हमने गेम कब रहने दिया है, यह तो मुहल्ले के श्वानों का युद्ध हो गया है, श्वान लड़ते रहते हैं और लोग हुलाते रहते हैं. अगर थोड़ी बेहतर उपमा दें तो मुर्गा लड़ाई कह सकते हैं. अंगरेज सर पीट रहे होंगे कि उनके जेंटलमैन गेम की एशिया पहुंचते-पहुंचते कैसी दुर्गति हो गयी है. मुमकिन है, बहुत जल्द यह डब्लू डब्लू एफ में न बदल जाये.

जाने दीजिये, मसला क्रिकेट का नहीं है. मसला हमारी भारत माता का है. जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी, वंदे मातरम, भारत माता ग्राम वासिनी जैसी साहित्यिक रचनाओं से होते हुए भारत माता की जय के मंचीय नारों तक यह मां ही है. मोदी जी के भाषणों की यह खासियत रही है कि वे आखिर में हर बार यह नारा जरूर लगाते हैं. मगर क्रिकेट के मैदान पर अब तक इंडिया-इंडिया के नारे ही लगते रहे हैं, भारत माता की जय के नारे कभी नहीं लगे.

इस बार नया नारा लगने वाला है, बाप-बाप करोगे… मतलब यह है कि वैसे तो हमारा मुल्क मां की भूमिका में ही रहता है. तभी यहां राष्ट्रपति होते हैं. मगर क्रिकेट के मैदान पर जब यह अपने एशियाई पड़ोसियों से भिड़ता है तो मां से बाप बन जाता है, दादा बन जाता है. लोग इसका लिंग परिवर्तन कर देते हैं. और यह कोई सोशल मीडिया का चुटकुला भर नहीं है. कमेंट्रेटर बोल रहे हैं, टीवी चैनलों पर इसी शीर्षक से प्रोग्राम चल रहे हैं. क्रिकेटप्रेमी राष्ट्रवादियों ने मान लिया है कि भारत मां नहीं बाप है. क्योंकि मां में कूटने का वह हुनर नहीं है, जो बाप में होता है. बाप अच्छी तरह धोती है, मां तो ममता दिखाती है.

हालांकि कई लोगों की राय इसके खिलाफ होगी कि मांएं ठीक से नहीं कूटतीं. कई माताएं पिताओं से बेहतर पिटाई करती हैं. मगर लैंगिक पूर्वाग्रह की वजह से वे दबी कुचली ही मानी जाती हैं. निरूपा राय टाइप. इसलिए क्रिकेट प्रेमी राष्ट्रवादियों ने भारत को बाप और दादा की पदवी दे रखी है. ठीक से कूटो बेटे और पोते को. सब सिखा दो. इस लिहाज से इसे कूटनीतिक छवि परिवर्तन माना जायेगा.

क्योंकि अगर भारत को यहां मां माना जाता तो पाकिस्तान को कहना पड़ता. मां-मां होती है, बेटा-बेटा होता है, या बेटी-बेटी होती है. पता नहीं पाकिस्तान वाले अपने मुल्क को पुल्लिंग मानते हैं या स्त्रीलिंग. लेकिन उस रूपक में वह दबंगई निखर कर नहीं आती जो इस बात में आती है कि बाप-बाप होता है और जब बाप से लड़ोगे तो बाप-बाप करोगे. मैंने सोशल मीडिया साइट्स पर पाकिस्तानियों के अपडेट्स नहीं देखे हैं कि वे इस फिकरे पर किस तरह रिएक्ट कर रहे हैं या बांग्लादेशियों ने भारत के खुद को उसका दादा घोषित करने पर किस तरह रिएक्ट किया.

मगर यह मैंने खूब सुना है कि बांग्लादेशी इस बात का बुरा मानते हैं कि भारत दक्षिण एशिया में बड़ा भाई बनने की कोशिश करता है. वह इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहता कि उसके आसपास के मुल्क एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई हैं और उनके साथ समानता का व्यवहार करना चाहिये. कुछ दिनों से नेपाल भी इस बात से नाराज रहता है. खेल हो या विदेश नीति या फिर जंग ही, स्पर्धा अपनी जगह है, गरिमा अपनी जगह. कभी ऐसी परंपरा थी कि हम अपने प्रतिद्वंद्वियों का समुचित सम्मान करके मानवीय गरिमा का प्रदर्शन करते थे. आज भी खेलों में मुकाबला खत्म होने के बाद प्रतिद्वंद्वियों को एक दूसरे से हाथ मिलाने कहा जाता है.

मगर उस परंपरा में एक ठंडापन होता है. वह मैच रह जाता है, जंग में नहीं बदलता. क्रिकेट या ऐसे ही दूसरे खेलों से जुड़े व्यापारी जानते हैं कि अगर पैसे बनाना है तो दर्शकों को जुनूनी बनाना होगा और माहौल जंग का बनाना होगा. हर मुकाबले से पहले दोनों पक्षों के खिलाड़ियों, पूर्व खिलाड़ियों से ऐसे बयान दिलाये जाते हैं कि मैच-मैच न रहे, जंग में बदल जाये. इसके उन्हें पैसे भी दिये जाते होंगे. फिर एक आग लगाऊ टीवी प्रोमो तैयार किया जाता है. मैच आते-आते दर्शकों का खून उबाल मारने लगता है, अगर सामने पाकिस्तान हो तो जाहिर सी बात है, स्थितियां जंग जैसी बहुत आसानी से बन जाती है. और जब जंग लड़ना होता है तो भारत माता को भी बाप बन जाना पड़ता है!
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