नरेंद्र मोदी की छवि बनाने के लिए करोड़ों अरबों रूपये खर्च किए गये , बचपन की गरीबी दिखाई गयी , उस गरीबी में एक बच्चा चाय बेचते हुए पैदा किया गया , चाय को उस बच्चे से जोड़ दिया गया , पूरे चाय साम्राज्य का राजनैतिक ब्रांड अंबेसडर नरेंद्र मोदी को बना दिया गया।

चाय का खेल इसलिए खेला गया कि दुनिया को लगे कि यह व्यक्ति कितना गरीब था , उसी गरीबी से निकल कर आज एक प्रदेश का 13 14 वर्ष से मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का दावेदार बना है , इसका एक संघर्ष है , यह संघर्ष को परास्त करके नायक बनने की दिशा में अग्रसर है।

दरअसल यह बालीवुड फिल्मों की घिसी पिटी स्टोरी है जिसमें नायक स्लम परिवार और बेहद गरीब माता पिता के घर से बचपन से ही संघर्ष करते हुए सफल होता है और या तो बहुत बड़ा उद्योगपति बनता है या डाॅन या बहुत बड़ा समाजसेवी। दरअसल गरीब देश की हर गरीब जनता का यही ख्वाब होता है , उस गरीब को अपनी गरीबी से निकलने की छटपटाहट की संतुष्टि ऐसी ही फिल्मी पटकथा देती है।

यही पटकथा राजनीति में नरेंद्र मोदी के लिए लिखी गयी और यहाँ भी सफल हुई , उन्हें बेहद गरीब घर का दिखाया गया जबकि ऐसा नहीं था , बचपन के उनके चित्र कहीं अधिक धनाढ्य परिवार के बच्चों जैसे , उनके वैवाहिक जीवन की विफलता को त्याग बताया गया , उनके गहने चोरी करके घर से भागने को सन्यास बताया गया और संघ की लंपट नौकरी को देश के प्रति समपर्ण बताया गया और गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके द्वारा गुजरात को दुनिया का सबसे समृद्ध प्रदेश की तरह महिमामंडित किया गया।

यह सब पर्सनल इमेज बिल्डिंग मैनेजमेंट का खेल था ना कि नरेंद्र मोदी के जीवन की सच्चाई। नरेंद्र मोदी के जीवन की असली सच्चाई छुपा दी गयी परन्तु सच और चरित्र तो सामने आता ही है।

मुख्यमंत्री रहते 14 वर्ष नरेंद्र मोदी ने सादगी की जगह आलीशान लग्जरियस जीवन व्यतीत किया है और अपने उचित अनुचित हर शौक पूरे किए तो प्रधानमंत्री बनने के बाद लग्जरी का यह स्तर और बढ़ता गया , यह पिछले तीन सालों से पूरी दुनिया के सामने है , उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं।

इसी देश के प्रधानमंत्री , जवाहरलाल नेहरू भी हुए हैं जिनकी शानशौकत को लेकर तमाम बातें कहीं जातीं रहीं हैं , तो यह समझना होगा कि जवाहरलाल नेहरू के पिता उस समय इलाहाबाद ही नहीं देश के सबसे प्रतिष्ठित वकील थे और उस समय के धनाढ्य लोगों में एक थे , जवाहरलाल नेहरू ऐसा जीवन जी कर देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में कूदे और 12 वर्ष जेल में रहे।

इसके अतिरिक्त इसी देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री भी थे जो सादगी के प्रतीक थे और लाल बहादुर शास्त्री के बाद इंदिरा गाँधी , राजीव गांधी , और यहाँ तक कि अटल बिहारी बाजपेयी भी थे जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते सादगी का जीवन जीकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया।

एक प्रधानमंत्री राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह भी थे जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद एक टोपी पहनी जिसपर उस समय तमाम आपत्तियाँ आईं।

आज हर 2 घंटे पर मँहगे सूट और काजू की रोटी विद 35 हजार प्रति किलो की मशरूम खाने वाला प्रधानमंत्री विलासिता की सारी हदें प्राप्त कर चुका है पर इस पर बोलने वाला कोई नहीं।

यह एक बेहद गरीब घर के बचपन में चाय बेचने वाले , संघर्ष की झूठी दास्तान गढ़ करके प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के विलासितापुर्ण जीवन की हकीक़त है , समझा जा सकता है कि इनका जीवन प्रारंभ से ही कैसा रहा होगा। सादगीपसंद व्यक्ति का जीवन सदैव सादगी भरा ही रहता है , संघर्ष तो अटल बिहारी बाजपेयी ने भी किया ही था।

एक उदाहरण और देखिए , देश की प्रधानमंत्री दादी और उनकी गोद में बीता एक बचपन , देश की सबसे सशक्त प्रधानमंत्री का सबसे चहेता पोता और उस गोद में बड़ा होता राहुल और फिर इस देश के सबसे अधिक बहुमत प्राप्त प्रधानमंत्री के पुत्र का अपनी जवानी के दौर में प्रवेश करना , देश के प्रधानमंत्री का एक मात्र पुत्र और फिर देश की सत्ता का केन्द्र “10 जनपथ” और उसकी शान शौकत की गतिविधियों में परिपक्व होता एक युवक , और फिर देश के 10 सालों तक सत्ता की महत्वपूर्ण हस्ती जिसकी एक आवाज़ केन्द्र की सरकार को उसकी मनमर्जी के अनुसार निर्णय लेने को बाध्य कर सकती थी , और इस व्यक्ति के जीवन का सर्वाधिक हिस्सा सत्ता का केन्द्र रह कर , इस सबके बावजूद वह नरेंद्र मोदी जैसी विलासिता और ऐश्वर्य से बहुत दूर किसानों के लिए बुंदेलखंड से भट्टापरसौल , और मंदसोर तक अपनी जान जोखिम में डाल कर पिछले 15 वर्षो से संघर्ष कर रहा है।

यह संघर्ष , देश को एक नया नेतृत्व देगा , अब सोचिएगा कि यह व्यक्ति भी मोदी बन सकता था पर नहीं बना उसने देश की सत्ता हाथ में होने के बावजूद संघर्ष का रास्ता चुना और पिछले 15 वर्ष से सिर्फ़ संघर्ष कर रहा है , महत्वपूर्ण बात यह है कि इन वर्षों में एक तिहाई समय देश की सत्ता उनके ही हाथ में रही ।

मोदी ने तो ऐसा संघर्ष कभी किया ही नहीं , संघ की शरण गच्छामि हुए या पर्वतों पर सुट्टा मारा और मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बन गये। बाकी सभी कहानियाँ इमेज बिल्डिंग का परिणाम हैं।

दरअसल सत्ता त्याग कर जनता की सेवा और उनके लिए संघर्ष करना ही “नायक” का धर्म भी है और कर्म भी।

एक ने अपने जीवन का सबसे अधिक समय देश के सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली और सत्ता केन्द्रित परिवार में रह कर सादगी और संघर्ष का रास्ता चुना तो दूसरे ने गरीबी (?) के जीवन में जी कर विलासिता और ऐश्वर्य का जीवन चुना जबकि सादगी से भी रह सकते थे।

राहुल गांधी हो सकता है कि धाराप्रवाह बोलने में अटकते हों परन्तु जो धाराप्रवाह बोलता है उसने ही 3 साल में क्या कर लिया ? देश में पिछले तीन सालों में अराजकता और खून खराबा अपने चरम पर है , बोल बोल कर इस व्यक्ति ने देश का सत्यानास कर दिया।

अच्छा बोलने से अधिक बेहतर है अच्छी और ईमानदार सोच , राहुल गांधी से मिलकर मैंने महसूस किया कि यह व्यक्ति बेहद ईमानदार है , अपनी पार्टी अपनी सरकारों की गलतियों को स्वीकार करता है , और उन गलतियों का कारण भी बताता है।

विश्वास कीजिए राहुल गांधी की हर विषय पर सोच स्पष्ट है , संघ , मुसलमान , किसान , दलित और ब्राह्मणवाद।

देश में एक नायक का “उदय” देखिए , आप इस इतिहास के साक्षी हैं। कांग्रेस के इतिहास में किए तमाम गलतियों और उससे तिव्र शिकायतों के बावजूद , राहुल से मिलने के बाद राहुल गांधी पर विश्वास ना करने का कोई कारण नज़र नहीं आता , विश्वास करना भी चाहिए , इतिहास पर रोने से बेहतर है वर्तमान और भविष्य के बेहतरी के लिए सोचना और प्रयास करना।