मोहम्मद जाहिद

नायक ( मोदी) और संघर्ष ( राहुल ) !

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नरेंद्र मोदी की छवि बनाने के लिए करोड़ों अरबों रूपये खर्च किए गये , बचपन की गरीबी दिखाई गयी , उस गरीबी में एक बच्चा चाय बेचते हुए पैदा किया गया , चाय को उस बच्चे से जोड़ दिया गया , पूरे चाय साम्राज्य का राजनैतिक ब्रांड अंबेसडर नरेंद्र मोदी को बना दिया गया।

चाय का खेल इसलिए खेला गया कि दुनिया को लगे कि यह व्यक्ति कितना गरीब था , उसी गरीबी से निकल कर आज एक प्रदेश का 13 14 वर्ष से मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का दावेदार बना है , इसका एक संघर्ष है , यह संघर्ष को परास्त करके नायक बनने की दिशा में अग्रसर है।

दरअसल यह बालीवुड फिल्मों की घिसी पिटी स्टोरी है जिसमें नायक स्लम परिवार और बेहद गरीब माता पिता के घर से बचपन से ही संघर्ष करते हुए सफल होता है और या तो बहुत बड़ा उद्योगपति बनता है या डाॅन या बहुत बड़ा समाजसेवी। दरअसल गरीब देश की हर गरीब जनता का यही ख्वाब होता है , उस गरीब को अपनी गरीबी से निकलने की छटपटाहट की संतुष्टि ऐसी ही फिल्मी पटकथा देती है।

यही पटकथा राजनीति में नरेंद्र मोदी के लिए लिखी गयी और यहाँ भी सफल हुई , उन्हें बेहद गरीब घर का दिखाया गया जबकि ऐसा नहीं था , बचपन के उनके चित्र कहीं अधिक धनाढ्य परिवार के बच्चों जैसे , उनके वैवाहिक जीवन की विफलता को त्याग बताया गया , उनके गहने चोरी करके घर से भागने को सन्यास बताया गया और संघ की लंपट नौकरी को देश के प्रति समपर्ण बताया गया और गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके द्वारा गुजरात को दुनिया का सबसे समृद्ध प्रदेश की तरह महिमामंडित किया गया।

यह सब पर्सनल इमेज बिल्डिंग मैनेजमेंट का खेल था ना कि नरेंद्र मोदी के जीवन की सच्चाई। नरेंद्र मोदी के जीवन की असली सच्चाई छुपा दी गयी परन्तु सच और चरित्र तो सामने आता ही है।

मुख्यमंत्री रहते 14 वर्ष नरेंद्र मोदी ने सादगी की जगह आलीशान लग्जरियस जीवन व्यतीत किया है और अपने उचित अनुचित हर शौक पूरे किए तो प्रधानमंत्री बनने के बाद लग्जरी का यह स्तर और बढ़ता गया , यह पिछले तीन सालों से पूरी दुनिया के सामने है , उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं।

इसी देश के प्रधानमंत्री , जवाहरलाल नेहरू भी हुए हैं जिनकी शानशौकत को लेकर तमाम बातें कहीं जातीं रहीं हैं , तो यह समझना होगा कि जवाहरलाल नेहरू के पिता उस समय इलाहाबाद ही नहीं देश के सबसे प्रतिष्ठित वकील थे और उस समय के धनाढ्य लोगों में एक थे , जवाहरलाल नेहरू ऐसा जीवन जी कर देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में कूदे और 12 वर्ष जेल में रहे।

इसके अतिरिक्त इसी देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री भी थे जो सादगी के प्रतीक थे और लाल बहादुर शास्त्री के बाद इंदिरा गाँधी , राजीव गांधी , और यहाँ तक कि अटल बिहारी बाजपेयी भी थे जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते सादगी का जीवन जीकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया।

एक प्रधानमंत्री राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह भी थे जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद एक टोपी पहनी जिसपर उस समय तमाम आपत्तियाँ आईं।

आज हर 2 घंटे पर मँहगे सूट और काजू की रोटी विद 35 हजार प्रति किलो की मशरूम खाने वाला प्रधानमंत्री विलासिता की सारी हदें प्राप्त कर चुका है पर इस पर बोलने वाला कोई नहीं।

यह एक बेहद गरीब घर के बचपन में चाय बेचने वाले , संघर्ष की झूठी दास्तान गढ़ करके प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के विलासितापुर्ण जीवन की हकीक़त है , समझा जा सकता है कि इनका जीवन प्रारंभ से ही कैसा रहा होगा। सादगीपसंद व्यक्ति का जीवन सदैव सादगी भरा ही रहता है , संघर्ष तो अटल बिहारी बाजपेयी ने भी किया ही था।

एक उदाहरण और देखिए , देश की प्रधानमंत्री दादी और उनकी गोद में बीता एक बचपन , देश की सबसे सशक्त प्रधानमंत्री का सबसे चहेता पोता और उस गोद में बड़ा होता राहुल और फिर इस देश के सबसे अधिक बहुमत प्राप्त प्रधानमंत्री के पुत्र का अपनी जवानी के दौर में प्रवेश करना , देश के प्रधानमंत्री का एक मात्र पुत्र और फिर देश की सत्ता का केन्द्र “10 जनपथ” और उसकी शान शौकत की गतिविधियों में परिपक्व होता एक युवक , और फिर देश के 10 सालों तक सत्ता की महत्वपूर्ण हस्ती जिसकी एक आवाज़ केन्द्र की सरकार को उसकी मनमर्जी के अनुसार निर्णय लेने को बाध्य कर सकती थी , और इस व्यक्ति के जीवन का सर्वाधिक हिस्सा सत्ता का केन्द्र रह कर , इस सबके बावजूद वह नरेंद्र मोदी जैसी विलासिता और ऐश्वर्य से बहुत दूर किसानों के लिए बुंदेलखंड से भट्टापरसौल , और मंदसोर तक अपनी जान जोखिम में डाल कर पिछले 15 वर्षो से संघर्ष कर रहा है।

यह संघर्ष , देश को एक नया नेतृत्व देगा , अब सोचिएगा कि यह व्यक्ति भी मोदी बन सकता था पर नहीं बना उसने देश की सत्ता हाथ में होने के बावजूद संघर्ष का रास्ता चुना और पिछले 15 वर्ष से सिर्फ़ संघर्ष कर रहा है , महत्वपूर्ण बात यह है कि इन वर्षों में एक तिहाई समय देश की सत्ता उनके ही हाथ में रही ।

मोदी ने तो ऐसा संघर्ष कभी किया ही नहीं , संघ की शरण गच्छामि हुए या पर्वतों पर सुट्टा मारा और मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बन गये। बाकी सभी कहानियाँ इमेज बिल्डिंग का परिणाम हैं।

दरअसल सत्ता त्याग कर जनता की सेवा और उनके लिए संघर्ष करना ही “नायक” का धर्म भी है और कर्म भी।

एक ने अपने जीवन का सबसे अधिक समय देश के सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली और सत्ता केन्द्रित परिवार में रह कर सादगी और संघर्ष का रास्ता चुना तो दूसरे ने गरीबी (?) के जीवन में जी कर विलासिता और ऐश्वर्य का जीवन चुना जबकि सादगी से भी रह सकते थे।

राहुल गांधी हो सकता है कि धाराप्रवाह बोलने में अटकते हों परन्तु जो धाराप्रवाह बोलता है उसने ही 3 साल में क्या कर लिया ? देश में पिछले तीन सालों में अराजकता और खून खराबा अपने चरम पर है , बोल बोल कर इस व्यक्ति ने देश का सत्यानास कर दिया।

अच्छा बोलने से अधिक बेहतर है अच्छी और ईमानदार सोच , राहुल गांधी से मिलकर मैंने महसूस किया कि यह व्यक्ति बेहद ईमानदार है , अपनी पार्टी अपनी सरकारों की गलतियों को स्वीकार करता है , और उन गलतियों का कारण भी बताता है।

विश्वास कीजिए राहुल गांधी की हर विषय पर सोच स्पष्ट है , संघ , मुसलमान , किसान , दलित और ब्राह्मणवाद।

देश में एक नायक का “उदय” देखिए , आप इस इतिहास के साक्षी हैं। कांग्रेस के इतिहास में किए तमाम गलतियों और उससे तिव्र शिकायतों के बावजूद , राहुल से मिलने के बाद राहुल गांधी पर विश्वास ना करने का कोई कारण नज़र नहीं आता , विश्वास करना भी चाहिए , इतिहास पर रोने से बेहतर है वर्तमान और भविष्य के बेहतरी के लिए सोचना और प्रयास करना।

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9 thoughts on “नायक ( मोदी) और संघर्ष ( राहुल ) !

  1. सिकंदर हयात

    Mohd Zahid
    26 मई 2014 के पहले भारत में पैदा होने पर शर्मिंदा होने वाले हमारे प्रधानमंत्री जी ने पिछले लगभग 1 साल से विदेशी दौरे तो बहुत किए परन्तु “मेगा शो” बंद कर दिए। क्युँ बंद किया वो बात में बताता हूँ।
    परन्तु जबतक यह विदेशी दौरे में मेगा शो करते रहे तब तक कुटनी और लकड़ीबाज औरत की तरह केवल शिकवा शिकायत करते रहे। कभी पिछली सरकार का तो कभी सोनिया गाँधी का।
    कभी संघाई मे 19 मई 2015 को पैदा होने पर शर्मिंदा हुए तो कभी देश की गंदगी और कभी नोटबंदी पर जापान में मटक मटक , ताली पीट पीट कर बताते रहे कि भारत में लोगों के यहाँ शादी ब्याह पड़ी और मैंने 500-1000 की नोटबंद करके सबको कंगाल कर दिया। तो देश में 70 साल के नाम पर केवल और केवल कमियाँ दिखाते रहे।
    भारत के सभी गोदिया मीडिया पूरा का पूरा भाषण लाइव दिखाती थी , जैसे पुण्य का काम हो और वह कोई धार्मिक कार्य कर रहे हैं।
    यह होता है देश को नीचा दिखाना और गिराना जब किसी देश का प्रधानमंत्री खुद अपने देश की बुराई करे तो फिर कुछ कहने को रह नहीं जाता।
    विदेशी दौरों का रिकॉर्ड बना चुके प्रधानमंत्री अब विदेशी दौरों में प्रवचन नहीं देते।
    दरअसल यह मेगा शो गुजरात के मालदार पटेलों का संगठन खुद पैसे की फंडिंग करके कराता था जिसने पटेलों की नाराजगी के कारण अब बंद कर दिया।
    मोदी जी विदेश में पैदल हो गये।
    42 महीने के विदेशी दौरों में की गयी कानफोड़ू और कानपकाऊ बक बक , राहुल गांधी की एक तार्किक व्याख्यान से धुल गयी।
    आज भी भाजपा के 17 प्रवक्ता , तमाम मंत्री राहुल गांधी के सवालों का जवाब ना देकर केवल व्यक्तिगत आक्रमण कर रहे हैं।
    भाई राहुल गांधी ने कुछ गलत कहा तो आँकड़ों से सिद्ध कीजिए।Mohd Zahid
    अमेरिका के “बार्कले” में छात्रों के बीच राहुल गांधी के उत्तर “संघियों” के लिए वो छरछराहट पैदा कर गये जो किसी बरनाल से भी दूर नहीं होगी।
    दरअसल भारत में एक मात्र नेता राहुल गांधी ही हैं जिनकी बातों से संघियों और भाजपाईयों को सबसे अधिक तीखी मिर्च लगती है तो उसका कारण है राहुल गांधी द्वारा संघ की जड़ पर वार।
    राहुल गांधी को लेकर मेरे मन मस्तिष्क में वही छवि थी जो संघ-भाजपा के 1000 पेड आईडी यूजर्स ने गढ़ी थी , उनके साथ 4 घंटे बिता कर मैंने महसूस किया कि वह बिलकुल ही विपरीत हैं।
    इंटेलिजेंट और शोधकर्ता , संघ का पूरा खूनी इतिहास उनके मन मस्तिष्क में है और सबसे बड़ी बात कि संघ को लेकर वह बिलकुल स्पष्ट हैं। कांग्रेस तो छोड़िए पूरे देश में और कोई ऐसा नेता नहीं जो राहुल गांधी की तरह भाजपा-संघ पर एक साथ वार करता है।
    मैंने संघ के प्रति राहुल गांधी की नफरत को उनके साथ 4 घंटे गुजार कर महसूस किया है।
    कांग्रेस से लाख शिकायतों और नाराज़गी के बावजूद अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि निश्चित रूप से यह व्यक्ति आज के भारत का सबसे ईमानदार और स्पष्ट सोच का नेता है।
    जो दिल में वही ज़ुबाँ और वही व्यवहार में
    उदाहरण दे देता हूँ कि
    10 साल की यूपीए की हुकूमत में अंबानी को 2 मिनट मिलने का वक्त नहीं दिया जिसके आगे पीछे आज मोदी घूमते हैं।Mohd Zahid
    वंशवाद (एक हकीकत)
    राहुल गांधी का वंशवाद पर दिए हिम्मत वाले जवाब की सराहना करनी चाहिए , ऐसा ईमानदार जवाब भारत की राजनीति में कभी किसी ने दिया हो याद नहीं आता।
    भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में पिता की विरासत पर पुत्र के अधिकार की परम्परा रही है और इस पर कभी किसी ने सवाल नहीं उठाया , डाक्टर पिता का बेटा हो या वकील और कारोबारी पिता का बेटा हो , स्वतः ही पिता की जगह ले लेता है।
    केवल नौकरी और राजनीति ही वह क्षेत्र है जहाँ योग्यता और जनमत के बिना पुत्र कुछ नहीं पा सकता।
    इस दृष्टि से देखा जाए तो राजनीति में किसी नेता के पुत्र को जनता के पास जा कर समर्थन माँगने की प्रक्रिया अपनाना ही पड़ता है तभी कोई नेता पुत्र विधायक , सांसद बनते हैं या फिर मंत्री , मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनते हैं।
    बिना जनादेश के वह राजनीति में कुछ नहीं कर सकते , एक तरह से यदि देखा जाए तो राजनीति में वंशवाद उस स्तर का नहीं जैसे अन्य क्षेत्रों में होता है , हाँ नेता के पुत्र होने के कारण उसे कुछ सुविधा मिल जाती है तो ऐसा हर क्षेत्र के पुत्र को मिलती है ।
    राहुल गांधी ने सच में दिलेरी का परिचय दिया है , और उन्होंने बहुत इमानदारी से वंशवाद को स्वीकार किया और कहा कि सिर्फ़ उनको ही दोष मत दीजिए। वंशवाद पर इस देश में बहस बंद कर देनी चाहिए।
    राहुल गांधी ने बिलकुल सच कहा कि भारत में वंशवाद सबके साथ चलता है।
    मुलायम-अखिलेश-शिवपाल और पूरा खानदान , लालू का पूरा परिवार और फिर भाजपा का देखें तो स्थिति और विकट है , वंशवाद राजनाथ-पंकज , विजया राजे सिंधिया के तमाम परिवार , धूमल-अनुराग , मुंडे परिवार , प्रमोद महाजन परिवार , बाल ठाकरे का परिवार , कल्याण सिंह की तीसरी पीढ़ी , प्रवेश वर्मा , यशवंत सिन्हा-जयंत सिन्हा , मेनका-वरुण गाँधी , इत्यादि तमाम उदाहरण हैं जो कांग्रेस और गैर-कांग्रेस गैर-भाजपाईयों से अधिक विभत्स है।
    और सुनिए , भाजपा की अवैध माता , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी इससे अछूती नहीं।
    उदाहरण देखिए
    वर्तमान में संघ के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य , संघ के एक सबसे बड़े नेता एमजी वैद्य के पुत्र हैं , ध्यान दीजिए संघ में प्रचार प्रमुख सरसंघचालक के बाद सबसे महत्वपूर्ण पद है।
    और सुनिए
    मधुकर राव भागवत , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक दौर में सबसे बड़े नेता थे और गुजरात में प्रचार प्रमुख थे , आडवाणी और मोदी को चड्डी पहनाने वाले वही थे।
    संघ प्रमुख मोहन भागवत का पूरा नाम “मोहन मधुकर राव भागवत है”
    अर्थात वंशवाद का सबसे बड़ा उदाहरण।
    इसी लिए इन को झुट्ठा कहता हूँ।
    S

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  2. सिकंदर हयात

    Arvind Sharma
    10 hrs ·
    यूपीए के समय में जनता धधक रही थी और बुद्धिजीवी शांत थे । आज जनता शांत है लेकिन बुद्धिजीवी उबल रहे हैं । लुटियन की दिल्ली में मेरा अनुभव कहता है कि पहले ये तबका पार्ट टाइम बुद्धिजीवी समारोह करता था और फुलटाइम लॉबिंग । नयी सरकार ने इनकी एशगाहों पर ताले लगवा दिए हैं । पहले सत्ता के सत्रह केंद्र हुआ करते थे और अब सिंगल विंडो मैनेजमेंट सिस्टम है |
    पहले लुटियन दिल्ली के हर चौराहे पर ‘मैडम’ और ‘रागा’ से वन टू वन मुलाकात करने वाले मिल जाते थे, जबकि आज कोई यह नहीं बता सकता है कि साहब और शाह से मीटिंग कौन फिक्स करवा सकता है, क्योंकि इस व्यवस्था में कोई पदानुक्रम नहीं है | कुआं और प्यासे के मध्य मिडिलमैन के अवसर समाप्त कर दिए गए हैं |
    ऐसे में खाली बैठी बुद्धिजीवियों और एलीट पत्रकारों की ‘बुद्धि’ तिकड़में रच रही है, अभी तक एक्चुअल मीडिया पर अकड़ कर सवारी करने वाली ये बिरादरी अब मजबूरन सोशल मीडिया पर गधा-पचीसी खेल रही है | सोशल मीडिया इनके लिए तुच्छ भी है लेकिन इनको फुटेज भी चाहिए |
    ये लोग कटाक्ष-कटाक्ष खेलने के लिए यहाँ आते हैं | ये कैरम के खेल की तरह काली गोटी को हिट करके सफ़ेद गोटी पर निशाना लगाना चाहते हैं | लेकिन सोशल मीडिया ओढ़ने-बिछाने वाली इस पीढ़ी को ऐसे तरीके बेहद खिजाने वाले लगते हैं | और वे ऐसे बुद्धिजीवियों को तरेर कर उनके बाड़े तक छोड़ कर आते हैं | इसलिए अब पर्दादारी नहीं चलेगी, ये बुद्धिविलास, धूर्त तटस्थता और सुविधाजनक खामोशी का दौर नहीं है | जो भी कहना है खुलकर कहिये Arvind Sharma————————|Vikram Singh Chauhan
    2 hrs ·
    राहुल गाँधी को लेकर देश के युवाओं को सोच बदलना चाहिए। बीजेपी के आईटी सेल के उनके खिलाफ फैलाये दुष्प्रचार से परे उन्हें देखना होगा। मैं वंशवाद का घोर विरोधी हूँ। वंशवाद क्या है? किसी सत्ता का अपने पुरखों के बाद स्थान लेना ,पिता का उत्तराधिकारी बनना। राहुल गाँधी ने इसमें से क्या लिया? वे कांग्रेस शासन रहने के बावजूद मंत्री पद लेने की जगह संगठन में ही रहे। उनको पिता की वजह से एक ही चीज मिली। और वो है जेड प्लस सिक्योरिटी ,क्योंकि उनके पिता की हत्या हुई थी ,दादी की हत्या हुई थी इसलिए राहुल को एसपीजी सिक्योरिटी मिली। इसके अलावा उनको जो मिली वो बंदिशे थी। घर से बाहर वे एक आम युवा की तरह नहीं घूम सकते। उन्होंने संभवतः शादी भी इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्होंने अपनी विधवा माँ की जिंदगी को करीब से देखा है। राहुल के बारे में कहा जाता है वे पप्पू है। पप्पू का मतलब जो बताया जाता है वह यह है कि वह फिसड्डी है। लेकिन इसके लिए जो तर्क दिए जाते हैं वो दमदार नहीं है ,उन्हें शर्ट ऊपर करने ,आलू की फैक्ट्री आदि बातों से चिढ़ाया जाता है और देश के पढ़े लिखे युवा भी इसे सच मान लेते हैं। जबकि आलू की फैक्ट्री वाली बात उन्होंने कभी कही ही नहीं थी। उनके दलितों के घर जाने को लेकर ,उनके घर खाने को लेकर मजाक उड़ाया जाता था। लेकिन जब अमित शाह दलितों के घर खाना खाने जाते हैं तो उनके कसीदे पढ़ती है मीडिया। उनकी शिक्षा को लेकर अफवाह फैलाया जाता है कि वे कम पढ़े लिखे हैं जबकि राहुल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा से सन 1994 में कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद सन 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की। राहुल को एक आम युवा की जिंदगी नहीं मिली है लेकिन उसका संघर्ष एक आम युवा की तरह ही है। बड़े बंगले में रहना ,चौबीसों घंटे सुरक्षा से घिरे रहना यह जिंदगी राहुल ने खुद नहीं चाहा था ,वह जिंदगी उसको मिली है। इसमें राहुल का क्या दोष है? तो क्या अगर वे गाँधी खानदान से हैं तो उन्हें अपनी राजनैतिक जीवन जीने का अधिकार नहीं है? जो भाजपा उनकी आलोचना वंशवाद के नाम पर करती है लगभग उनके सभी मुख्यमंत्री ,बड़े मंत्री और सांसदों की दूसरी पीढ़ी तैयार हो चुकी है। फिर ये तंज अकेले राहुल क्यों झेले? देश के युवाओं की एक बहुत बड़ी संख्यां भाजपा द्वारा सोशल मीडिया से फैलाये जा रहे दुष्प्रचार को सच मान लेते हैं। और इसे शेयर भी करते हैं। राहुल के बारे में लोगों के मन में बनी धारणा भाजपा के बनवाई हुई धारणा है जो अब टूट रही है। राहुल गाँधी ने नियमगिरी में वेंदाता ,पोस्को के प्रोजेक्ट के खिलाफ आदिवासियों के हित में खुद के सरकार के खिलाफ चले गए थे। कितने चैनलों के संपादक और बड़े पत्रकारों को ये बातें पता है ,अलबत्ता इन्हें ये जरूर पता होता है कि राहुल बिना सरकारी जानकारी के चीन के राजदूत से मिले। विपक्ष दल का नेता किसी भी देश के राजदूत से मिलकर देश की चिंता पर बात कर सकता है ,यह हमारे देश के मीडिया हाउस को भी नहीं पता। इसलिए चार दिन इस पर न्यूज़ भी चल गए। अभी अमेरिका में राहुल गाँधी के भाषण पर चर्चा हो रही है ,कहा जा रहा है राहुल ने देश का अपमान किया है ,गलत है राहुल ने मोदी की वाकशैली की तारीफ की और स्वस्थ आलोचना की। देश का अपमान तो मोदी ने किया था ये बोलकर ‘कितना पाप किया था जो हिंदुस्तान में पैदा हुआ’ आपको यकीं नहीं तो गूगल कर लीजिये। राहुल बड़े -बड़े लच्छेदार बात नहीं बोल सकते ,आपको भ्रमित नहीं कर सकते ,आपको गुस्सा नहीं दिला सकते ,आपको वो वादे नहीं कर सकते जो पूरा न कर पाए। पर वे आपकी बात को गंभीरता से सुन सकते हैं। कौन सा नेता है वर्तमान में जो आपकी बात को सुन सकते हैं? वे गंभीर हैं ,देश के लिए भी और देश के लोगों के लिए भी। आप उसके बारे में अपनी धारणा बदलिए।

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  3. सिकंदर हयात

    Mohd Zahid
    2 hrs ·
    जिस व्यक्ति के विरोध को कुचलने के लिए ₹400 करोड़ संघ और भाजपा ने खर्च करके “पप्पू” बनाया उसकी तारीफ आज पूरा अमेरिका कर रहा है।
    मैं मैं और गाली-गलौज से दूर शालीनता से अपनी बात कहने की खासियत राहुल गांधी में है , टाईम स्क्वायर में उनका भाषण सुनिए जो आपको उनके प्रति फैलाए झूठ से निकालेगा। अपने वरिष्ठ के सम्मान में उनका व्यवहार देखिए।
    हालांकि मेरी कांग्रेस से बहुत शिकायते हैं परन्तु राहुल गांधी की स्पष्ट सोच और इमानदार व्यक्तित्व को मैं देश के धुर्त नेताओं की अपेक्षा बेहतर समझता हूँ।
    कुछ अंश हिन्दी में यहाँ संदीप गुप्ता भाई की वाल से लेकर लिख रहा हूँ।
    अमेरिका से एक दोस्त ने बताया कि
    आज टाइम्स स्क्वायर पर राहुल जी की जनसभा थी बहुत कुछ बोला राहुल जी ने हर शब्द पर तालियों की गड़गड़ाहट गूंज रही थी पर राहुल जी आज रुला गये।
    राहुल जी ने शहीद राजीव जी की वो दास्तान दुनिया को बताई, जिसे शायद बहुत कम लोग जानते है। सुनिये राहुल जी के शब्दों में।
    1982, मैं 12 साल का था मेरे पिता एक सुबह आ कर बोले कि आज एक प्रेजेंटेशन है और तुम्हे रहना है मैं और मेरी बहन प्रियंका को 6 घण्टे तक प्रेजेंटेशन में बैठना पड़ा।
    सैम पित्रोदा और राजीव जी कंप्यूटर के बारे में बाते कर रहे थे..मुझे वो प्रेजेंटेशन समझ मे नही आया..मेरे लिये कंप्यूटर बस एक छोटी सी TV स्क्रीन थी।
    4-5 साल बाद मेरे पिता ने PMO में सबको बोला कि अब टाइपराइटर नही कंप्यूटर मिलेगा..लोगो ने मना किया विरोध किया।
    राजीव जी ने समझाया कि एक महीने कंप्यूटर इस्तेमाल कर लीजिये अगर अच्छा ना लगे तो आपका टाइपराइटर वापिस मिल जायेगा।
    एक महीने बाद फिर राजीव जी ने सबसे पूछा कि कंप्यूटर हटाकर टाइपराइटर वापिस लाया जाये…चमत्कार हो गया अबकी बार सबने कहा हमे टाइपराइटर नही चाहिये कंप्यूटर ही रहेगा।
    क्रांति हो चुकी थी !! देश हरदम के लिये बदल चुका था !
    एक 12 साल का बच्चा, 6 घण्टे का प्रेजेंटेशन, राजीव जी, सैम पित्रोदा ऐतिहासिक मुहूर्त के साक्षी राहुल जी आपकी आंखों में आंसू नही आये वो पल याद करते वक्त ?
    इतनी सहजता से कैसे बोल गये आप उन बातों को जिसने भारत मे सूचना क्रांति ला दी ? हमारी यादों को ऐसे मत छेड़ा कीजिये राहुल जी.आज दिल भर आया पर बहुत गर्व भी महसूस हो रहा है।
    आप ऐसे ही रहिये राहुल जी आपकी सभ्यता, सौम्यता, सहजता, आपकी सोच..राजीव जी दिखते है आप मे।
    पता नही कैसे अपना देश मोदी जैसे लफफाज के जाल मे फस गयाMohd Zahid

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  4. सिकंदर हयात

    Chanchal Bhu
    Yesterday at 07:32 · Singramau ·
    आढ़तिया मुकदमा का धौंस तो दे गया , पर मुकदमा धौंस से तो चलता नही , वह बखिया उधेड़ देता है । और फिर यह खेल तो और भी दिलचस्प बनता नजर आ रहा है । इसमें एक मंत्रालय , दो बड़े घराने और एक बैंक के डूबने का इतिहास भी खुलेगा । मामला टेढा नही है अपराध के पैरों के निशान जिल्लेसुभानी के दीवाने खास के सदर दरवाजे तक जा रहा है Chanchal Bhu
    10 October at 09:54 · Singramau ·
    मुकदमा करने वालो एक वाक्या सुन लो । बर्दाश्त और समझ ,बड़ी शाखीयत की पहचान है ,जिससे तुम्हारा दूर तक कोई रिश्ता नही ।
    हिंदुस्तान के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू लाल किले में आयोजित मुशायरे का उद्घाटन करने पहुंचे जिसमे उन्होंने नशाबंदी पर तकरीर कर दिया । मंच के पीछे बैठे जोश मलीहाबादी साहब दो तीन पेग लगा चुके थे । इसकके बाद जोश साहब मंच पर आए और नशाबंदी के खिलाफ अपनी रुबाइयात पेश कर दी
    जिस मय को छुड़ा सका न अल्लाह अबतक
    उस मैं को छुड़ा रहे हैं बंदे साकी ।
    कुंवर महेंद्र सिंह बेदी जो खुद अच्छे शायर रहे और उस समय दिल्ली के कलेट्टर भी थे ,वही इंतजाम करता थे । कार्यक्रम खत्म हुआ तो जोश साहब बेदी जी के पास आये । बेदी जी दुखी , बोले जोश साहब हम तो गए काम से । बहरहाल सब घर गए । दूसरे दिन अलसुबह जोश जी बेदी के घर पहुचे और बोले – भाई ! रात नशे में गलत हो गया ,अब क्या किया जाय । तय हुआ कि पंडित जी के पास चल कर माफी मांग ली जाय । और पंडित जी दर पहुंचे । पंडित जी को सैदेश भेजा गया तो पंडित जी ऊपर ही बुला लिया । पंडित ने दोनो को बिठाया और आवाज दिया इंदिराजी , पंडित विजय लक्ष्मी सब को उसी कमर में तलब किया । जोश ने अदब से माफी मांगी । एक न चली । जोश साहब बोलते रहे , कल नशे में था, नशा बन्दी की खिलाफ बोल गया । पंडित ने रोका नही आज उसे यहां फिर सुनाइये , चूंकि हुकूमत की पालसी नशाबन्दी के हक में है ,वरना हम भी वही महसूस करते हैं जो आप ने कहा । पंडीत जी खूब हँसे और दाद दी ।
    तुम्हारे समझ मे नही आएगा ।राहुल गांधी ने बड़ी शालीनता से गुजरात मे इनके किले को भसका दिया है ।
    इनका हमला अमेठी में आ गया । अग्रज श्याम कृष्ण पांडे जी ने अल सुबह इशारा किया कि अचानक भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व (?) अमेठी क्यों आ गिरा ? वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने एक मजेदार बात कही – पानी बरसे सदर में औ छाता मछली शहर में ? चुनाव गुजरात मे और प्रचार अमेठी में ? दादा अवस्थी जी सुनिये – अमेठी कारण है । सब को मालूम है गुजरात चुनाव ये हार रहे हैं और उसका एक बड़ा कारण है कांग्रेस नेतृत्व के बड़प्पन का ।जिसे बार बार राहुल गांधी पेश कर रहे हैं । कल ही बड़ोदा में जिस तरह से रॉहुल गांधी ने बड़प्पन का परिचय दिया ,व इनसे नही पच रह । बहुत सलीके से रॉहुल गांधी ने भिगो कर मारा है ।
    आदि सांडिल्य ने पूरी रपट बड़ोदरा से भेजी है रॉहुल गांधी भाषण नही दे रहे थे ,संवाद कर रहे थे । हाल खचा खच भरा था । कल राहुल एक स्टेट्समैन की तरह शांत खड़े जवाब दे रहे थे पहली सतर सुनिये । ये कुछ भी बोलें ,लेकिन हम कभी यह नही बोलेंगे की हम भारत को भाजपा मुक्त बनायेगे । ये यहीं के हैं इनकी सोच यही है यह रहें , हमारी सोच इनसे अलग है । मामूली बात नही रही । राहुल गांधी ने इतिहास सामने ला दिया , कांग्रेस की सोच और उसकी दिशा बता दिए । कि भारत किसी एक का नही है ,यह सब का है । जनतंत्र का मूलमंत्र कह गए राहुल गांधी । याद करिये भारत मे पहली अंतरिम सरकार बन रही थी कांग्रेस चाहती तो वहः अकेले सरकार बना लेती लेकिन उसने खुलासा किया यहां बहुदलीय व्यवस्था रहेगी । कांग्रेस ने अपने विरोधियों को मंत्रिमंडल में जगह द9या । श्यामा प्रसाद मुखर्जी अंतरिम सरकार में रसद मंत्री हैं । तो नही समझोगे तड़ी पारो यह इतिहास है ।
    तुम भागे भागे अमेठी चले गए । लगाम पकड़ने ? रॉहुल गांधी राज कुमार नही है , सिपाही है अमेठी घर है । वहः अपाने सिपाही को प्यार से ,दुलार से गुजरात भेज रहा है अमेठी बहुत बड़ा परिवार है । वहः तुम्हारे झांसे में नही आएगा । याद रखना राज नारायण न राय बरेली के लोंगो से क्या कहा था ? – जब तुम इंदिरा गांधी के नही हुए तो हमारे क्या होगे ?Kuldeep Kumar is with Chanchal Bhu and Ujjwal Bhattacharya.
    11 October at 17:23 ·
    उज्ज्वल भट्टाचार्य ने अपनी वॉल पर लिखा—“राजनीति में विरोध और समर्थन तो होता रहेगा, लेकिन इतना मानना पड़ेगा कि राहुल की बातों में शराफ़त है.”—तो एक सज्जन ने टिप्पणी की—” राजनीति में शराफत का क्या काम?” इस पर मुझे राममनोहर लोहिया पर बनी एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म याद आ गयी. इसमें कृष्णनाथ जी का एक इंटरव्यू है. कृष्णनाथ जी ने कहा: “एक बार डॉक्टर साहब के साथ हम दस-बारह लोग बैठे थे. अचानक उन्होंने हमसे पूछा कि अगर मैं बीमार पड़ जाऊं तो मेरी सबसे अच्छी देखभाल कहाँ होगी? मैंने कहा हैदराबाद में बद्रीविशाल पित्ती के यहाँ, किसी ने किसी और का नाम लिया और दूसरों ने किसी और का. डॉक्टर साहब हँसते रहे. बोले—“तुम्हें किसी को कुछ पता नहीं है. मेरी सबसे अच्छी देखभाल अगर कहीं होगी तो वह पंडित के घर होगी।” “पंडित” यानी जवाहरलाल नेहरू. हम सब अवाक. डॉक्टर साहब उन दिनों पंडितजी पर सबसे अधिक हमला कर रहे थे. लेकिन उनके यह कहने से हमें पता चला कि राजनीतिक विरोध कितना भी क्यों न हो, नेहरूजी और उनके बीच कितनी आत्मीयता थी.”
    राजनीति में भी किसी ज़माने में शराफत हुआ करती थी. लेकिन तब नेता बाहुबली नहीं होते थे. उनमें दुश्मनी नहीं, वैचारिक मतभेद होता था. संजय गाँधी की मृत्यु का समाचार सुनते ही कम्युनिस्ट नेता भूपेश गुप्ता भागे-भागे राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचे. तब तक उनकी पार्टी कांग्रेस से नाता तोड़ चुकी थी और इमरजेंसी के लिए इंदिरा गाँधी की कड़ी आलोचना कर चुकी थी. लेकिन दोनों की केम्ब्रिज के दिनों की मित्रता थी. अस्पताल में घुसकर दौड़ने के चक्कर में भूपेश गुप्ता की चप्पल निकल गयी. जब वे इंदिरा गाँधी से मिले तो उस कठिन घड़ी में भी उन्होंने देख लिया कि भूपेश गुप्ता नंगे पाँव हैं. तत्काल उन्होंने अपने साथ आये लोगों को आदेश दिया कि इनकी चप्पल खोजो और अगर न मिले तो बाजार से तुरंत खरीद कर लाओ.Chanchal जी ने बहुत खूब व्याख्या की है उस राजनैतिक फकीर की जिसका नाम था राममनोहर लोहिया।
    “१२ अक्टूबर १९६७ को डॉ लोहिया ने तमाम तरह की गैर बराबरी से भरी इस दुनिया को अलविदा कह दिया . वे न तो किसी ओहदे पर थे , न मंत्री रहे , उनके पास कहने के लिए न ही कोइ कीर्तिमान था . न ही छल कपट से किसी सरकार को गिराने का हुनर था न ही ताल तिकडम से अपनी सरकार बनाने का हुनर . अगर कुछ था तो अहिंसा और पारदर्शी संघर्ष की लंबी यात्रा थी जो मुल्क ही नहीं बल्कि समूचे मानवीय समाज में व्याप्त हर तरह की गैर बराबरी के खिलाफ लड़ने का एक जज्बा था . बापू के बाद भारतीय राजनीति का फक्कड योद्धा जिधर भी चला है एक भूचाल आया है . आजादी की लड़ाई से लेकर आजाद भारत का इतिहास उनके संघर्ष के साथ चलता है . फैजाबाद , काशिविश्व्विद्यालय , कलकता और फिर बर्लिन में प्रोफ़ेसर बर्नर जेम्बार्द के सानिध्य में राममनोहर लोहिया का शोध उन्हें ‘नमक आंदोलन ‘ पर डाक्टरेट की उपाधि देता है और राम मनोहर डॉ लोहिया के रूप में विख्यात होते हैं . आजादी की लड़ाई में जेल की यातना मिलती है . गांधी को कहना पड़ा है डॉ लोहिया जब तक जेल में हैं हम खामोश नहीं बैठ सकते ‘. आजादी के बाद डॉ लोहिया पंडित नेहरू से टक्कर लेते हैं . कहते हैं – हम पहाड़ को हिला तो नहीं सकते लेकिन दरार तो डाल ही सकते है . डॉ लोहिया और पंडित नेहरू की टकराहट भारतीय राजनीति में मतभेद और मनभेद का अदभुत उदाहरण है . आजादी की लड़ाई के दोनों सिपाही रात के दो दो बजे तक बात चीत करते हैं एक दूसरे वैचारिक बहस करते है . और जहां मत भेद हो टा है उसे सार्वजनिक करने से भी नहीं चूकते . ‘नेहरू और लोहिया ‘ के इस रिश्ते पर जो काम होना चाहिए था नहीं हुआ . ६३ में डॉ लोहिया संसद पहुचे . उनके साथ देसी भाषा पहुची , गाँ संसद में खड़ा हो गया . गरीब के सवाल पर संसद हिल गयी . भारतीय राजनीति का स्वर्णिम काल है . ‘ लोकसभा में लोहिया ‘ एक मुकम्मिल दस्तावेज है . ३० सितम्बर को विलिंगटन अस्पताल में डॉ लोहिया भर्ती हुए . देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बगैर नागा के सुबह और शाम देखने जाती रही . देश विदेश से डाक्टर बुलाये गए लेकिन १२ अक्टूबर को डॉ लोहिया ने अलविदा कह दिया . नं आँखों से दुनिया ने देखा था डॉ लोहिया की अर्थी को प्रधानमंत्री से लेकर तमाम मंत्री कंदा दे रहे हैं . जेपी फूट फूट कर रो रहे थे और बस एक वाक्य बोल पाए थे – मनोहर हमसे दो साल छोटा था …
    डॉ साहब ! हम आपके अलविदा को नहीं कबूल करते . आप ज़िंदा रहेंगे तब तक दुनिया में गैर बराबरी रहेगी कोइ न कोइ ‘पागल ‘ आपको सामने कर के जंग का ऐलान करता रहेगा .
    आपको प्रणाम।”
    See TranslationHaider Rizvi
    35 mins ·
    Via प्रशांत कुमार सिंह
    हिंदू राष्ट्रवादी सम्पादक हरिशंकर व्यास ने अपने अख़बार नया इंडिया में आज लिखा है –
    “ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है, उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की हाकिम के कहे अनुसार उठक-बैठक कराते रहते हैं।
    “आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है। ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है – वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है। तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं!
    “अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है!
    “आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ। आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे! वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं।
    “सोचें, क्या हाल है! हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था। और यह मेरा निचोड़ है जो 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है! मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं। इसमें मैं ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए।
    “यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ काल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें। आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें।
    “आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं। एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं। मालिकों को बुला कर हड़काते हैं। धमकियां देते हैं।
    “जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता है, उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो। सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई।
    “इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो। इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी! जय हो अमित शाह! जय हो अरूण जेटली!
    “और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें! लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है। ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है। …”

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  5. सिकंदर हयात

    Satyendra PS
    12 hrs ·
    राहुल गाँधी ने चुपचाप निर्भया के परिवार की मदद की- उसके भाई को इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी, रायबरेली से पायलट प्रशिक्षण दिलवाया, और उसके पिता की अस्थायी नौकरी को पक्का करवाया। फिर ऊपर से जिनको पता था उनको कड़ा निर्देश भी दिया कि इसको प्रचार के लिए इस्तेमाल न किया जाय! अब ऐसा आदमी पप्पू नहीं होगा तो कौन होगा!
    Samar Anarya यहां तो ट्वीट कर दूध भी पहुंचा देते हैं उसे बेच खाते हैं! मां को नोट की लाइन लगवाकर बेचते हैं! ऐसे लोग जननेता होते हैं।

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  6. सिकंदर हयात

    Vikram Singh Chauhan
    15 hrs ·
    भारतीय मीडिया बोल रहा है राहुल गाँधी में बदलाव आया है जबकि सच यह है कि राहुल को लेकर भारतीय मीडिया में बदलाव आया है। दरअसल अब भारतीय मीडिया राहुल की सही रिपोर्टिंग कर रहे हैं। उनकी सही तस्वीर पेश कर रहे हैं। इसके पीछे मीडिया की अपनी मज़बूरी भी है ,मोदी को लेकर बनाये प्रोग्राम की टीआरपी एकदम नीचे चली गई है। मोदी के चेहरे से जनता हद से ज्यादा बोर हो चुकी है। अब वे राहुल में अपनी उम्मीद देख रहे हैं। मीडिया भाजपाइयों की तरह उसे पप्पू मानती थी अब उनकी हर एक छोटी बात को बड़ी खबर बना रही है। उनके जापानी मार्शल आर्ट ,उनके ट्वीट ,उनका पीडी ,उनका ट्वीट अब सब बड़ी खबर है। राहुल गाँधी में कोई बदलाव नहीं आया है ,वे वैसे ही सीधे सादे व्यक्तित्व के हैं जैसे पहले थे। बस वे बहुरुपिया और बड़बोले नहीं है। भारतीय मीडिया अपने स्वार्थ के लिए राहुल गाँधी की छवि को ख़राब बनाये रखा। विदेशी मीडिया में जब राहुल ने वाहवाही बटोरी तब भारतीय मीडिया शर्म से झुक गई। इन सब के बावजूद मैं व्यक्तिगत तौर पर राहुल गाँधी को एक अनचाहा नेता मानता हूँ। खुद के लिए अनचाहा। बिलकुल अपने पिता की तरह। काफी हद तक अंतर्मुखी ,जो जनता के दबाव और पार्टी को बचाने के लिए अपनी व्यक्तिगत जिंदगी का स्वाहा कर दिया। वे एक बेहतरीन इंसान है। मैं कभी राहुल से मिला तो मैं उनसे उनका बचपन ,एसपीजी सुरक्षा घेरे में कटी जवानी ,दादी और पिता की हत्या के बाद उनकी मनोस्थिति पर बात करना चाहूंगा। यह झूठ का संसार है , सच्चे लोगों की कद्र नहीं है। राहुल गाँधी ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा था ,पर हम सबने उनकी जिंदगी बिगाड़ दी है। नेताओं के अंदर अगर इंसानियत ढुंढी जाये तो राहुल गाँधी को सौ में सौ नंबर मिलेंगे।Vikram Singh ChauhanVikram Singh Chauhan
    31 October at 00:07 ·
    उत्तरप्रदेश में डेढ़ फुटिया आदित्यनाथ की सरकार ने 12 साल के बच्चे को बैंक का नोटिस दिया है कि वे अपने मृत पिता का कर्ज दो लाख रूपए जमा करे। अभी दो माह पहले ही इस डेढ़ फुटिया की सरकार ने बड़े -बड़े प्रमाण पत्र बांटे थे और 15 पैसे से लेकर 1 रुपया तक कर्जमाफी का प्रमाण पत्र दिया था। मामला सीतापुर के बिसवां स्थित थानगांव कस्बे का है , बैंक से नोटिस पाने वाला मासूम हर्षित अभी पांचवी में पढता है। उनके पिता लालता प्रसाद ने नवंबर 2005 में यूपी सहकारी ग्राम्य विकास बैंक से 52 हजार रुपये का कर्ज लिया था. तंगहाली की वजह से लालता प्रसाद वह कर्ज जमा नहीं कर सके और कर्ज की रकम ब्याज जुड़ते जुड़ते दो लाख को पार कर गई. उधर, तंगहाली और बीमारी की वजह से लालता प्रसाद की एक साल पहले मौत हो गई। बैंक को पता है लालता प्रसाद मर गया ,इसलिए अब नोटिस उनके 12 साल के बच्चे के नाम पर भेजी गई है। इस बच्चे पर अपनी बहन की शादी की जिम्मेदारी भी है। मीडिया में आने की वजह से अधिकारी वर्तमान में दिलासा जरूर दे रहे हैं ,पर मुझे पता है इस परिवार का अंजाम क्या होगा। जल्द ही बैंक इनकी जमीन कुर्क कर अपनी रकम वसूलेगी। यह परिवार सड़क पर आएगा ,चार दिन कहीं रोजी मज़दूरी करेगा ,फिर एक -एक कर फांसी पर टंग जायेगा या जहर खा लेगा। दुआ है ऐसा न हो ,पर ऐसा न हो पाए इसके लिए कौन इस परिवार के लिए सामने आएगा।
    15 hrs · Vikram Singh Chauhan
    30 October at 22:17 ·
    डॉक्‍टर को भगवान का दूसरा रूप कहा गया है,लेकिन ये आजकल आदर्शवादी शब्द बन गया है। अब तो डॉक्टरी पेशा है ,बड़ा व्यापार है। कुछ डॉक्‍टर ऐसे भी होते हैं जो ज्‍यादा पैसा कमाने के फेर में मरीजों को लूटने से भी बाज नहीं आते। कई बार तो मरीज डॉक्‍टरों की महंगी फीस नहीं चुका पाते हैं और इलाज न मिलने की वजह से दम तक तोड़ देते हैं।खबर आती है लाश को पैसे के भुगतान से पहले ले जाने नहीं दिया। ओपीडी में जाने के बाद पता चलता है कि 500 या 1000 दिए बिना डॉक्टर का चेहरा भी नहीं देख सकते। इन सबके बीच एक ऐसा भी डॉक्‍टर है जो नि:स्‍वार्थ भाव से लोगों की सेवा कर रहा है. खास बात यह है कि वह मात्र दो रुपये में लोगों का इलाज कर रहे हैं.जी हां, चेन्नई के 67 साल के डॉक्‍टर थीरुवेंगडम वीराराघवन 1973 से दो रुपये की फीस लेकर चेन्‍नई के लेागों का इलाज कर रहे हैं. स्टेनले मेडीकल कॉलेज से एमबीबीएस करने वाले डॉक्‍टर थीरुवेंगडम इलाके में इतने मशहूर हो गए कि आसपास के डॉक्‍टरों ने ही उनका विरोध शुरू कर दिया. डॉक्‍टर उन पर फीस बढ़ाने का दबाव डाल रहे थे. डॉक्‍टरों का कहना था कि उन्‍हें बतौर फीस कम से कम 100 रुपये लेने चाहिए। इन सबसे से बचने का उन्‍होंने एक नायाब तरीका ढूंढ निकाला. अब उन्‍होंने फीस का मामला पूरी तरह अपने मरीजों पर छोड़ दिया है. यानी कि फीस क्‍या हो और कितनी हो इसका फैसला मरीज ही करते हैं. अब मरीज उन्‍हें फीस के रूप में पैसे या खाने पीने का सामना दे सकते हैं. मरीज कुछ दिए बिना भी अपना इलाज करा सकते हैं. अपनी इस सेवा के लिए उन्हें लोग दो रुपये वाले डॉक्टर के रूप में भी पुकारते हैं। डॉक्‍टर थीरुवेंगडम वीराराघवन चेन्‍नई के इरुकांचेरी में सुबह 8 बजे से रात 10 के बजे तक मरीजों को देखते हैं. इसके बाद वह आधी रात तक वेश्यारपादी में भी मरीजों को देखने के लिए जाते हैं. उनका सपना है कि वह वेश्‍यारपादी की छुग्‍गियों में रहने वाले लोगों के लिए अस्‍पताल खोलकर जीवनभर वहां के लोगों की सेवा कर सकें। डॉक्‍टर थीरुवेंगडम के जज्‍बे को सलाम। ऐसे लोग अगर आपके आसपास है तो उनके बारे में लिखिए ,दुनिया को बताइये। बहुत जरूरत है ऐसे लोगो की।

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  7. सिकंदर हयात

    Geetali Saikia
    Yesterday at 09:39 ·
    #speaker_VS_communicator
    राहुल जी अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं.उनकी हिंदी भी माशाल्लाह है… वही PM मोदी जी की जहाँ हिंदी में गुजराती टोन साफ़ नजर आता है बल्कि अंग्रेजी में भी उतना कम्फर्ट नही महसूस करते नजर आते.
    लेकिन दोनों में एक बड़ा अंतर है. राहुल जी सिर्फ एक अच्छे स्पीकर हैं और PM मोदी जी बेहतरीन communicator .
    स्पीकर अपनी बात कहता है . उसका सन्देश ही उसके भाषण का प्रमुख अंग होता है जिसकी वजह से कई बार जनता स्पीकर से जुड़ नही पाती. जबकि communicator के भाषण में public मुख्य अंग होती है.एक communicator पहले खुद को पब्लिक से जोड़ देता है .उनकी जरूरतों को महसूस करता है .तत्पश्चात अपना सन्देश उन तक पहुचाता है ..लिहाजा पूरे भाषण के दौरान श्रोता उससे जुड़े रहते हैं. स्पीकर एकतरफा सम्प्रेषण का उदहारण है …वही कम्यूनिकेटर के संदेशों में म्यूच्यूअल इनफार्मेशन शेयरिंग होती है, सूचनाओं का विनिमय होता है.
    स्पीकर और communicator में बड़ा फर्क होता है.एक लीडर को communicator होना ही चाहिए.इसलिए मोदी जी आज PM हैं…और राहुल जी कांग्रेस के डिप्टी.—————————————————–Mohd Zahid is with Mohd Zahid.
    Yesterday at 07:13 ·
    FBP/17-233
    राहुल गाँधी को सुनिए , कुछ नया , कुछ सुकून भरा एहसास :-
    कल राहुल गाँधी “सूरत” के हज़ारों उद्योगपतियों के साथ “परामर्श” के कार्यक्रम में थे , बिल्कुल वैसे ही जैसे हम और हमारे कुछ दोस्तों के साथ कुछ दिन पहले अपने घर पर थे और हम कुछ दोस्तों की तीखी और कुछ हद तक बत्तीमीज़ी भरी शिकायतों को सुना और उसका जवाब भी दिया और कांग्रेस की गलती भी मानी।
    निःसंदेह यह व्यक्ति कपटी , धुर्त , मक्कार और ठेठ ढीठ , और साजिश करने वाला राजनीतिज्ञ नहीं है , यह साफ और नेक दिल का बंदा है जिसके दिल में सबके लिए हमदर्दी है।
    आप इस कारण राहुल गाँधी को “पप्पू” कह सकते हैं यह आपका अधिकार है।
    परन्तु यह भी सच है कि करण थापर और विजय त्रिवेदी के सवालों से घबरा कर जहाँ लाईव कैमरे पर नरेन्द्र मोदी इंटरव्यु छोड़ कर चले गये थे वहीं यह बंदा सूरत के हज़ारों नाराज़ व्यापारियों के सवालों का जवाब दे रहा है।
    सत्ता किसी एक शीर्ष व्यक्ति के कारण ही केवल नहीं चलती है परन्तु यह भी सच है कि उस शीर्ष व्यक्ति की सोच और स्वभाव का असर सत्ता और उसके निर्णयों पर पड़ता ही है।
    विध्वंषकारी सोच का व्यक्ति यदि सत्ता के शिर्ष पर है तो उस सत्ता के हर निर्णय उसके उसी विध्वंसकारी सोच पर आधारित होगा।
    उदाहरण के लिए नोटबंदी और जीएसटी का गलत क्रियान्वन एक विध्वंषकारी परिणाम लेकर सबके सामने है।
    कांग्रेस से लाख शिकायतों के बावजूद राहुल गाँधी से असहमति या नापसंद करने का कोई कारण नहीं है।
    बंदा सुनता है और कांग्रेस की पिछली गलतियों को स्विकार करता है उन गलतियों का तर्क के साथ कारण बताता है और भविष्य में ऐसी गलतियाँ ना हों इसका भरोसा दिलाता है।
    सबसे बड़ी बात कि अपने साथ की गयी नेताओं और लोगों की तमाम बत्तीमीज़ियों के बावजूद वह बदले में किसी के साथ बत्तीमीज़ी नहीं करता।
    मोदी जी उसके साथ चाहे जितनी अभद्र भाषा का प्रयोग करें यह शख्स उनको “मोदी जी” कह कर ही संबोधित करता है।
    कल स्मृति इरानी के निमंत्रण को ठुकरा कर सूरत के हजारों व्यापारी राहुल गाँधी के साथ संवाद और परामर्श करने पहुँचे।
    थोड़ा वक्त लगेगा पर 1 घंटे के इस कार्यक्रम को सुकून से सुनिए और देखिए।
    निश्चित रूप से आप की भी सोच राहुल गाँधी के प्रति बदलेगी।

    Reply
  8. सिकंदर हयात

    Vikram Singh Chauhan
    1 hr ·
    गुजरात की जनता सिर्फ राहुल गांधी को देखना चाहती है ,उन्हें सुनना चाहती है। बच्चे,बूढ़े और महिलाएं उनके हाथ छूना चाहती है। उनका सौम्य चेहरा राजनीति में आये खूंखार चेहरों के बीच ठंड में सुबह की गुनगुनी धूप की तरह लग रही है। देश के राष्ट्रीय चैनल उन्हें सिर्फ ढाबा और मंदिर तक ही दिखा रहे हैं। संपादकों ने भीड़ का फोटो एडिट करवा लिया है। संपादक बहुत डरते हैं कभी मालिक से ,कभी मालिक के मालिक से!————————Arun Maheshwari
    12 hrs ·
    The Telegraph – Calcutta
    ·
    गुजरात में मोदी की हार उनके प्रधानमंत्रित्व के अंत की भी घोषणा होगी
    आज के ‘टेलिग्राफ’ की एक रिपोर्ट के अनुसार मोदी ने गुजरात में प्रचार का एक भारी तूफान खड़ा करने के साथ ही तक़रीबन पचास सभाएँ करने का निर्णय लिया है । सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसी से लेकर तमाम चुनाव विशेषज्ञों ने गुजरात की परिस्थिति का आकलन करते हुए यह साफ राय जाहिर की है कि गुजरात के लोग भाजपा से बुरी तरह उखड़ चुके हैं और इस बार बदलाव चाहते हैं ।
    ऐसे में मोदी ने अपने को गुजरात का गौरव बताते हुए इस गौरव की रक्षा के लिये लोगों से भावनात्मक स्तर पर अनुनय-विनय करने का निर्णय लिया है । इसमें वे कई स्थानों पर बाक़ायदा आँसू भी बहायेंगे । ‘टेलिग्राफ’ की रिपोर्ट के अनुसार भाजपा के नेता यह भी प्रचार करेंगे कि मोदी यदि गुजरात में हारते हैं तो फिर दिल्ली में भी उनकी गद्दी पर ख़तरा पैदा हो जायेगा । गुजरात के गौरव की हानि होगी ।
    मोदी एक तरफ़ तो पूरे देश के लोग को चोर बताते हुए आए दिन उन्हें सताने की अपनी नाना योजनाओं की तालियाँ पीट-पीट कर घोषणाएँ करते दिखाई देते हैं, और दूसरी ओर उन्हीं के सामने रो कर, गिड़गिड़ा कर अपनी दिल्ली की सल्तनत बचाने की विनती करना चाहते हैं । ऐसे दुरंगेपन के अंदर छिपी प्रतिहिंसा की सचाई को कोई भी समझदार व्यक्ति आसानी से समझ सकता है । गुजरात के आम लोग जान गये हैं कि इस बार यदि मोदी कंपनी को पूरी तरह से पराजित नहीं किया गया तो वे ज़ख़्मी शेर की तरह पलट कर उन्हें अपने और भी घातक हमलों का निशाना बनायेंगे ।
    इसमें कोई शक नहीं है कि गुजरात में मोदी-शाह की हार दिल्ली में भी इनके शासन के अंत का ऐलान होगा ।
    हम यहाँ ‘टेलिग्राफ’ की इस रिपोर्ट को मित्रों से साझा कर रहे हैं :——————————————————————–Gaurav Solanki
    30 October at 13:32 ·
    तो बात यह है कि हिंदुस्तान में अगर किसी वक़्त 10 GB इंटरनेट इस्तेमाल हो रहा हो तो एक अनुमान के मुताबिक उसमें से करीब 7 GB तक पॉर्न के लिए होगा। दिलचस्प बात यह भी है कि हमारे कॉलेजों से हर साल करीब 10 लाख इंजीनियर निकलते हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत – यानी करीब 7 लाख के लिए कोई नौकरी नहीं है।
    और बात नौकरियों की ही चली है तो याद रहे कि भारत को हर साल कम से कम 2 करोड़ नई नौकरियों की ज़रूरत है, लेकिन फ़ॉर्मल सैक्टर में काम है बस 2 लाख लोगों के लिए। इस तरह पीछे छूटते जाते हैं करोड़ों लोग – जिनमें लड़के ज़्यादा हैं – नाराज़ और कभी-कभी आवारा लड़के। लड़कियाँ भी हैं पर उनकी अलग मुश्किलें हैं, उन पर कमाने की अभी इतनी ज़िम्मेदारी नहीं।
    इन लड़कों की भीड़ के बीच खड़े होकर आज के भारत को समझना थोड़ा आसान होगा और तब शायद इतना अजीब नहीं लगेगा कि 15000 से ज़्यादा लोग ‘बोल ना आंटी आऊं क्या’ के फ़ेसबुक इवेंट पेज पर कहते हैं – आई एम गोइंग। उनमें से कई सौ कनॉट प्लेस जाकर चिल्ला-चिल्लाकर यह गाना गाते भी हैं। वे उस लकीर पर खड़े हैं, जहाँ किसी का मज़ाक उड़ाना और उसका फ़ैन बनना एक हो जाता है। और इस लकीर पर बहुतों को पता नहीं कि यह गाना रेप की धमकी के करीब खड़ा है। बहुतों को पता भी है, पर तब यही तो है जो वे चाहते हैं।
    फिर क्विंट की एक रिपोर्टर जवाब में रैप बनाती है और आख़िर पूरा प्रोग्रेसिव तबका गाने को यूट्यूब से हटवाने में कामयाब भी हो जाता है और लॉजिकली तो पागलपन यहाँ ख़त्म होना था, लेकिन यहीं ठीक से शुरू होता है। फ़ेसबुक पर और बड़ी भीड़ जुटती है, क्विंट को डाउनरेट किया जाता है और 2 दिन के अंदर उस लड़की को मिलते हैं 50000 से ज़्यादा एब्यूसिव मैसेज जिनमें करीब इतनी ही बार रेप या हत्या की धमकियाँ भी हैं।
    यह बस एक किस्सा है। ऐसे दर्जनों किस्से हर हफ़्ते हैं और है करोड़ों लड़कों की भीड़। भारत दुनिया का सबसे जवान देश है, औसत उम्र – करीब 29। और प्लान तो ये था कि हमें महान होना था। अभी कुछ साल पहले ही तो आईएमएफ़ ने कहा था कि भारत इतना जवान है कि अगले 20 साल तक जीडीपी हर साल एक्स्ट्रा 2 प्रतिशत बढ़ सकती है।
    पर हम पागल हो गए हैं। अब तो इसमें कोई शॉक वैल्यू भी नहीं कि हम एक भयानक तरह से भटक गए हैं। इक्कीसवीं सदी कम से कम उस देश की तो नहीं हो सकती जिसे हर साल 2 करोड़ नौकरियाँ चाहिए पर उसके पास हैं बस 2 लाख।
    कुछ ऐसा ही राहुल गाँधी ने कहा हाल में – और कहा उन्होंने सॉरी वाले लहजे में ही – पर उस ग़लती के सॉरी पर कोई क्या रीएक्ट करे जिसने एक पूरे देश से उसका भविष्य और वर्तमान छीन लिया हो। वही ग़लती जो पिछले 3 साल में और भी बड़ी होती गई। और हममें से करोड़ों ऐसे हो गए, जो काम कर सकते हैं, जो काम करना चाहते हैं – पर कोई काम है कहाँ?
    बलात्कार की धमकियाँ देने वाली और बलात्कार करने वाली, कभी गाय के नाम पर – कभी कुरान के नाम पर पागल होती इस भीड़ को कोसना ज़रूरी तो है पर हम अक्सर इसी पर क्यों रुक जाते हैं? क्या इसलिए कि इसकी मूल वजह बहुत डरावनी है?
    क्या हमीं सबसे बड़े विक्टिम हैं? ख़ुद को समझदार समझने वाले हम – जो इन ट्रोल्स से नफ़रत करते हैं, अपने तबके के लोगों की हत्याओं पर भड़क उठते हैं, नए कानून बनाने की जुनूनी माँगें करते हैं और हिंसा का विरोध करते-करते हर दिन ज़्यादा हिंसक होते जाते हैं।
    कितनी बार पूछते हैं हम ख़ुद से या किसी और से – कि यह नाराज़ और आवारा भीड़ बढ़ती क्यों जा रही है?
    खाली बरतन की तरह इधर से उधर घूमते बहुत सारे लड़के जो ख़ुद भी इसी मर्दवादी समाज के विक्टिम हैं। जो सिर्फ़ इसलिए अपने परिवार और समाज की परिभाषा में ठीक से मर्द नहीं हैं क्योंकि शाम को 100 रुपए भी कमाकर नहीं ला पाते। जो सेक्शुअली कुंठित हैं क्योंकि शादियों के बाज़ार में उनका खरीददार कोई नहीं। क्योंकि उनमें ऐसा कुछ नहीं जो उन्हें प्रगतिशील या पारम्परिक, किसी भी परिभाषा में लड़कियों के लिए डिजायरेबल बनाए। और हैरत नहीं कि वे अपने भीतर समूची इंसानियत से नफ़रत करते हैं और कभी-कभी रोते भी हैं।
    हम हर साल कितने लाख सोश्योपैथ बनाते हैं, किसी को नहीं मालूम।
    हर 2 में से 1 बच्चा कुपोषण का शिकार है और यह समझने के लिए विज्ञान की डिग्री नहीं चाहिए कि क्यों इनमें से बहुत सारे बच्चे बड़े होकर तर्क नहीं कर पाते और तर्क नहीं समझ पाते। क्यों इन्हें बरगलाना आसान होता है, क्यों ये झूठे इतिहास पर गर्व करते हैं और धर्म की छाया चुनते हैं, भले ही वह इन्हें मार डाले।
    हम वॉट्सऐप पर ज़्यादा भरोसा करते हैं क्योंकि एजुकेशन का तो भट्टा सरकारों ने ऐसा बिठाया है कि उस पर बौखलाए बिना बात करना बहुत मुश्किल है। दुनिया के 75 देशों के छात्रों पर किए गए एक सर्वे में भारत 74वें नम्बर पर रहा। सर्व शिक्षा अभियान का बेड़ा नेताओं और अधिकारियों ने इस कदर गर्क किया है कि सरकारी स्कूलों के पांचवीं क्लास के आधे बच्चे 75 में से 74 नहीं घटा सकते। इसीलिए बड़े होकर पूछ भी नहीं सकते कि वर्ल्ड बैंक से मिले हज़ारों करोड़ कहाँ गए?
    ऐसी बहुत सारी बातें हैं और ये धीरे-धीरे ज़्यादा बोरिंग होती जाती हैं। इसीलिए हम अक्सर इन पर बात नहीं करते। हम अपने-अपने हिस्से का पैसा कमाते हैं और तभी बोलते हैं, जब यह भीड़ हममें से किसी को घेर लेती है या मार डालती है।

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  9. सिकंदर हयात

    Vikram Singh Chauhan
    16 mins ·
    राहुल गांधी के रूप में नया अध्यक्ष कांग्रेस को मिलने वाला है लेकिन पेट दर्द भाजपाइयों को हो रहा है। संबित पात्रा बोल रहा है अगर राहुल गांधी का सरनेम गांधी नहीं होता तो वे राजनीति के डस्टबिन में पड़े होते। एक पल को उनके बात पर यकीन भी कर ले पर भाजपा में तो और बुरा हाल है। वहां बुजुर्ग आडवाणी,यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी सब डस्टबिन में ही पड़े हुए हैं। जब बिजनेसमेन धीरूभाई का बेटा मुकेश,अनिल अंबानी बिजनेसमेन बन सकता है,अमिताभ बच्चन का बेटा अभिषेक घटिया एक्टिंग के बावजूद अभिनेता बन सकता है तो राहुल गांधी माता पिता की तरह राजनेता और कांग्रेस अध्यक्ष क्यों नहीं बन सकता है। उसका कैरियर राजनीति है समझ लीजिए। उनकी इच्छा अनिच्छा क्या कभी भारतीय मीडिया ने पूछा है। भारतीय मीडिया तो पिछले बीस साल से प्रियंका के बारे में भी भविष्यवाणी करती रही वो अब आएगी राजनीति में आज आएगी राजनीति में। इंदिरा जैसी दिखती है फलाना ढिमका।मीडिया ने राजीव गांधी के मौत के बाद ही उनका राहुल को उनका उत्तराधिकारी बना दिया था। लेकिन राहुल ने जल्दबाजी नहीं कि और सत्ता में पदों से दूर रहे।कांग्रेस के पिछले दो कार्यकाल में वे मंत्री बन सत्ता सुख ले सकते थे लेकिन वे जमीन पर काम करते रहे। देश की मीडिया उनकी सादगी को पप्पू नाम दे दिया और उनका मखौल उड़ाती रही।आज उनका एक बयान दस मंत्री को माइक के सामने आने को मजबूर करता है।उनका एक स्टैंड केंद्र को फैसले बदलने को मजबूर करता है,यही उनकी ताकत है। उन्होंने कभी ताल नहीं ठोका लेकिन विपक्ष के वे सर्वमान्य नेता है। बीच मे लगा देश को अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस का विकल्प दिया है लेकिन अभी अरविंद को बहुत लंबा रास्ता तय करना है। अरविंद केजरीवाल से जितना लाभ आम आदमी पार्टी नहीं उठा पाई है उससे ज्यादा कांग्रेस ने उठा लिया है। अरविंद की तरह पार्टी बड़े मुद्दों को अब सोशल मीडिया में ला रही है। कांग्रेस का बड़ा संगठन भी इसमें काम आ रहा है। जब जब लगता है कांग्रेस अब खत्म होने के कगार पर है तभी बुझा दीपक फिर से जल उठता है। अन्ना आंदोलन और निर्भया प्रकरण के समय राहुल गांधी को काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी कि उस वक़्त राहुल नदारद रहे लेकिन आज जिस तरह से निर्भया के भाई की सफलता के पीछे राहुल गांधी की मानवीय छवि सामने आई है देश उसे स्वीकार करने लगा है।हम भारतीय काफी भावुक होते हैं ऐसी घटनाएं हमारे दिल और दिमाग में गहरा असर डालती है। ऐसे वक्त में जब हर नेता झूठ बोलने का रिकॉर्ड बना रहा है तब एक नेता चुपचाप एक परिवार की मदद करता रहा। ऐसे परिवार की मदद जिसका न्यूज़ बनाकर सब चैनल वालो ने अपनी टीआरपी बढ़ाई लेकिन जेब से एक पैसा नहीं निकला।आसूंओं का भी कारोबार करते हैं मीडिया हाउस। ऐसे सादगी पसंद नेता की ही देश को और कांग्रेस पार्टी को जरूरत थी।राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनने की अग्रिम शुभकामनाएं।Vikram Singh Chauhan
    3 hrs ·
    आज मुझे ये बात समझ में आ गया कि शशि थरूर यूएन का महासचिव क्यों नहीं बन पाया था। क्योंकि उनके अंदर वो घटिया मानसिकता ज़िंदा है जो भारत के पुरुषों को अपने बाप दादाओं से विरासत में मिला है। आप लोगों को भी बुरा लग रहा होगा पर सच यही है। किसी को सरनेम,जाति और रंग का मजाक उड़ाने की परंपरा हमें अपने बाप दादाओं से ही मिला है। छिल्लर को चिल्लर कहकर मजाक उड़ाना सामान्य नही है। उनका एक अच्छा नाम भी है मानुषी जिसका अर्थ होता है मनुष्य की,इसे देवी लक्ष्मी भी धार्मिक लोग कहते हैं। इस पक्ष को किसी ने नहीं देखा।कुछ लोग कह रहे हैं सिर्फ गोरे और सुंदर लोग ही मिस वर्ल्ड बनते हैं।ये भी गलत है।वहां मिस केन्या भी फाइनलिस्ट में थी।और सुंदरता रंग से परे है । अगर काले को काला कहना रंगभेद है तो गोरे को गोरा कहना भी रंगभेद है। गोरे लोग भी रंगभेद के शिकार होते हैं।तमिलनाडु सेलम में मैं खुद इसका शिकार हुआ। कहने का मतलब यह है कि भारतीय पुरुष इंसान बनने की प्रक्रिया में बहुत पीछे हैं।बहुत पीछेVikram Singh Chauhan
    Yesterday at 15:20 ·
    अपने माता पिता के निधन के बाद फेसबुक में त्वरित लाइक और संवेदना पाने के लिए जो पोस्ट डाले जा रहे हैं वे मेरी नज़र में अमानवीय है। क्या किसी इंसान के पास इतनी शक्ति बची रहती है कि वे अपने माँ बाप को खोने के कुछ मिनट बाद फेसबुक में सैड रिएक्शन गिनता बैठे रहे। कोई अपनी पिता की जलती हुई चिता दिखा रहे हैं तो कोई कमेंट का रिप्लाय कर बोल रहा है रो रोकर बुरा हाल है। क्या निधन के दिन ही पोस्ट डाला जाना जरूरी है। क्या कुछ दिन बाद पोस्ट नहीं डाला जा सकता। यह सोशल मीडिया का सबसे घृणित चेहरा है। भावनाओं और दुखों का लाइक पाकर मिलेगा क्या? ऐसे वक्त में ढाढ़स बांधने और टिकने के लिए किसी दोस्त का कंधा देखिये बजाय यहां हजारों सैड लाइक और कमेंट के। पोस्ट दुख से उबरने के बाद कर लीजियेगा।

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