यशवंत सिंह

सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा क्यों न करें, बता रहे हैं यशवंत सिंह!

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सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा मत करिए. ये पेड लोग हैं. ये दोनों अपने-अपने मालिकों के धंधों को बचाने-बढ़ाने के लिए वैचारिक उछल कूद करते हुए आपको बरगलाएंगे, भरमाएंगे, डराएंगे, अपने पक्ष में खड़े होने के लिए उकसाएंगे और इसके लिए देर तक व दूर तक ब्रेन वाश करते चलते जाएंगे…

रवीश कुमार को हर पत्रकार डरपोक दिखने लगा है. उन्हें दिल्ली में डर लगने लगा है. हर किसी का फोन टेप होता दिखने लगा है…लोकतंत्र में सारा सत्यानाश हुआ दिख रहा है…ये दौर भाजपा राज का है सो एनडीटीवी को अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है और रवीश कुमार सुर ताल भिड़ाकर गाने में जुटे हैं- ”अंधेरे में जो बैठे हैं, नजर हम पर भी तुम डालो…. अरे ओ रोशनी वालों…”

कुछ ऐसा ही हाल तब जी ग्रुप का था, जब कांग्रेस राज में उगाही के मामले में सुधीर चौधरी उठाकर जेल भेज दिए गए थे और सुभाष चंद्रा प्राण बचाए भागते फिर रहे थे. तब जी न्यूज को सब कुछ खराब होता हुआ, हर ओर अराजकता की स्थिति, अभिव्यक्ति की आजादी का गला घुटा हुआ, आपातकाल सरीखा माहौल दिख रहा था… तबके जी न्यूज के एंकर सुर ताल भिड़ाकर कुछ वैसा ही गीत गाए बकबकाए जा रहे थे.

दोस्तों, भारत अदभुत देश है. यहां कोई मोदी आए या कोई मनमोहन, जनता को बहुत फरक नहीं पड़ता. भारत वाले बहुत संतोषी और मस्त जीव हैं. जब हम सब अंग्रेज को सौ साल तक झेल गए जो कि बाहरी और विदेशी थे, फिर ये मनमोहन, मोदी तो अपने ही देश के हैं. मनमोहन ने क्या बना-बिगाड़ दिया था और मोदी ने क्या रच-उखाड़ लिया है…तब भी अंबानी बिरला लूट रहे थे, सत्ता के प्रिय बने हुए थे… आज भी अंबानी अडानी बिरला सब लूट रहे हैं, सत्ता के प्रिय बने हुए हैं… तब भी जो ‘अप्रिय’ थे उन्हें ठीक करने के लिए ढेर सारे सरकारी कुकर्म किए जाते थे, आज भी जो ‘अप्रिय’ हैं, उनकी हंटिंग होती रहेगी…

कांग्रेस के जमाने में जो आर्थिक नीति थी, वही भाजपा के जमाने में है बल्कि भाजपा वाले कांग्रेस से कुछ ज्यादा स्पीड से उनकी सारी पालिसिज लागू कर रहे हैं.. जीएसटी से लेकर फारेन इनवेस्टमेंट और प्राइवेटाइजेशन को देख लीजिए… इसलिए उनके नाम पर डराकर इनके पाले में करने का खेल वही नहीं समझेगा जो वाकई दिमाग से पैदल होगा…

धर्म जाति की पालिटिक्स हर वक्त थी. 1857 की क्रांति से लेकर किसान विद्रोहों तक में धर्म जाति के आधार पर गोलबंदियां की गई थीं. आजादी के इतने सालों बाद भी गोलबंदियां इसी आधार पर होती रही हैं. कांग्रेस वाले धर्म-जाति-क्रांति आदि के समस्त पैकेज का इस्तेमाल रणनीतिक तौर पर समय व माहौल देखकर करते रहते हैं, बिलकुल ‘निर्दोष’ अंदाज में.. पर भाजपाई और अन्य पार्टियां वही काम खुलकर ‘भदेस’ तरीके से कर रही हैं..

जनता चेतनासंपन्न होती जाएगी तो उनके सोचने विचारने और वोट देने का पैर्टन बदलता जाएगा. इसमें कोई घबड़ाने वाली बात नहीं है. हम मनुष्य आज जहां तक पहुंचे हैं, वहां तक किसी पैराशूट से हमें नहीं लाया गया है बल्कि हम क्रमिक विकास और इवोल्यूशन की हजारों लाखों करोड़ों साल की यात्रा करके आए हैं… ये यात्रा जारी है और सब कुछ बेहतर होगा, ये उम्मीद करते रहना चाहिए…

जो लोग भाजपा से डराकर हमको आपको कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करना चाहते हैें उनको बताना चाहता हूं कि कांग्रेस ने सबसे ज्यादा कम्युनिस्ट नौजवान अपने राजकाज के दौरान मरवाए हैं. वो चाहे पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचलने का काम रहा हो या पूरे देश में कांग्रेसियों द्वारा चलाए गए नक्सल-कम्युनिस्ट विरोधी अभियान के जरिए बड़े पैमाने पर छात्रों, किसानों-मजदूरों का सफाया करवाना रहा हो.

इसी कांग्रेस ने लाखों सिखों का कत्लेआम पूरे देश में अपने नेताओं के नेतृत्व में कराए. सारे पाप इन कांग्रेसियों ने कराए और सिखाए हैं. इसलिए भाजपा का डर दिखाकर आपको जिनके पक्ष के सपने दिखाए जा रहे हैं, जिनके पक्ष में हमें गोलबंद करने को उत्तेजित-उत्प्रेरित किया जा रहा है, वे ज्यादा बड़े पापी हैं. भाजपा वाले तो बड़े पापियों से थोड़ा बहुत सबक सीखकर आए हैं और इसका समय समय पर नौसिखियों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और इस प्रक्रिया में पकड़े भी जा रहे हैं. कांग्रेस के जमाने में भी सीबीआई का रोजाना गलत व मनमाफिक इस्तेमाल होता था, आज भाजपा के राज में भी हो रहा है. सत्ता में आपने पर सबका चरित्र एक-सा हो जाता है, इसे समझ लीजिए क्योंकि सत्ता खुद में एक संस्था होती है जो सबसे ज्यादा मजबूत और सबसे ज्यादा संगठित होती है. सत्ता में भाजपाई आएं या कांग्रेसी या कम्युनिस्ट या सपाई या बसपाई या कोई और… सबकी कार्यशैली अंतत: सत्ता परस्ती वाली यानि बड़े लोगों के पक्षधर वाली हो जाती है… जनता तो बेचारी जनता ही बनी रहती है, थोड़ी कम, थोड़ी ज्यादा… वो अपने मित्र जेपी त्रिपाठी एक जगह लिखते हैं न- ”बाबू हुए तुम, राजा हुए तुम, आदमी बेचारे के बेचारे हुए हम…”

भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा आदि इत्यादि ढेरों पार्टियां जो हैं.. .ये सब पावर की लालची हैं, सत्ता की लालची हैं, पैसे की लालची हैं, पूंजीपरस्त हैं, झूठे और मक्कार हैं. जनविरोधी हैं… ब्लैकमनी के केंद्र हैं… हरामीपने और उपद्रव की कुंजी हैं… इनके चक्कर में न फंसिए. इन पार्टियों ने अब अपने अपने टीवी चैनल गढ़ लिए हैं. जो सत्ता मेंं होता है, उसकी तरफ मीडिया परस्ती ज्यादा होती है, उसकी तरफ न्यूज चैनल ज्यादा झुके रहते हैं. जैसे सूरज की तरफ सारे फूल पौधे और वनस्पतियां झुकी होती हैं. रीयल जर्नलिज्म अगर कोई कर रहा है तो वह सोशल मीडिया मे थोडा बहुत हो रहा है, वेबसाइटों और ब्लागों के जरिए थोड़ा बहुत हो रहा है. ये बाजारू मीडिया वाले, ये एनडीटीवी और जी न्यूज वाले तो बस टर्नओवर जोड़ रहे हैं, फायदे देख रहे हैं…

चिदंबरम की गोद में बैठकर जब प्रणय राय टूजी स्कैम के पैसे के ब्लैक से ह्वाइट कर रहे थे तो रवीश कुमार को दिल्ली में घना अंधेरा नहीं दिख रहा था… जब एनडीटीवी और चिदंबरम के स्कैम को उजागर करने वाले ईमानदार आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को पागलखाने भिजवा गया था तो रवीश कुमार की संवेदना नहीं थरथराई और उनको मनुष्यता व लोकतंत्र के लिए एक भयावह दौर नहीं दिखा. अब जब उनके मालिक की चमड़ी उनके काले कारनामों के चलते उधेड़ी जा रही है तो उन्हें सारी नैतिकता और दुनिया भर के सारे आदर्श याद आने लगे हैं… उनका बस चैनल की स्क्रीन पर फूट फूट कर रोना ही बाकी रह गया है..

अरे भइये रवीश कुमार, तू अपनी सेलरी भर पूरा पैसा वसूल एक्टिंग कर ले रहा है… उसके बाद आराम से रह.. चिल्ल कर… एक्टर वैसे भी दिल पर नहीं लेते… रोल खत्म, पैसा हजम… उसके बाद घर परिवार और मस्ती…इस अदभुत देश को और यहां की फक्कड़ जनता को कुछ नहीं होने जा रहा… बहुत आए गए शक हूण कुषाण मुगल अंग्रेज और ढेरों आक्रांता… देश नहीं मरा न मरेगा… आप कृपा करके एनडीटीवी के शेयरों का भाव डबल दिखाकर बैंक को चूतिया बनाकर कर्ज लेने के फर्जीवाड़े की सच्चाई पर एक प्राइम टाइम डिबेट करिए जिसमें बैंक के प्रतिनिधि समेत सभी पक्षों को लाकर स्टूडियो में बैठाइए बुलाइए और दूध का दूध पानी पानी कर दीजिए… आप जरा एनडीटीवी-चिदंबरम के सौजन्य से पागलखाने भिजवाए गए आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को भी बुला लीजिएगा पैनल में जो सुना देंगे आपके एनडीटीवी चैनल और इसके मालिक प्रणय राय की चोरी की 100 कहानियां…

रवीश जी, युवाओं को भरमाना छोड़िए… सच्ची पत्रकारिता का नाटक बंद करिए… हां, पेट पालने के लिए आपको सेलरी की जरूरत पड़ती है और प्रणय राय को एक ऐसे एंकर की जरूरत पड़ती है जो उनको डिफेंड कर सके तो आप दोनों की जोड़ी ‘जेनुइन’ है, उसी तरह जैसे सुधीर चौधरी और सुभाष चंद्रा की है. कांग्रेस राज में जिस तरह संघिये सब डराते थे कि जल्द ही भारत में कांग्रेस के सहयोग से मुस्लिम राज आने वाला है, उसी तरह भाजपा के राज में एनडीटीवी वाले डरा रहे हैं कि बस सब कुछ खत्म होने वाला है क्योंकि मोदिया अब सबका गला ही घोंटने वाला है…

अरे यार बस करो… इतना भी हांका चांपा न करो… प्रणय राय की थोड़ी पोल क्या खुल गई, थोड़ी चड्ढी क्या सरका दी गई, आप तो अपने करियर का ‘द बेस्ट’ देने पर उतारू हो गए… पोलैंड से लेकर न्यूयार्क टाइम्स और ट्रंप से लेकर प्रेस कार्प की नैतिकता के पत्र के जरिए प्रणय राय को दूध से नहलाकर पवित्र कहने को मजबूर करने लगे….

हम लोगों को यकीन है कि जितनी चिरकुटई कांग्रेस शासन के राज मेंं हुई, उससे काम ही भाजपा के राज में होगी क्योकि भाजपाइयों को अभी संपूर्ण कांग्रेसी चिरकुटई सीखने में वक्त लगेगा… हां, ये पता है कि दोनों ही पूंजीपतियों को संरक्षण देकर और उनसे आश्वस्ति पाकर राज करते हैं इसलिए इनके शासनकालों में जनता का बहुत भला न होने वाला है.. और, जनता बहुत बुरे में भी या तो मस्त रहती है या फिर मारपीट करती है या फिर सुसाइड कर लेती है. उसे अपने रास्ते पता हैं… उसके लिए नए रास्ते न तो आपके प्राइम टाइम लेक्चर से खुल सकते हैं और न ही मोदी जी के ‘देश बदल रहा है’ के जुमलों से…

रवीश भाई और सुधीर चौधरी जी, लगे रहिए… आप दोनों को देखकर यकीन होने लगा है कि एक कांग्रेस और दूसरा भाजपा का प्रवक्ता कितना दम लगाकर और कितना क्रिएटिव होकर काम कर रहे हैं… बस इतना कहना चाहूंगा कि ये देश इस छोर या उस छोर पर नहीं जीता है और न जीता रहा है… इस देश का अदभुत मिजाज है… वह कोई नृप होए हमें का हानि की तर्ज पर अपने अंदाज में अपनी शैली में जीवित रहा है और जीवित रहेगा.. पहाड़ से लेकर मैदान तक और रेगिस्तान से लेकर समुद्र तटीय इलाकों तक में फैले इस देश में अंधेरा लाने की औकात न किसी मोदी में है और न किसी मनमोहन में हो सकी…

फेसबुक के साथियों से कहना चाहूंगा कि इस छोर या उस छोर की राजनीति-मीडियाबाजी से बचें.. दोनों छोर बुरे हैं… दोनों निहित स्वार्थी और जनविरोधी हैं.. सारा खेल बाजारू है और इसके उपभोक्ता हमकों आपको बनाया जा रहा है, जबरन… आप रिएक्ट न करें.. आप मस्त रहें… जीवन में राजनीति-मीडिया के अलावा ढेर सारा कुछ है लिखने करने पढ़ने देखने को… इस भयानक गर्मी में जाइए घूम आइए पहाड़… चढ़ जाइए हिमालय की उंचाई और अपनी आत्मा तक को पवित्र और मस्त कर आइए… देह के पार देख आइए और रुह संग बतिया आइए… ये रवीश कुमार और सुधीर चौधरी तो लाखों रुपये लेता है, जैसा मालिक कहता है, वैसा स्क्रिप्ट पढ़ता है… एक का मालिक कांग्रेस के गोद में बैठा रहता है, दूसरे का भाजपा की गोद में… इनके चक्कर में अपनी नींद, उर्जा और धैर्य बर्बाद न करिए… जाइए, हिमाचल उत्तराखंड आपको बुला रहा है… किसी जाती हुई सामान्य सी सरकारी बस पर बैठ जाइए और चार पांच सौ रुपये में पहाड़ की बर्फ से ढकी चादर को हिला आइए…

जाइए अपनी जिंदगी जी आइए और भटक मरने से बच जाइए…. ध्यान रखिएगा, सारा प्रपंच यह तंत्र आपको भटकाने और मुर्दा बनाने के लिए रचता है… ताकि आपका खून पीकर वह अपने को अमर रख सके…

वो कहते हैं न कबीर… साधो ये मुर्दों का गांंव… और ये भी कि… भटक मरे न कोई….

तो दोस्तों, मुर्दों से दिल लगाना बंद कर दीजिए और भटक मरने से बचने की तरकीब ढूंढने में लग जाइए… शायद जीवन का मतलब मकसद समझ में आ जाए…

जैजै
यशवंत

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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29 thoughts on “सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा क्यों न करें, बता रहे हैं यशवंत सिंह!

  1. ramesh kumar

    YASHWANT SINGH SE SAHMAT , MAGAR EK BAAT TO HAI KE RAVISH KUMAR AAJ KAL HINDI PATRKAARITA KI IJJAT BACHAYE HUE HAI !

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  2. prasad joshi

    भारत की राजनितीमे हिंदुत्व हो या सेक्युलरीझम ये दोनो ही रेल की पटरी की तरह है. दिखते दो अलग पर जाते है एक ही जगह.
    और ऱाजनेता रेलगाडी होते है, और जनता पँसेंजर.जो दाये बैठा हो उसे सिर्फ दाये ने आने वाले पेड,खेत, घर दिखाइ देते है और जो बाये बैठा है ऊसे बायी तरफ के. Left,Right ये बहोत सही शब्द है.

    मुझे सिर्फ एक और बात इसमे जोडनी है. राजनिती बुरी नही है. लेखक ने राजनेताओ का चित्र नकारात्मक बनाया है. राज किसी का भी हो काँग्रेस, भाजपा, हम आगे बढते रहते है. हा कभी कभार कुछ दौर बुरे भी होते है. तो ऐसेमे हमे शांतीसे काम लेना होता है. राजनेता भ्रष्ट होते जरुर है पर वो काम भी करते रहते है. अब हमारा देश युरोप या अमेरीकी तरह नही बन सकता है क्युं की हमारी आबादी और कुल क्षेत्र के हिसाब से बहोत जादा है. यही बात हमे रोके रोकती है.

    ये सब पुरा एक system है. हम इसके हिस्से है. युवाओको लगता है कि system ही खराब है. पर ये एक नकारात्मक सोच है. हमे एेसा कहना चाहीये system is in the phase of run time upgradation.

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  3. qutubuddin ansari

    बहुत हि सर्थक लेख् एक्दम सहि कहा है यश्वन्त जि ने !

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  4. zakir hussain

    सुधीर एक अपराधी था, इसलिए घबराया हुआ था, उसके साथ इस अपराध मे उसका मालिक सुभाष चंद्रा भी शामिल था.
    रवीश ने कोई अपराध नही किया है. जिस बात के लिए, CBI ने रेड डाली, वो भी अपराध नही है, उस मुद्दे पर, प्रणोय रॉय भी अपराधी नही है.
    यशवंत सिंह, CBI की रेड, और सुधीर चौधरी के बहाने दोनो पत्रकारो को अपराधी या अपराधी मालिको के नौकर की तरह बतला कर, एक जैसा साबित करना चाह रहे हैं. जबकि पत्रकारिता के मूल्यों मे दोनो की कोई तुलना ही नही की जा सकती.

    ndtv ने icici से जो लोन 9 साल पहले लिया था, उसे 6 महीने मे ही चुका दिया, और इस लोन मे 40 करोड़ का ब्याज, icici ने माफ़ कर दिया. और icici ने इसकी कोई शिकायत भी नही की. निधि राज़दान ने संबित पात्रा से जिस तरीके से बात की, उसको देख के लग ही रहा था कि बीजेपी चुप नही रहने वाली.

    चलिए, अब अगर किसी को लगता है कि ndtv ने कुछ ग्लात नही किया है, तो CBI के रेड से क्या डरना? देखिए ये रेड NDTV को डराने के लिए नही है. रविश, श्रीनिवास, राजदीप, कमाल ख़ान अपने पेशे के प्रति ईमानदार लोग है, उन्हे इससे फ़र्क भी नही पड़ेगा. ये रेड बाकी चैनल्स और पत्रकारो को डराने के लिए है. जिनमे हिम्मत नही, बिकने की बड़ी कीमत लेके, आराम से जिंदगी बसर करो.

    CBI को बेहद ज़रूरी मसलो मे सरकार के निर्देश पे शामिल किया जाता है. वैसे, हर केस के लिए, हमारे यहाँ न्यायपालिका है. सवाल यही है कि, अगर कोई अनियमितता थी भी, तो CBI को बीच मे लाने की क्या ज़रूरत थी? यहाँ तो लोन चुका दिया गया. icici ने अपनी तरफ से कोई शिकायत नही करी. लेकिन सरकारी बैंको का हज़ारो करोड़ रुपया डकारने वालो के उपर CBI जाँच बैठी? यशवंत जी, सरकार की इस घटिया हरकत के लिए, सुधीर चौधरी जैसे बिके हुए पत्रकार की बुराई कर के, आप निष्पक्ष दिखने की कोशिश कर रहे हो, जिसमे बेवकूफ़ लोग ही फँसेंगे.

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    1. dilip

      आप के पास क्या सबुत है कि ndtv ने कुछ ग्लात नही किया है ? क्या आप ndtv के वहिखाते देखते है जो आप को सब पता है ?

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  5. zakir hussain

    यशवंत जी, ये कह रहे हैं कि देश का व्यक्ति ना इस सिरे पे है, ना दूसरे सिरे पे. तो ध्यान रखिए कि बीजेपी और कम्युनिस्ट पार्टियाँ ही विचारधारा के हिसाब से दो धुरो पे हैं, बाकी मध्यम मार्गी राजनीति के बहुत से विकल्प देश मे है, या ढूँढे जा सकते है.

    लेकिन राजनीति या मुद्दो की समझ, एक आम मतदाता मीडिया के ज़रिए बनाता है. वरना बेहद शिक्षित व्यक्ति भी हर विषय के बारे मे तब तक सही राय नही बना सकता, जब तक उसके बाद सही तथ्य नही आते. अगर, सारे चैनल्स सिर्फ़ सैनिको की आड़ मे ज़ज्बात ही परोसेंगे, तो देश का आम नागरिक भी एक छोर को समर्थन करने लगेगा. बीजेपी की राजनैतिक सफलता मे इस रणनीति का प्रयोग हुआ है.

    मैने इन 4-5 दिनो मे देखा है कि NDTV को पसंद करने वाले, कई लोग मिले कि यार ये भी भ्रष्ट निकला. CBI की रेड पड़ गयी. बिना ये जाने कि कौनसा मसला था, क्या मसला था. ये चरित्रा पे लांछन लगाने का बेहद पतित तरीका था.
    उससे भी घटिया, जो बीते साल. पठानकोट हमले की कवरेज के हवाले से लगाया था.

    मैं इस बात से सहमत हूँ कि ये हमला सिर्फ़ NDTV पे नही है, ये हमला दर्शक को ख़त्म करने के लिए है. उस तक सही सूचनाओ को पहुँचने से रोकने के लिए है.

    इससे पहले भी रवीश के भाई, बृजेश को सेक्स रेकेट के झूठे केस मे फँसाया गया था. अगर उस केस की भी जानकारी ढुंढोगे तो पता लगेगा कि बृजेश का नाम मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान मे नही था, उसे बाद मे डाला गया. ये यूपी चुनाव से पहले किया गया था, जिससे रवीश द्वारा उठाए गये, मुख्य सवालो के जवाब मे उसके भाई का मुद्दा उठा सके.

    ये सबसे ख़तरनाक मोड़ है, हाल के वर्षो मे इस देश मे आया.

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  6. Rkk

    I seen both programme DNA as well as Prime Time but there is a lot of difference.

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  7. prasad joshi

    आप कहा ये छोटी मोटी बातो की सत्यता और वैधता मे ऊलझे हुवे है. NDTV छोड दो, रविश कुमार छोडदो, मोदी, ममता छोडदो. आप जिस गाव मे रहते हो ऊस गाव के सौ दुकान दारो का वित्तीय अध्ययन करो. अगर दस लाख कि सालाना कमाइ हो तो IT Returns पाच लाख के ही भरते है. ऊसमे तरह तरह के Tax rebates लेकर जितना कम हो सके उतना कम Tax भरते है. भारत का ही नही पुरी दुनीया के हर कारोबारी ऐसा करते है. यही से सारा हेर फेर शुरु होता है.

    सत्य को घटना की वैधता पर ढुंढना आधे सत्य को सत्य मानने कि तरह है.

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  8. zakir hussain

    सत्य की खोज तो निरंतर प्रक्रिया है. इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही पाया जा सकता है, भले ही धर्म हो या आध्यात्म. ये दृष्टिकोण कालजयी है.

    वैज्ञानिक दृष्टिकोण सिर्फ़ सूचनाओ का संग्रह नही, सूचनाओ के विश्लेषण का सामर्थ्य है. सूचनाए और रेशनल थिंकिंग साथ साथ बढ़ती है. इसलिए पत्रकार के लिए ज़रूरी है, कि वो ज़्यादा से ज़्यादा सूचनाए, विशेषकर सरकार की नीतियों संबंधी हम तक पहुँचाए.
    विभिन्न नज़रियों से सूचनाओ को देखने पर, नयी सूचनाओ और बेहतर समझ का निर्माण होता है. इस समझ के निर्माण मे मीडिया एक आवश्यक कड़ी है.

    लोकतंत्र के लिए मजबूत मीडिया की आवश्यकता इसलिए भी है कि लोकतंत्र मे हर नागरिक को सरकार निर्माण मे योगदान का अवसर दिया जाता है. लेकिन जब हमारी समझ इन विषयो पर बनेगी ही नही तो हमारे निर्णय कितने सही होंगे, और हम सरकार का मूल्यांकन कैसे करेंगे?

    डरा हुआ मीडिया, डरा हुआ लोकतंत्र बनाता है.

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  9. prasad joshi

    ढेरो TV channels कि भिड मे हर दर्शक की अपनी पसंंद होती है. movies, sports, daily soaps, music, journey हर तरह के TV Channels है. ईन सब मे दर्शक distribute हुवा है.

    सिर्फ News Channels की बात करे तो ऊसमे भी sports news, filmi news, politics और ऐसी कई cataguories है. TRP Ratings कि बात करे. भारत कि ६०% आबादी TV देखती है. तो सभी चँनल के दर्शको मे न्युज चँनल देखने वालो का प्रमाण कुछ ९% है. और ईन मे Political News देखने वालोका कुछ २१% प्रमाण है.

    मतलब एक करोड लोग ही Political News देखते है. ईसमे भी और कई विच्छेद हो सकते है.

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  10. prasad joshi

    News channel देखने वालो मे आधेसे जादा लोग. न्युज को entertainment के दृष्टीसे देखते है. धमाकेदार खबरे हो तो वो बडे चाव से देखते है.

    मुझे तो लगता है के civil services exams को seriously pass करने की मनीषा रखने वाले छात्र ही न्युज चँनल को गंभीरता से देखते है.

    लोग किसीभी न्युज चँनल्स को गंभीरतासे लेते नही है.

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  11. सिकंदर हयात

    दुःख की बात हे की बुरे लोग तो एक हो जाते हे मगर अच्छे लोग एक नहीं हो पाते हे . यशवंत और रविश दोनों अच्छे आदमी हे मगर अफ़सोस दोनों ने एक दूसरे के साथ अच्छा नहीं किया यशवंत का लेख में रविश और सुधीर को एकपेज पर रखना बहुत ही दुखद हे रविश के पैर के नाख़ून के बराबर भी सुधीर का कद नहीं हे और आदमी तो खेर खराब हे ही , जिसका भविष्य जेल हे जबकि रविश का भविष्य मेग्सेसे अवार्ड हे यशवंत की रविश से असली शिकायत यहाँ हे कमेंट में http://khabarkikhabar.com/archives/3180 अब ये भी सच हे की रविश ने भी यशवंत के साथ ठीक नहीं किया जो भी हो यशवंत रविश के प्रोग्राम में जिक्र के लायक तो हे ही , वैसे भी ये ही तो चार लोग थे जिन्होंने हमें नेट पर हिंदी पढ़ना लिखना सिखाया में भी प्रिंट में व्यंगय आदि लिखता था हमें तो मालूम ही नहीं था की प्रिंट का टाइम खत्म हो रहा हे फिर इन्ही चार लोगो ने नेट पर लोगो को -पढ़ना लिखना सिखाया था आकर्षित किया था ये थे संजय तिवारी आलोकतोमर अविनाश और यशवंत इनमे से आलोक तोमर 2011 कैंसर का शिकार हो गए , तिवारी का विस्फोट बंद हो गया अविनाश मोहल्ला छोड़ कर फिल्मो में चले गए और आज अपनी मामूली या बस ठीक ठाक सी फिल्म की इन्ही हिंदी पाठक लेखक वर्ग की बदौलत दस गुना अधिक तारीफ पा रहे हे यानी यशवंत ही डटे हुए हे तो खेर रविश को भड़ास या यशवंत का जिक्र करना चाहिए था नहीं किया इस पर यशवंत भी गुस्से में अंधे हो गए और उन्होंने भी इस तरह से बदला लिया की रविश जैसे अधभुत पत्रकार का नाम सुधीर चौधरी जैसे घिनोने के साथ जोड़ दिया बहुत दुखद रविश के बारे में यही कहूंगा की वो महान हे ही मगर क्या करे की हालात ही ऐसे जटिल हो चुके हे की आज आप मेट्रो सिटी में किसी नार्मल बाल बच्चो वाले आदमी से शुद्ध विशुद्ध आदर्शवाद पर चलने की उम्मीद नहीं कर सकते हे और यशवंत का भी दक्षिणपंथ में हल्का झुकाव हुआ ही हे इसकी वजह उनका खास दोस्त संजय तिवारी हो सकता हे जो पूरी तरह इस्लाम और मुस्लिम विरोध में अँधा होकर दक्षिणपंथ भाजपा संघ मोदीतव में रंग ही चुका हे

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    1. सिकंदर हयात

      बुरे लोग तो एक हो जाते हे मगर अच्छे लोग एक नहीं हो पाते हे जैसे रविश और यशवंत का बताया इसके आलावा एक और भी तकलीफ होती हे की जैसे जो भी कोई अच्छा लिबरल लेखन कर रहा हे वो कोई भी हो कोई भी हो अगर हमें जानकारी मिली तो , हमने यहाँ उसका अपनी तरफ प्रचार जरूर किया उनके नाम दो दो बार लिख कर आगे और पीछे इसके अलवा भी यहाँ हमेशा लिंक भी दिए गए , जबकि खबर की खबर के साथ लोगो का यानि की अच्छे ही लोगो का ही सलूक इतना खराब हे इतना खराब हे की पूछिए मत , लगभग सभी ” नाम ” खबर की खबर से परिचित हे पढ़ते भी हे मगर हराम हे जो कभी भी कुछ भी जिक्र करते हे नहीं जैसे ठान राखी हो की इन्हे प्रचार नहीं देना हे इनका नाम जबान पर नहीं लाना हे संजय तिवारी विस्फोट को देखिये इसके पेज पर जाकर आप इस पर दो लाइन का कमेंट लिख दो तो जवाब देगा हमने पूरा लेख और सेकड़ो सबूत कमेंट दिए मगर अनदेखा करेगा क्योकि दुसरो को जरा भी प्रचार देना नहीं हे वैसे बड़ी बड़ी दीन ईमान अध्यात्म शांति की बाते आप तिवारी से सुन सकते हे . मगर फितरत वही कीवही . सोशल मिडिया के एक बड़े सेकुलर बरेलवी लेखक ने तो लिबरल लेखन में एक यु ही बबली सी लेमनचूस बच्ची तक का जिक्र कर दिया मगर जाकिर हुसैन या खबर की खबर का कोई जिक्र नहीं किया जबकि काफी नाम लेखक आदि खबर की खबर पढ़ते हे परिचित हे . शायद इन्हे यह बर्दाश्त नहीं हे की बिना किसी भी पत्रकारिता लेखन यहाँ तक की सोशल मिडिया के भी किसी भी बड़े या मध्यम नाम को खबर की खबर से जोड़े बिना ही और हिंदी लेखन पत्रकारिता में बिना किसी भी तरह के बेकग्रॉउंड सकिर्यता या किसी के भी कैसे भी सपोर्ट के बिना ही अफ़ज़ल भाई के खबर की खबर ने थोड़ा बहुत नाम और पाठक जमा लिया हे बहुत कम ही सही पर सर्वाइव तो किया ही . शायद ये भि लोगो को पसंद नहीं हे दूसरी बात हम लोग सोशल मिडिया पर भी सक्रीय नहीं हे जो आपको लाइक आदि दे तो ये वजह हो सकती हेकि शायद नयी हिंदी साइट्स में सबसे अधिक कमेंट वाली खबर की खबर का नाम लेना भी किसी को गवारा नहीं हे यानि विचार पर भलाई पर फितरत भारी पड़ जाती हे , इंसान की फितरत बदलना नामुमकिन सा काम हे

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        1. सिकंदर हयात

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          सिकंदर हयात • 12 hours ago
          रविश जी हमारी व्यथा पढोगे तो अपनी तकलीफे कम लगने लगेगी बहुत लोड हे आप पर सही भी हे आपकी इंसानियत और प्रतिभा की जितनी तारीफ की जाए कम होगी मगर हमारे पास तो सिर्फ इंसानियत और इरादा हे प्रतिभा नहीं हे दो भाई गल्फ में थे चाहता तो में भी थोड़ी सी अंग्रेजी थोड़ा कम्प्यूटर ये वो सीख कर उनके पास चला जाता छह फुट लम्बा हु कलर फेयर सर पर घने बाल और कास्ट का सुन्नी सय्यद जिनकी अहमियत हमारे यहाँ आपके ब्राहमणो से भी कुछ ज़्यादा ही हे यानि और नौकरी और शादी के लिए लड़की पैसा आराम की जिंदगी सब कुछ मिलने को मिल भी सकता था मगर हमने सोचा की लेखक बनेगे एक नयी सोच फेलायेंगे लेकिन सात पुश्तों में भी न कोई लेखक पत्रकार था न कोई अकदामिक ऊपर से प्रतिभा भी नहीं हे यानि न कोई सपोर्ट न कोई मार्गदर्शन कुछ भी नहीं , ऊपर से बड़ा परिवार सौ समस्याएं मुक़दमेबाज़ी घर के एक सदस्य की भयंकर बीमारी जीना मुहाल इनसे झुझते झुझते और साथ में जिन्दा भी रहना था और लेखन में भी हाथ पाँव मारने थे और कुछ नहीं तो इसलिए अभ्यास तो रहे और लेखन में आपको पता ही होगा की कोई पैसा नहीं ऊपर से जब हम लेखन में आये प्रिंट का पतन हो रहा था नेट का हमें पता नहीं था बहुत धक्के खाये मुफ्त में लिखा और जिन्दा रहने के लिए लेबर टाइप जिंदगी जीनी पड़ी ऊपर से किसी का भी समर्थन नहीं बड़े भाइयो का था भी तो में कोई उनका इकलौता सगा नहीं था और भी बड़ा परिवार बहनो की शादिया किसी की इंजीनियरिंग तो किसी की पि एच डी पर लाखो का खर्च फिर दिल्ली जैसे महानगगर में बाहर से आकर बसने घर बनाने में होना वाला भारी खर्च ऊपर से कोढ़ में खाज में की दोनों औरो की भी मदद करते थे ऊपर से 2008 – 10 महामंदी में और भारी नुकसान और सेकड़ो तनाव इन तनावों के बीच मेरा लिखना बेहद मुश्किल और प्रिंट में लिखना बंद हुआ और कोढ़ में खाज की आपके तो विरोधी भी हे तो सपोटर भी . और हम लेखन में शुद्ध सेकुलर लिबरल भारतीय मुस्लिम वो भी सुन्नी देवबंदी ( सारे लिबरल मुस्लिम शिया या बरेलवी क्योकि उन्हें वहाबिज्म आदि से लड़ने के नाम पर पीछे से किसी न किसी का सपोर्ट मिलता हो सकता हे ) हमारे लिए सपोर्ट का नाम नहीं विरोध और जूते पड़ने के डर से आजके ज़माने में सबसे जरुरी चीज़ प्रचार से भी दूर रहते हे मेरे यहाँ मेरे सोशल सर्किल एक से बढ़ कर एक काबिल लोग हे फ़र्ज़ कीजिये में कोई छुटभ्या जाकिर नायक होता तो नाम दाम आराम में खेलता मगर शुद्ध सेकुलर लिबरल वो भी सुन्नी वो भी देवबंदी होने के कारण बिलकुल दिवालिया हालत . लिखना छूटने ही वाला था की दुबई के अफ़ज़ल भाई से नवभारत पर मुलाकात हुई और फिर से लिखना चालू हुआ तीन साल मेहनत करके साइट कुछ जमाई ही थी http://khabarkikhabar.com/a… समर्थन के लिए कुछ मेल और ad देना वाले आये ही थे में जोश और उत्साह में था ही की 11 मई को मेरे बड़े भाई की डेथ हो गयी भाई के साथ ही मेरा सारा हौसला चला गया क्रांति के लिए इतनी कुर्बानिया दीं बहुत कुछ खोया एक ऐश्वर्या जैसी तो एक मदर टेरेसा जैसे दिल वाली लड़की मिलने को कौन जाने मिल भी सकती थी उनसे ध्यान हटाया . क्या क्या नहीं किया क्या क्या नहीं खोया अब जाकर हमारी विचारधारा थोड़ी फेल रही थी तो अब भाई की डेथ और इस ज़हरीली मोदी सरकार की हरकतों के कारण सब कुछ बड़ा बेमानी सा लग रहा हे जीने की चाह काम और विचारो का उत्साह मर सा रहा हे तो शुक्र मनाइये सर इरादा आपका भी नेक था हमारा भी – हमसे तो हज़ार गुना बेहतर हालत में हे आप

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          Varsha सिकंदर हयात • 7 hours ago
          जब लगे कि हौसला छूटने को है तो समझ लेना मंज़िल नज़दीक ही है और हौसला बनाए रखना,

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          सिकंदर हयात Varsha • 3 hours ago
          यही तो बात हे वर्षा जी में तो यही कहता हु की रविश जी हमारे जेसो की दुर्गत देखे और जो भी हे ईश्वर को धन्यवाद दे और खुश रहे रही बात हमारी कामयाबी या मंजिल की तो हमारे साथ तो इतनी बड़ी मनहूसियत जुडी हुई हे की फ़र्ज़ कीजिये कल को कोई कामयाबी कोई सफलता मिल भी गयी तो वो अच्छी बात होगी मगर आप तो हमारी विचारधारा जानती ही हे की ये दुनिया की सबसे अल्पसंख्यकविचार हे तो कामयाबी भी हमारे लिए तो शायद कोई न कोई बहुत बड़ी सरदर्दी और खतरा विरोध ही लेकर आएगी कोई आराम नहीं इसलिए मेने लिखा था की राइटिंग करते हुए में तो कल को अपने साथ किसी हादसे या मरने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर चूका था मेने सपने में भी नहीं सोचा था की मेरा हट्टा कट्टा बड़ा भाई जो यहाँ भी नहीं गल्फ में रहते हे वो अचानक चले जाएंगे

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          1. zakir hussain

            मुझे पता नही था, परिवार मे करीबी का आपका मतलब आपके सगे भाई से ही था. दुखों का बहुत बड़ा पहाड़ आप और आपके परिवार पर टूटा है. बहुत दुख हुआ ये सब जान कर.

          2. सिकंदर हयात

            जाकिर भाई में बीमार तो नहीं तीमारदार के रूप में एम्स लोहिया आदि हॉस्पिटल्स जाता रहा हु वहा लोगो को जानवरो की तरह पड़े देख कर एक बार तो में भी नंगे फर्श हॉस्पिटल में सोया तो वो सब देख कर मरीज तीमारदारों की परेशानिया देख कर में तरस खाता था और अब आज में सोचता हु की वो लोग कितने खुशकिस्मत हे की उनका अपना उनके हाथो में सामने तो हे भले ही मौत के मुँह हो तब भी , हमें तो पता ही नहीं चला की भाई को हुआ क्या था दिस्मबर में तो आये थे तब तो फिट थे अचानक हार्ट अटैक कैसे आ गया कुछ भी पता नहीं चला की हुआ क्या था एक दिन पहले तक ऑफिस में काम कर रहे थे कॅरियर की पीक पर थे में तो उनकी तरफ से बेफिक्र रहता था की चलो विदेश में हे भारत के भयानक तनाव सामाजिक पर्यवरणीयपोल्युश्न तनाव बदमिजाजी से बचे हुए हे में तो यहाँ मदर की सिस्टर की जीजा जी की किसी किसी की सेहत के लिए चिंता में रहता था उनकी तरफ से तो बेफिक्री महसूस करता था . फादर की भी ऐसे ही डेथ हुई थी घर से ठीक निकले थे तब भी नहीं पता चला था की आखिर लास्ट टाइम उन्हें हुआ क्या था उस हादसे के बाद घर का एक सदस्य ऐसा बीमार हुआ की पंद्रह साल हॉस्पिटल्स के चक्कर लगाकर ठीक हो पाया ही था की फिर वही खड़े हो गए जहा पंद्रह साल पहले थे इतनी मेहनत और तनाव् के बाद इसी साल मेरा बड़ा परिवार कुछ राहत सी महसूस कर रहा था मेरे पास भी कोई कामयाबी भले ही नहीं रही लेकिन जोश एनर्जी और पॉजिटिविटी तो मेरे पास थी सब बर्बाद सा हो गया ये इतना भयानक हादसा हुआ हे मेरे साथ की हो सकता हे की सब कुछ खत्म हो जाए भाई भी गया और ज़हरीली मोदी सरकार के कारण एक तरफ आर्थिक तनाव बढ़ते जा रहे हे मेरा काफी पैसा एक आदमी ने रोक लिया हे जो उन्ही कारोबार से जुड़ा था जिसकी यह ज़हरीली सरकार कमर तोड़ रही हे कांवड़ियों की भीड़ के कारण रोड बंद और बाग़ में भी नुक्सान हुआ दूसरी तरफ आप देख ही रहे होंगे की जो हलात मोदी ने बना दिए हे की इस सबके कारण हमारी सोच जो हमने पंद्रह साल की मेहनत और ज़हमत और कुर्बानिया देकर जिसकी हल्की सी नीव ही डाली थी की ये सब हो गया हे जिस कारण सब बड़ा बेमानी सा लग रहा हे उधर वो लोग जो मोदी सरकार से पहले भी फायदे में रहते थे भड़का भड़का कर बहुत कुछ पाते थे नाम और दाम अब इसी ज़हरीली मोदी सरकार के विरोध से भी वही लोग ही कुछ ना कुछ पा ही रहे हे दाम ना सही वो तो पहले ही कमा लिया अब नाम कमा रहे हे दूसरी तरफ हम लोग बर्बाद हो गए सब कुछ खत्म सा हो गया हो सकता हे की कुछ समय बाद लिखना भी छूट जाए ———————- ?

    1. सिकंदर हयात

      बस जोशी जी , आज चालीस दिन हो गए बड़े भाई को गए हुए , मेरी हालत अभी भी खराब हे बहुत एंग्जाइटी रहती हे मगर फिर भी इस बात की थोड़ी तसल्ली हुई हे की मेरी मदर ठीक हे शुरू में उनकी हालत बहुत खराब थी डॉक्टर ने तो इस हादसे से पहले ही इकोटेस्ट को बोल रखा था उसके बाद भाई की तबियत खराब हो गयी चार दिन हॉस्पिटल रहकर उनकी डेथ हो गयी उसके बाद लोगो ने बताया की सऊदी से तो बॉडी लाना बहुत मुश्किल होता हे तब खासकर जब सऊदी अरब की इंडियन एम्बेसी से फोन आया परमिशन के लिए की आपकी इज़ाज़त हे की आपके बेटे की अंतिम क्रिया यही की जाए तब उनकी ज़्यादा हालत खराब हो गयी थी ऐसा हादसा किसी दुश्मन के साथ भी न हो . भारत में निजाम और हालात और वयवस्था के आम आदमी पर होने वाले ढेरो अत्याचार के ही शिकार हो गए शायद मेरे बड़े भाई भी वो पढ़ना चाहते थे मगर बी कॉम के बाद ही जॉब करनी पड़ी क्योकि फादर की डेथ के बाद किसी का सहारा नहीं था थोड़े सेटल हुए तो लोगो के प्रेशर में शादी करनी पड़ी फिर शादी परिवार रिश्ते महामंदी फिर और भी बुरे हालात तनाव शायद इन्ही सब ने ————— ? लेकिन मेरी मदर अब धीरे धीरे वो बेहतर हो गयी वार्ना उनकी चिंता में मेरा और भी बुरा हाल था लेकिन वो अब कुछ ठीक हे इसकी वजह वही हे की ईश्वर पर इनका अटूट विशवास की जैसी अल्लाह की इच्छा जितनी जिंदगी जहा की मिटटी उसने लिख दी . इनकी अटूट और गहरी आस्था कुरान नमाज़ इन्हे उबार लेती हे इतने भयानक हादसों से भी ,और में क्योकि जीरो स्प्रिचुअल नीड का आदमी हु इसलिए मेरी एंग्जाइटी बहुत अधिक रही हमारे पास तो गहरी आस्था का मरहम भी नहीं हे हमारी मज़बूरी हे क्योकि हम लेखक हे विचारक हे हमें लॉजिक की दुनिया में रहना पड़ता हे क्योकि हमें आस्था का व्यक्तिगत फायदा उठाने वालो से लड़ना हे तो ये हे , खेर इसलिए हमने तो हमेशा लिखा की खुद जीरो स्प्रिचुअल नीड का आदमी होते हुए भी में किसी की भी आस्था के खिलाफ नहीं लिखूंगा क्योकि जीवन हे ही ऐसी ऐसी तोड़ देने वाली तकलीफो से भरा , इंसान ईश्वर और धर्म के सहारे के बिना जी नहीं सकता .

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      1. prasad joshi

        ऐसे मुष्किल वक्त मे सिर्फ अल्लाह का सहारा होता है सिकंदरजी. अब आप ही देखीये ना आपकी माताजी को कुरान पढकर कितना हौसला मिला होगा. जिवन जब कठीनाइयो के दौर मे होता है, जिवनकी तकलिफे दर्द अपनी मर्यादाए पार कर इन्सान कि पिडा सहन करने कि सिमासे परे चले जाते है तब यही धर्म का ग्यान हमे राहत और शांती देता है.

        आपको भी अल्लाह मे आस्था रखनी चाहीये. आपको और आपके पुरे परिवार को अल्लाह इश्वर इस कठीनाइयो के दौर मे आत्मबल और शांती प्रदान करे यही मनो कामना कर सकते है हम.

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  12. prasad joshi

    किसी भी इन्सान कि हद से जादा तारिफ और किसिकी हद से जादा बुराई अगर करते रहे तो एक असंतुलन बनता है. जैसे झी न्युज हद से जादा मोदी को प्रमोट कर रहा है. और NDTV हाथ धोकर मोदी कि बुराइ करने मे जुट गया है. जनता को ये बात समझ मे आती है.

    अगर कोई अच्छा इन्सान भी हदसे जादा किसी बुरे इन्सान कि बुराई करता रहा तो ऊसकी अच्छाइ पर संदेह होना जायज है.
    सत्य को दुनीया के सामने रखने का भी एक प्यार भरा तरीका होता है. अन्यथा सत्य भी जहर का कडवा घोट बनता है.

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  13. prasad joshi

    Fake News पर रविश कुमारका prime time देखा मैने आज You Tube पर. और ऊसके बाद हमारा local news paper लोकमत पढा. १३ जुलै कि घटना हमारे यहा कि. दो मुस्लिम गुटो मे मारामारी हुवी, लाठी, हाँकी स्टिक्स, पत्थर और ईटे फेके एक दुसरे पर.सात आठ लोग बहोत बुरी तरह से घायल हुवे. अब यहा ना तो हिंदु थे, ना गाय थी, ना फेक न्युज थी. मुस्लिम गुटो का अंदरुनी मामला था. ये ऐसी गुट बाजीया और मारामारी हिंदु गुटो मे भी अक्सर होती है.

    रविश कुमार या सेक्युलर लोग हिंदु मुसलमान विवाद को ईतना बडा मुद्दा क्युं बना रहे है. धार्मिक शांती बनी रहे और एक ही धर्म के लोगो मे मारामारी हुवी तो ऊसे कोई कव्हर नही करता है, ऊसका ईश्यु भी नही होता है.

    फेक न्युज हर कोई देता है. ये राजनिती है, यहा कोई संत या पुन्यात्मा नही होता है. सोशल मिडीया what’s up, face book, you tube पर भगवान राम, मोहम्मद पैगंबर से लेकर हर महान शक्स के बारे मे अपमान जन्य और हिन बाते लिखी है. तो नेहरु पर लिखी बुरी बातो का क्या शोक मनाना. ईंटरनेट का मायाजाल बडा विचीत्र हुवा है. मैने खुद एक बात पढी थी ईन्टरनेट पर, सभी ब्राह्मणो को खडा कर के गोली से ऊडा देना चाहीये. अब क्या ये बाते पढ कर मुझे डरना चाहीये?

    फेक न्युज के साथ फेक पॉर्न व्हिडीयोज और ईमेजेस भी होते है फिल्म स्टार के. फेक मँट्रीमोनी साईट्स, fake recruitment sites, fake companies, यहा तक fake financial investment कंपनी.

    हमे धार्मिक विवाद ऊपर ऊठकर देखना ही होगा.

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    1. zakir hussain

      प्रसाद जी, रवीश पर तो ये इल्ज़ाम लगता है कि वो क्यूँ बंगाल के दंगो को हिंदू दमन के तौर पर नही दिखा रहा.

      आप कह रहे हो, वो हिंदू-मुस्लिम करता है. वो तो खुद हिंदू है, वो भी ब्राह्मण.

      राम मुहम्मद पर नज़रियों की भिन्नता का टकराव है. नेहरू के खिलाफ झूठ, राजनैतिक प्रोपेगेंडा, और इस झूठ को सच मानने वाले भी कम नही, इस वजह से लिखा गया.

      रवीश से मुझे भी आपत्ति है, सिकंदर भाई ने अपने एक लेख मे उसे लिखा भी है, लेकिन इन आरोपो से सहमत नही.

      बाकी फेक कोई भी ग़लत है.

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      1. prasad joshi

        झाकिरजी,
        रवीश कुमार मे presentation skill है, काफी कलात्मक ढंगसे वो रिसर्च करके अपनी सोच दुनीया के सामने रखते है. पर ये अतीशयोक्ती होती है, मै सिर्फ एकही थेअरी मानता हु. अगर कोइ हिंदु कट्टरवादी संघटन मुझे मुसलमानो के खिलाफ कितना भी उकसाए, फेक news दिखाए, फिर भी मै हाथ मे तलवार लेकर किसी मुसलमान को काटने नही जाउंगा. ना मारुंगा, ना मुसलमानोको पिटुंगा. और मेरे जैसे नब्बे करोड हिंदु, इस देश मे है. तो कुछ पचास हजार दंगाइ हिंदुओ के कारण रविश कुमार सभी हिंदु नाझीवादी बनरहे है, चाय के टेबल पर बैठकर मुसलमानो को ये लोग ऐसेही होते है, ऐसा कहते है. और ये नाझीवादी हिंदु ऐसे शब्दोसे आपत्ती है.

        असलमे रविश कुमार मुसलमानो के मन मे हिंदुओ का डर पैदा करने वाले लोगोमेसे एक है. नाझीवाद आतंकवाद से बत्तर है, पर काँग्रेस, वामपंथी लोग, रविश कुमार बहोत ही आसानीसे भारत अब नाझीवाद की तरफ बढ रहा है. ऐसा कह रहे है. ये सिर्फ फेक न्युज नही एक फेक प्रोपगेंडा है, और खुद रविश कुमार इसे चला रहे है.

        और मै मानता हु कि फेक न्युज हर कोइ पैदा करता है, और दिखाता भी है.

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  14. prasad joshi

    चलो छोड दो,
    मान लिया रविश कुमार महान पत्रकार है. बाकि सब बिके हुवे है. पर ये सारे पत्रकार मोदी सरकार के शासन काल मे ही क्युं बिके हुवे नजर आए रविश कुमार को. दस साल काँग्रेस का शासन रहा तो जो पत्रकार आज बिके हुवे है तो वो काँग्रेस के शासन काल मे भी बिके हुवे होगे ना. हा शायद उस वक्त वो सारे पत्रकार काँग्रेस सरकार के पक्ष मे बात कर रहे थे. और इसी कारण रवीश कुमार को वो उस वक्त बिके हुवे नही लगे.

    छोड दो यार रविश कुमार से मेरी कोई जाती दुश्मनी तो नही है. और रविश कुमार माफ करना मुझे.

    रविशजी आप महान पत्रकार हो…आपकी महानता पर मै कोई संदेह नही लुंगा. और मेरी औकात है ही क्या, मै कोइ नही हु आपके सामने. बस आप कि महानता के साथ साथ मै भारत के बाकी पत्रकारोको भी महान कहुंगा. वो भी काम करते है हमारे लिये दिन रात मेहेनत करते है. जैसे India is great और India के साथ साथ मै पाकिस्तान ईझ ग्रेट भी कहुंगा. क्युं किसीको झुठा या निचा दिखाना है.

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  15. सिकंदर हयात

    Awesh Tiwari19 hrs · आज से तकरीबन एक दशक पहले की बात है एनडीटीवी पूरी तरह से अपने शबाब पर था। मुझे याद है वो पहला मीडिया हाउस था जहां सप्ताह के पांच दिन काम हुआ करता था।महिलाओं को डिलीवरी से पहले और बाद छह छह माह की मैटरनिटी लिव दी जाती थी।जो कर्मचारी छुट्टियां नही लेते थे साल के अंत मे उन्हें एके माह की फोर्स लिव जाती थी।मुझे याद है कि उस वक्त वो देश का सबसे ज्यादा तनख्वाह देने वाला चैनल था। 2007 के दौरान चैनल में डेढ़ लाख दो लाख माहवार तनख्वाह पाने वाले खबरनवीस हुआ करते थे आज जितने भी बड़े टीवी पत्रकार दिखते हैं ज्यादातर एनडीटीवी से कभी न कभी जुड़े रहे हैं। एक वक्त था प्रणव राय को टीवी जर्नलिज्म के क्षेत्र में सबसे उम्दा नियोक्ता माना जाता था। एक एनडीटीवी आज है इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट लगभग बन्द किया जा रहा है , कैमरामैन भी हटाये जा रहे है, ओबी भी अब नही रहेगी। अब मोबाइल से वीडियोग्राफी और स्काइप से लाइव होगा। अब सवाल यह है कि इस छंटनी के पीछे क्या है? क्या प्रणब राय बुरे नियोक्ता हो गए? सच्चाई यह है कि एनडीटीवी भारी घाटे से जूझ रहा है, सरकारी विज्ञापन बन्द है, निजी कंपनियां सरकार के दबाव में विज्ञापन नही दे रही है।उस पर से सीबीआई का छापा डाल पत्रकारों को ट्रोल करके पूरे चैनल के मैकेनिज्म को ध्वस्त करने की कोशिश की जा रही है। इस छंटनी का किसी भी कीमत पर समर्थन नही किया जा सकता। लेकिन लोगों के रोजगार सुरक्षित रहे चाहे वो निजी क्षेत्र हो या सार्वजनिक इसकी जिम्मेवारी सरकार की भी है।Awesh Tiwari———————Nitin Thakur : सब जानते हैं कि एनडीटीवी की छंटनी किसी पूंजीपति के मुनाफा बढ़ाने का नतीजा नहीं है. वो किसी नेटवर्क18 या ज़ी ग्रुप की तरह मुनाफे में होने के बावजूद लोगों को नहीं निकाल रहा. एनडीटीवी एक संस्थान के बिखरने की कहानी है. यही वजह है कि उनका कोई कर्मचारी मालिक को लेकर आक्रोशित नहीं है. वो जानते हैं कि उनसे ज़्यादा ये मुसीबत संस्थान के प्रबंधन की है. बावजूद इसके किसी को तीन महीने तो किसी को छह महीने कंपन्सेशन देकर विदा किया जा रहा है.एनडीटीवी को जाननेवालों को मालूम है कि यहां ऐसे बहुतेरे हैं जिन्होंने दशकों तक आराम से नौकरी की और कहीं जाने की ज़रूरत नहीं समझी. सैलरी फंसाना, जाते हुए कर्मचारी की सैलरी मार लेना, किश्तों में तन्ख्वाह देना या चार चार पैसे पर इंटर्न पाल कर उनका शोषण वहां उस तरह नहीं हुआ जिस तरह इंडस्ट्री के दर्जन भर कई चैनलों में होता है. सबसे ऊंची सैलरी पर करियर की शुरूआत इसी चैनल में होती रही है. ये जो छंटनी -छंटनी का राग अलाप कर एनडीटीवी को सूली पर चढ़ाने की भक्तिपूर्ण चालाकी भरी कोशिश है वो धूर्तता के सिवाय कुछ नहीं.
    ये वही हैं जो एनडीटीवी को रोज़ बंद होने की बददुआ देते थे और आज जब सरकार के खिलाफ मोर्चा लेते हुए वो तिनका तिनका बिखर रहा है तो किसी की जाती हुई नौकरी पर तालियां बजाने की बेशर्मी भी खुलकर दिखा रहे हैं. बीच बीच में कुटिल मुस्कान के साथ “बड़ा बुरा हुआ” भी कह दे रहे हैं. इनकी चुनौती है कि एनडीटीवी वाले अपनी स्क्रीन पर अपने ही यहां हो रही छंटनी की खबर दिखाएं. भाई, आप यही साहस अपने चैनलों और अखबारों में क्यों नहीं दिखा लेते? मुझे तो नहीं याद कि उस चैनल ने कहीं और छंटनी की खबर भी दिखाई हो.. फिर आप ये मांग आखिर किस नीयत से कर रहे हैं?
    आपने पी7, श्री न्यूज़, जिया न्यूज़, ज़ी, आईबीएन में रहते हुए खुद के निकाले जाने या सहयोगियों के निकाले जाने पर खबर बनाई या बनवाई थी?? दरअसल आपकी दिक्कत पत्रकार होने के बावजूद वही है जो किसी पार्टी के समर्पित कैडर की होती है. आप उस चैनल को गिरते देखने के इच्छुक हैं जो चीन विरोधी राष्ट्रवाद के शोर में भी CAG की रिपोर्ट पर विवेकवान चर्चा कराके लोगों का ध्यान सरकार की लापरवाही की तरफ खींच रहा है. आपकी आंतें तो डियर मोदी जी की आलोचना की वजह से सिकुड़ रही हैं, वरना किसी की नौकरी जाते देख खुश होना किसी नॉर्मल इंसान के वश से तो बाहर की बात है.मैंने यहां पहले भी लिखा है कि मैं चैनल दिखने की एक्टिंग करते संघ के अघोषित इलेक्ट्रॉनिक मुखपत्र चैनलों के बंद होने के भी खिलाफ हूं. वो चाहे जो हों मगर आम लोगों की रोज़ी रोटी वहां से चल रही है. विरोधी विचार होना एकदम अलग बात है.. मगर सिर्फ इसीलिए किसी की मौत की दुआ करना अपनी गैरत के बूते से बाहर का सवाल है. एनडीटीवी का मालिक दूध का धुला ना हो तो भी सरकार को सबसे ज़्यादा दिक्कत उसी से है. ये तो उसी दिन पता चल गया था जब पठानकोट हमले की एक जैसी रिपोर्टिंग के बावजूद ऑफ एयर का नोटिस बस एनडीटीवी इंडिया को मिला था. चैनल को लेकर सरकारी खुन्नस छिपी हुई बात नहीं है. इसे रॉय का वित्तीय गड़बड़झाला घोषित करके मूर्ख मत दिखो.
    रूस में एनटीवी हो या तुर्की में आधा दर्जन सरकार विरोधी मीडिया संस्थान.. सबको ऐसे ही मामले बनाकर घेरा और मारा गया है. आज सरकार की बगल में खड़े पत्रकारनुमा कार्यकर्ताओं के लिए जश्न का दिन है. उसे खुलकर सेलिब्रेट करो. किसी की मौत की बददुआ करके.. अब जब वो मर गया तो उस पर शोक का तमाशा ना करो. थोड़ी गैरत बची हो तो सिर्फ जश्न मनाओ. जिस चैनल पर एक दिन के बैन को भी सरकार को टालना पड़ा था अंतत: वो सरकार के हाथों पूरी तरह “बैन” होने जा रहा है. अब आप कहां खड़े हैं तय कीजिए, वैसे भी इतिहास कमज़ोर राणा के साथ खड़े भामाशाह को नायक मानता है, मज़बूत अकबर के साथ खड़े मान सिंह को नहीं।-Nitin Thakur :

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  16. सिकंदर हयात

    खबर की खबर को बार बार कम्युनल और राइटिस्ट ताकते हैक कर रही हे और जैसा की होना ही था की शायद ये हरकत हिन्दू मुस्लिम दोनों राइटिस्ट कर रहे हे क्या कर सकते हे हम लोगो के कुछ बस का नहीं हे जबकि उधर खुद देश का ————– इन लोगो के साथ हे और उधर हम लोग भारत के सबसे कमजोर लोग हे जिनके साथ कोई भी नहीं हे अफ़सोस ——————-Mohammed Afzal Khan added 2 new photos.
    1 hr ·
    मेरा न्यूज़ पोर्टल खबर की खबर को ४ दिन के अंदर २ बार हैकरों ने हैक कर लिया है जबकि 2014 से कुल पांच बार इसको हैक किया जा चूका है जुलाई 2016 में जब हैक किया गया था तो बहुत से मटेरियल भी डिलीट कर दिया गया था! समझ में नहीं आ रहा है के आखिर हैकर मेरे न्यूज़ पोर्टल के पीछे क्यों पड़ गए है जबकि हमरा काम सच लिखना है क्योके —–
    न स्याही के है दुश्मन न सफेदी के दोस्त
    हम को आइना देखना है देखा देते है !!!

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  17. सिकंदर हयात

    उम्मीद हे की अगर यशवंत ने इधर पढ़ा होगा तो रविश कुमार के खिलाफ उनका गुस्सा कुछ तो ठंडा हुआ ही होगा रविश ने तो फिर भी जैसा की यशवंत का आरोप था की भाई अपने प्रोग्राम में उन्होंने अपनी नौकरी बचाने की खातिर उनके भड़ास मिडिया का जिक्र तक नहीं किया यशवंत जो बहादुरी से जेल हो आये ( पॉजिटिव कारणों से जेल न की तिहाड़ चौधरी की तरह दलाली में ) आये उनका जिक्र नहीं किया तो रविश ने तो मान भी ले की नौकरी की खातिर किया तो एक आम बाल बच्चे वाले ईमानदार आदमी के लिए दिल्ली जैसे भयंकर महंगे शहर में नौकरी तो फिर भी बहुत बड़ी बात हे वो भी ऐसी नौकरी जो फिर भी मन का काम करने दे रही हे तो वो तो फिर भी बहुत बड़ी बात हे जबकि देखे तो हाल तो ये हे की मेने पिछले दिनों कई कमेंट करके दर्शाया की किस तरह से लखनऊ के सोशल मिडिया के प्रसिद्ध सूफी संत आधुनिक सरमद ने तो सिर्फ अपने कुछ लाइक बचाने की खातिर ही विपुल सामग्री बहस ( शायद सबसे अधिक ) वाली और जाकिर हुसैन जैसे जीनियस की उपस्थिति वाली खबर की खबर का जिक्र तक नहीं किया उसकी जगह एक लेमनचूस बच्ची लेखिका का जिक्र किया की भाई ये ये ये हे लिबरल लेखन . तो समझिये इंसान किस कदर फितरती होता हे और घुमा फिराकर अपने हित सबसे ऊपर रखता हे भला ही वो हित कितने भी मामूली क्यों ना हो , एनिमी एट दा गेटस फिल्म में एक यहूदी कम्युनिस्ट अंत में कहता हे की -हमने कितने मेहनत की थी एक नया समाज बनाने को सब बेकार गया इंसान कभी नहीं सुधरने वाला -तो ये हे . इन बातो को समझ ले तो बेहतर होगा और गुस्सा निराशा भी कम होगी

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