एक कामरेड ने हिंदुत्व की यूं की व्याख्या!

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by– अखिलेन्द्र प्रताप सिंह

हिन्दुत्व हिन्दू धर्म नहीं है… भारत में फासीवाद के दो प्रमुख स्रोत माने जाते हैं: कारपोरेट वित्तीय पूंजी और हिन्दुत्व। हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व में बुनियादी फ़र्क है। यह फ़र्क समझना फासीवाद विरोधी संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है। हिन्दू धर्म हिन्दू शास्त्रों पर आधारित है। वहीं हिन्दुत्व विनायक दामोदर सावरकर, माधव सदाशिव गोलवलकर और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचार पर आधारित है। हिन्दू धर्म पुरातन है, हिन्दुत्व आधुनिक फासीवादी राजनीतिक विचार है। हिन्दू धर्म को मानना न मानना राष्ट्रवादी होने की शर्त नहीं है, जबकि हिन्दुत्व यानि हिन्दू राष्ट्र न मानने वाला नागरिक दोयम दर्जे का नागरिक होने के लिए अभिशप्त है।

हिन्दू धर्म में ढेर सारे सम्प्रदाय और पंथ हो सकते हैं, जबकि हिन्दुत्व में एक पंथ, एक पहचान, एक विधान आवश्यक हैं। सावरकर भी इस पर सचेत हैं कि कहीं हिन्दुत्व को हिन्दूवाद या हिन्दू धर्म न मान लिया जाए। इसलिए वह कहते हैं कि हिन्दूवाद एक वाद के बतौर एक धर्म शास्त्र हो सकता है जबकि हिन्दुत्व एक शब्द नहीं, अपने में एक सम्पूर्ण इतिहास है, हिन्दू जाति है (Hindu Race), हिन्दू राष्ट्र (Hindu Nation) है। वे लिखते हैं सिन्धु राष्ट्र आर्यो का राष्ट्र है जो सप्त सिन्धु से शुरू होकर हिमालय और समुद्र के बीच में फैल गया। यही सिन्धु राष्ट्र आर्यावर्त, ब्रहमावर्त, भारतवर्ष के नामकरण से होते हुए हिन्दू राष्ट्र के नाम तक पहुंचा है।

संस्कृत के सिन्धु राष्ट्र को प्राकृत में हिन्दू और ईरानियों, यहूदियों, यवनों की भाषा में हिन्दू राष्ट्र कहा गया। वे कहते हैं कि संस्कृत भाषा के ‘स’ का उच्चारण विदेशी यानि मलेच्छ ‘ह’ के रूप में करते हैं। सावरकर कहते हैं कि सभी हिन्दू भारत के केवल नागरिक इसलिए नहीं हैं क्योंकि वे मातृभूमि से जुड़े हुए हैं बल्कि उन सबका रक्त भी एक है। वे केवल एक राष्ट्र नहीं एक जाति भी हैं। सबकी नसों में वैदिक पूर्वजों, सिन्धुओं का खून बहता है। आगे वह कहते हैं कि हम लोंगो की एक महान सभ्यता है और हिन्दू संस्कृति है इसलिए राष्ट्रवादी होने के लिए केवल मातृभूमि मानना और एक रक्त सम्बंध होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि हर नागरिक को महान हिन्दू सभ्यता और संस्कृति को भी मानना होगा।

‘हिन्दुस्थान’ को पितृभूमि (Fatherland) और पुण्यभूमि (Holy Land) दोनों मानना जरूरी है। जो इन शर्तों को नहीं मानता है वह हिन्दू राष्ट्र का स्वतंत्र नागरिक नहीं हो सकता। इसका मतलब है वे मुस्लिम, ईसाई या अन्य धर्मावलंबी जो भारत को मातृभूमि मानते हैं लेकिन उनके हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को स्वीकार नहीं करते, वे न तो स्वतंत्र नागरिक हो सकते हैं और न ही राष्ट्रवादी। इस प्रकार सावरकर की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की समझ नस्लीय और निरंकुश है, यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति के बहुलवादी चरित्र के विरूद्ध है। यहां की सभ्यता और संस्कृति में पितृभूमि मानने का इस तरह का आग्रह नहीं है, यहां के शास्त्रों में भी आमतौर पर मातृभूमि शब्द का उपयोग किया गया है। दरअसल पितृभूमि (Fatherland) यूरोप खासकर जर्मनी से लिया हुआ उधार शब्द है।

सावरकर की हिन्दुत्व की इस अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए ‘हम अथवा हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा में गोलवलकर लिखते हैं, ‘‘आज जर्मनी का राष्ट्रीय गौरव चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। राष्ट्र और उसकी संस्कृति की शुद्धता की रक्षा करने के लिए जर्मनों ने अपने देश को सेमिटिक नस्ली-यहूदियों से मुक्त करके समूची दुनिया को हिला दिया है। यहां राष्ट्रीय गौरव अपने शिखर पर अभिव्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी दिखला दिया है कि एक-दूसरे से मूलतः पृथक नस्लों और संस्कृतियों को एक एकल समग्र में समेटना कितना असम्भव है। हमारे लिए यह काफी शिक्षाप्रद है और हमें हिन्दुस्तान में इससे सीखना और लाभ उठाना चाहिए।“ हिटलर के नाजीवाद से सीख लेते हुए हिन्दू राष्ट्र का दर्शन तैयार करते हुए गैर हिन्दू नागरिकों के बारें में गोलवलकर कहते हैं कि ‘इस देश में कुछ न मांगते हुए, किसी सुविधा का हकदार न होते हुए, किसी भी प्रकार की प्राथमिकता पाए बिना, यहां तक कि नागरिकता के अधिकारों के बिना ही हिन्दू राष्ट्र के अधीन रहें।‘

स्पष्ट है सावरकर, गोलवलकर और संघ की राष्ट्र राज्य की आधुनिक अवधारणा विभाजनकारी, आत्मघाती है और राष्ट्रीय आंदोलन के भारत निर्माण के सपनों के विरूद्ध पूरी तौर पर है। जिस तरह से यूरोप के ज्ञानोदय को नाजीवाद-फासीवाद ने नकार दिया था उसी तरह से हिन्दू राष्ट्र की यह अवधारणा समाज सुधार और सामाजिक चेतना की जो भी भारतीय धारा है, उसके विरूद्ध खड़ी होती है। सावरकर मानतें है कि बौद्ध धर्म ने हिन्दू राष्ट्र को पौरुषविहीन बना दिया और विक्रमादित्य ने खोयी हुई हिन्दू राष्ट्र की गरिमा को पुनःस्थापित किया। बौद्ध धर्म के बारे में सावरकर की समझ पूरी तौर पर अनैतिहासिक और पूर्वाग्रही है।

बौद्ध धम्म भारत वर्ष में लगभग एक हजार साल से अधिक प्रभावशाली रहा है। जिस चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के काल को वह सिन्धु राष्ट्र का स्वर्णयुग मानते हैं, उसमें भी बौद्ध धर्म की महत्ता बरकरार रही है। तथाकथित हिन्दू सभ्यता के दौर में भी बौद्ध धर्म का जर्बदस्त प्रभाव रहा है। यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत देश में केवल मगध राज ही नहीं, ढेर सारे अन्य राज भी थे, जिनमें बौद्ध धर्म का प्रभाव रहा है। बहरहाल, सावरकर भारतीय राजनीति को हिन्दुत्व की अवधारणा में ढालने और उसका हिंसक स्वरूप उभारने के पक्ष में थे। इसलिए बार-बार इतिहास के मानकों के आधार पर भारत के अतीत की खोज करने की जगह अपनी हिन्दू राष्ट्र के मनोगत भावना के अनुरूप अवैज्ञानिक अनैतिहासिक इतिहास की रचना करते हैं।

आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी व उसके अन्य संगठन हिन्दू भावनाओं का दोहन करके मार-पीट और उपद्रव का जो दौर कारपोरेट पूंजी के सक्रिय सहयोग से चला रही है उसकी बुनियाद सावरकर की इसी हिन्दुत्व राजनीति में है। हमारे महाकाव्य रामायण के मिथकीय नायक राम को हिन्दू नस्ल का इतिहास-पुरूष सिद्ध करने का काम सावरकर ने किया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उसे अंजाम देने के लिए अयोध्या मंदिर निर्माण की नयी मुहिम शुरू कर रहा है, जो साफतौर पर भारतीय राष्ट्र-राज्य निर्माण के लिए विनाशकारी होगा।

संक्षेप में हिन्दुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है, जो भारत के आधुनिक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है। आधुनिक भारत धर्मनिरपेक्ष भारत ही हो सकता है और इस पर विवाद वही लोग कर सकते हैं जो भारत को लोकतांत्रिक देश के बतौर विकसित नहीं होना देना चाहते हैं। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आज जो हिन्दुत्व की ताकतें बढ़ी हैं उसकी वजह हिन्दुस्तान में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को यहां वास्तविक अर्थो में न लागू करना है। धर्म और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा और भूमिका भिन्न है और उसे गड्ड-मड्ड नहीं किया जाना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिर्फ और सिर्फ धर्म का राज्य से पूर्ण अलगाव है। नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के लिए धर्मनिरपेक्ष राजनीति को धर्म पर निर्भर नहीं होना पड़ता है।

धर्मनिरपेक्ष राज्य अतीत के सभी शुभ और सकारात्मक मूल्यों को समेटे रहता है और वह जनता की भौतिक, सांस्कृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक जरूरतों को पूरा करता है। जनता की प्रगति और विकास के लिए यह जरूरी है कि धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक मूल्यों की दृढ़ता से रक्षा की जाए। जहां तक धर्म की बात है वह लोंगो का व्यक्तिगत मामला है, उसमें राज्य द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। लोगों को अपने विश्वास के हिसाब से धार्मिक व्यवहार करने की पूरी छूट होनी चाहिए। किसी भी पंथ, सम्प्रदाय को दूसरे पंथ सम्प्रदाय पर अपना विश्वास जबरन नहीं थोपना चाहिए। हिन्दू धर्म में भी इस तरह के मूल्यों की चर्चा है जो कि हिन्दुत्व की राजनीति में कतई नहीं है। दरअसल हिन्दू धर्म की बुनियादी कमजोरी यह है कि वह सामाजिक सम्बंधों का वर्णां व जातियों के रूप में निर्धारण करता है जबकि ऐसी परम्परा ‘श्रमण’ और ‘चार्वाक-लोकायत’ में नहीं देखने को मिलती है। हिन्दू धर्म में इन्हीं अंर्तनिहित कमजोरियों की वजह से ढे़र सारा विभाजन हुआ और उसके सुधार के लिए सामाजिक आंदोलन शुरू हुए।

बहरहाल धर्म का बने रहना न रहना परिस्थितियों पर निर्भर करता है क्योंकि सामाजिक विकास की खास परिस्थिति में धर्म पैदा हुआ है, बुनियादी तौर पर उन परिस्थितियों को बदलने में ही नयी वैज्ञानिक चेतना लोगों में जन्म लेती है। जब तक मनुष्य का स्वयं से, समाज और प्रकृति से अलगाव बना रहता है उसकी चेतना में धर्म भी बना रहता है। उसे बलात् नहीं हटाया जा सकता है। मार्क्स का यह कहना कि ‘धार्मिक व्यथा एक साथ वास्तविक व्यथा की अभिव्यक्ति तथा वास्तविक व्यथा का प्रतिवाद दोनों ही है। धर्म उत्पीडि़त प्राणी की आह (उच्छ्वास) है, निर्दय संसार का मर्म है तथा साथ ही निरूत्साह परिस्थितियों का उत्साह भी है। यह जनता की अफीम है।

जनता के प्रतिभासिक सुख के रूप में धर्म के उन्मूलन का अर्थ है उसके वास्तविक सुख की मांग करना। मौजूदा हालात के सम्बंध में भ्रमों का परित्याग करने की मांग उन हालात का परित्याग करने की मांग करता है जिनके लिए भ्रम जरूरी बन गये हैं। इसलिए धर्म की आलोचना भ्रूण रूप में आंसुओं की घाटी, धर्म जिसका प्रभामण्डल है, की आलोचना है’, आज भी सटीक है। फासीवाद विरोधी संघर्ष के इस दौर में हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के फासीवादी आतंकी राजनीति के बीच फर्क को रेखांकित करना बेहद जरूरी है। समाज के सभी तबकों, समुदायों, वर्गां, आंदोलनों, व्यक्तियों को लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के आधार पर एकताबद्ध करना और फासीवादी राजनीति को शिकस्त देना ऐतिहासिक जरूरत है, उसे पूरा किया जाना चाहिए।

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16 thoughts on “एक कामरेड ने हिंदुत्व की यूं की व्याख्या!

  1. prasad joshi

    झुठ….झुठ…..झुठ….
    ये लेखक पुरी तरह से झुठा है. कोइ भी इस देश को हिंदु राष्ट्र बनाने वाला नही है. पुरी तरह से राजनिती से प्रेरीत मुसलमानो के मन मे डर फैलाने के लिये लेखक इस मे मसाला मिरची डालकर लिख रहे है.
    जब भि कभी हिंदु राष्ट्र बनने की प्रक्रिया कोई शुरु करेगा ( वैसे तो वो शुरु नही होने वाली है ) पर हम जैसे लोग जो ना RSS,BJP, काँग्रेस, Comunist, leftist, rigtist, center ऐसी किसी भी राजनैतीक विचार धारा से संबध नही रखते है वो पहले सडको पर उतर आऐंगे.
    मै मानता हु भारत मे हिंदुत्व कि बाते बहोत लोग करते है. जितना बोलना है लिखना है ईन हिंदुत्ववादीये के खिलाफ आप लिखो, ये लोकतंत्र है और लिखना आपका हक है. पर Fasisam, Nazisam जैसे शब्दोका प्रयोग करके आप क्या जताना या दिखाना या डराना चाहते हो? क्या यहा कोई holocaust होने वाला है या कोई कँप लगने वाले है जिन कँपो मे लाखो करोडो मुसलमानो को भरकर मारा जानेवाला है. हिटलर ने चालीस लाख यहुदियोको मारा था. ये अपनी घटीया तर्क बुद्धी आपहीके पास रखो. आप दुनीया भर के विद्वान होगे पर आपकी विद्वत्तापर राज नैतीक ग्रहण लग चुका है. ईन हिंदुत्व कि बाते करने वालो से जादा खतरनाक आप जैसे लोग हो. राइ का पर्बत करना तो कोइ आपसे सिखे.
    जनता सचेत है लेखक महोदय. ये ना हिंदुओके मन मे मुसलमानो के डर को फैलने नही देने वाली है और नाही मुसलमानो के मन मे हिंदु ओ के प्रती डर को फैलने नही देने वाले है.
    भारत के मुसलमानो मेरी बिनती है आपसे. आप पुरी तरह सुरक्षीत है इस देश मे. यहा इस देश मे Germany जैसे कोइ भी हालात नही पैदा होने वाले है कभिभी. इन नौटकी बाज लेखकोसे सावधान रहो

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    1. Alla tala and chabi

      अगर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा किसी के दिमाग में नहीं है तो वह ज्यादा खतरनाक साबित होगा जिसको जो चाहिए था वह तो लेकर निकल चुके अपना हम यहां अभी भी सर्कुलर सर्कुलर का ढोंग करते हुए अपनी म******* रहे हैं जिस च**** ने भी सेकुलरिज्म सही है बोला तो वह सबसे बड़ा बेवकूफ है आज सेकुलरिज्म ही भारत को बर्बाद कर रहा है

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  2. vijay

    हमारे समाज का एक वर्ग आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से न केवल ग्रस्त है, बल्कि गुलामी के प्रतीकों को आत्मसात भी करके बैठा है। यदि मुझे राष्ट्रीय शर्म की एक काली सूची बनाने का अवसर मिले, तो मैं निश्चय रुप से उसमें अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने की घटना को शामिल नहीं करुंगा। हालांकि यह घटना गौरव करने लायक भी नहीं है।
    भारत के 70 वर्षों का इतिहास कई घटनाओं से कलंकित है, जिसके स्मरणभर से मेरा सिर शर्म से झुक जाता है। मेरी काली सूची में सबसे ऊपर 14 अगस्त 1947 का वह दिन होगा, जब भारत का विभाजन कर और हजारों-लाखों निरपराधों के लहू से इस्लामी राष्ट्र के रुप में पाकिस्तान की भौगोलिक रेखा खींची गई थी। 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की नृशंस हत्या। वर्ष 1962 में 20 अक्टूबर-21 नवंबर की वह अवधि, जब चीन के हाथों भारत को शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा।
    1975-77 में 21 माह का वह काल, जब देश के सभी नागरिक अधिकारों का तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने गला घोटा था। 3-6 जून 1984 का वह समय, जब खालिस्तानी आतंकियों से निपटने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को गोलियों और टैंकों से छलनी व लहूलुहान कर दिया था। 31 अक्टबूर 1984 का वह दिन, जब इंदिराजी की उनके ही दो अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी। इसके परिणामस्वरुप, नवंबर 1984 में दिल्ली सहित अन्य कई क्षेत्रों में हजारों निरपराध सिखों को मौत के घाट उतार दिया था।
    1985-86 का शाह बानो मामला, जब मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने इस्लामी कट्टरपंथियों के दवाब में रौंदा था। 1980-90 के दशक का वह दौर, जब कश्मीर में जिहादियों ने मजहबी जुनून में हिंदुओं के कई पूजा-स्थलों और मंदिरों को जलाकर राख कर दिया। कश्मीरी पंडितों को प्रताड़ित कर मौत के घाट उतार दिया, महिलाओं से बलात्कार किया, जो हिंदू-रहित घाटी का एकमात्र मुख्य कारण बना। 1991 का वह शर्मनाक वर्ष, जब भारत ने अपनी अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को चुकाने के लिए अपना स्वर्ण भंडार गिरवी रखा था। 6 दिसंबर 2010 का वह दिन, जब कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने मुंबई के 26/11 आतंकी हमले में परोक्ष रुप से पाकिस्तान को क्लीन चिट देते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर दोषारोपण किया था। इसी कालखंड में देश के छद्म-सेकुलरिस्टों ने इस्लामी कट्टरवाद-आतंकवाद को न्यायोचित ठहराने के लिए हिंदू आतंकवाद का हौव्वा खड़ा किया।
    9 फरवरी 2016 की वह शाम, जब जेएनयू ‘भारत तेरे टुकड़ें होंगे…इंशा अल्लाह’ जैसे नारों से गूंज उठा था, जिसे छद्म-पंथनिरपेक्षकों ने सेकुलरिज्म का चोला पहनाया। सेकुलरिस्टों की इसी जमात ने 29 सितंबर 2016 को गुलाम कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ भारत के सैन्य ऑपरेशन पर भी सवाल खड़े किए। 27 मई 2017 का वह शर्मनाक दिन, जब कांग्रेस के कुछ युवा नेताओं ने केरल में सार्वजनिक रुप से गाय के बछड़े की बलि देकर गोमांस का सेवन किया।
    सर्वप्रथम अयोध्या में विवादित ढांचे को गिराना कोई षड़यंत्र नहीं, अपितु कई दशकों से आहत हिंदुओं की वह भावना थी, जो 6 दिसंबर 1992 को एकाएक अदम्य हो गई। भारत में गोकशी पर प्रतिबंध के साथ-साथ अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर का पुनर्निर्माण हिंदुओं की आस्था से संबंधित है। देश में आज भी ऐसी कई मस्जिदें व दरगाह है, जिनकी नींव, मंदिरों के मलबे पर टिकी होने के साक्ष्य मिले है। जो लोग बाबरी मस्जिद ढहाए जाने पर आज भी बवाल काट रहे है, वह 1985-90 के कालखंड में कश्मीर के मंदिरों को जमींदोज करने की शर्मनाक घटना पर निर्लज्ज-पूर्ण चुप्पी साधे हुए है।
    भारत लगभग एक हजार वर्षों तक मुस्लिम शासन और अंग्रेजों की हुकूमत में पराधीन रहा। कारण सिर्फ यही था हिन्दू संगठित नही था आज भी हिन्दू को तोड़ने की कोसिस लगातार हो रही दलितों को भड़काया जा रहा हिन्दुओ का धर्म पारिवर्तन कई वर्षो से चल रहा ! हिंदुत्व ईतना ही कट्टर होता तो अल्पसंख्यक इस्लामिक देशो जैसे भारत से भी खत्म हो गए होते! इसी कारण आरएसएस बना बाकी गजवा हिन्द तो हर मुस्लिम चाहता कह भले सक़े !!!!!!

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    1. RAJKHYD

      अयोध्या ढांचा गिराना नहीं था
      किसी भी भीड़ को कानून हाथ् मे लेने का अधिकार नही दिया जा सकता
      साथ में उसका मुकदमा का फैसला जल्दी अनाचाहिये
      देश का सबसे पुराना मुकदमा वह क्यों रहे

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  3. prasad joshi

    विजयजी,
    अगर आगे बढना है तो पिछे मुडकर नही देखना है हमे. भारत मे हिंदुओ को मुसलमानो से खतरा नही है. हिंदुओ को खतरा पार्थ चटर्जी जैसे लोगो से है. आज ही पार्थ चटर्जी ने आर्मी चिफ को जनरल डायर कहा. पार्थ चटर्जी, रविश कुमार, अरविंद केजरीवाल, ममता बँनर्जी खुद को लोकतंत्र, अहींसा और धर्म निरपेक्षता के ठेकेदार मानकर घुम रहे है. ये अपनी निजी(personnel war) लडाई लड रहे है. और अगर ईनकी निजी लडाइ मे जो ईनकी तरफ है वो सच्चा और बाकी सब झुठे.
    नयी नयी theories को जन्म दिया जारहा है. मोदी के खिलाफ लिखना लोकतंत्र है पर सिर्फ और सिर्फ मोदी को टारगेट करना राजतंत्र है. ग्यान का अहंकार, हम ही ग्यानी है बाकी जनता को कुछ भी समझ नही है.
    एक तरफ मोदी ब्रिगेड है और उनका झी न्युज और दुसरी तरफ नॉन मोदी ब्रिगेड ( केजरी, ममता, रविश ) और इन लोगोका NDTV.
    रविश कुमार जी से मेरा सवाल है, अगर मोदी के उकसाने पर जनता भ्रमीत होरही है तो ऐसी अंधी जनता लोकतंत्र के लायक ही नही है, तो सिर्फ आप लोग ही सही गलत तै करने की काबीलीयत रखते हो तो आप इस देश कि सत्ता अपने ही हाथ मे लेलो. भ्रमसे प्रेरीत जनता के लोकतंत्र से लाख गुना अच्छी है आपके जैसे ग्यानी जनोकी तानाशाही.
    केजरीवाल, ममता, रविश कुमार जी के पक्ष मे अगर जनता बात करती है तो ही इस देश मे लोकतंत्र है और अगर जनता इनके विरोध मे बोलरही है तो लोकतंत्र का गला घोटा जारहा है. जैसे राष्ट्रवाद और देशभक्ती की बाते मोदी ब्रिगेड करती है वैसे ही केजरी, ममता, रविश कुमार लोकतंत्र का गला घोटा जा रहा है ऐसी बाते करते है. और वो भी इस विश्वास के साथ के ये सब सच्चाई के ठेकेदार है.

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  4. prasad joshi

    वैसे रविश कुमार , पार्थ चटर्जी जैसे लोगो से कुछ कहना चाहुंगा…
    पार्थ चटर्जी जो बयान आज आपने दिया है वो आपकी जगह दिग्विजय सिंग या ओवेसी ने दिया होता तो बिलकुल जायज था मै ऊसपर कोइ टिप्पणी नही करता.
    पर लोकतंत्र कि अभिव्यकती कि आझादी कि बाते करने वाले और खुद को निष्पक्ष कहने वाले आप या रविश कुमार जैसे लोग जो राज नेताओ के निजी युद्ध ( personel war )का हिस्सा बनते है तब आप के बयान आप के विष्पक्षता पर सवाल ऊठाते है.
    सिर्फ और सिर्फ मै ही सही हु ये दिखाने कि कितनी अडीयल जिद है ये. कश्मिर कि समस्या को किसी एक के सर क्युं फोडा जाये. हम सब ईसके लिये जिम्मेदार है. और अगर ऐसा है तो मुझे, आपको, मोदी, गांधी, नवाझ, पत्थरबाज जनता, और आर्मी हम सब के अंदर एक जनरल डायर छुपा है. मानवता वाद कि बाते कर कर हम मे से कोइ ईस दोष से मुक्त नही होने वाला है.

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  5. prasad joshi

    राजनेता भ्रष्ट होते है, वो चरीत्र मे दोगले होते है, जनता उन्हे सिर्फ वोट देती है. पर बुद्धीजिवीयो पर जनता यकिन करती है, उनक् विचारो को आदर्श मानती है ऊन्ही के दिखाये मार्ग पर चलती है. एक बुद्धी जिवी का निष्पक्ष होना बहोत जरुरी होता है. बुद्धी जिवीयो को राजनेताओ का आपसी रंजीश और ऊनकी अंदरुनी लडाइयो से दुर रहना चाहीये.

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  6. vijay

    प्रसाद जी अब तो मोदी सरकार आरएसएस के बिरोध में तथाकतिथ बउद्धिजीवी इतना हताश हो गए है की मनघडंत लिखना चालू करदिया ! सेना को लपेटे में ले लिया ! हद हो गई ! ओर सबसे बड़ी हतासा तो तब महसूस होती जब देश प्रेम की बात करने बाले को भक्त बोलते है ! आज खालिस्तान जिंदा बाद के नारे भी लग गए पंजाब में

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  7. vijay

    सिकंदर हयात भाई खैरियत से तो है काफी समय से आपका कमेंट नही दिखा

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  8. सिकंदर हयात

    खैरियत नहीं हे में बर्बाद हो गया हु हम दस भाई बहन हे में छठे नम्बर का हु मेरे सबसे बड़े भाई की डेथ हो गयी हे , वो भी यहाँ नहीं सऊदी अरब में , वही उन्हें दफना दिया गया हे कह नहीं सकता की कितना समय लगेगा इस हादसे से मुझे उबरने में , पापा की भी ऐसे ही अचानक डेथ हुई थी लोगो के जीवन में एक दो हादसे होते हे मेरे जीवन में अब तक दस हादसे हो चुके हे

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    1. Ranjan

      आपके भाई साहब के निधन की ख़बर पढ्कर दुख हुआ. इश्वर शोकसन्तप्त परिवार को यह दुख सहने की शक्ति और साहस प्रदान करे…

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  9. vijay

    बहुत ही ह्रदय विदारक घटना हुई भाई हौसला रखिये अल्लाह उनको जन्नत में स्थान दे हम सब खबर की खबर के पाठक भी दुखी है अल्लाह आपको इस दुख का सामना करने का हौसला दे 😢

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  10. prasad joshi

    सिकंदरजी,
    आप को अल्लाह इस बुरे दौर से ऊभर ने कि शक्ती दै. यही जिवन का वास्तवीक रुप है. पल भर मे सब बदल जाता है. बहोत दुख हुवा ये सब सुनकर.
    हम तो यहा महाराष्ट्र मे आपसे बहोत दुर रहते है. कुछ मदत कि जरुरत हो कहीये.

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  11. ramesh kumar

    सिकंदर हयात साहब के भाई की मौत की खबर सुन कर अफ़सोस हुआ , भगवन आपको शक्ति दे संभलने का ! सिकंदर हयात साहब की कमी कमेंट की कमी प्रसाद जोशी साहब बहुत अच्छा कमेंट कर रहे है पढ़ कर मजा आ रहा है इधर कुछ घरेलु अड़चन के कारण में भी कम्मेंट नहीं लिख पा रहा हु जल्द ही एक्टिव हो जाऊँगा !

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  12. upendra prasad

    SIKANDAR JI AAP KE BHAI KI MAUT KI KHABAR SUN KAR BAHUT DUKH HUA BHAGWAN AAPKO AUR AAP KE GHAR WAALO KO SABR DE !

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  13. अबरार अहमद

    इन्ना लिल्लाही वा इन्ना इलैहि राज़ेवुन। अल्लाह उनकी मगफिरत करे, आप और तमाम अहलोअयाल को सब्रे जमील अता फरमाये।

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