भीम आर्मी क्यों?

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by — -कँवल भारती

अगर नेतृत्व परिपक्व नहीं है, तो वह जिस तेजी से उभरता है, उसी तेजी से कमजोर भी हो जाता है. भीम आर्मी क्यों? अवश्य ही यह नाम तमाम तरह की उन सेनाओं के अनुकरण में रखा गया है, जिन्हें आरएसएस और हिन्दू संगठन चला रहे हैं. वे धर्म के नाम पर इस तरह की सेनाएं चला सकते हैं. उनके पास संख्या बल है, सत्ता बल है और धन बल है. वे अपनी सेनाओं के लोगों को हर तरह की सहायता करते हैं. उनमें जो पूर्ण कालिक होते हैं, उन्हें जीवन-निर्वाह के लिए वेतन देते हैं, और उनको भरपूर राजनीतिक संरक्षण देते हैं. अगर वे हिंसक गतिविधियों में पकड़े जाते हैं, तो वे उनकी कानूनी मदद भी करते हैं. किन्तु, भीम आर्मी के पास क्या है? उसके पास न संख्या बल है, न धन बल है और न सत्ता बल है. जिन मायावती के चन्द्रशेखर ने गुण गाये, उनने भी भीम आर्मी को नकार दिया.

सवाल है कि भीम आर्मी बनाने की क्या जरूरत थी, भीम संगठन भी बनाया जा सकता था. जिन सेनाओं का चन्द्रशेखर अनुकरण कर रहे हैं, उनके सदस्यों की सांस्कृतिक ट्रेनिंग होती है, उनका ब्रेनवाश किया हुआ होता है. भीम आर्मी के किस सदस्य की सांस्कृतिक ट्रेनिंग हुई है. मुझे चन्द्रशेखर तक अपरिपक्व दिखाई देते हैं. वह अपने नाम के आगे ‘रावण’ शब्द लगाये हुए हैं. उनकी अपरिपक्वता यहीं से शुरू होती है. जंतरमंतर पर अपने भाषण में वे रावण के गुण गिना रहे थे. कह रहे थे कि रावण चरित्रवान था, शीलवान था, विद्वान था, यह था..वह था..इत्यादि. अगर रावण के मिथ को लेकर चलेंगे, तो राम की जबर्दस्त प्रतिक्रांति होगी, उसे आप रोक नहीं पाएंगे.

महाराणा प्रताप के साथ यही तो हुआ. उसे सम्पूर्ण हिन्दू समाज का आदर्श बनाने की कार्ययोजना आरएसएस की है. सहारनपुर में महाराणाप्रताप की शोभायात्रा इसी कार्ययोजना का हिस्सा थी. और अब जोरशोर से उसे व्यापक बनाने का सिलसिला शुरू हो गया है. आज बलरामपुर में खुद मुख्यमंत्री योगी ने महाराणाप्रताप को हिन्दू आदर्श बनाने की पुरजोर घोषणा की है.

याद कीजिये, जब महाराष्ट्र में नामदेव ढसाल अपने शुरूआती दौर में हनुमान को लेकर जोरशोर से तर्क करते थे, और मजाक उड़ाते थे, तो उनकी सभा में हजारों की संख्या में मौजूद दलित हँसते थे और तालियाँ बजाते थे. उसकी प्रतिक्रिया यह हुई कि महाराष्ट्र में जिन हनुमान की कभी शोभायात्रा नहीं निकलती थी, वह गली गली में निकलने लगी थी. हनुमान के रूप में एक बड़ी प्रतिक्रांति हुई. नामदेव ढसाल का क्या हुआ, उसे बताने की जरूरत नहीं है, सब जानते हैं. इसलिए रावण के नाम से कोई भी राजनीति अपरिपक्व राजनीति के सिवा कुछ नहीं है.

रावण को दलित आन्दोलन का हिस्सा मत बनाइए. अपनी लड़ाई का हिस्सा डा. आंबेडकर को बनाइए, जोतिबा फुले को बनाइए, उसके केन्द्र में बुद्ध को लाइए, कबीर को लाइए, रैदास को लाइए. इससे दलित आन्दोलन को प्रगतिशील धार मिलेगी.
आर्मी से शांति और अहिंसा का बोध नहीं होता है, बल्कि हिंसा का बोध होता है. लगता है जैसे हथियारों से लैस कोई गिरोह हो. जो जुल्म का बदला जुल्म और हत्या का बदला हत्या से लेना चाहता हो. क्या भीम आर्मी ऐसा ही काम करना चाहता है? मैं समझता हूँ, शायद ही चन्द्रशेखर और उनके साथी इसका जवाब ‘हाँ’ में देंगे. फिर भीम आर्मी क्यों? भले ही भीम आर्मी की कोई हिंसक गतिविधि न हो, पर प्रतिक्रियावादी हिन्दुओं में यह हिंसक प्रतिक्रांति को और भी ज्यादा हवा देगा. इससे समानता स्थापित होने वाली नहीं है.
जंतरमंतर पर बेशक विशाल भीड़ थी. उसमें तमाम संगठनों के लोग थे, बहुत सारे दूसरे लोग भी थे, जो भीम आर्मी के सदस्य नहीं थे, बल्कि उनके प्रतिरोध को अपना समर्थन देने गए थे. मैंने चन्द्रशेखर का भाषण भी सुना था, जिसमें मुद्दों की कोई बात नहीं थी. उस पर उनका भाई हर पांच मिनट के बाद उनके कान में कुछ कह देता था, जो बहुत अशिष्ट लग रहा था. फिर माइक पर फोन नम्बर बोले जा रहे थे. यह पूरी तरह राजनीतिक अपरिपक्वता थी. वहाँ जिग्नेश मेवाणी और कन्हैया कुमार भी मौजूद थे, जो ज्यादा परिपक्व हैं. उन्होंने अपने आन्दोलन से न सिर्फ सरकार को झुकाया है, बल्कि देश भर में एक बड़ा प्रभाव भी छोड़ा है. किन्तु सहारनपुर की घटना को भीम आर्मी ने जिस अपरिपक्वता से दलित बनाम हिन्दू का मुद्दा बना दिया है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. ‘दलित बनाम हिन्दू’ और ‘दलित बनाम मुस्लिम’ पूरी तरह आरएसएस का एजेंडा है, इसे दलितों को समझना होगा. इससे हिन्दूराष्ट्र की उसकी परिकल्पना को बल मिलेगा. यह लोकतंत्र के हित में नहीं है. दलित बनाम हिन्दू की लड़ाई को हमें ‘सामाजिक न्याय की लड़ाई’ में बदलना होगा. इस लड़ाई में हमें उन तमाम लोगों को, जो किसी भी वर्ग, धर्म या जाति के हों, अपने साथ लेना होगा, जो अत्याचार और विषमता के विरुद्ध लड़ रहे हैं.
भीम आर्मी की एक अपरिपक्वता यह भी है कि तुरंत ही धर्मपरिवर्तन की बात करने लगे. ‘हमें न्याय नहीं मिला तो धर्मपरिवर्तन कर लेंगे’. यह क्या पागलपन है? धर्मपरिवर्तन क्या धमकी देकर किया जाता है? क्या इसका मतलब यह है कि न्याय मिल गया, तो धर्मपरिवर्तन नहीं करेंगे, हिन्दू बने रहेंगे? धर्म निजी मामला है, विचारों का मामला है. किसी को अगर धर्मपरिवर्तन करना है, तो करे, उसकी धमकी देने की क्या जरूरत है? चलो मान लिया कि न्याय नहीं मिला, और धर्मपरिवर्तन कर भी लिया, तो कितने दलित धर्मपरिवर्तन कर लेंगे? हजार, दस हजार? बस इससे ज्यादा तो नहीं. क्या कर लेंगे ये हजार-दस हजार धर्मान्तरित लोग? क्या पूरी यू.पी. के दलितों का धर्मपरिवर्तन करा दोगे? दलितों में ही एक संगठन ‘भावाधस’ है, जो दलितों के धर्म बदलने पर आरएसएस की तरह ही उनकी घर वापिसी का कार्यक्रम चलाता है.
भीम आर्मी के सदस्यों ने बाबासाहेब की कोई किताब नहीं पढ़ी है, वरना वे इस तरह अपरिपक्व राजनीति नहीं करते.

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3 thoughts on “भीम आर्मी क्यों?

  1. upendra prasad

    भीम सेना की जरुरत क्यों है साफ़ है के इन के अधिकार का हनन किया जा रहा है इसके लिए हुकूमत जिम्मेदार है ! भीम सेना कोई पहली सेना नहीं है इसके पहले भी कई सेनाए बन चुकी है और देश को नुकसान पहुँचाया है तो एक सेना और .

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  2. सिकंदर हयात

    हिमांशु कुमारबीजेपी ने आपको गोबर में कुदा दिया है, यहाँ आपकी हार तय है!
    भाजपा चाहती है कि भारत की राजनीती उसके तय करे गए मुद्दों में उलझी रहे, इसीलिये भाजपा गाय, भारत माता, सेना, पकिस्तान, राष्ट्रवाद, देशद्रोही जैसे मुद्दे उछालती रहती है। अगर आप इन मुद्दों में उलझ जाते हैं तो भाजपा आपको अच्छे से पटक कर मार देगी। इन मुद्दों में भाजपा को महारत है।लेकिन भाजपा असली राजनैतिक मुद्दों पर चर्चा करने में डरती है।

    असली राजनैतिक मुद्दे हैं, बढ़ती बेरोजगारी, किसानी की बदहाल हालत, मजदूरों के अधिकारों की बदतर होती जा रही हालत। आप भाजपा के अखाड़े में जायेंगे तो पिट जायेंगे। भाजपा को अपने अखाड़े में खींच कर लाइए, लेकिन अगर आप भाजपा की गाय की राजनीति का जवाब देने के लिए गाय काटने का विडिओ बनायेंगे। तो इससे भाजपा का बहुत फायदा होगा।

    भाजपा जनता को समझाएगी कि हमारे अलावा बाकी का पूरा विपक्ष गोह्त्यारा है, अगर आप भाजपा की राम के नाम पर राजनीति का विरोध करने के लिए अपने नाम के सामने रावण लगाते है तो इससे भाजपा को फायदा होगा। भाजपा जनता से कहेगी कि हम राम वाले हैं और हमारे विरोधी राम विरोधी हैं। आप अगर रोमियो के मुकाबले कृष्ण के प्रतीक को खड़ा करने की राजनीति करेंगे। तो भाजपा जनता से कहेगी कि हम कृष्ण वाले हैं और विपक्षी दल कृष्ण विरोधी हैं।

    इसका नुकसान यह होगा कि राजनीति फिर भी गाय, राम, और कृष्ण के चारों तरफ ही घूमती रहेगी और भाजपा जीतती रहेगी। असल में तो आप राम, कृष्ण या गाय के विरुद्ध नहीं हैं। असल में तो आप गाय, राम या कृष्ण के प्रतीकों को राजनीति में इस्तेमाल करके असली मुद्दों से ध्यान हटाने के विरोधी हैं। इसलिए भाजपा के उछाले गए मुद्दों में मत उलझिए। जनता के असली मुद्दे राजनीति के केंद्र में लाइए। और भाजपा को उन मुद्दों पर घेरिये।

    हांलाकि भाजपा बहुत शातिर है, वह फिर से दंगा करवा देगी, गाय मरवा देगी, या कोई फर्जी मुद्दा उछाल देगी। लेकिन मजबूती से लगातार अपने मुद्दों पर भाजपा को घेरते रहिये। भाजपा के मुद्दों पर प्रतिक्रिया की राजनीति बिलकुल मत कीजिए। उससे भाजपा को ही फायदा होगा और भारत की जनता का नुकसान होगा।

    लेखक- हिमांशु कुमार

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  3. सिकंदर हयात

    चारु लेखा with Anshu Malviya and 3 others.
    10 hrs · Kushinagar ·
    मुस्लिम शासकों के अत्याचार को याद करने और दोहराने के लाभ क्या हैं? इसके पीछे कौन सी मानसिकता है?
    इस सवाल के उत्तर में एक और सवाल सामने आया-
    “दलितों और सवर्णों के बीच अनारक्षित समानतामूलक “गंगा-जमुनी” क्यों नहीं होनी चाहिए?”
    मैंने इतिहास का विशेष अध्यन तो नही किया संस्कृत साहित्य पढ़ा है। मौर्य काल से लेकर आज़ादी के पूर्व तक का संस्कृत साहित्य- उसी के आधार पर उत्तर देने का प्रयास है।
    हिंदुओं पर मुस्लिम शासको का अत्याचार विदेशी शासकों का अत्याचार था।
    भारतीय राजे महाराजे भी युद्ध के दौरान हारे हुए राजाओं को मार देते या दास बना लेते थे।
    शासक के रूप में उन्होंने अत्याचार किया होगा वो स्वाभाविक भी था।पर चूंकि वो मुसलमान हैं क्या इसलिए शासक के रूप में किया गया उनका अत्याचार आज याद रखने योग्य हो गया?
    अशोक चन्द्रगुप्त आदि हिन्दू राजाओं ने भी तो भाइयो को मारकर राजगद्दी पाई थी। और बिम्बसार तो पितृहंता था।
    बाणभट्ट की कादम्बरी में राजा की तारीफ में एक श्लोक देखिए
    “हे राजा ! आपके द्वारा बंदी बनाई गयी आपके वैरी राजाओं की स्त्रियों के दोनों स्तन आँसूओं से नहाते हुए और हृदय स्थित शोकाग्नि के समीप रहते हुए तपस्वी का आचरण कर रहे है।”
    इस श्लोक में क्रूरता को कितने कलात्मक तरीके से व्यक्त किया गया है। एक हिन्दू राजा द्वारा दूसरे राजा पर क्रूरता।
    खैर…
    11 वीं शताब्दी से लेकर 16 वीं शताबदी तक संस्कृत भाषा में रस, छंद अलंकार और व्यंजना पर बड़े बड़े शास्त्र लिखे गए। इसी दौरान साहित्य की आत्मा ‘रस’ की खोज हुई।
    यह मुस्लिम काल रहा है।
    कबीर, रहीम,तुलसी, मीरा और रसखान ये सभी मुगलकाल में ही हुए ये और इनके ग्रन्थ सुरक्षित रहे। संगीत के क्षेत्र में भी तानसेन बैजू बावरा(दोनों हिन्दू थे) मुगल काल में हुए।मुगल राजाओं के दरबारी भी थे। उसी समय संगीत, नृत्य, और मूर्ति कला की अनेक धाराएँ विकसित हुई।
    आज अंधविश्वास के खिलाफ बोलने वाले तीन विद्वानों को मार दिया गया।
    पर कबीर का साहित्य और कबीर को उस समय किसी ने छुआ तक नही।
    मलिक मुहम्मद जायसी जैसे मुस्लिम विद्वान ने राजा रत्नसेन और पद्मावती पर पद्मावत लिखी।।
    और अब जब मुसलमान शासक नही रहे तो उन शासको द्वारा किए अत्याचार को याद रखने में कौन सा लाभ?
    इसे दलितों पर सवर्ण के अत्याचार के साथ तुलना करना मूर्खता है।
    दलितों के साथ छुआ छूत और भेदभाव इतिहास का विषय नही है।
    यह आज की भी समस्या है।
    प्राइमरी स्कूलो में सिर्फ पिछड़े और दलित पढ़ते हैं।
    आखिर क्यों?
    इस प्रश्न का उत्तर खोजने की कोशिश करिए।
    रसोइयाँ का चयन ग्राम प्रधान करता है और वह कोशिश करता है कि रसोइयाँ दलित न हो । ऐसा क्यों?
    यदि आरक्षण न होता तो क्या साक्षात्कार लेने वाले सवर्ण दल किसी अछूत को नौकरी देना पसन्द करते?
    और जैसे ही मुस्लिम शासन खत्म हुआ हिन्दुओ ने तो गरीब मुसलमानों को भी अछूत बना दिया।
    दलितों के साथ अत्यचार एकतरफा रहा है।
    उन्हें शिक्षा और भूमि से वंचित रखा गया।
    पर हिन्दू मुस्लिम झगड़े दोनों तरफ से हैं।
    दोनों शासक वर्ग में शामिल रहे हैं।
    दोनों ने मिलकर दलितों को अछूत बनाए रखा।
    आज इन लोगों के बीच गङ्गा-जमुनी तहजीब की बात की जाती है क्योकि यह तहजीब वर्षो से अब तक समाज में मौजूद है ।
    जो मौजूद है उसकी शिनाख्त करने की कोशिश की जाती है और उसी को दो समुदायों के बीच सेतू के रूप में देखा जाता है।
    उसे बरबस पैदा करने की कोशिश नही की जाती।
    दलितों और सवर्णों की संस्कृति एक ही रही है जिसमे एक सेवक की भूमिका में था तो एक स्वामी की भूमिका में।
    इन दोनों की बीच कौन सी गङ्गा-जमुनी??
    दलित आज भी गाँवों और कस्बो में जाति की वजह से प्रताड़ित हैं।
    वे आज भी भूमिहीन हैं।
    इसलिए दलित विमर्श और आरक्षण अभी भी ज़रूरी है।
    आरक्षण के फायदे -नुकसान और उसे लागू करने के तरीके की खामियों पर अलग से बहस हो सकती है। वो अलग विषय है।
    ( जिस पोस्ट में वह प्रश्न था वो कमेंट बॉक्स में है)चारु लेखा

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