मोदी जी हमें नेहरू के इंडिया में ही रहने दो!

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by — चमन मिश्रा

यह 16 मई 2014 का दिन था। रोज की तरह भोर में, पूरब से थाली के आकार का लाल सूरज हल्के-हल्के से अपनी लालिमा को पीछे छोड़ते हुए उदय हो रहा था। इसी दिन भारत में 2014 के आम चुनावों का परिणाम आना था। हर किसी की नज़रें टेलीविज़न की तरफ टिकीं थीं। जो जहां था, वहीं टीवी देख रहा था। कोई ऑफिस में, कोई स्कूल में, कोई सड़क पर, कोई दुकान पर। सड़कों पर ट्रैफिक उस दिन बहुत कम था। जैसी उम्मीद थी, परिणाम वैसा ही रहा। भारतीय जनता पार्टी ने अभूतपूर्व विजय हासिल की। दरअसल, 2009 के आम चुनाव की अपेक्षा भारतीय जनता पार्टी को 166 सीटें ज्यादा मिलीं। कुल 31.34 फीसदी वोटों के साथ 282 सीटें जीतकर पिछले 1984 के बाद यानि कि 30 साल बाद किसी एक पार्टी ने बहुमत हासिल किया था।

लोकसभा चुनावों में जीतने के बाद कई राज्यों के चुनाव हुए। महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, असम, गोवा, मणिपुर उत्तर-प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों में भी मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़कर भाजपा ने अच्छी जीत हासिल की और सरकार बनाई। दिल्ली और बिहार अपवाद छोड़ दीजिए।

यह सब पहले ही इसलिए बता दिया, जिससे आप आगे की बातों को पढ़ते वक्त यह ध्यान रखें कि जनता ने भाजपा को बेइंतहां वोट दिया है। प्रधानमंत्री मोदी पर पंडित नेहरू जैसा भरोसा जताया है। इसलिए सवाल भी भाजपा और मोदी से ही पूछे जाएंगे। सत्ताधारी दल से ही ज्यादा सवाल किए जाने चाहिए। पत्रकारिता के पुरोधा गणेश शंकर विद्यार्थी कहा करते थे- “पत्रकार विपक्ष का नेता होता है।” विपक्ष को तो जनता ने ही नकार दिया है, उनसे हम क्या और क्यों पूछेंगे ? केंद्र की मोदी सरकार की तीन साल पूरे हो रहे हैं, तो चलिए हम कुछ घटनाओं पर नज़र डाल लेते हैं-

विजय माल्या, ललित मोदी, गुरूदासपुर हमला, उड़ी आतंकी हमला, पठानकोट आतंकी हमला, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या, कश्मीर के नौजवानों के हाथ में पत्थर और आंखों में पैलेट गन, 11 मार्च, 2017 को सुकुमा में 12 CRPF जवान शहीद, 24 अप्रैल, 2017 को सुकुमा में ही 25 CRPF जवान शहीद। बॉर्डर पर पाकिस्तान भारतीय सैनिकों के सिर काट के ले गया। यह सब घटनाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हम यहां इन्हें छोड़ देते हैं। हम आज सिर्फ भीड़ की बात करेंगे। जब सरकार अपनी तीसरी सालगिरह के जश्न में व्यस्त है, तब देश किधर जा रहा है, जरा इस पर नजर डालते हैं-

28 सितंबर, 2015 को दिल्ली से सटे दादरी में गौमांस के शक की वज़ह से मोहम्मद अख़लाक़ नाम के शख्स की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।

मार्च, 2016 को दिल्ली के विकासपुरी में डॉक्टर पंकज नारंग को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला।

11 जुलाई, 2016 को गुजरात के ऊना में भीड़ ने 7 दलितों को गाड़ी से बांधकर पीटा। पूरे गुजरात में दलितों के उग्र प्रदर्शन हुए।

28 जून, 2016 को हरियाणा के पलवल हाइवे पर गोरक्षकों ने तीन लोगों को गोबर खिलाया और बेल्टों से उनकी पिटाई की।

मार्च 2016 को झारखंड में दो मुस्लिमों के शव पेड़ से लटके मिले, बाद में उनके परिवार ने कहा कि उन्हें लगातार धमकी दी जा रहीं थीं।

3 अप्रैल, 2017 को राजस्थान के अलवर में दूध के लिए गाय खरीदकर ले जा रहे पशुपालक पहलू खान को गोरक्षकों ने उसके बेटे के सामने ही पीट-पीटकर मार डाला।

22 अप्रैल, 2017 को जम्मू-कश्मीर में गोरक्षकों ने 7 लोगों पर हमला कर दिया, जिनमें से 4 गंभीर रूप से घायल हुए।

19 मई, 2017 को झारखंड में बच्चा चोरी की अफ़वाह पर भीड़ ने 7 लोगों को पीट-पीटकर मार डाला।

इन सभी घटनाओं में एक समानता है। यह घटनाएं भीड़ द्वारा की गईं हैं। कभी गोरक्षकों की भीड़, कभी बजरंग दल की भीड़, कभी हिंदू युवा वाहिनी की भीड़, कभी एंटी रोमियो स्कवॉड वाले होते हैं। कई बार कोई संगठन नहीं होता, लोग ही भीड़ बन जा रहे हैं। आप दीमापुर को याद कीजिए, बलात्कार के एक आरोपी को भीड़ ने थाने से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला था, बाद में पता चला वो निर्दोष था।

भीड़ कभी भी न्याय नहीं कर सकती। हम भारत के लोग अपने देश में इस तरह की घटनाएं होते हुए देखने के बाद खामोश कैसे रह सकते हैं? आज जो भीड़ आरोपियों को पीट-पीटकर मार रही है, कथित गोतस्करों की जान ले रही है, कथित ‘रोमियो’ को टॉर्चर रही है, कल वही भीड़ हम-आप तक पहुंच जाएगी। लोकतांत्रिक देश में कौन आरोपी है, कौन दोषी है, किसे क्या सजा मिलनी चाहिए, इसका फैसला करने के लिए पुलिस, अदालतें और कानून होते हैं। जब सड़क पर ही ‘न्याय’ किया जाने लगे और उसे किंतु-परंतु लगाकर सही ठहराया जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि आप एक समाज के तौर पर, एक देश के तौर पर फेल हो रहे हैं।

पिछले तीन सालों में ऐसी घटनाओं में गुणात्मक स्तर पर बढ़ोत्तरी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसी जघन्य घटनाओं की आलोचना भी नहीं की। उस ‘80 फीसदी गोरक्षकों गुंडे होते हैं’ वाले बयान को अपवाद ही समझना चाहिए। हालांकि उस बयान के बाद स्वयंसेवक से प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी खुद ही कथित गोरक्षकों के निशाने पर आ गए थे। केंद्र सरकार के किसी मंत्री ने ऐसी घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी। दरअसल, जब आप कुछ बोल नहीं रहे हैं, इसका मतलब है आप समर्थन कर रहे हैं। राजस्थान में जब पहलू खान को मार डाला गया तो वहां के गृह मंत्री बाबूलाल कटारिया ने कहा- “गोरक्षक काम तो सही कर रहे थे।”

सवाल तो हाल ही में सहारनपुर में हुई जातीय संघर्ष की घटना पर भी उठने चाहिए। यह सवाल इस दौर में बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। एक जाति विशेष की भीड़ इकठ्ठी होती है और दूसरे लोगों के घरों में आग लगा देती है। इसके बाद दूसरी जाति की ‘आर्मी’ इकठ्ठी होती है, और हिंसा शुरू। सहारनपुर से शुरू हुए जातीय संघर्ष की लपटें दिल्ली तक पहुंचती हैं, और जंतर-मंतर पर हजारो की संख्या में लोग इकठ्ठा हो जाते हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार में से किसी मंत्री ने सहारनपुर जाने के बारे में नहीं सोचा। ठीक से निंदा भी नहीं की। नेहरू ने एक बार कहा था- “देश लोकतंत्र के दिखावे में बिखर जाएगा और कमजोर हो जाएगा, यदि जातिवाद और तंग मानसिकता अधिक प्रबल हो गई।” भाजपा के ही दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 22 अप्रैल, 1997 को संसद में प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल द्वारा प्रस्तुत विश्वासमत के प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा था- “धर्मनिरपेक्षता के क्षेत्र में जातिवाद, संप्रदायवाद से भी अधिक खतरनाक है।”

थोड़ा-सा आगे बढ़ते हैं, लेकिन बात भीड़ की ही करेंगे। सोशल मीडिया पर हर सप्ताह कोई ना कोई ऐसा वीडियो वायरल हो जाता है, जिसमें प्रेमी युगल को या फिर लड़का-लड़की जो कि दोस्त हैं, उन्हें पीटा जा रहा होता है। कभी लव ज़िहाद का नाम लेकर कपल्स को निशाना बनाया जाता है। कभी एंटी रोमियो स्कवॉड उनकी छानबीन कर रहे होते हैं। तमाम सेनाओं, संघों और संगठनों की भीड़ इकठ्ठी होकर आती है और ‘मॉरल पुलिसिंग’ के नाम पर उन्हें पीटती है।

20 नवबंर, 2016 को बुलंदशहर के खुर्जा में एक होटल के कमरे में से कपल्स को निकालकर हिंदूवादी संगठन की भीड़ ने पीटा।

20 अप्रैल, 2017 को राजस्थान के बांसवाड़ा में कपल्स को पीटा गया। इसके बाद दोनों को नंगा करके पूरे गांव में घुमाया गया।

मई, 2017 को मेरठ में कपल्स को एक घर में से निकालकर पीटा।

21 मई, 2017 को मुजफ्फरनगर में दो लड़के अपनी फेसबुक फ्रेंड से मिलने गए थे, उन्हें कथित रूप से बजरंग दल वालों ने बीच सड़क पर बेल्टों से पीटा। उनके कपड़े फाड़ दिए गए।

यह कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने सुर्खियां बटोरीं। ऐसी और भी कितनी ही घटनाएं होंगी जो पता ही नहीं चलतीं। जितनी घटनाएं सामने आती हैं, उससे दोगुनी छिपी रहती हैं। इन्हें हम आपराधिक घटनाएं कहकर चुप नहीं रह सकते। यह एक बदलते भारत की तस्वीर है। इसे हर कोई देख रहा है। टेलीविजन चैनल्स में रॉ फुटेज़ देखकर सब सहम जाते हैं। सब जान रहे हैं, कि जो भी हो रहा है वो सही नहीं हो रहा है। इसके बावजूद लोग बोलते नहीं ?

इसकी भी एक बड़ी वजह भीड़ है। यह भीड़ वर्जुअल स्पेस यानि कि सोशल मीडिया पर है। फेसबुक, ट्वीटर पर अगर इन घटनाओं के ख़िलाफ़ कोई पत्रकार, छात्र, एक्टिविस्ट, अभिनेता, नेता या फिर कोई दूसरा लिख दे/ आलोचना कर दे, तो उसे वहीं निशाना बनाया जाता है। उसे बदत्तर से बदत्तर गालियां दी जाती हैं। उसके परिवार वालों के मामलों को उछाला जाने लगता है। उनकी फोटोज़ से छेड़छाड़ होने लगती है। और अंत में उसे देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। कई बड़े पत्रकार ऐसे हमलों का शिकार आए दिन होते रहते हैं। रवीश कुमार को मां की गालियां दी गईं, बरखा दत्त को वो सभी गालियां दी जाती हैं, जो इस ब्रहमाण्ड में मौजूद हैं।

अंत में बहुत ही सिंपल सवाल है। क्या यही न्यू इंडिया है? जिसकी बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार करते हैं। तीन सालों में मोदी जी ने इसी को तो बनाया है। मिस्टर प्राइम मिनिस्टर- क्या आपके न्यू इंडिया में आरोपियों का न्याय भीड़ ही करेगी ? आपके न्यू इंडिया में लड़का-लड़की दोस्त नहीं होंगे, अगर होंगे तो उन्हें भीड़ पीटेगी ? आपके न्यू इंडिया में अगर पत्रकार सवाल उठाएगा तो उसे मां-बहन की गालियां दी जाएंगी ? आपके न्यू इंडिया में पशुपालक को गाय रखने की इज़ाजत नहीं होगी, अगर वो गाय ले जाएगा तो भीड़ उसे जान से मार देगी ? आपके न्यू इंडिया में यह सब होता रहेगा और आप चुप रहेंगे ? अगर आपका न्यू इंडिया ऐसा होगा, तो प्लीज़ हमें ऐसा न्यू इंडिया नहीं चाहिए। हमें पंडित नेहरू वाले इंडिया में ही रहने दो, जिसमें भीड़ नहीं, संविधान ही सबकुछ तय करता आया है। कृपया ध्यान रखें, यह सिर्फ आपराधिक घटनाएं नहीं हैं ये देश/समाज के ‘तालिबानीकरण’ की शुरूआत है।

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16 thoughts on “मोदी जी हमें नेहरू के इंडिया में ही रहने दो!

  1. prasad joshi

    मैने ये लेख पढा नही,
    India ना तो नेहरु का है और ना तो मोदी का.

    सिकंदर जी आपको और आप के विचारो को पढने के बाद आप
    निष्पक्श नही है मै ईस नतीजे पर पोहोच चुका हु

    Reply
  2. prasad joshi

    Be focus on the business world rather than the political world. Politics is an illusion of power & business is the truth that proves we are driven

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  3. बृजेश यादव

    जोशी जी सिकंदर साहब निष्पक्ष नही है ये बात तो मैं बहुत पहले से जनता थ इन्हें मैं ५ सालो से पढ़ रहा हु पहले तो मैं समझता था की ये सएक्यूलर इंसान है निष्पक्ष है पर दरअसल ये बस भजपा और हिन्दू कट्टरपंथियो पर टूट पड़ते है इन्हें हर वो इंसान अच्छा लगता है जो संघ की बुराई कर द
    और और ये ममता जैसी घमंडी और मुस्लिम तुस्टीकरण वाली महिला को देश का प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते पूरी कांग्रेस को उसे सौप देने की बात करते ह इससे इनकी मानसिकता स्पस्ट हो जाती है

    Reply
  4. सिकंदर हयात

    एक हादसे के कारण ( जीवन का दसवा हादसा ) फ़िलहाल लिखने की मानसिकता में नहीं हु बाद में इन विषयो पर बात होती रहेगी

    Reply
  5. prasad joshi

    हर राजनैतीक दल की अपनी कार्य पद्धती होती है. बाते बढा चढाकर दिखाना या बताना ये काम हर राज नेता करता है. यहा राज निती मे कोई संत, महापुरुष, पुन्यात्मा नही होता है. चाहे भाजप, कॉंग्रेस, आप, RPI हर बात आखीर मे सत्ता की गलीयो मे आती है.

    जिस तरह भाजप के कुछ सब नही कुछ नेता हिंदुत्व की बाते करते है ऊस प्रकार हर दल के नेता अपनी वोट बँक को मजबुत करने के लिये वोट बँक के पक्ष मे बात करते है. ये निती सर्व साधारण रुप से अपना ई जाती है.

    झुठी खबरे हर कोइ फैलाता है. मै खबरो कि विश्वसनीयता को सिर्फ ५०% मानता हु. हर कोई अपने निजी भावनाओ मे बहता है.और खबरे भी कारेबार ही है business. कुछ news channels भाजप के है कुछ काँग्रेस के पत्रकारो का भी यही हाल है. बुद्धी जीवी भी ऐसे ही खेमो मे बट गये है. बहोत सारे बुद्धीजीवी अपने निजी अहंकार से ऊपर उठते ही नही है.

    सौ करोड से ऊपर आबादी है हमारे देश की ईतने विशाल देश मे कोइ फसाद होगा ही नही ये अपेक्षा रखनी ही नही चाहीये. जब कोइ फसाद होता है तो हमे शांती और संयम से उसकी और देखने को सिखना होगा. उलटी पुलटी बाते करके , अपनी निजी भावनाओ का तेल उसमे डालकर उस फसाद को और नही परोसना है.

    जिस तरह मुसलमाने के मन मे डर है वैसा ही डर हिंदुओके मन भी है. ये डर कभी भी कम नही होने वाला है. ये सच्चाइ हमे स्विकार करनी होगी. कोइ permanent solution ढुंढने की बजाय हमे ईसमे कमसे कम विवाद कैसे होगे और ये जादा समाज मे हावी नही होगे ये काम करना होगा.

    Reply
  6. prasad joshi

    बृजेश जी,
    सिकंदरजी एक नेक ईन्सान है, वो अच्छे इन्सान है. बस वो कुछ लोगोको बहोत अच्छा और कुछ लोगोको बहोत बुरा मानते है. और ये कुछ लोग राजनितीसे जुडे हुवे है.
    सिकंदरजी आपके उपर कोइ वयक्तीक टिप्पनी करना मेरा मक्सद नही है.

    Reply
  7. umakant

    इस केरल की घटना का क्या असर हुआ है जानना चाहेंगे ??
    मैं एक सामान्य चेतना वाला हिन्दू हूँ जो देश धर्म के मुद्दों पर कुछ कुछ निगाह रखता है।
    जब कोई हिंसा करके कहता है कि मैं हिन्दू रक्षक हूँ, जब कोई किसी को पीट के कहता है कि मैं गोरक्षक हूँ तो मैं थोड़ा सा डर जाता हूँ
    अंदर से कोई कहता है कि मेरा हिंदुत्व आक्रामक तो नहीं है, ये कौन लोग हैं जो मेरे धर्म का जिम्मा ले रहे हैं
    पर आज के बाद अब मैं कोई और वीडियो देखूंगा तो मेरा नजरिया थोड़ा नरम हो चुका होगा गौरक्षकों के प्रति, आज के बाद में इस कहानी में उनके मत पर भी गौर करूँगा
    आज के बाद में शायद उनसे पहले से कम घृणा करूँगा क्योंकि कोई अंदर से कह रहा है कि हिन्दू आक्रामक नहीं तो कायर भी नहीं।
    बाकी, अगर आपने इतने ध्यान से पढ़ा तो ये भी समझ लीजिये कि ये मैं, सिर्फ मैं नहीं हूं, इस देश का सामान्य हिन्दू मानस कट्टरता की तरफ धकेला जा रहा है।
    हिन्दुओं का ध्रुवीकरण हो रहा है, परिणाम भविष्य के गर्त में है
    अवनीश कुमार

    Reply
  8. prasad joshi

    ( Last comment , Good bye all )
    कहा फस गया मै आप लोगो के बिच मे. …

    आप सब लोग लगे रहो…

    धार्मीक ध्रुवी करन हो रहा है…

    बापरे ये बात अब पुरी दुनीया को ले डुबेगी. सब को डरना चाहीये.

    धर्म और जाती के अलावा इस दुनीया मे कुछ और है ही नही.लोग भुख लगती है तो धर्म ही खाते है, प्यास लगती है तो धर्म ही पिते है, गाडीयो मे धर्म डालकर ही हम ऊसे चलाते है,
    खेलने की इच्छा होने पर धर्म धर्म खेलते है…

    आप लोग लगे रहो … धार्मीक ध्रुवीकरन हो रहा है. बहोत चिंता का विषय है. अब सारे कारोबार बंद पडने वाले है.

    धार्मीक दंगो से जादा हत्याए तो domestic disputes मे होती है. हर साल अपने ही परीजनो और दोस्तो के द्वारा कइ लोग मारे जाते है. ये आकडा यकीनन सालाना बिस हजार का होगा. Inter Muslim crime, Inter Hindu crime, inter dalit crime, inter brahmin crime, inter Kshatriya crime, यार ईसकी कभी बाते नही होती है.
    सालाना बिस हजार यानी की दस साल मे दो लाख.

    धर्म निरपेक्षता की secularism कि क्रांती करने वालो जरा domestic disputes कि हत्या को देखो, धार्मीक दंगो से जादा लोग हर साल इस मे मारे जाते है…

    Good bye …
    Best of luck

    Reply
  9. सिकंदर हयात

    Anil SinghFounder (company) at ArthKaam shared Girish Malviya’s post.
    30 May at 18:42 ·
    Girish Malviya
    30 May at 09:31 · मोदी जी की सरकार को तीन साल पूरे हो गये तो अब समय आ गया है कि उनकी सरकार की एक बेहद महत्वपूर्ण योजना स्टार्टअप इंडिया योजना की जांच परख की जाए, आखिर मोदी जी के स्वप्न मेक इन इंडिया को पूरा करने के लिए यह स्टार्ट अप इंडिया सबसे अधिक महत्वपूर्ण थी………..श्री नरेंद्र मोदी जी ने 15 अगस्त 2015 को लालकिले से स्टार्ट अप इंडिया योजना का जिक्र किया था
    ओर जब विज्ञान भवन में उन्होंने उस पर भाषण दिया था साहब ,क्या बताऊँ क्या भाषण था , आज आप वह वीडियो दुबारा देखे तो इतना हँसेंगे कि कपिल का कॉमेडी शो फेल हो जाएगा……..सरकार ने स्टार्टअप्स के लिए 10 हजार करोड़ फण्ड देने की बात की थी जिसे 2025 तक स्टार्टअप को देना है आज दो साल होने को आये है हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि इस योजना के तहत अब तक केवल 5.66 करोड़ रुपये का ही नए स्टार्टअप को वित्तपोषण किया गया है, यानी सरकार की कथनी और करनी में कितना अंतर है यह साफ नजर आ जाता हैअसलियत यह है कि स्टार्टअप को इससे मदद मिलने की बात तो दूर रही अभी तक उनका रजिस्ट्रेशन तक इस स्टार्टअप स्कीम में नही हो पाया है यह सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया इतनी पेचीदा है, कि छोटा मोटा बिजनेस मैन तो कही टिक ही नही सकता ………..
    इस योजना का महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि नए स्टार्टअप को करो में भी छूट दी जाएगी अंतर-मंत्रालय बोर्ड ने बताया है कि कर रियायत के लिए करीब 12 स्टार्टअप को मंजूरी दी है जबकि 1 मई की बैठक में 62 आवेदनों पर विचार किया गया था। 2016-17 में 142 आवेदनों में से मात्र 10 स्टार्टअप को कर रियायत की मंजूरी मिली पायी है…………..
    अब जाकर को सरकार को होश आया है कि इस प्रक्रिया में खामियां है
    मोदी जी की यह स्टार्ट अप इंडिया की योजना पूरी तरह से फेल हो गयी है लेकिन यह बात कोई मीडिया चेनल आपको नही बतायेगा, क्योकि फेके गए विज्ञापनों के टुकड़े उनके पास पुहंच गए है, वो बस गुणगान करने मे ही व्यस्त है……………
    ऐसे ही हर योजना का विश्लेषण करने बैठे तो इन्हें मुँह छिपाने को जगह ही नही मिलेगी………..
    See TranslationLikeShow More ReactionsShare
    4 4CommentsAnil Singh
    30 May at 12:46 · जनरल! जनता के नौकर हो, औकात में रहो…
    जनरल साहब! सुना है कि आप कहे हैं कि देश की जनता को सेना से डरकर रहना चाहिए और जो जनता नहीं डरती वो देश बर्बाद हो जाता है। यदि आपने सच मे ऐसा कहा है तो जरा ये बताइए कि जब भारत गुलाम था तो आजादी की लड़ाई किस सेना ने लड़ी थी? सेना ने नहीं लड़ी, जनता ने लड़ी और आजादी मिलने के बाद उसी सेना को अपना लिया जिसने उसी जनता पर अंग्रेजों के कहने पर बेइन्तहा जुल्म किए थे। जनता ने ऐसा क्यों किया, क्योंकि वो सैनिक भी इसी देश के बच्चे थे। और आपको, उस जनता को सेना से डराने मे शर्म नही आई?
    जनरल साहब! आप भूल रहे हैं कि इस देश की जनता ने आपको अपनी सुरक्षा के लिए नौकरी पर रखा है, न कि आपसे खुद को डराने के लिए। डराना है तो उनको डराओ जो भारत की जनता के खिलाफ हैं। ये मत भूलिएगा जनरल साहब कि आपके जूते चप्पल से लेकर खाने-पीने तक का इन्तजाम इस देश की गरीबी से जूझ रही वह जनता भी करती है जो अपने बच्चे को एक जून भूखा ही सुला देती है। और, सुनिए रही बात जान देने की तो जनरल साहब सैनिक के मौत के बाद जितनी आर्थिक सुरक्षा और सम्मान उसके परिवार को जनता द्वारा मिलती है, वही जनता आपकी तमाम चौकसी को धता बताते हुए आपकी नाक के नीचे से देश मे घुस आए आतंकवादियों द्वारा मारे जाने पर एक पैसा नही लेती, सम्मान तो दूर की चीज रही। एक बात और ध्यान में रखिएगा। नौकरी में आने से पहले आप भी जनता ही थे और अवकाशप्राप्ति के बाद फिर जनता हो जाएंगे। ध्यान रहे, देश की जनता को डराने की हिमाकत दोबारा मत कीजिएगा।
    [मधुसूदन श्रीवास्तव का ह्वाट्स-अप संदेश]Anil Singh
    29 May at 17:39 ·
    परमल को बासमती बता बेचनेवाले सुभाष चंद्रा का जलवा-जलाल…
    ज़ी के चैनलों से जलवा-जलाल बना चुके सुभाष चंद्रा का प्रताप इतना बड़ा है कि पंद्रह दिन पहले 14 मई को जब उन्होंने अपने एस्सेल ग्रुप की 90वीं सालगिरह बनाई तो उस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी तक शामिल हुए। बताया गया कि एस्सेल ग्रुप की स्थापना सुभाष चंद्रा के बाबा जगन्नाथ गोयनका ने अपने भाइयों के साथ मिलकर 1926 में की थी। हकीकत यह है कि जगन्नाथ गोयनका ने 1926 में मंडी आदमपुर (हरियाणा) में अनाज के व्यापार की दुकान खोली थी जो बाद में बंद हो गई। एस्सेल पैकेजिंग की शुरुआत सुभाष चंद्रा ने 1981 में की। उससे पहले तक उनके पास रामा एक्पोर्ट्स नाम की एक कमोडिटी एक्सपोर्ट फर्म हुआ करती थी। इसके ज़रिए उन्होंने सस्ते परमल चावल को महंगा बासमती बताकर सोवियत संघ को निर्यात किया और जमकर नोट बनाए। वहीं से उनका सितारा चमका है।
    यह है सुभाष चंद्रा की बिजनेस परंपरा और एस्सेल ग्रुप की हकीकत। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने उक्त समारोह में चंद्रा की तारीफ के पुल बांधते हुए कहा था: एस्सेल समूह के साथ मेरा लंबा जुड़ाव रहा है. इस समूह की यात्रा से देश को लाभ मिला है. एस्सेल समूह भारतीय परंपरा का उदाहरण है। आदि-इत्यादि।Anil Singh
    13 May at 09:07 ·
    भाजपा का बढ़ना और पानी का गिरना बड़ा सहज है!
    भाजपा जिस सोच को लेकर चल रही है, वो हमारे व्यापक भारतीय समाज की सहज सोच है। जो शिक्षित हैं, वे भी इस सोच से मुक्त नहीं हो सके क्योंकि मैकाले की शिक्षा व्यवस्था ने तर्कसंगत बनाने के बजाय उन्हें राज व अतीत की महिमा और झूठे अहंकार पर फूलना सिखाया है। इसलिए कांग्रेस, सपा या बसपा जैसी पार्टियों के ज़मीनी स्तर के हताश कार्यकर्ताओं को खींच लाना भाजपा के लिए बड़ा सहज है।
    भारतीय समाज में सार्थक राजनीतिक बदलाव के लिए सच्ची देशभक्त और लोकतांत्रिक शक्तियों को एकजुट करना ज़रूरी है। लेकिन दिक्कत यह है कि हमारे समाज में लोकतांत्रिक शक्तियों का विकास काफी कमजोर अवस्था में है। दूसरे सच्चे देशभक्तों को भाजपा व संघ के लोग देशद्रोही सिद्ध करने में लगे हैं। देशप्रेम का मूल है अपने वतन, अपनी माटी और अवाम को प्यार करना।
    सोचिए, जिन्होंने मौका मिलने के बावजूद पाकिस्तान न जाकर अपने वतन में रहने का फैसला किया, वे देशद्रोही कैसे हो सकते हैं! लेकिन संघी लोग भारत में रहने का फैसला करनेवाले मुसलमानों को ही देशद्रोही बताने पर तुले हुए हैं ताकि उनका भय दिखाकर हिंदुओं को वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया जा सके।
    साथ ही जनता के हकों के लिए लड़नेवालों को ये लोग देशद्रोही बताने का कोई मौका नहीं चूकते। इन्हें डर है कि अगर सच्चे देशभक्त व लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखनेवाले लोग एकजुट हो गए तो इनका सर्वनाश हो जाएगा। अगर हमें देश में सच्चा लोकतंत्र स्थापित करना है और भारत की सुदीर्घ परंपरा को नई गरिमा तक पहुंचाना है तो दलित व अल्पसंख्यक विरोधी भाजपा के छद्म राष्ट्रवाद को तोड़ना ही होगा।Anil Singh

    Reply
  10. prasad joshi

    मधुसुदन श्रीवास्तव, आनील सिंग,..
    और सिकंदर हयात,
    ईस देश की जनता ने सेना को जनता की सुरक्षा के लिये नौकरी पर रखा है, सेना को खरीद नही लिया है आपने. सिमा पर रक्षा करने की नौकरी है ये आप के लिये जान देने की गुलामी नही है ये.

    सिकंदर हयात, आनील सिंग, मधुसुदन श्रीवास्तव tax हम भी देते है. पर हम किसीको अपना सेवक या नौकर नही मानते है.
    भारतीय सेना हमारी हम साथी है. हमारी नौकर, सेवक या गुलाम नही है.

    हम भारतीय सेना के पक्ष मे खडे है.

    Indian army we love u..
    we are with u,

    Reply
  11. prasad joshi

    सिकंदर हयात, आनील सिंग,मधुसुदन श्रीवास्तव,
    आप लोग जो लिखना चाहते हो वो लिख सक ते हो, ये अभीव्यक्ती की आझादी है आपकी पर यही आझादी हमे भी है.
    पर लिखते वक्त आप हमेशा सही हो ये जताने की कोशीश ना करो.

    सिकंदर जी ,
    नरसिंम्हाराव, मनमोहन सिंग, नरेन्द्र मोदी हमारे देश के प्रधान मंत्री है. आप होते कौन है की हमारे प्रधान मंत्री दो करोड का पाणी गटक गये ऐसी भाषा का ईस्तमाल करने वाले. एक वोट
    दिया है ईसका ये मतलब नही है की आप ने खरीद नही लिया है किसी को. काम पर टिप्पनी करो, कितना खाना खाया, कितना पाणी पिया, ये हिसाब रखना आप के काम का हिस्सा नही है.
    That is strictly none of your business.
    आप ईस देश के नागरीक हो, जागीर नही है ये देश आप की.

    हम हमारे देश के प्रधान मंत्री ईस पद कि गरीमा का मान रख ते है. इस पद पर कोइ भी बैठा हो नरेन्द्र मोदी, मनमोहन सिंग, नेहरु या आगे चलकर ओवेसा या खुद सिकंदर हयात. ऊन का खाने पिने का हिसाब रखना बुद्धी के हिन स्तर को दर्शाता है.

    Reply
  12. prasad joshi

    भारत मे असहीष्नुता ( Intolerance ) कौन फैला रहा है :-

    (१) कुदरत के नियम के अनुसार ( परीवर्तन कुदरत का नियम है) भारत मे एक सत्तांतरन होता है. अगर नही होता तो क्या होता? तो अगले पाच या पचास साल बाद होता, पर होता जरुर.
    (२) भारत मे लोक तंत्र है. मतलब जनता मे आधीकतम लोगोकी ईच्छा थी के सत्तांत्तरन हो और न्युनतम लोगोकी की नही थी.
    ( न्युनतम लोगो मे हिंदु और मुसलमान दोनो है जिन्होने सत्तांतरन के विरोध मे मतदान किया था. यह लेख धार्मीक नही है )
    (३) क्या ये सत्तांतरन स्थायी है? नही ये सरकार भी पाच या शायद दस साल बाद बदलेगी.
    (४) तो क्या भारत के वो न्युनतम लोग जो नित्य निरंतर लोकतंत्र की बाते करते है वो कुदरत के परिवर्तन को स्विकार नही कर पा रहे है? क्या ये लोग ये चाहते है के सत्ता हमेषा उनके हाथो मे होनी चाहीये जिन्हे ये चुन रहे है. तो ये ना मुमकीन है.
    (५) सत्तांतरन हुवा है पर देश कि जनता वही है. वो नही बदली है. ये वोही जनता है जो दिन भर काम करती है, पैसे कमाती है, अपने परीवार का पेट भरती है.
    (६) अब ईन न्युनतम लोगोका ये कहना है के एक छोटेसे सत्तांत्तरन से ये जनता अपने काम धाम घर परीवार सब छोड छाडकर हाथ मे चक्कु, तलवार, लाठी, काठी लेकर दंगे फसाद करने वाली है.
    (७) चलो ठिक है, ये भी मान लेते है. ( कुदरत की अनीश्चीतता ).
    देश मे असहिष्नुता ( Intolerance) , या धार्मीक ध्रुविकरन किया जा रहा है.
    (८) अब मेरा सवाल लोक तांत्रीक सवाल है. बहोत सोच विचार कर के देना?

    सवाल :-
    (१) असहीष्नुता ( Intolerance ) कौन फैला रहा है?
    कोई भी हो सकता है, जो सत्ता मे है वो सत्ता मे बने रह ने के लिये या फिर जो सत्ता मे नही है वो सत्ता हथीयाने के लिये.
    (२) उपर पुछे गये सवाल का जवाब देते वक्त देश कि जनता क्या चाहती है इसपर सोचने कि जरुरत है. मतलब अगर देश की जनता दंगे और फसाद चाहती है तो वो धार्मीक ध्रुविकरन करने वालो को सत्ता मे बिठायेगी. अगर ऐसा है तो दंगा फसाद चाहने वाली जनता के देश मे लोक तंत्रके कोइ मायने नही. और अगर देश कि जनता शांती चाहती है तो धार्मिक ध्रुवीकरन करने का कोई फायदा नही. मतलब धार्मिक ध्रुविकरन कर के भी दंगे नही होगे उलटा जो धार्मीक ध्रुविकरन कर रहा है ऊस की सत्ता चली जायेगी.

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  13. vijay

    नेहरू का भारत तो नही कश्मीर जरूर नेहरू का था बही चले जाओ लेखक महोदय सेकुलरिज्म भी समझ आजायेगा

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  14. prasad joshi

    बुद्धीजिवी अहिंसा और धर्म निरपेक्षता के पाखंडी है :-

    मै हजार बार वंदन करता हु महात्मा गांधी को. बिना हथीयार ऊठाये अहींसा के मार्ग से अंग्रेज सरकार के खिलाफ लडे भारत को आझादी दिलाई.

    मै हजार बार वंदन करता हु डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को जिन्होने भी बिना हथीयार ऊठाये अहिंसा के मार्ग से जाती प्रथा के खिला लढे.

    भारत के बुद्धीजिवीयो महात्मा गांधी ने अंग्रेजो पर आझादी
    के लिये पत्थर बाजी करो ये नही सिखाया था.
    डॉ आंबेडकर ने जाती व्यवस्था मिटाने के लिये ब्राह्मण और क्षत्रीयो पर पत्थर बाजी करो ये नही सिखाया था.

    तो भारत के पाखंडी बुद्धीजिवीयो कश्मिर मे सेना पर पत्थर बाजी करने वाली जनता का समर्थन करना अहींसा का पाखंड नही तो और क्या है. भारत कि सेना जनरल डायर कि तरह नही है. जनरल डायर ने जालीयन वाला बाग मे जो अमानवीय गोली बारी कि थी फिर भी महात्मा गांधीजी ने भारत कि जनता को अंग्रेजो के खिलाफ पत्थर बाजी करो ऐसा नही कहा.
    तो आप बताओ भारत कि सेना कश्मिरीयो पर ऐसे कोनसे जुल्म ढारही है की आप पत्थर बाज जनता का जिन्होने आझादी के लिये हिंसा और आतंक का रास्ता अपनाया.

    भारत के बुद्धीजिवीयो आप हिंदु हो या मुसलमान आप धर्म निरपेक्षता और अहींसा के पाखंड से भरे पडे हो.ये बदनसिबी है हमारी जनता कि और सेना कि कि ये आप के अहंकार से भ्रमीत कि जाती रही

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  15. सिकंदर हयात

    Dilip Khan
    26 June at 18:19 ·
    मैंने पहले ही कहा था कि मोदी जी अमेरिका इतनी बार जाते हैं कि वहां के लोग इन्हें दूर के फूफा मानने लगे हैं। पिछली बार मित्र बराक ने एक सचिव को रिसीव करने भेजा था। इस बार तो हद ही हो गई। इस बार भारत के राजदूत नवतेज सरना आए रिसीव करने। साथ में एक अमेरिकी राजनयिक मैरीके कार्लसन भी थीं। मोदी जी बुरा नहीं मानते। बराक ओबामा या डोनल्ड ट्रंप किसी को भी भेज दें। वो बुरा नहीं मानते।Krishna Kant
    17 hrs ·
    द ग्रेट खली से कोई जाकर कहे कि हम अपने तीन साल के भतीजे को गोद में उठा लिए तो यह कैसा लगेगा? मोदी जी यही कर रहे हैं. अमेरिका जाकर शेखी बघार रहे हैं कि हमने ​सर्जिकल स्ट्राइक किया और दुनिया ने लोहा मान लिया. अमेरिका ने कितने देश बर्बाद किए? जापान से लेकर सीरिया, अफगानिस्तान, इराक तक लंबी फेहरिस्त है. मूर्ख बनाने का काम भारत में ही करना चाहिए. अमेरिका और यूरोप को पता है कि 2016 में भारत में पिछले आठ साल में सबसे ज्यादा सैनिक शहीद हुए. अब भी हो रहे, कश्मीर अशांत है, दार्जिलिंग अशांत है, नागरिकों में पीटकर मार दिए जाने का ख़ौफ़ है. वह अमेरिका है, आपकी तिवारी पुरवा की चुनावी सभा नहीं है. देश की बेइज़्ज़ती मत कराइए. भारत की सेना काफ़ी बड़ी और ताक़तवर है. उसने पाकिस्तान तोड़ा है. उसकी इज़्ज़त का मलीदा मत बनाइए. प्लीज लौट आइए.Krishna Kant
    21 hrs ·
    ये आदमी बहुत बेइज़्ज़ती कराएगा. कोई रिसीव करने तक नहीं आया, फिर भी बोल रहा है कि यह 125 करोड़ भारतीयों का सम्मान है. भाई साहब, मानना पड़ेगा. जिस दौरान पूरे देश में रोज चार छह किसान खुदकुशी कर रहे हैं, जब भीड़ द्वारा किसी को भी पीटकर मार देने के लिए देश पूरी दुनिया में बदनाम हो रहा है, यह आदमी पता नहीं किस मुंह से वहां जाकर ‘गुड गवर्नेंस’ पर भाषण दे रहा है. कश्मीर से लेकर दार्जिलिंग तक अव्यवस्था फैली हुई है. 2010 दस के बाद शांत हो चुका कश्मीर फिर से उबल रहा है, तब ये आदमी सर्जिकल स्ट्राइक का गाना गा रहा है. जो अमेरिका और यूरोप पूरी दुनिया में घूम घूम कर देश के देश बर्बाद कर रहे हैं, वहां सर्जिकल स्ट्राइक की शेखी बघारना कतई बचकाना है. इतनी बड़ी, इतनी ताकतवर भारतीय सेना के लिए क्या सर्जिकल स्ट्राइक कोई ऐसी घटना थी, जिसे वैश्विक मंच से अपने मुंह से ही सराहा जाए, जबकि उसी वर्ष 2008 के बाद सबसे ज्यादा सैनिक शहादत दे चुके हों? यह आदमी किसान, जवान, संविधान सबकी खटिया खड़ी करके तब मानेगा.———————Sanjay Tiwari
    Yesterday at 01:56 ·
    Waiting for Indian prime minister Modi.
    It’s new thing.
    It’s good.Sanjay Tiwari
    Yesterday at 01:56 ·

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