by — चमन मिश्रा

यह 16 मई 2014 का दिन था। रोज की तरह भोर में, पूरब से थाली के आकार का लाल सूरज हल्के-हल्के से अपनी लालिमा को पीछे छोड़ते हुए उदय हो रहा था। इसी दिन भारत में 2014 के आम चुनावों का परिणाम आना था। हर किसी की नज़रें टेलीविज़न की तरफ टिकीं थीं। जो जहां था, वहीं टीवी देख रहा था। कोई ऑफिस में, कोई स्कूल में, कोई सड़क पर, कोई दुकान पर। सड़कों पर ट्रैफिक उस दिन बहुत कम था। जैसी उम्मीद थी, परिणाम वैसा ही रहा। भारतीय जनता पार्टी ने अभूतपूर्व विजय हासिल की। दरअसल, 2009 के आम चुनाव की अपेक्षा भारतीय जनता पार्टी को 166 सीटें ज्यादा मिलीं। कुल 31.34 फीसदी वोटों के साथ 282 सीटें जीतकर पिछले 1984 के बाद यानि कि 30 साल बाद किसी एक पार्टी ने बहुमत हासिल किया था।

लोकसभा चुनावों में जीतने के बाद कई राज्यों के चुनाव हुए। महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, असम, गोवा, मणिपुर उत्तर-प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों में भी मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़कर भाजपा ने अच्छी जीत हासिल की और सरकार बनाई। दिल्ली और बिहार अपवाद छोड़ दीजिए।

यह सब पहले ही इसलिए बता दिया, जिससे आप आगे की बातों को पढ़ते वक्त यह ध्यान रखें कि जनता ने भाजपा को बेइंतहां वोट दिया है। प्रधानमंत्री मोदी पर पंडित नेहरू जैसा भरोसा जताया है। इसलिए सवाल भी भाजपा और मोदी से ही पूछे जाएंगे। सत्ताधारी दल से ही ज्यादा सवाल किए जाने चाहिए। पत्रकारिता के पुरोधा गणेश शंकर विद्यार्थी कहा करते थे- “पत्रकार विपक्ष का नेता होता है।” विपक्ष को तो जनता ने ही नकार दिया है, उनसे हम क्या और क्यों पूछेंगे ? केंद्र की मोदी सरकार की तीन साल पूरे हो रहे हैं, तो चलिए हम कुछ घटनाओं पर नज़र डाल लेते हैं-

विजय माल्या, ललित मोदी, गुरूदासपुर हमला, उड़ी आतंकी हमला, पठानकोट आतंकी हमला, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या, कश्मीर के नौजवानों के हाथ में पत्थर और आंखों में पैलेट गन, 11 मार्च, 2017 को सुकुमा में 12 CRPF जवान शहीद, 24 अप्रैल, 2017 को सुकुमा में ही 25 CRPF जवान शहीद। बॉर्डर पर पाकिस्तान भारतीय सैनिकों के सिर काट के ले गया। यह सब घटनाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हम यहां इन्हें छोड़ देते हैं। हम आज सिर्फ भीड़ की बात करेंगे। जब सरकार अपनी तीसरी सालगिरह के जश्न में व्यस्त है, तब देश किधर जा रहा है, जरा इस पर नजर डालते हैं-

28 सितंबर, 2015 को दिल्ली से सटे दादरी में गौमांस के शक की वज़ह से मोहम्मद अख़लाक़ नाम के शख्स की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।

मार्च, 2016 को दिल्ली के विकासपुरी में डॉक्टर पंकज नारंग को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला।

11 जुलाई, 2016 को गुजरात के ऊना में भीड़ ने 7 दलितों को गाड़ी से बांधकर पीटा। पूरे गुजरात में दलितों के उग्र प्रदर्शन हुए।

28 जून, 2016 को हरियाणा के पलवल हाइवे पर गोरक्षकों ने तीन लोगों को गोबर खिलाया और बेल्टों से उनकी पिटाई की।

मार्च 2016 को झारखंड में दो मुस्लिमों के शव पेड़ से लटके मिले, बाद में उनके परिवार ने कहा कि उन्हें लगातार धमकी दी जा रहीं थीं।

3 अप्रैल, 2017 को राजस्थान के अलवर में दूध के लिए गाय खरीदकर ले जा रहे पशुपालक पहलू खान को गोरक्षकों ने उसके बेटे के सामने ही पीट-पीटकर मार डाला।

22 अप्रैल, 2017 को जम्मू-कश्मीर में गोरक्षकों ने 7 लोगों पर हमला कर दिया, जिनमें से 4 गंभीर रूप से घायल हुए।

19 मई, 2017 को झारखंड में बच्चा चोरी की अफ़वाह पर भीड़ ने 7 लोगों को पीट-पीटकर मार डाला।

इन सभी घटनाओं में एक समानता है। यह घटनाएं भीड़ द्वारा की गईं हैं। कभी गोरक्षकों की भीड़, कभी बजरंग दल की भीड़, कभी हिंदू युवा वाहिनी की भीड़, कभी एंटी रोमियो स्कवॉड वाले होते हैं। कई बार कोई संगठन नहीं होता, लोग ही भीड़ बन जा रहे हैं। आप दीमापुर को याद कीजिए, बलात्कार के एक आरोपी को भीड़ ने थाने से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला था, बाद में पता चला वो निर्दोष था।

भीड़ कभी भी न्याय नहीं कर सकती। हम भारत के लोग अपने देश में इस तरह की घटनाएं होते हुए देखने के बाद खामोश कैसे रह सकते हैं? आज जो भीड़ आरोपियों को पीट-पीटकर मार रही है, कथित गोतस्करों की जान ले रही है, कथित ‘रोमियो’ को टॉर्चर रही है, कल वही भीड़ हम-आप तक पहुंच जाएगी। लोकतांत्रिक देश में कौन आरोपी है, कौन दोषी है, किसे क्या सजा मिलनी चाहिए, इसका फैसला करने के लिए पुलिस, अदालतें और कानून होते हैं। जब सड़क पर ही ‘न्याय’ किया जाने लगे और उसे किंतु-परंतु लगाकर सही ठहराया जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि आप एक समाज के तौर पर, एक देश के तौर पर फेल हो रहे हैं।

पिछले तीन सालों में ऐसी घटनाओं में गुणात्मक स्तर पर बढ़ोत्तरी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसी जघन्य घटनाओं की आलोचना भी नहीं की। उस ‘80 फीसदी गोरक्षकों गुंडे होते हैं’ वाले बयान को अपवाद ही समझना चाहिए। हालांकि उस बयान के बाद स्वयंसेवक से प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी खुद ही कथित गोरक्षकों के निशाने पर आ गए थे। केंद्र सरकार के किसी मंत्री ने ऐसी घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी। दरअसल, जब आप कुछ बोल नहीं रहे हैं, इसका मतलब है आप समर्थन कर रहे हैं। राजस्थान में जब पहलू खान को मार डाला गया तो वहां के गृह मंत्री बाबूलाल कटारिया ने कहा- “गोरक्षक काम तो सही कर रहे थे।”

सवाल तो हाल ही में सहारनपुर में हुई जातीय संघर्ष की घटना पर भी उठने चाहिए। यह सवाल इस दौर में बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। एक जाति विशेष की भीड़ इकठ्ठी होती है और दूसरे लोगों के घरों में आग लगा देती है। इसके बाद दूसरी जाति की ‘आर्मी’ इकठ्ठी होती है, और हिंसा शुरू। सहारनपुर से शुरू हुए जातीय संघर्ष की लपटें दिल्ली तक पहुंचती हैं, और जंतर-मंतर पर हजारो की संख्या में लोग इकठ्ठा हो जाते हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार में से किसी मंत्री ने सहारनपुर जाने के बारे में नहीं सोचा। ठीक से निंदा भी नहीं की। नेहरू ने एक बार कहा था- “देश लोकतंत्र के दिखावे में बिखर जाएगा और कमजोर हो जाएगा, यदि जातिवाद और तंग मानसिकता अधिक प्रबल हो गई।” भाजपा के ही दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 22 अप्रैल, 1997 को संसद में प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल द्वारा प्रस्तुत विश्वासमत के प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा था- “धर्मनिरपेक्षता के क्षेत्र में जातिवाद, संप्रदायवाद से भी अधिक खतरनाक है।”

थोड़ा-सा आगे बढ़ते हैं, लेकिन बात भीड़ की ही करेंगे। सोशल मीडिया पर हर सप्ताह कोई ना कोई ऐसा वीडियो वायरल हो जाता है, जिसमें प्रेमी युगल को या फिर लड़का-लड़की जो कि दोस्त हैं, उन्हें पीटा जा रहा होता है। कभी लव ज़िहाद का नाम लेकर कपल्स को निशाना बनाया जाता है। कभी एंटी रोमियो स्कवॉड उनकी छानबीन कर रहे होते हैं। तमाम सेनाओं, संघों और संगठनों की भीड़ इकठ्ठी होकर आती है और ‘मॉरल पुलिसिंग’ के नाम पर उन्हें पीटती है।

20 नवबंर, 2016 को बुलंदशहर के खुर्जा में एक होटल के कमरे में से कपल्स को निकालकर हिंदूवादी संगठन की भीड़ ने पीटा।

20 अप्रैल, 2017 को राजस्थान के बांसवाड़ा में कपल्स को पीटा गया। इसके बाद दोनों को नंगा करके पूरे गांव में घुमाया गया।

मई, 2017 को मेरठ में कपल्स को एक घर में से निकालकर पीटा।

21 मई, 2017 को मुजफ्फरनगर में दो लड़के अपनी फेसबुक फ्रेंड से मिलने गए थे, उन्हें कथित रूप से बजरंग दल वालों ने बीच सड़क पर बेल्टों से पीटा। उनके कपड़े फाड़ दिए गए।

यह कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने सुर्खियां बटोरीं। ऐसी और भी कितनी ही घटनाएं होंगी जो पता ही नहीं चलतीं। जितनी घटनाएं सामने आती हैं, उससे दोगुनी छिपी रहती हैं। इन्हें हम आपराधिक घटनाएं कहकर चुप नहीं रह सकते। यह एक बदलते भारत की तस्वीर है। इसे हर कोई देख रहा है। टेलीविजन चैनल्स में रॉ फुटेज़ देखकर सब सहम जाते हैं। सब जान रहे हैं, कि जो भी हो रहा है वो सही नहीं हो रहा है। इसके बावजूद लोग बोलते नहीं ?

इसकी भी एक बड़ी वजह भीड़ है। यह भीड़ वर्जुअल स्पेस यानि कि सोशल मीडिया पर है। फेसबुक, ट्वीटर पर अगर इन घटनाओं के ख़िलाफ़ कोई पत्रकार, छात्र, एक्टिविस्ट, अभिनेता, नेता या फिर कोई दूसरा लिख दे/ आलोचना कर दे, तो उसे वहीं निशाना बनाया जाता है। उसे बदत्तर से बदत्तर गालियां दी जाती हैं। उसके परिवार वालों के मामलों को उछाला जाने लगता है। उनकी फोटोज़ से छेड़छाड़ होने लगती है। और अंत में उसे देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। कई बड़े पत्रकार ऐसे हमलों का शिकार आए दिन होते रहते हैं। रवीश कुमार को मां की गालियां दी गईं, बरखा दत्त को वो सभी गालियां दी जाती हैं, जो इस ब्रहमाण्ड में मौजूद हैं।

अंत में बहुत ही सिंपल सवाल है। क्या यही न्यू इंडिया है? जिसकी बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार करते हैं। तीन सालों में मोदी जी ने इसी को तो बनाया है। मिस्टर प्राइम मिनिस्टर- क्या आपके न्यू इंडिया में आरोपियों का न्याय भीड़ ही करेगी ? आपके न्यू इंडिया में लड़का-लड़की दोस्त नहीं होंगे, अगर होंगे तो उन्हें भीड़ पीटेगी ? आपके न्यू इंडिया में अगर पत्रकार सवाल उठाएगा तो उसे मां-बहन की गालियां दी जाएंगी ? आपके न्यू इंडिया में पशुपालक को गाय रखने की इज़ाजत नहीं होगी, अगर वो गाय ले जाएगा तो भीड़ उसे जान से मार देगी ? आपके न्यू इंडिया में यह सब होता रहेगा और आप चुप रहेंगे ? अगर आपका न्यू इंडिया ऐसा होगा, तो प्लीज़ हमें ऐसा न्यू इंडिया नहीं चाहिए। हमें पंडित नेहरू वाले इंडिया में ही रहने दो, जिसमें भीड़ नहीं, संविधान ही सबकुछ तय करता आया है। कृपया ध्यान रखें, यह सिर्फ आपराधिक घटनाएं नहीं हैं ये देश/समाज के ‘तालिबानीकरण’ की शुरूआत है।