by – Rakesh Kayasth

मैं केजरीवाल के पक्ष में खड़ा होना चाहता हूं. ये जानते हुए भी इस वक्त ऐसी बात मुंह से निकालना गालियों की बौछार को न्योता देना है. ये जानते हुए भी कि ये एक बहुत कमजोर और लगभग हारा हुआ मुकदमा है.

मैं केजरीवाल के पक्ष में इसलिए खड़ा होना चाहता हूं क्योंकि मैं उन्हें उसी भीड़तंत्र की भेंट चढ़ता हुआ देख रहा हूं, जिस भीड़तंत्र ने उन्हें बनाया था.

भीड़ बहुत ताकतवर चीज है. भीड़ किसी राह चलते आदमी को महात्मा बना सकती है और किसी बेकसूर की जान भी ले सकती है. भीड़ चुटकियों में सब कुछ तय कर लेती है. भीड़ से एक आवाज उठती है- ईमानदारी का बोलबाला है और पूरा देश मान लेता है कि ईमानदारी का युग आ गया.

भीड़ से आवाज उठती है बेईमान का मुंह काला और पूरा देश मान लेता है कि कल तक जो ईमानदार था अब वह परले दर्जे का बेईमान है. भीड़ फौरन कंबल और डंडा ढूंढने लगती है. इसी तरह चलता है हमारा महान लोकतंत्र.

लहरों की सवारी

केजरीवाल के उत्थान और पतन की कहानी लहरों की सवारी की कहानी है. कुछ साल पहले भारत में ईमानदारी की एक लहर उठी और देखते-देखते मास हिस्टीरिया यानी सामूहिक उन्माद में बदल गई.

पूरे घर को बदल डालूंगा वाले अंदाज में देश ने मान लिया कि हम जिस व्यवस्था में रहते हैं वह बने रहने लायक नहीं है. कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सबकुछ पूरी तरह भ्रष्ट है. देखा जाये तो यह बात पूरी तरह सही नहीं है लेकिन बहुत हद तक सच है.

लेकिन इस सच तक हमारी महान जनता किस आधार पर पहुंची? क्या वह कोई सामूहिक विवेक था जो देश की हालत को देखते और समझते हुए धीरे-धीरे विकसित हुआ था. अगर ऐसा हुआ होता तो देश सचमुच बदल जाता. लेकिन वह महज एक लहर थी, ठीक वैसी ही लहर जिस तरह नये फैशन की कोई लहर उठती है.

या फिर भारत पर वर्ल्ड कप क्रिकेट जीतने का जो बुखार चढ़ता है. जिस तरह पब्लिक कहती है, ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’ उसी तरह पूरे देश ने कहना शुरू कर दिया- पॉलिटकल सिस्टम सड़ा हुआ है और देश की संसद डाकुओं का अड्डा है.

आंदोलन या सिर्फ एक सामूहिक उन्माद?

इसी लहर में अन्ना के हजारे के साथ खड़े हुए थे अरविंद केजरीवाल. याद कीजिये रामलीला मैदान के वो दिन जहां सिर्फ भीड़ थी. देशभर के तमाम चैनलों के कैमरे थे. मंच पर अन्ना हजारे थे और उनके साथ थे अरविंद केजरीवाल और अन्य सहयोगी.

दूसरी तरफ था डरा सहमा राजनीतिक तंत्र. तमाम नेता बौने नजर आ रहे थे और देश की संसद बेजान बुतों से भरा कोई अजायब घर. ऐसा लग रहा था कि देश की जनता लोकपाल लाकर रहेगी. अन्ना के आंदोलन से लेकर आम आदमी पार्टी के गठन तक जो कुछ हुआ उसके विस्तार में जाना वक्त की बर्बादी होगी.

मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं रामलीला मैदान में केजरीवाल का पहला शपथ ग्रहण समारोह जब उन्होने, ‘इंसान से इंसान का हो भाईचारा’ गाया था. साथ ही कार्यकर्ताओं से मार्मिक अपील की थी- कि कभी घमंड मत करना वर्ना कांग्रेस की तरह जनता तुम्हें मिटा देगी.

ऐसी लग रहा था कि थोड़ी बहुत आधुनिकता के साथ गांधीवाद मूल्य भारतीय राजनीति में वापस लौट आये हैं. बातचीत से लेकर पहनावे तक केजरीवाल की पूरी शख्सियत में असाधारण किस्म की स्वभाविकता थी. इसलिए ‘मैं तो आम आदमी हूं जी’ वाले उनके दावे हर किसी ने खुले दिल से स्वीकार किया.

उन्तालिस दिन के कार्यकाल में मेट्रो से दफ्तर जाने से लेकर बीच सड़क धरना देते हुए सरकार चलाने तक उन्होंने जो कुछ किया भीड़ ने उसे एक तरह से अपना सशक्तीकरण माना. यही वजह है कि मोदी लहर के कुछ ही महीने बाद दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी का नामो-निशान मिट गया और 70 में से 67 सीटों के साथ आम आदमी पार्टी की सरकार बनी.

भीड़ की ताकत पर इतराता डिक्टेटर

लेकिन दूसरे कार्यकाल के आते ही अरविंद केजरीवाल की शख्सियत बदल चुकी थी. थोड़े से गांधीवादी, थोड़े नक्सली, थोड़े समाजवादी और जो बाकी बचा वो संघी मार्का राष्ट्रवादी. आवाज पहले से ज्यादा ऊंची, लहजा आदेशात्मक और पर्सनैलिटी पूरी तरह जजमेंटल.

उनके हाथ में प्रचंड बहुमत का हंटर था और वे एक ऐसे रिंग मास्टर में तब्दील हो चुके थे जो भीड़ की ताकत का दंभ भरता हुआ किसी पर भी कोड़े बरसा सकता था.

प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और आनंद कुमार जैसे अपने पुराने बौद्धिक साथियों को निर्ममता से बाहर फेंककर केजरीवाल ने इस बात का एलान किया कि इंटलेक्चुअल सपोर्ट या गाइडेंस की उन्हें कोई जरूरत नहीं है क्योंकि जनता उनके पीछे पागल है.

लोकलुभावनवाद का रास्ता

खुद को पॉपुलिज्म की राह पर धकेल चुके केजरीवाल अब किसी भी आम रीजनल लीडर की तरह हो चुके थे. फर्क सिर्फ इतना था कि लोक-लुभावन फैसलों के अलावा उनमें दूसरे रीजनल लीडर्स जैसी कोई और बात नहीं थी.

उन्हें इस बात का एहसास नहीं रहा कि जनता की जिस दीवानगी के दम पर वे मनमाने फैसले ले रहे हैं और एक दुश्मनी के बेहिसाब मोर्चे खोल रहे हैं वो दरअसल अब उतार पर है. नेता के पास विचारधारा होती है लेकिन भीड़ विचारहीन होती है.

भीड़ को विचारों के धागे में पिरोकर मजबूत और स्थायी जनाधार बनाना ही राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती होती है. लेकिन केजरीवाल ये बात पूरी तरह भूल गये. कांग्रेस के पतन के दौर में पैदा हुए महाशून्य में उन्होंने ये मान लिया कि बिना किसी संगठन या तैयारी के वे आम आदमी पार्टी को देश का मुख्य विपक्षी दल बना देंगे.

इसी दम पर वे नरेंद्र मोदी को लगातार ललकारते रहे. पहली बार पंजाब में चुनाव लड़कर 20 फीसदी से ज्यादा वोट और मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल करने के बावजूद केजरीवाल ने मातम इस तरह मनाया जैसे हर चुनाव में वॉक ओवर हासिल करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो.

उतार पर करिश्मा

बीजेपी के लिए केजरीवाल का डर उसी वक्त था जब तक भीड़ की ताकत उनके साथ नजर आ रही थी. मास हिस्टीरिया एक बार फिर उभर रहा है लेकिन अलग ढंग से.

जिस तरह केजरीवाल ईमानदारी के सबसे बड़े मसीहा माने गये थे उसी तरह उन्हें बिना किसी ठोस तथ्य के भ्रष्ट करार दिया जा रहा है. जिस भीड़ ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया था वही भीड़ अब उन्हें पांवों तले रौंदने को तैयार है. जाहिर है बीजेपी के लिए अपने दुश्मन की राजनीतिक हत्या का इससे बेहतर कोई और मौका नहीं होगा.

आम आदमी पार्टी के आधे से ज्यादा विधायकों पर मुकदमे हैं. बहुत से असंतुष्ट हैं. ब्लैकमेलिंग और सौदेबाजी की खबरें भी आम हैं. ऐसे में ताज्जुब नहीं होगा कि अगर आनेवाले महीनो में आम आदमी पार्टी की सरकार गिर जाये.

आगे क्या होगा केजरीवाल का?

अब सवाल ये है कि केजरीवाल का क्या होगा? क्या उनके लिए वापसी संभव होगी. उम्र के लिहाज से केजरीवाल के पास लंबा वक्त पड़ा है. बशर्ते वे अपनी गलतियों से सीखें.

नैतिकता के साथ चालूपने की मिलावट नहीं चल सकती और कम बेईमान आदमी ज्यादा बेईमान आदमी से ईमानदारी की जंग नहीं जीत सकता.

ये बातें अगर केजरीवाल समझने को तैयार हों और देश को समझाने के लिए संघर्ष करने को तैयार हों तो मुझे गालियां खाकर भी उनके पक्ष में खड़े रहने से गुरेज नहीं होगा.