by — चमन मिश्रा

अभी हाल ही में ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर’ ने विश्व के सभी देशों में प्रेस को कितनी आज़ादी है उसकी सूची जारी की है। इस सूची में भारत का स्थान 136वां है, जोकि पिछली साल 133वां था। प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में हम तीन नंबर नीचे खिसक गए। वहीं, हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में कई अंक ऊपर चढ़ा है। यहां मैं ‘फ्रीडम ऑफ़ प्रेस’ या फिर सूची के मानकों और विश्वसनीयता पर बात नहीं करूंगा। मैं तो यहां पत्रकारों की बात करूंगा। किस सूची में है, उसके बारे में वो विचार करें जो सूट-बूट की या फिर डिजायनर पत्रकारिता कर रहे हैं।

आप शाम को बेडरूम में लेटे हुए, जिन बाइट्स और विजुअल्स को इफैक्ट के साथ सुन रहे होते हैं, दरअसल वो सबकुछ एक रिपोर्टर/पत्रकार लगभग-लगभग खुद को मार के लाता है। फील्ड की क्या स्थिति होती है, सोची भी नहीं जा सकती। आप सोचिए पिछले दिनों अखिलेश यादव की पार्टी में भषड़ फैली थी, तब पत्रकार कैसे भाग रहे थे, अब केजरीवाल की पार्टी में है। आप चुपके से बेडरूम में कह देते हो, ‘देखो कुत्तों की तरह भाग रहे हैं।‘ आज ही मैं एक रॉ फीड देख रहा था, रिपोर्टर केजरीवाल की गाड़ी के पीछे भागते हैं, तब तक केजरी का समर्थक किसी एक रिपोर्टर को पीछे से थप्पड़ जड़ देता है/ एक पीछे शर्ट पकड़ के खींच लेता है। इससे भी बुरी दशा होती है।

जो ठीक से पत्रकारिता करना चाहता है, उसे गोली मार दी जाती है। बिहार, झारखंड, यूपी और पंजाब के हालिया उदाहरणों से इसे समझा जा सकता है। यूपी में समाजवादी पार्टी के नेता ने एक पत्रकार को जिंदा जला दिया तो वहीं नीतीश के बिहार में शहाबुद्दीन के गुर्गे ने एक पत्रकार को गोली मार दी। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 2015-16 में 145 पत्रकारों पर हमले हुए। इनमें मरने वाले ज्यादात्तर ग्राउंड जीरो के वो पत्रकार होते हैं जिन्होंने अपने न्यूज़ रूम की शक्ल तक नहीं देखी होती है। यह करीब-करीब दुनिया के हर मुल्क में होता है। अमेरिका में तो खुद राष्ट्रपति सभी पत्रकारों को मार देना चाहता है। फॉक्स टीवी के छोड़कर।

वहीं, न्यूज़रूम के पत्रकारों की हालत बहुत खस्ता होती है। इनका सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यही है कि ये पत्रकार भी हैं तो भी इन्हें कोई देख/सुन नहीं रहा है। परदे पर जब प्रकाश चमकता है तो नेपथ्य में मजबूत आदमी भी प्रकाश से चौंधिया कर दम तोड़ देता है। इसके बाद बिडंबना ये है कि इन्हें इतना भी नहीं मिलता कि ठीक से पेट भरके सो सकें। हालात तो इतने ख़राब हो जाते हैं, कि कम उम्र में ही शरीर वृद्धावस्था को महसूस करने लगता है। टाइपिंग स्पीड तेज होती जाती है, दिमाग सुन्न पड़ता जाता है। पूरी दुनिया की ख़बरें याद रहने लगतीं हैं, खुद की ख़बर लेने का वक्त नहीं मिलता। इसलिए न्यूज़रूम के पत्रकार रोज मरते हैं। जितने टाइम सोते हैं उतने टाइम ही जीते हैं। क्या आप जानते हैं कि पिछले साल कितने पत्रकारों ने आत्महत्या कर ली। 5-6 तो ऐसे लोग रहे हैं जिन्हें मैंने नोटिस किया है। उनके पास विकल्प का अभाव हो जाता है। वो खुद को कमतर आंकने लगते हैं। वो अंतिम विकल्प को चुन लेते हैं। कुछ पत्रकार ऐसे मर रहे होते हैं।

दूसरी तरफ कई बार स्टोरी करते-करते ही पत्रकार काल के गाल में समा जाते हैं। इंडियन एक्सप्रेस का फोटो जर्नलिस्ट, झांसी में पानी ले जाने के लिए खाली खड़ी ट्रेन का फोटो खींच रहा था, ऊपर बिजली का वायर था, करेंट से मौत। आज तक का पत्रकार भोपाल में व्यापम कवर करने गया पता नहीं क्या हुआ, मौत। हादसों में मरने वालों की कोई ज्यादा ख़बर लेता नहीं। पत्रकारिता संस्थान उसे छिपाना चाहते हैं, लोगों को पत्रकारों की फ़िकर है नहीं।

वहीं, पत्रकार सबसे ज्यादा तब मरता है जब मीडिया को गालियां दी जातीं हैं। जमीन पर वो सब मेहनत करता है। पूरे फैक्ट्स भेजता है। बाद में उस स्टोरी को कोई कैसे चला रहा है, ये वो कैसे तय कर सकता है। वो धूप में भाग-भाग के कवर करके न्यूज़ रूम को भेज देता है, बाद में न्यूज़ रूम डिसाइड करता है कि क्या चलना है, कैसे चलना है। आप जनता और कुछ पत्रकार भी जब रोज-रोज मीडिया को गालियां देते हो, तब तो पत्रकार घुट-घुट कर मरता है। मीडिया की समीक्षा/आलोचना एक बात है और उसे गालियां देना दूसरी बात। कुछ पत्रकार रोज मीडिया को मन भरके गालियां देते हैं। कोट-वोट पहनकर एसी में बैठकर गरियाते रहते हैं। जो आप खुद कर रहे हो, उसमें कमियां हो सकतीं हैं, दुनिया के हर प्रोफेशन में कमियां हैं। दुनिया के सभी देशों में मीडिया पर सवाल उठते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मुद्दों की बजाय आप रोज मीडिया को ही गरियाओ। इससे दिक्कत ये है कि जो बेचारा सुबह से शाम तक मेहनत करता है उसे रात को मरना पड़ता है। आप अगर खुद को गणेश शंकर विद्यार्थी समझते हैं तो बदलाव कीजिए। जितना कर सकते हैं, उतना कीजिए। अपने हिस्से का तो चलिए, आप तो चल भी नहीं रहे, दूसरे जो चल रहे हैं, गलत या सही आप उनके चलने को गालियां दे रहे हो। अपनी ना चल पाने की कुंठा में अपने ही प्रोफेशन को गालियां क्यों दे रहे हो ?

इतने तरीकों से मरने के बाद भी जो कोई बच जाता है वो सिगरेट/ शराब से मर जाता है। दरअसल, ये एक प्रक्रिया है, पत्रकारिता करते वक्त आप अकेले होते हैं, आप गरीब होते हैं, आपके पास फोन कॉल्स आना बंद हो जाते हैं। ऐसे में सिगरेट और शराब पत्रकार की चाय के बाद दूसरे अच्छे दोस्त बन जाते हैं। इन्हीं की दम पर वो खुद को रोज मारता है और अंत में किसी दिन कमरे के किसी कोने में मरा हुआ मिलता है।

यह सिर्फ इसलिए लिखा है कि मेरे नए-नए पत्रकार साथियो मीडिया को/पत्रकारों में मत गालियां दो। इस भयंकर पूंजीवादी दौर में वो इससे बेहत्तर कर भी नहीं सकते। अगर आप कर सकते हो तो कीजिए, स्वागत है इंटरनेट की दुनिया में आपका बेसब्री से इंतजार हो रहा है।