मुस्लिम पर्सनल लॉ, एक सुधार अभियान की आवश्यकता!

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by — डॉक्टर मोहियुद्दीन गाजी

पत्नी के साथ मेरे संबंध खराब हो गए हैं, जुदाई की नौबत आ गई है, लेकिन तलाक नहीं दूंगा बल्कि इंतजार करेंगे कि पत्नी खुला ले, क्योंकि पहली स्थिति में मुझे महर की राशि देनी पड़ेगी, और दूसरी स्थिति में महर माफ हो होगा” यह वाक्य मैंनें कई बार सुना है। इस वाक्यांश से कानूनी कौशल तो जाहिर होता है लेकिन ईमान और नैतिकता का नूर ज़रा नज़र नहीं आता। तथ्य यह है कि अगर जीवन में ईमान और अखलाक के नियम हो तो व्यक्ति सख़ी और फ़य्याज़ बन जाता है, और अगर जीवन केवल कानूनी दांव-पेंच की भेंट कर दी जाए तो मनुष्य स्वार्थी और कंजूस होकर रह जाता है। बड़ा अंतर होता है उस मनुष्य में जो केवल कानून के स्तर पर जीता है, और उस व्यक्ति में जो ईमान और अखलाक की ऊंचाइयों में उड़ाता है। ईमान और अखलाक के हिसार न हो तो इस्लामी कानून से भी अनगिनत हीले और धोखे के निकाल लिए जाते हैं।

कुरआन में कानून, ईमान और अख़लाक़ तीनों परस्पर ऐसे जुड़े हुए नज़र आते हैं, कि उन्हें अलग करके देखने की कल्पना ही नहीं किया जा सकता। कुरआन का पालन करने वालों के लिए यह संभव ही नहीं है कि कानून से मिलने वाले अधिकार को तो बढ़कर ले, लेकिन अखलाक द्वारा लगाए जाने वाले आवश्यकताओं की अनदेखी कर दे।

कानून कितना ही अच्छा हो, वह अखलाक को बदल नहीं सकता। यह बात एक उदाहरण से समझा जा सकता है, कि सड़क पर कोई अज्ञात व्यक्ति दुर्घटना का शिकार होकर तड़प रहा हो, इस स्थिति में कानून बाधाओं से भरा हो तो लोग उसे उठाकर अस्पताल ले जाते हुए डरेंगे कि कहीं वह खुद आरोप की चपेट में न आ जाएँ, और उन्हें थाने और अदालत के चक्कर लगाने पड़े, कानून अगर सहायक हो तो लोग उसे अस्पताल ले जाते हुए डर महसूस नहीं करेंगे। लेकिन केवल कानून चाहे वह कितना ही अच्छा हो लोगों के अंदर यह भावना पैदा नहीं कर सकता है कि वह लाभ हानि से बेनियाज़ होकर एक अज्ञात घायल को अस्पताल ले जाएं। यह जुनून तो ईमान और अखलाक से जन्म लेता है।

पारिवारिक कानून के हवाले से नीचे कुछ उदाहरण इस पहलू से भी विचार करें:

कानून की दृष्टि से अकारण तलाक देने से भी तलाक हो जाती है, और तीन तलाकें देने से तीन तलाकें भी हो जाती हैं, लेकिन ईमान और अखलाक का तकाजा है कि इंसान बिना जरूरत तलाक़ न दे, और तलाक दे तो बस एक ही तलाक दे, तलाक से पहले स्थिति की सुधार की सारी कोशिशें कर डाले, तलाक का फैसला लेने से पहले बुजुर्गों से सलाह और मशवरा और अल्लाह से खैर की दुआ भी कर ले, और इस पूरी प्रक्रिया में कहीं स्वार्थ और नफ्स परस्ती को बीच में न आने दे।

कानून की दृष्टि से पति चाहे तो पत्नी के खुला मांगने पर भी इसे खुला न दे, लेकिन अखलाक का तकाजा है कि अगर पत्नी साथ रहते हुए खुश न हो, तो पत्नी को साथ रहने को मजबूर न करे, समझाने बुझाने के लिए कुछ समय जरूर मांगे , लेकिन उसे अपनी पत्नी बने रहने और घुट घुट कर जीने पर मजबूर न करे। और अगर खुद उसकी किसी कमजोरी की वजह से पत्नी खुला मांग रही हो तो किसी मुआवजे की मांग भी न करे। कानून की दृष्टि से हो सकता है तलाक देने वाले के लिए आवश्यक न हो कि वह तलाकशुदा पत्नी को कुछ दे, लेकिन नैतिकता का तकाजा है कि ऐसे समय में सखावत और उदारता की एक यादगार मिसाल कायम करे।

कानून की दृष्टि से हो सकता है कि अनाथ पोते को दादा के तर्के में भाग न मिले, लेकिन नैतिकता का तकाजा है कि जीवित भाई खुद आगे बढ़कर अपने मरहूम भाई के बच्चों को विरासत में उतना ही हिस्सा दे जितना खुद उसे मिल रहा है ।

यह कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि नैतिक शिक्षाएं ही हैं जिनसे प्रभावित होकर एक व्यक्ति अनाथ बच्चों को अपनी सरपरस्ती में ले लेता है, और विवाह की छाया खोने वाली महिलाओं को आगे बढ़कर विवाह का छाया प्रदान करता, चाहे उसे कितनी ही परीक्षाओं से गुजरना पड़े। यह नैतिक शिक्षाएं ही हैं जो खैर और भलाई के बड़े बड़े कामों की प्रेरणा बन जाती हैं।

इस्लामी कानून इस्लामी समाज का गौरव है, इससे बेहतर कानून प्रदान नहीं किया जा सकता है, लेकिन इस्लामी समाज का इससे भी बड़ा भेद वह नैतिक शिक्षा है जो हकीम रब की तरफ से कानून के साथ दी गई हैं। इस्लामी कानून की सारी आबो ताब उन्हीं से है। ईमान और अखलाक के साथ न हो तो कानून बे रूह और भद्दा होकर रह जाता। याद रहे केवल कानून के शासन से इस्लामी समाज एक आदर्श समाज नहीं बन सकता है। एक आकर्षक आदर्श इस्लामी समाज के लिए कानून से पहले और कानून से कहीं अधिक ईमान और अखलाक का शासन आवश्यक है।

कुरआन में जहां शादी और तलाक के नियम बयान हुए हैं, वहाँ तकवा और एहसान के बार बार उल्लेख से स्पष्ट होता है कि इन नियमों के क्रियान्वयन के समय अल्लाह के सामने जवाबदेही का गंभीर अहसास और लोगों के साथ उत्तम अखलाक के साथ पेश आने का शक्तिशाली जुनून चाहिए। तकवा का मतलब है विवेक की वह शक्तिशाली आवाज जिसे कोई वकील दबा न सके, और अहसान का मतलब है नैतिकता, वह अंतिम ऊंचाई जहां व्यक्ति पहुंच सकता हो। इस्लाम के पारिवारिक कानून में कई बातें इज्तेहादी होने की वजह से विभेदक भी हो सकती हैं, हर एक में लंबी बहस भी हो सकती है, लेकिन ईमान और अखलाक के आवश्यकताओं में कोई आवश्यकता विभेदक नहीं है, जो भी है वह सर्वसम्मति से प्रशंसा के योग्य है। इस्लाम के पारिवारिक कानून की चिंता करने वालों के लिए आवश्यक है कि वह पारिवारिक नियमों का रिश्ता विश्वास और नैतिकता फिर से जोड़ने का अभियान चलाएँ। यह रिश्ता जब तक बहाल नहीं होगा इस्लाम के पारिवारिक नियम खतरों से दो चार रहेंगे, और मुस्लिम समाज अनगिनत पारिवारिक समस्याओं से परेशान रहेगा।

मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर जो अभियान मनाई जाती रही हैं, उनमें मुफ़्तीयाना और मुदाफेआना लब-ओ-लहजा हावी रहा है। पारिवारिक कानून के हवाले से हर फतवे की रक्षा, और हर फतवे पर अधिक जोर, एहसास होता है कि अब मुसलमानों की जरूरत एक ऐसा सुधार अभियान है, जिसका उद्देश्य, रक्षा से आगे बढ़कर मुस्लिम समाज के हर उस पहलू की सुधार हो जहां त्रुटि आई है।
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