रवीश जी ने गौ रक्षा गुंडागर्दी पर लेख लिखा वही किन्ही शुजूको जी का ये कमेंट था ——

Shuzuka • 14 days ago गौरक्षा के उपाय :-१. प्रतिदिन एक रोटी गाय के लिए जरूर निकालें | हो सके तो ज्यादा भी | २. गाय को सूखा आटा या उसका चोकर, गुड़ और हरी पत्तेदार कच्ची सब्ज़ियां (पालक , धनिया आदि ) बहुत पसंद होती हैं | अपनी श्रद्धानुसार आप ये सब गाय को खिला सकते हैं |३. कभी भी गाय को बासी खाना न दें |४. यदि आप गाय को पालते हैं तो उसके दूध कम देने पर अथवा बूढी हो जाने पर भी उसकी सेवा करें | उसे न त्यागें | और न ही उसे कूड़ाघरों में प्लास्टिक और कूड़ा खाने के लिए छोड़े | आखिर गाय हमारी माता है |५. गौधारक शपथ लें कि कभी भी अपनी गाय को कसाई के हाथों नहीं बेचेंगे | और ना ही, गाय के मरने पर उसको चमड़ा उतरने वालों को बेचेंगे | बल्कि उसका यथाविधि अंतिम संस्कार करेंगे |६. सरकार को चाहिए कि वो गाय की ही तरह भैंस, बैल और दूसरे मवेशियों के मांस पर भी प्रतिबन्ध लगाए | साथ ही गाय, भैंस, बैल और दूसरे मवेशियों के मांस के निर्यात पर रोक लगाए |७. सरकार को उन गौधारको की आर्थिक मदद करनी चाहिए , जिनकी गाय बूढी हो गयी हैं या दूध नहीं देती | ताकि वो उसकी सेवा कर सकें |८. बूढ़ी गायों की सेवा न करना अपराध की श्रेणी में गिना जाए और उचित दंड दिया जाए |९. गाय – भैंसों को Oxytoxin के इंजेक्शन न दिए जाएँ | सरकार को Oxytoxin के इंजेक्शन की खुली बिक्री पर रोक लगा देनी चाहिए | सिर्फ डॉक्टर के prescription पर बीमार lactating women को ही बिकना चाहिए |१०. गाय – भैंस के मांस का प्रयोग , दवाओं आदि में प्रयोग होने वाले gelatin को बनाने में ना किया जाए | सरकार को ऐसी कंपनियों को जेलाटीन की जगह Hypromellose का इस्तेमाल करना सुनिश्चित करना चाहिए |११. किसी भी उत्पाद में जानवरों की चर्बी के इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए | इसका वनस्पति विकल्प इस्तेमाल करना चाहिए | १२. सरकार को गायों – मवेशियों की संख्या की आधार या जीपीएस ट्रैकिंग करनी चाहिए | ताकि वो सड़को पर आवारा न घूमे और न ही बूचड़खानों में काटी जाएँ |१३. जिन्होंने गौशाला की ज़मीने हड़पी हैं , सरकार को उनसे ज़मीने छीन लेनी चाहिए | १४. जो गौमांस के कानून का उल्लंघन करें , उन पर कानूनी कार्यवाही की जाए | ताकि गौरक्षा दल को बेवज़ह कानून हाथ में ना लेना पड़े | क्या सरकार के बस की नहीं है गौरक्षा कानून को ठीक से लागू करवाना, जो बेचारे गौरक्षको को कानून तोड़कर – बिना कोई जाँच पड़ताल किये – किसी की हड्डियां तोड़नी पड़ती है ?१५. डेरी वालो को गाय – भैंस के दूध में मिलावट बिलकुल बंद कर देनी चाहिए | ताकि शाकाहारी लोग तंदरुस्त हो सके | और लोगो का मांसाहार के प्रति प्रोत्साहन कम हो |१६. सरकार को मवेशियों के लिए अच्छे पशु अस्पतालों की संख्या बढ़ानी चाहिए | और सुविधाओं में (डॉक्टर , दवाएं आदि ) भी सुधार होना चाहिए | ”——

ये कमेंट पढ़कर में सोच में पढ़ गया की अब इन लम्बी चौड़ी मांगो का खर्च कौन उठाएगा डी एन झा लिखते हे ”और अगर आप दूध न देने वाली और बीमार होती जा रहीं गायों को बचाते रहेंगे तो मेरे हिसाब से ये अनइकोनॉमिक (आर्थिक नुकसान का) ख़्याल है.मैं खुद जानवरों के अधिकारों का समर्थक हूँ लेकिन सड़क पर घूमती प्लास्टिक खाने वाली, गंदगी खाने वाली और घरों से निकाल दी गईं गायों को बचा के रखने में कहाँ की समझदारी है. ” खेर फिर भी मान ले की जनता पर टेक्स लगाकर हिंदूवादी सरकार गायो की फुल देखभाल करने की कोशिश करेगी आज ही खबर भी आई की सरकार गायो के आधार कार्ड ट्रेकिंग आदि की वयवस्था करने वाली हे यानि आपके हमारे खून पसीने की कमाई के टेक्स से गायो की देखभाल की जायेगी चलिए धार्मिक भावनाव की खातिर ये भी सही , मगर भारत में जो जमीनी हालात हे उनमे ये तो तय हे की गायो के लिए चाहे जितने फण्ड की व्यवस्था कर भी ली जाए तो भी गायो का भला नहीं होगा क्यों की बीच में ही वो पैसा ठिकाने लग ही जाना हे . जिस देश में इंसानो को सुविधा नहीं हे कम से कम तीस से पचास करोड़ लोग जिस देश में जानवर जैसी या जानवर से भी बदतर हालत में रहते हे वहा कोई कैसे सोच सकता हे की गायो के लिए इतनी सुविधाओं का जुगाड़ कभी भी हो सकता हे ऐसा कभी नहीं हो पायेगा – वही में ये भी सोचने लगा की जैसे ये गायो के लिए कई सुविधाएं मांग रही हे ”बूढ़ी गायों की सेवा न करना अपराध की श्रेणी में गिना जाए और उचित दंड दिया जाए ” जिस देश में बूढ़े माँ बाप की सेवा ही एक बड़ा मसला बन कर खड़ी हे वहा बूढी गायो की सेवा का सपना ——- ? और जैसे ये गायो का महत्व उससे जुडी अपनी धार्मिक भावनाये बता रही हे वैसे ही मिलता जुलता केस हमारे यहाँ मदरसों का भी तो नहीं हे ———— ?

मुझे अपनी मोटी अक्ल से दोनों केस कुछ कुछ सेम से लगे हे गाय हो या मदरसों के छात्र दोनों का ही कुछ होता बनता मुझे नहीं दिख रहा हे हां दोनों ही मामलो में कुछ सयाने लोग खूब पैसा बना रहे हे इस विषय में कुछ बोलते ही धर्मविरोधी करार दिए जाने का खतरा हे पाठको जरा सोचिये गाय का भला -भला कैसे हो सकता हे सवाल ही नहीं भारत जैसे देश में जहा इतना बुरा हाल हे जगह संसाधनों की इतनी कमी हे वहा गौ सेवा के लिए भला कौन आएगा कोई अपनी जेब नहीं ढीली करने वाला हे जैसे बहुत से लोग मदरसों का गुणगान करते हे मगर सवाल नहीं हे की अपने बच्चो को मदरसे भेजे — ? वैसे ही गौ माता के गीत हर कोई गाता मिल सकता हे मगर गायो की दुर्गत हम घर से बाहर निकलते ही देख सकते हे अब दूध ना देने वाली गायो पर होने वाला खर्च तो सीधे कोई उठाएगा नहीं सवाल ही नहीं उठता हे पढ़े ये लेख जो एक शुद्ध संघी की साइट से ही हे पढ़े http://desicnn.com/blog/ban-on -beef-the-other-side-of-coin तो ये बात हम नहीं कह रहे हे एक संघी की साइट पर ही हे की गौसेवा असम्भव सा काम हे यही नहीं फ़र्ज़ कीजिये की गौ सेवा के लिए सरकार या पैसे वाले लोग पैसा दे भी देंगे तो भी गौ सेवा नहीं होने वाली हे आप जिस किसी को भी पैसा देंगे उनकी अपनी जायज़ नाज़ायज़ जरूरते जरूर होंगी वो उन पेसो से अपनी वो जरूरते ही पूरी करेंगे गौ सेवा तब भी नहीं होने वाली हे तो ये बिलकुल तय हे की गौ रक्षा गौ सेवा के नाम पर केवल लूट और गुंडागर्दी करप्शन राजनीति ही हो सकती हे सही मायनो में गौ सेवा कभी नहीं होने वाली क्योकि हर कोई गौ माता का गुणगान करके उस पर होने वाला खर्च दूसरे पर डालने वाला हे . जिस देश में इंसानो के लिए आने वाला पैसा बीच में कहा गायब हो जाता हे जरूरतमंद समझ भी नहीं पाता राजीव गाँधी ने इसे 1 रूपये में से 85 पैसे बताया था बेचारी गे के मामले में ये और भी अधिक ही जाना हे कोई शक .

इसी तरह बात करे मदरसों की तो सेम गायो के केस की तरह कई लोग मदरसों का नाम लेते ही हकीकत से दूर रहकर मज़हबी भावनाव से बहकर बात करने लगते हे सच तो ये हे की मदरसों के छात्रों का कोई भविष्य नहीं हे जिस देश ( या यु कहे पूरा उपमहाद्वीप ) में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चो का भविष्य अंधकार में दीखता हे वहा भला मदरसों के छात्रों का क्या कोई भविष्य हो सकता हे—————- ? जैसे गायो का तो भला नहीं होता हां गौ सेवा के नाम कितने ही लोग फंड और जमीन हड़प रहे हे वैसे ही मदरसों के नाम पर देश विदेश से चंदा लिया जाता हे कोई अरब देशो से करोड़ो का चंदा लेता हे तो कोई ठीक इसी समय रसीद लेकर बाहर दरवाजे की घंटी बजा रहा हे एक मदरसा संचालक तो शायद करोड़पति भी नहीं अरबपति बताये जाते हे ( आरोप ) इनके अपने बच्चे शायद दार्जिलिंग में पढ़ते हे और मेने नोट किया की इनका एक दाए बाए का साथी एक लेखक मदरसों का महत्व बतलाता दीखता हे समझे —— ? ये भी तय हे की ये अकेले नहीं होंगे बहुत लोग होंगे ऐसे . और कोई एक दो दस बड़े मदरसे हो भी तो जहा इस्लाम से जुड़ा अध्ययन होता हे तो वो तो एक बात हे मगर हज़ारो मदरसे ————– ? आखिर क्या भविष्य हे इनमे पढ़े बच्चो का ——— ?

दो उदहारण देता हु मेरा एक एजुकेटिड कज़िन मदरसों का महत्व बता रहा था की यहाँ दीनी तालीम दी जाती हे बहुत जरुरी हे मेने पूछा ये बताओ की तुम्हारे पब्लिक स्कुल में पढ़ रहे बच्चो को दीनी तालीम कहा मिलती हे जैसे तुम्हारे बच्चो को मिलती हे वैसे ही इन गरीबो के बच्चो को क्यों नहीं मिल सकती हे उसने जवाब नहीं दिया दूसरे केस में मदरसों को खासा चंदा इमदाद देना वाले मेरे बहुत पैसे वाले डॉक्टर दोस्त से मेने पूछा की चंदा दे रहा हे वो तो ठीक हे ये बता की कल को इन बच्चो को अपने क्लिनिक पर कम्पाउडर असिस्टेंट आदि नौकरी देगा उसने साफ जवाब दिया नहीं में कैसे दे सकता हु स्किल ही नहीं हे मेने इन दोनों चरित्रों को कहा की बजाय मदरसों में चंदा देने के जहा गरीबो के बच्चे पढ़ते हे तुम सीधे ही दो चार गरीब मुस्लिम बच्चो की पढाई का खर्च क्यों नहीं सर पर ले लेते हे मगर शायद दोनों ही किसी की भी जिम्मेदारी लेने की सरदर्दी के बजाय सीधे चंदा देकर पुण्य कमाना चाहते हे वो चंदा जिस पर इन दक्षिणपंथी ज़ाहिद साहब तक ने सवाल खड़े किये हुए http://khabarkikhabar.com/arch ives/1811 , तो ये सब वो प्रशन हे जिनके जवाब सभी गौ प्रेमियों और मदरसा समर्थको को सोचना चाहिए .