सिकंदर हयात

गाय गौरक्षा और मदरसा छात्रों का कुछ नहीं हो सकता !

Category: सामाजिक, सिकंदर हयात 2006 views 17

रवीश जी ने गौ रक्षा गुंडागर्दी पर लेख लिखा वही किन्ही शुजूको जी का ये कमेंट था ——

Shuzuka • 14 days ago गौरक्षा के उपाय :-१. प्रतिदिन एक रोटी गाय के लिए जरूर निकालें | हो सके तो ज्यादा भी | २. गाय को सूखा आटा या उसका चोकर, गुड़ और हरी पत्तेदार कच्ची सब्ज़ियां (पालक , धनिया आदि ) बहुत पसंद होती हैं | अपनी श्रद्धानुसार आप ये सब गाय को खिला सकते हैं |३. कभी भी गाय को बासी खाना न दें |४. यदि आप गाय को पालते हैं तो उसके दूध कम देने पर अथवा बूढी हो जाने पर भी उसकी सेवा करें | उसे न त्यागें | और न ही उसे कूड़ाघरों में प्लास्टिक और कूड़ा खाने के लिए छोड़े | आखिर गाय हमारी माता है |५. गौधारक शपथ लें कि कभी भी अपनी गाय को कसाई के हाथों नहीं बेचेंगे | और ना ही, गाय के मरने पर उसको चमड़ा उतरने वालों को बेचेंगे | बल्कि उसका यथाविधि अंतिम संस्कार करेंगे |६. सरकार को चाहिए कि वो गाय की ही तरह भैंस, बैल और दूसरे मवेशियों के मांस पर भी प्रतिबन्ध लगाए | साथ ही गाय, भैंस, बैल और दूसरे मवेशियों के मांस के निर्यात पर रोक लगाए |७. सरकार को उन गौधारको की आर्थिक मदद करनी चाहिए , जिनकी गाय बूढी हो गयी हैं या दूध नहीं देती | ताकि वो उसकी सेवा कर सकें |८. बूढ़ी गायों की सेवा न करना अपराध की श्रेणी में गिना जाए और उचित दंड दिया जाए |९. गाय – भैंसों को Oxytoxin के इंजेक्शन न दिए जाएँ | सरकार को Oxytoxin के इंजेक्शन की खुली बिक्री पर रोक लगा देनी चाहिए | सिर्फ डॉक्टर के prescription पर बीमार lactating women को ही बिकना चाहिए |१०. गाय – भैंस के मांस का प्रयोग , दवाओं आदि में प्रयोग होने वाले gelatin को बनाने में ना किया जाए | सरकार को ऐसी कंपनियों को जेलाटीन की जगह Hypromellose का इस्तेमाल करना सुनिश्चित करना चाहिए |११. किसी भी उत्पाद में जानवरों की चर्बी के इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए | इसका वनस्पति विकल्प इस्तेमाल करना चाहिए | १२. सरकार को गायों – मवेशियों की संख्या की आधार या जीपीएस ट्रैकिंग करनी चाहिए | ताकि वो सड़को पर आवारा न घूमे और न ही बूचड़खानों में काटी जाएँ |१३. जिन्होंने गौशाला की ज़मीने हड़पी हैं , सरकार को उनसे ज़मीने छीन लेनी चाहिए | १४. जो गौमांस के कानून का उल्लंघन करें , उन पर कानूनी कार्यवाही की जाए | ताकि गौरक्षा दल को बेवज़ह कानून हाथ में ना लेना पड़े | क्या सरकार के बस की नहीं है गौरक्षा कानून को ठीक से लागू करवाना, जो बेचारे गौरक्षको को कानून तोड़कर – बिना कोई जाँच पड़ताल किये – किसी की हड्डियां तोड़नी पड़ती है ?१५. डेरी वालो को गाय – भैंस के दूध में मिलावट बिलकुल बंद कर देनी चाहिए | ताकि शाकाहारी लोग तंदरुस्त हो सके | और लोगो का मांसाहार के प्रति प्रोत्साहन कम हो |१६. सरकार को मवेशियों के लिए अच्छे पशु अस्पतालों की संख्या बढ़ानी चाहिए | और सुविधाओं में (डॉक्टर , दवाएं आदि ) भी सुधार होना चाहिए | ”——

ये कमेंट पढ़कर में सोच में पढ़ गया की अब इन लम्बी चौड़ी मांगो का खर्च कौन उठाएगा डी एन झा लिखते हे ”और अगर आप दूध न देने वाली और बीमार होती जा रहीं गायों को बचाते रहेंगे तो मेरे हिसाब से ये अनइकोनॉमिक (आर्थिक नुकसान का) ख़्याल है.मैं खुद जानवरों के अधिकारों का समर्थक हूँ लेकिन सड़क पर घूमती प्लास्टिक खाने वाली, गंदगी खाने वाली और घरों से निकाल दी गईं गायों को बचा के रखने में कहाँ की समझदारी है. ” खेर फिर भी मान ले की जनता पर टेक्स लगाकर हिंदूवादी सरकार गायो की फुल देखभाल करने की कोशिश करेगी आज ही खबर भी आई की सरकार गायो के आधार कार्ड ट्रेकिंग आदि की वयवस्था करने वाली हे यानि आपके हमारे खून पसीने की कमाई के टेक्स से गायो की देखभाल की जायेगी चलिए धार्मिक भावनाव की खातिर ये भी सही , मगर भारत में जो जमीनी हालात हे उनमे ये तो तय हे की गायो के लिए चाहे जितने फण्ड की व्यवस्था कर भी ली जाए तो भी गायो का भला नहीं होगा क्यों की बीच में ही वो पैसा ठिकाने लग ही जाना हे . जिस देश में इंसानो को सुविधा नहीं हे कम से कम तीस से पचास करोड़ लोग जिस देश में जानवर जैसी या जानवर से भी बदतर हालत में रहते हे वहा कोई कैसे सोच सकता हे की गायो के लिए इतनी सुविधाओं का जुगाड़ कभी भी हो सकता हे ऐसा कभी नहीं हो पायेगा – वही में ये भी सोचने लगा की जैसे ये गायो के लिए कई सुविधाएं मांग रही हे ”बूढ़ी गायों की सेवा न करना अपराध की श्रेणी में गिना जाए और उचित दंड दिया जाए ” जिस देश में बूढ़े माँ बाप की सेवा ही एक बड़ा मसला बन कर खड़ी हे वहा बूढी गायो की सेवा का सपना ——- ? और जैसे ये गायो का महत्व उससे जुडी अपनी धार्मिक भावनाये बता रही हे वैसे ही मिलता जुलता केस हमारे यहाँ मदरसों का भी तो नहीं हे ———— ?

मुझे अपनी मोटी अक्ल से दोनों केस कुछ कुछ सेम से लगे हे गाय हो या मदरसों के छात्र दोनों का ही कुछ होता बनता मुझे नहीं दिख रहा हे हां दोनों ही मामलो में कुछ सयाने लोग खूब पैसा बना रहे हे इस विषय में कुछ बोलते ही धर्मविरोधी करार दिए जाने का खतरा हे पाठको जरा सोचिये गाय का भला -भला कैसे हो सकता हे सवाल ही नहीं भारत जैसे देश में जहा इतना बुरा हाल हे जगह संसाधनों की इतनी कमी हे वहा गौ सेवा के लिए भला कौन आएगा कोई अपनी जेब नहीं ढीली करने वाला हे जैसे बहुत से लोग मदरसों का गुणगान करते हे मगर सवाल नहीं हे की अपने बच्चो को मदरसे भेजे — ? वैसे ही गौ माता के गीत हर कोई गाता मिल सकता हे मगर गायो की दुर्गत हम घर से बाहर निकलते ही देख सकते हे अब दूध ना देने वाली गायो पर होने वाला खर्च तो सीधे कोई उठाएगा नहीं सवाल ही नहीं उठता हे पढ़े ये लेख जो एक शुद्ध संघी की साइट से ही हे पढ़े http://desicnn.com/blog/ban-on -beef-the-other-side-of-coin तो ये बात हम नहीं कह रहे हे एक संघी की साइट पर ही हे की गौसेवा असम्भव सा काम हे यही नहीं फ़र्ज़ कीजिये की गौ सेवा के लिए सरकार या पैसे वाले लोग पैसा दे भी देंगे तो भी गौ सेवा नहीं होने वाली हे आप जिस किसी को भी पैसा देंगे उनकी अपनी जायज़ नाज़ायज़ जरूरते जरूर होंगी वो उन पेसो से अपनी वो जरूरते ही पूरी करेंगे गौ सेवा तब भी नहीं होने वाली हे तो ये बिलकुल तय हे की गौ रक्षा गौ सेवा के नाम पर केवल लूट और गुंडागर्दी करप्शन राजनीति ही हो सकती हे सही मायनो में गौ सेवा कभी नहीं होने वाली क्योकि हर कोई गौ माता का गुणगान करके उस पर होने वाला खर्च दूसरे पर डालने वाला हे . जिस देश में इंसानो के लिए आने वाला पैसा बीच में कहा गायब हो जाता हे जरूरतमंद समझ भी नहीं पाता राजीव गाँधी ने इसे 1 रूपये में से 85 पैसे बताया था बेचारी गे के मामले में ये और भी अधिक ही जाना हे कोई शक .

इसी तरह बात करे मदरसों की तो सेम गायो के केस की तरह कई लोग मदरसों का नाम लेते ही हकीकत से दूर रहकर मज़हबी भावनाव से बहकर बात करने लगते हे सच तो ये हे की मदरसों के छात्रों का कोई भविष्य नहीं हे जिस देश ( या यु कहे पूरा उपमहाद्वीप ) में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चो का भविष्य अंधकार में दीखता हे वहा भला मदरसों के छात्रों का क्या कोई भविष्य हो सकता हे—————- ? जैसे गायो का तो भला नहीं होता हां गौ सेवा के नाम कितने ही लोग फंड और जमीन हड़प रहे हे वैसे ही मदरसों के नाम पर देश विदेश से चंदा लिया जाता हे कोई अरब देशो से करोड़ो का चंदा लेता हे तो कोई ठीक इसी समय रसीद लेकर बाहर दरवाजे की घंटी बजा रहा हे एक मदरसा संचालक तो शायद करोड़पति भी नहीं अरबपति बताये जाते हे ( आरोप ) इनके अपने बच्चे शायद दार्जिलिंग में पढ़ते हे और मेने नोट किया की इनका एक दाए बाए का साथी एक लेखक मदरसों का महत्व बतलाता दीखता हे समझे —— ? ये भी तय हे की ये अकेले नहीं होंगे बहुत लोग होंगे ऐसे . और कोई एक दो दस बड़े मदरसे हो भी तो जहा इस्लाम से जुड़ा अध्ययन होता हे तो वो तो एक बात हे मगर हज़ारो मदरसे ————– ? आखिर क्या भविष्य हे इनमे पढ़े बच्चो का ——— ?

दो उदहारण देता हु मेरा एक एजुकेटिड कज़िन मदरसों का महत्व बता रहा था की यहाँ दीनी तालीम दी जाती हे बहुत जरुरी हे मेने पूछा ये बताओ की तुम्हारे पब्लिक स्कुल में पढ़ रहे बच्चो को दीनी तालीम कहा मिलती हे जैसे तुम्हारे बच्चो को मिलती हे वैसे ही इन गरीबो के बच्चो को क्यों नहीं मिल सकती हे उसने जवाब नहीं दिया दूसरे केस में मदरसों को खासा चंदा इमदाद देना वाले मेरे बहुत पैसे वाले डॉक्टर दोस्त से मेने पूछा की चंदा दे रहा हे वो तो ठीक हे ये बता की कल को इन बच्चो को अपने क्लिनिक पर कम्पाउडर असिस्टेंट आदि नौकरी देगा उसने साफ जवाब दिया नहीं में कैसे दे सकता हु स्किल ही नहीं हे मेने इन दोनों चरित्रों को कहा की बजाय मदरसों में चंदा देने के जहा गरीबो के बच्चे पढ़ते हे तुम सीधे ही दो चार गरीब मुस्लिम बच्चो की पढाई का खर्च क्यों नहीं सर पर ले लेते हे मगर शायद दोनों ही किसी की भी जिम्मेदारी लेने की सरदर्दी के बजाय सीधे चंदा देकर पुण्य कमाना चाहते हे वो चंदा जिस पर इन दक्षिणपंथी ज़ाहिद साहब तक ने सवाल खड़े किये हुए http://khabarkikhabar.com/arch ives/1811 , तो ये सब वो प्रशन हे जिनके जवाब सभी गौ प्रेमियों और मदरसा समर्थको को सोचना चाहिए .

Related Articles

17 thoughts on “गाय गौरक्षा और मदरसा छात्रों का कुछ नहीं हो सकता !

  1. सिकंदर हयात

    मुझे इतना दुःख हुआ की मेरा अपना डॉक्टर दोस्त पहले लखपति था अब जमीन के अर्बनाइजेशन से करोड़पति होने की कगार पर हे तो जी बहुत खुश , बातो ही बातो में उसके पापा ने मुझसे बता दिया की अरे साहब मेरा बेटा मदरसों को बहुत देता हे बहुत ( चेहरे पर जन्नत में सीट रिजर्व होने की गहरी ख़ुशी सुकून ) बहुत देता हे साहब कभी पैसा लकड़ी आटा तेल घी भिजवाता रहता हे सुनकर में सर पकड़ कर बैठ गया , की हम भी तो इतने साल से समाजसेवा कर रहे हे राइटिंग कर रहे हे झक मार रहे हे हम ———– ? हमें तो हमारे काम में तो उसने कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई कभी हमें नहीं पूछा की हम किस हाल में हे क्या काम हे क्यों हे कैसे होगा क्या होगा कभी कोई अमाउंट हमें नहीं दिया चलो हमें छोड़ो ना कभी आप को दिया ना केजरीवाल को न कभी वाम दलों को दिया ना रिहाई मंच को दिया हम लोग क्या हवा खाकर जिन्दा रहेंगे ——– ? अब वो यु पि चुनाव के बाद सर पकडे बैठे था और भी कई मुसलमानो की तरह , इनकी चिंता सम्प०ारदायिक तनाव ही नहीं बल्कि ये भी की सपा बसपा सरकारों में पैसे वाले आदि मुसलमानो के काम हो ही जाते थे अब ये चिंतित हे वास्तव में यही तो किया पैसे वाले मुसलमानो ने की मदरसों को चंदा दिया , कई कई बार हज किये , बकरीद पर लाखो के बकरे लिए , और पैसा दिया भी तो कम्युनल और सड़ चुके दिमाग के मुस्लिम नेताओ को तो दिए मगर सेकुलर लिबरल प्रगतिशील ताकतों की इन्होने मदद नहीं की अब भाजपा की बढ़ती ताकत देख कर अब रो रहे हे भुगतो ——————- जारी

    Reply
  2. सिकंदर हयात

    मदरसों की सही संख्या भी मुझेनहीं पता हे , बहुत से मुस्लिम लेखक जहा मदरसों का गुणगान करते हुए उनकी संख्या बेहद कम बताते हे ( अरबपति – -? ) मदरसा संचालक के दाए बाए दिखने वाले पत्रकार की साईट पर एक लेख में केवल चार % मुस्लिम बच्चो के मदरसों में होने की बात कही गयी हे वही वही एक संघी पत्रकार लिखते हे की सिर्फ बिजनौर के ही इलाके में पांच सौ मदरसे हे किसे सच माने ————— ? Sanjay Tiwari
    22 April at 10:55 · छह राज्यों की पुलिस ने मिलकर ऑपरेशन किया और बिजनौर से पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें एक इमाम है बाकी चार मदरसों में पढ़नेवाले तालिब। वे पांचों मिलकर तालिब से तालिबान होने की प्रक्रिया में थे कि पुलिसवालों ने पकड़ लिया। वो न पकड़े जाते तो दिल्ली और यूपी में इस्लामिक स्टेट का आतंक फैलाते।इस कार्रवाई के बाद यूपी पुलिस की नींद खुली है। अब वह कह रही है कि इलाके की १५०० मस्जिदों और पांच सौ मदरसों पर नजर रखेगी। पहली तो चौंकानेवाली बात यही है कि महज बिजनौर के इलाके में पांच सौ मदरसे चल रहे हैं। इतनी बड़ी तादात में चलनेवाले मदरसे क्या पढ़ाते हैं अपने यहां? कौन सी तालीम देते हैं? क्या सिर्फ कुरान की तिलावत ही कराते हैं या फिर कुछ और भी सिखाते हैं?जावेद अहमद घामड़ी कहते हैं कि दुनिया का कोई भी मदरसा हो वह चार चीज जरूर सिखाता है। इन चार बातों में जो सबसे खतरनाक है वह है राज्य के खिलाफ विद्रोह। मदरसे लोकतंत्र को कुफ्र मानते हैं और बच्चों को सिखाते हैं कि दुनिया में सिर्फ इस्लाम का शासन होना चाहिए। गैर मुस्लिम हम पर शासन नहीं कर सकते, वो तो सिर्फ हमारे महकूम (शासित) होने के लिए पैदा हुए हैं। इन मदरसों की इन्हीं तालीम का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने मदरसों को तालिबान की फैक्ट्री बनाया था और जिहाद के लिए अफगानिस्तान भेज दिया था।योगी हों कि मोदी। अगर वो मदरसों पर उसी तरह पहरा नहीं रखते जैसे चीन रखता है तो तालिबान की फैक्ट्री यहां भी खुलेगी। आज न खुले दस साल बाद खुले, सौ साल बाद खुले लेकिन खुलेगी जरूर।Sanjay Tiwari

    Reply
  3. ramesh kumar

    सिकंदर हयात जी आपसे सहमत , गाय और मदरसे के नाम पे लोग अपनी तिजोरी भर रहे है और सब से दायीय स्थिति में गाय और मदरसा के बच्चे ही है लेकिन किसी से इसको कोई मतलब नहीं है सब धर्म के नाम पर जायज है !

    Reply
  4. hassan khan

    AAP NE SAHI MUDDA UTHAAYA HAI , AAJ KA HAR KOI MADARSA BANA RAHA HAI AUR SHAHAR SHAHAR ME HI GAU RAKSHAK PAIDA HO GAYE !

    Reply
  5. सिकंदर हयात

    रमेश भाई और हसन खान भाई , मदरसों की दुनिया के एक बड़े खिलाडी तो हमारे ही रिश्तेदार हे इनकी वेल्थ पता नहीं , मगर बताने वाले खासी बताते हे हो ये रहा हे की इन्ही धर्माधिकारियों को लखपति करोड़पति और एक साहब तो अरबपति बताये जाते हे वैसे इन अरबपति साहब का में तो फिर भी शुक्रिया करूंगा की ना से हां की ये कम से कम भड़कने भड़काने के खेल में नहीं हे ये तो चुपचाप नोट छाप रहे हे भला हो इनका , अच्छा अब जब लोगो को इतना पैसा पीटता हुआ देखा जा ही रहा होगा , तो जैसा की दूसरे बिजनेस में होता हे की अमीरो को देख और भी दुसरो लोग सेम बिजनेस में उतर आ रहे हे इसलिए मेने कई लोगो से पूछा तो उनकी भी सेम यही कहानी हे की हर टाइम कोई ” निरीह ” हाथ में रसीद लेकर घंटी बजा रहा हे वैसे असली लानत तो इन कुछ पैसे वालो पर हे जो गरीब मुस्लिम बच्चो को पढ़ाने की सरदर्दी तो लेते नहीं हे मगर धर्म के नाम पर खूब पैसा लुटाते हे ऊपर मेने लेख में जिसका मेने जिक्र किया उसकी एकतरह से ”वहशी ” सोच में आगे लेख या कमेंट लिख कर बताऊंगा और बात करे उन वहशियों की जो गाय के लिए ( असल में अपने लिए ) पता नहीं क्या क्या ट्रीटमेंट उस देश में मांग रहे हे जहा हिमांशु कुमार लिखते हे -भारत में चालीस करोड़ मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं၊
    यानी ईंट भट्टे पर, चाय की दूकान पर, शापिंग माल में, या बाबु साहब लोगों के बंगले या कालोनी के बाहर गार्ड बन कर खड़े हैं၊
    या आपके घरों की बाई, माली और ड्राइवर၊
    इनकी हालत बहुत बुरी है . ना हफ्ते की छुट्टी का नियम, ना बीमारी में कोई रियायत, ना प्रसूति अवकाश၊
    हजारों मामलों में इनकी मजदूरी नियमानुसार हर सप्ताह ना मिलने के कारण इन्हें बंधुआ बन कर काम करना पड़ता है၊
    हज़ारों मामलों में काम करने वाली मजदूर औरतों का शरीरिक शोषण किया जा रहा है၊
    इनकी कोई सुनने वाला नहीं है၊
    हांलाकि इनके रक्षण के लिये कानून बनाये गये हैं लेकिन आज़ाद भारत में आज तक किसी अधिकारी को मजदूरों के अधिकारों की रक्षा में कोताही के लिये कोई सज़ा नहीं हुई है၊
    गरीब के खिलाफ अपराध को हम अपराध ही नहीं मानते၊
    श्रम कार्यालय के अधिकारियों और निरीक्षकों का काम है कि वो घूम घूम कर देखें कि हर मजदूर को न्यूनतम मजदूरी, छुट्टी तथा अन्य सुविधाएँ दी जा रही हैं या नहीं ?
    इस देश में लाखों मेहनत कश लोग जानवरों की तरह जीने के लिये मजबूर हैं၊
    अदालतों ने स्वीकार कर लिया है कि मजदूर का मामला तो उसे पैसे देने वाले और मजदूर के बीच का है इसमें अदालत को आने की कोई ज़रूरत नहीं है၊
    मजदूरों से बारह घंटे सातों दिन काम कराया जा रहा है၊
    आज सबसे ज़्यादा मुसीबत में दो ही लोग हैं . एक वो जो प्रकृति की गोद में रह रहे थे और दूसरे वे जो मेहनत कर के जीते हैं၊
    मज़े में और ताकतवर वो हैं जो दूसरों की मेहनत और दूसरों की प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा कर रहे हैं और उन्हें ताकत के दम पर लूट रहे हैं၊
    ज्यादतर मामलों में लूटने की यह ताकत सरकार और पुलिस दे रही है၊
    ये आजदी का सपना नहीं था जनाब၊
    आजादी का सपना था कि गरीब का किसान का मजदूर का ज़्यादा ख्याल रखा जायेगा၊
    अपने वादा तोड़ दिया၊
    जिस वर्ग के पास बड़े पैमाने पर लोगों को लूटने की ताकत है उन्ही लोगों के पास सरकार को अपने काबू में करने की ताकत भी है ! इसी सरकार के दम पर ये अपनी लूट को कानूनन सही भी सिद्ध करवा लेते हैं ၊
    इस हालत को बदलना ही होगा

    Reply
  6. सिकंदर हयात

    ” Sheetal P Singh : काजोल के पति अजय देवगन तमाम संघी प्रोफ़ाइलों के heartthrob हैं। वे बालीवुड के उस क्लब से आते हैं जो मोदी जी / बीजेपी/संघ/हिंदुत्व / कश्मीर / नक्सल / जे एन यू आदि पर उनके मन की बात कहता / लिखता है। काजोल को मोदी सरकार ने प्रसार भारती बोर्ड की सदस्यता का उपहार दिया है।अजय देवगन का नाम कुख्यात “पनामा पेपर्स ” में भी है जिस पर भारत में कोई कार्रवाई नहीं हुई पर तमाम यूरोपीय देशों सहित पाकिसतान में वहाँ के सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तगड़ा हल्ला बोला। नवाज शरीफ़ तक इसके लपेटे में आये हुए हैं। पनामा पेपर्स अवैध विदेशी खातों की एक फ़ेहरिस्त का नाम है!
    ख़बर काजोल की एक “लंच पार्टी” की है जो भक्तों का ज़ायक़ा बिगाड़ देगी। काजोल और उनकी कई दोस्त जिस ख़ास डिश पर चीख रही हैं वह “बीफ” से बनी है। यह गौमांस या भैंसमांस में से एक होगा। “बीफ” दोनों के लिये प्रयुक्त होता है। काजोल ने ट्वीट कर कहा है कि यह “भैंस माँस” था।
    इस ख़बर को यहाँ प्रस्तुत करने की वजह है संघी “hypocrisy”! क्या संघी भगतमंडल अजय देवगन और उनके राजनैतिक दोस्तों से इस सच के सामने आने पर विलग हो सकता है / घृणा कर सकता है जो एक मेवाती मुस्लिम पशुपालक की हत्या पर जश्न मनाता है? ताजी सूचना के मुताबिक काजोल ने फेसबुक लाइव पर से वीडियो को डिलीट कर दिया है. पूरी खबर यूं है, जो जनसत्ता डाट काम से साभार लेकर यहां प्रकाशित की जा रही है…
    बॉलीवुड अभिनेत्री काजोल ने दोस्तों संग की बीफ पार्टी, सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
    बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री काजोल ने रविवार को अपने फेसबुक पेज पर एक वीडियो पोस्ट किया है जो धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में काजोल अपने दोस्तों के साथ लंच पार्टी में नजर आ रही हैं। काजोल ने फेसबुक लाइव कर ये वीडिये बनाया है। वीडियो में काजोल बता रही हैं कि वो और उनकी सहेलियां उनके एक दोस्त के यहां लंच पर इकट्टा हुई हैं। काजोल अपने इस वीडियो में बता रही हैं कि उनके दोस्त रेयान ने लंच में कुछ बेहद खास बनाया है। इसके बाद काजोल का कैमरा सीधे प्लेट पर रखे बाउल की तरफ जाता है। बाउल में वही खास चीज रखी गई है जो काजोल के दोस्त ने बनाया है। बॉलीवुड अभिनेत्री के दोस्त रेयान उस बाउल में कुछ रसा सा डालते हैं। रेयान को ऐसा करता देख वहां मौजूद काजोल समेत उनकी सहेलियां काफी उत्साहित नजर आ रही हैं। काजोल एक बार फिर से कैमरे को बाउल में रखी उस डिश की तरफ से हटाकर अपने चेहरे पर लाती हैं। उसके बाद काजोल अपने दोस्त को कैमरे पर बुलाती हैं और उनसे कहती हैं कि आप सबको बताइए कि आपने ये कौन सी डिश बनाई है।
    काजोल के इस सवाल का जो जवाब मिला वही इस वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने का कारण बन गया है। लोग काजोल के फेसबुक वॉल पर इस वीडियो को देख अपने-अपने तरह से प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। दरअसल जब काजोल ने अपने दोस्त से उस डिश के बारे में पूछा तो उनके दोस्त ने बताया कि ये बीफ है। वीडियो में जब काजोल के दोस्त बीफ की उस डिश के बारे में बता रहे थे तब काजोल काफी उत्साहित भी नजर आईं। काजोल ने वीडियो खत्म करते समय कहा कि चलिए अब मुझे अपने हाथ खाने की उस बाउल में बिजी करने हैं इसलिए अब मैं ये वीडियो बंद कर रही हूं।
    जहां पूरे देश में इस वक्त बीफ को लेकर ऐसा माहौल बन गया है कि जिसका नाम भी उससे जुड़ता है वो विवादों में आ ही जाता है। साल 2015 में तो बीफ खाने के शक में अखलाक नाम के एक शख्स को लोगों ने पीट-पीट कर मार डाला था।हालत ऐसी हो गई है कि बीफ खाने को लेकर कोई भी खुल कर बात करने से कतरा रहा है। ऐसे में काजोल के इस वीडियो ने सोशल मीडिया हलचल बढ़ा दिया है। लोग इस वीडियो को शेयर कर रहे हैं। कुछ ऐसे यूजर्स भी हैं जो वीडियो को शेयर करते हुए लिख रहे हैं- राष्ट्रवादी हीरो अजय देवगन जी की बीवी काजोल राष्ट्रवादी बीफ खाती हुई।
    वहीं कुछ यूजर्स ऐसे भी हैं जो वीडियो को शेयर करते हुए सवाल पूछ रहे हैं कि क्या बीफ खाने वाली काजोल भी राष्ट्र विरोधी हैं। सोशल मीडिया पर विवाद बढ़ता देख काजोल में अपने फेसबुक पेज से ये लाइव वीडियो हटा लिया है, लेकिन शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
    वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह ” ————————–हलाकि ये भी हे की इसमें अजय देवगन का कोई लेना देना नहीं हे असल में कुड दिमाग संघी फौज आज से नहीं बीसियों सालो से खान सितारों की लोकप्रियता से बहुत चिढ़ती हे इसलिए वो हमेशा किसी को भी चढाने की फ़र्ज़ी कोशिशे करती रहती हे अच्छा इसी विशाल संघी फौज को देखते हुए शायद कनाडा के नागरिक ——— कुमार , ने बड़ी चतुराई से अपनी मनोज कुमार जैसी छवि बना ली हे और इस तरह से अपने गिरते हुए कैरियर को बचा लिया हे चतुर खोपड़ी लोग इसी तरह से इन मुर्ख सस्तेदेशभक्तो और धर्मभक्तो का फायदा उठाते हे

    Reply
  7. सिकंदर हयात

    कुछ मदरसे हो जिनमे इस्लाम से जुड़े अध्ययन हो तो वो तो फिर भी ठीक हे मगर उपमहाद्वीप में हज़ारो हज़ारो मदरसे सिर्फ गरीबी से जुड़े हुए हे गरीब लोग हे गरीब ज़्यादा बचे पैदा करता हे वो अपने बच्चो एक दो को मदरसों में भजते हे मदरसों कि सही संख्या पता नहीं एक मुस्लिम राइटिस्ट कहता हे की सिर्फ चार % बच्चे मदरसे में हे यानी बहुत कम उधर दूसरा राइटिस्ट शयद संघ का एक अंडर कवर पत्रकार ——- तिवारी इनकी संख्या सिर्फ एक ही इलाके में पांच सौ कह्ता हे , जैसा की बताया हे की दोनों ही राइटिसट आपस में इस विषय पर कोई सार्थक बहस करेंगे नहीं क्योकि दोनों राइटिस्टों को मतलब बदलाव से नहीं हे बल्कि इन बातो की आड़ में कोई ना कोई व्यक्तिगत हित साधने से हे एक तरह से उपमहाद्वीप में 90 करोड़ हिन्दुओ और 60 मुसलमानो के बीच मौजूद दक्षिणपंथियों ने आपस में एक अदभुत संतुलन एक अध्भुत गठबंधन बना लिया हे ऊपर से ये लड़ते दीखते हे मगर अंदर से इन्हे एकदूसरे से मोहब्बत हे एकदूसरे का महत्व ये खूब पहचान गए हे एक दूसरे को खूब ताकत प्रदान कर रहे हे एकदूसरे की जड़े सींचते हे दोनों को ही पता हे की इनके असली दुश्मन लिबरल्स हे एक ऐसा चक्रव्यूह इन राइटिस्टों ने कायम कर लिया हे की जिसमे फंस कर सारे लिबरल सारे नॉन राइटिस्ट सबका दम सा घुट रहा हे इन लोगो के पास पैसा हे पावर हे हिंसक और फ्रस्ट्रेट एनर्जी से भरे सपोटरो काडर की भरमार हे किसी को अरब से लेकर अमरीका एन आर आई और उपमहाद्वीप के बईमान पैसे वालो का सपोर्ट हे क्या क्या नहीं हे इनके पास ——— ? लिबरल्स के पास क्या हे कौन कुछ देने वाला हे पहले भी कोई नहीं था मगर पहले इनलोगो ( राइटिस्टों ) की भी इतनी वेल्थ इतना आकर्षक भविष्य और इतने फ्रेस्ट्रेट युवाओ की पगलाई भीड़ भी नहीं थी खेर ये कमेंट राहुल जैन भाई का हे जो मेरे मेल पर हे पर यहाँ शो नहीं कर रहा हे जैन समाज भारत का सबसे पैसे वाला समाज हे और राइटिस्टों को खासी फंडिंग भी करता हे अगर राहुल जैन भाई जैसे लोग ये समझेंगे और प्रचार करेंगे तो इससे बढ़िया बात नहीं हो सकती हे
    Visit Rahul Jain’s profile
    Rahul Jain
    Bahut shaandar, Aisa aanklan aapki Zindagi bhar ke anubhav ka nichod Hai..Atulniya hai
    2 p.m., Thursday April 27 | Other comments by Rahul Jain
    Visit Rahul Jain’s profile
    Rahul Jain

    Bahut shaandar, Aisa aanklan aapki Zindagi bhar ke anubhav ka nichod Hai..Atulniya hai
    2 p.m., Thursday April 27 | Other comments by Rahul जैन अब आप देखे की राइटिस्ट हलके फुल्के भी राइटिस्ट किस कदर गद्दारी करते हे ऊपर जो मेरा डॉक्टर कज़िन हे वो जो कह रहा था की मदरसे बहुत जरुरी हे जो दीनी तालीम देते हे आदि और ये कुछ राइटिस्ट जो रात दिन मुसलमानो के पिछड़ेपन की बात करते हे मगर फेमली प्लानिंग की बात भी नहीं करते हे कभी चू भी नहीं करते हे कुछ मुस्लिम राइटिस्ट अभी राहुल गाँधी का दिमाग खा कर आये तो ये सभी लोग गौर करे की ये कभी मुसलमानो की सबसे अधिक आबादी बढ़ोतरी दर की भूल कर भी चर्चा नहीं करते हे ये इनकी इतनी बड़ी मक्कारी हे की मेरा खून खोल उठता हे इस विषय पर तफ्सील से लेख या कमेंट लिखता हु

    Reply
  8. सिकंदर हयात

    बूढ़ी गायों को बीजेपी नेताओं के घर बांध दो, कुत्ते पालने वालों का गौप्रेम सामने आ जाएगा: लालू
    Created By : नेशनल दस्तक ब्यूरो Date : 2017-05-05 Time : 10:04:11 AM
    बूढ़ी गायों को बीजेपी नेताओं के घर बांध दो, कुत्ते पालने वालों का गौप्रेम सामने आ जाएगा: लालू
    पटना। कथित गौरक्षकों की गुंडई और उन्हें बढ़ावा दे रही भाजपा पर लालू प्रसाद यादव ने जमकर हमला बोला। राजगीर में राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बोलते हुए लालू प्रसाद ने कार्यकर्ताओं से कहा कि अपने-अपने इलाके की बूढ़ी गायों को इकट्ठा करके बीजेपी नेताओं के घर बांध दो। इनकी गौ भक्ति, गौ प्रेम सामने आ जाएगा।उन्होंने इस बात को फेसबुक पर लिखा, मैंने अपने कार्यकर्ताओं से कहा है कि बिना दूध देने वाली गायों को भाजपा कार्यालयों में जाकर बांध दो तब देखना कि कुत्ते पालने वाले तथाकथित गौमाता हितैषी उन गायों के साथ क्या-क्या करते हैं? अगर वे गाय माता को पीट-पाट कर भगाते हैं तो उसे ध्यान से देखो। यदि वे गाय माता का अपमान करते है, किसी और के यहां भेजते है तो उन्हें तथाकथित गौरक्षकों को सौंप देना।
    उन्होंने आगे कहा कि भला बताइये, कुत्ते पालने वाले आडंबरी लोग गौ-पालकों को गौरक्षा का उपदेश दे रहे हैं। है ना विडंबना। अब आप सोचिए, विचारिए? कितने खतरनाक किस्म के लोग हैं।
    बैठक में भी प्रस्ताव के जरिए लालू को नरेंद्र मोदी सरकार को हटाने के अभियान मोर्चाबंदी के लिए अधिकृत किया गया। लालू ने कहा कि वह देश में घूम-घूम कर इस मोर्चाबंदी को अंजाम देंगे। उन्होंने कहा कि 27 अगस्त को पटना में राजद की महारैली होगी। बैठक में न्यायित सेवा में आरक्षण और नौकरियों में आरक्षण के बैकलॉग को भी भरने की मांग उठी।पढ़ें- लालू ने पीएम मोदी पर साधा निशाना, कहा- गाय दूध देती है, वोट नहीं
    लालू प्रसाद ने कार्यकर्ताओं से कहा कि मनुस्मृति पढ़ो, ताकि बीजेपी के खतरनाक मंसूबे को पर्दाफाश किया जा सके। एक ही नशा रखो- दिल्ली में बैठी बीजेपी सरकार को हटाने का नशा।
    पढ़ें- गुजरात में एक और ऊना कांड, मरी गाय न उठाने पर गर्भवती महिला को पीटा
    आपको बता दें कि लालू प्रसाद यादव का गौप्रेम जगजाहिर है। वे दिल्ली में भी अपने सरकारी आवास में गाय रखते थे। ऐसे समय में जब भाजपा ने राजनीति के लिए गाय की पूंछ पकड़ रखी है तब लालू प्रसाद यादव ने उऩ्हें कुत्ते पालने वाला बताते हुए निशाना साधा है।
    संपादन- भवेंद्र प्रकाश —————————-
    —Dilip C Mandal
    4 hrs ·
    गुजरात के SC ने सवर्णों से कहा कि अपनी मरी माता का अंतिम संस्कार ख़ुद करो। बिहार से आवाज़ आई है कि बूढ़ी गोमाताओं को बीजेपी नेताओं के गेट पर बाँध दो।
    अगर बीजेपी नेताओं ने गोमाताओं से बदसलूकी की तो वहीं पकड़ लो।Dilip C Mandal added 5 new photos.
    2 hrs ·
    अगर RJD के युवा कार्यकर्ता एक हफ़्ते तक हर दिन बीस बूढ़ी गायों को बटोरकर सुशील मोदी के निवास और बीजेपी प्रदेश कार्यालय में आदर सहित पहुँचा दें तो देश को, गाय के नाम पर चल रहे आतंकवाद से, मुक्ति मिल जाएगी।
    बाक़ी राज्यों में भी अन्य पार्टियाँ यह कर सकती हैं।
    बीजेपी नेताओं ने अगर गोमाताओं को भगाया या डंडा मारा तो उसका वीडियो बनाकर अपलोड कीजिए।
    कुत्ता पालकों के फ़र्ज़ी गाय प्रेम का भांडा फूट जाएगा।

    Reply
  9. सिकंदर हयात

    एक हम हे जो पता नहीं कैसे कैसे सामान इक्कठा करते हे जबकि अपने ही जीवन में समस्याओ के अम्बार लगे रहते हर समय तनाव इंसिक्योरिटी आदि और कैसे कैसे ढूंढते हे की सामान जरूरतमंद को ही दे , और एक ये ”कम्युनल राक्षस ” हे विष्णुगुप्त- जो पांच करोड़ रूपये ( हिंदी पत्रकार के पास पांच करोड़ ———- ? ) Vishnu Gupt4 May at 15:31 · मैंने इसलिए स्कूल और अस्पताल नहीं बनवाया==============================मेरे द्वारा गौशाला को 5 करोड का दान देने पर सैकडों लोगों ने न केवल मुझे गालियां दी बल्कि मुझे इन लोगों ने शाब्दिक हिंसक तौर पर कोसा भी। गालियां देने और कोसने वालों का कहना था कि 5 करोड रूपये में एक स्कूल बन सकता था जहां पर गरीब बच्चों की शिक्षा दी जा सकती थी या फिर एक अस्पताल बनवाया जा सकता था?ऐसी सोच के लोगो का मेरा जवाब यह है…………… पढ-लिख कर आज देशभक्त कौन बनता है? आज पढने -खिलने वाले लोग जब नौकरी, व्यापार आदि में उतरते हैं तो रिश्वतखोर बन जाते हैं, लुटेरे बन जाते हैं, गरीबों के खून के प्यासे बन जाते हैं। ज्यादा पढ लिख गये तो फिर ये विदेश भाग जाते है, देश को मिलता क्या है? आईना दिखाने वाली बात यह है कि गांव-गांव के कोने-कोने में सरकारी स्कूल खुले पडे हैं जहां पर गरीब-अमीर सभी शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।अब अस्पताल की बात………….. पांच करोड में कोई ढंग का अस्पताल न बन पाता है। अगर सिर्फ अस्पताल का ढाचा खडा कर दिया गया होता तो फिर इलाज कहां सभव होता। आज कोन डॉक्टर दयावान है जो निशुल्क में इलाज करता और अपना समय दे देता। पैसे के लिए गैर जरूरी आपरेशन करने वाले और गैर जरूरी आक्शीजन पर रखने वाले डॉक्टरों से सेवा भाव की उम्मीद बेकार है। फिर अस्पताल चलाने के लिए हमें धनासेठों से भीख मांगनी पडती। गरीब के लिए सरकारी अस्पताल भी तो है। सुझाव देने वाले लोग सरकारी अस्पताल के सुधार के लिए कितना कार्य करते हैं?गौमाता……….. हमारी संस्कृति की अनमोल उपहार है, आर्थिक समृति का आधार है, स्वाभिमान का प्रतीक है। इसलिए हमनें गौमाता की सेवा में यह दान दिया है। मैं जिस गौशाला का दान दिया है उस गौशाला पर मेरे द्वारा नियुक्त देशभक्त निगरानी भी कर रहे हैं। मुझे गौमाता की सेवा में आनंद की अनुभूति हो रही है। ”

    Reply
  10. सिकंदर हयात

    गाय से प्रेम, हूरों के सपने और सुसाइड बॉम्बरWritten by ताबिश सिद्दीकी
    Tabish Siddiqui : कामसूत्र भारत में लगभग 300 BC में लिखी गयी.. उस समय ये किताब लिखी गयी थी प्रेम और कामवासना को समझने के लिए.. कामसूत्र में सिर्फ बीस प्रतिशत ही भाव भंगिमा कि बातें हैं बाक़ी अस्सी प्रतिशत शुद्ध प्रेम है.. प्रेम के स्वरुप का वर्णन है.. वात्सायन जानते थे कि बिना काम और प्रेम को समझे आत्मिक उंचाईयों को समझा ही नहीं जा सकता है कभी.. ये आज भी दुनिया में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली किताबों में से एक है

    भारत किसलिए अलग था अन्य देशों से? संभवतः इसीलिए.. क्यूंकि भारत जिस मानसिक खुलेपन की बात उस समय कर रहा था वो शायद ही किसी सभ्यता ने की थी.. मगर धीरे धीरे विदेशी प्रभावों से यहाँ की मानसिकता दूषित हो गयी.. खजुराहो के मंदिर इस्लाम के आने के कुछ ही सौ साल बाद बने.. ये बताता है कि उस वक़्त तक यहाँ अपनी संस्कृति और समझ को स्वीकार करने की हिम्मत थी.. यहाँ तक की भारत की पूजा पद्धति में अभी तक नग्नता पूजनीय है.. जीवन कि उत्पत्ति के अंग पूजनीय स्वीकार किये गए हैं मगर आज वही पूजने वाले शर्माते हैं अगर कोई उनसे सवाल करे तो वो लिंग और योनी के दार्शनिक पहलू समझाने लगते हैं.. ये बताता है कि भीतर से उन्हें ये स्वीकार्य नहीं है.. विदेशी प्रभावों द्वारा ये अपनी परंपरा से शर्मिंदा हैं.. बस परंपरा निभा रहे हैं किस तरह

    बैन (निषेध) तो भारत ने शायद कि किसी चीज़ पर लगाया हो.. खासकर जहाँ प्रेम कि बात आये वहां तो ये संस्कृति और सभ्यता के हिसाब से एक असंभव बात लगती है.. निषेध की मानसिकता इस्लामिक मानसिकता है.. शराब लोग ज्यादा पियें तो शराब बंद कर दो.. काम (सेक्स) निषेध कर दो.. साथ घूमना.. गले में हाथ डालना.. आलिंगन करना.. ये सब निषेध है इस्लामिक मानसिकता में.. भारत का इस से कोई लेना देना नहीं है.. मगर चूँकि उनसे नफरत करते करते हमने कब उनही की चीज़ें ओढ़ लीं ये पता ही न चल पाया.. साधू और साध्वी हमे जो ब्रहमचारी हों वो अधिक भाने लगे.. इस्लाम के तरह ही जो हर चीज़ के निषेध कि बात करता हो उसे हम सर आखों पर बिठाने लगे

    सोचिये अगर तालिबान को कामसूत्र दे दी गयी होती पढने को.. और ये कहा गया होता कि ये बिलकुल भी निषेध नहीं है.. जैसे जीना चाहते हो वैसे जियो.. प्रेम तुम्हे किसी से भी हो सकता है और अल्लाह तुम्हारे प्रेम पर पहरा नहीं लगा रहा है.. तो क्या उन्हें किसी हूर कि चाहत होती कभी? यूरोप के लोग क्यूँ नहीं मरते हैं हूर की चाहत में? वो क्यूँ नहीं शराब की नदियों के लिए जन्नत कि कल्पना करते हैं? क्यूंकि उनके लिए ये निरी बेवकूफी भरी बातें हैं.. उनके डिस्को में हूरों की कमी नहीं है.. और ऐसा नहीं है कि वो उनसे रेप कर रहे हों.. मर्ज़ी का सौदा होता है प्रेम का वहां.. शराब उनके यहाँ अथाह है और हर तरह की है.. उन्हें किसी जन्नत की ज़रूरत नहीं है शराब पीने के लिए.. उन्होंने अपने देश को ही जन्नत बना रखा है.. और इसीलिए हर मुल्क का हर नागरिक अमेरिका में रहने के सपने देखता है.. क्या है अमेरिका में? वहां कुछ नहीं है बस आपके जन्नत कि कल्पना को धरती पर साकार कर दिया है उन्होंने.. वहां वो खुलापन है जो कभी भारत में था.. इसीलिए आप मरते हैं वहां जाने के लिए

    भारत अमेरिका हो सकता था.. और अभी भी हो सकता है.. अगर किसी चीज़ की ज़रूरत है हमे तो वो है सख्त कानून और मानवाधिकार.. बाक़ी किसी भी चीज़ पर बैन लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है.. और वैसे भी ये निषेध हमारी संस्कृति के ही विरुद्ध है.. और प्रेम पर बैन तो ये बताता है कि आपको अपने धर्म की रत्ती भर समझ नहीं है.. आप के भीतर सिर्फ इस्लाम की कुंठा भर गयी है बस

    निषेध लोगों को जीवन विरोधी बना देता है.. उन्हें कुंठित कर देता है.. जिन नौजवानों को स्त्री/पुरुष से प्रेम करना है उन्हें आप गाय से प्रेम करना सिखा रहे हैं और जिन्हें इस जीवन में कामसूत्र पढनी चाहिए उन्हें आप हूरों के सपने दिखा रहे हैं.. और ऐसा करके आप सुसाईड बॉम्बर पैदा कर रहे हैं.. एक की परिकल्पना साकार रूप ले चुकी है और वो इस निषेध से तंग आकर अब हूरों से मिलने को लालायित हैं और दुसरे बस तय्यारी कर रहे हैं.. ये बहुत धीरे धीरे होता है मगर आज नहीं तो कल आप उन्हें भी यही समझाने में सफल हो जायेंगे कि कहाँ इन गंदे मांस के लोथड़ों के पीछे पड़े हो.. वहां स्वर्ग की अप्सराओं का सोचो.. और शराब यहाँ नहीं वहां सवर्ग में मिलेगी भरपूर.. यहाँ बस तुम लट्ठ ले कर जैसा हम कहते हैं वैसा करते रहो बस
    ताबिशTabish Siddiqui

    Reply
  11. prasad joshi

    माफी चाहता हु सिकंदर जी फिर एक बार आप ने बात को समझ ने की गलती कि है.
    (१) ‘बंधन ही मुक्ती है.’. ये हिंदु घर्म का ग्यान है. स्त्री और पुरुष संबध संसार और परीवार को जन्म देता है़. प्रेम, काम, धर्म, त्याग, कर्तव्य, अर्थार्जन, संगोपन, शालीनता ,सात्वीकता ऐसे कई सारे पहलु ईस संसार रुपी स्त्री पुरुष संबंध का हिस्सा है. मुझे लगता है इस्लाम भी यही सिखाता है ..

    (२) वैसे आझादी की कोइ हद नही होती है. एक वक्त एक के साथ या कइयो के साथ शारिरीक संबध बनाया जा सकता है. या फिर जानवरो के साथ भी लोग संबध बनाते है. जैसे खजुराहो के मंदीरो पर की मुर्तीया दिखाती है वैसे. ये सही है या गलत है मै ईस विवाद मे नही जाना चाहुंगा. अगर आप ये कर ना चाहते है तो शौक से करीये. पर ये धर्म या संन्स्कृती मे लिखा है ये मत कही ये.

    (३) काम जीवन हर किसी का निजी मामला है. अगर कोइ घर के कमरो से बाहर आकर चौराहे पर संभोग कर ना चाहता है तो शौक से कर सकता है. पर ये करने की खुली छुट होने को आझादी कहना बचकाना लगता है.

    (४) किचन मे खाना बनाते है अगर कोइ कहे मुझे वहा टट्टी करनी है तो ऊसे वो करने देना आझादी होगी क्या?

    (५) आझादी कि कोई हद नही होती है लेकीन बंधन मनसे स्विकारा जाना चाहीये बंदुक की नौक पर या लाठी की धौस पर नही.

    Reply
  12. सिकंदर हयात

    Mukesh Tyagi added 3 new photos.
    10 hrs ·
    किस किस्म के लोग मोदी की फासीवादी राजनीति के पीछे के असली शातिर दिमाग हैं उसको समझना जरूरी है| रिपब्लिक टीवी के एक निवेशक और हथियार व्यापारी राजीव चंद्रशेखर के बारे में मैं पहले लिख चुका हूँ| आज इसके एक और निवेशक मोहनदास पई के बारे में| ये पहले भारतीय पूँजीवाद की बड़ी आदर्श मानी जाने वाली इनफ़ोसिस के मुख्य वित्तीय अधिकारी थे| आजकल ये कुछ हजार करोड़ रुपये वाले वित्तीय फंड चलाते हैं, रिपब्लिक में भी पैसा लगाया है, ‘हरे कृष्णा’ के ‘धार्मिक-खैराती’ कामों के जिम्मेदार हैं और अक्सर टीवी पर मोदी का गुणगान करते, शाकाहार का प्रचार करते, पशु और गौमाता पर अत्याचार का विरोध करते देखे जा सकते हैं| पिछली बकरीद पर इन्होने पशु हत्या पर बड़ा शोर मचाया था| अब इनके कुछ और कारोबार जानिए –
    ये अमीर लोगों को घर पर उच्च गुणवत्ता वाला माँस पहुँचाने वाली कंपनी Licious के भी साझीदार हैं| इस कम्पनी का एक खास दावा कम उम्र के मेमनों जिनका वजन 8 किलो से कम हो का नरम माँस बेचना है| कल इनको सोशल मीडिया में इस पाखंड के लिए घेरा गया तो इनका जवाब नीचे देखिये – हम पशु हत्या नहीं करते, हम तो वैध कत्लखानों से लेकर बस सप्लाई करते हैं!
    आज और पता चला कि इन्होने अपने बेटे के नाम पर एक रेस्टोरेंट भी खोला है, वह भी नियमों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और पहुँच का फायदा उठाकर| खैर इस रेस्टोरेंट में ‘बीफ बर्गर’ भी सर्व किया जाता है| आज फिर इनको घेरा गया तो इनका कहना था कि हमने तो सिर्फ पैसा लगाया है, मेनू बनाने का काम तो मैनेजरों का है! (मेनू नीचे देखा जा सकता है)
    हत्यारे गुंडा गिरोहों के पीछे फासीवादी राजनीति के असली योजनाकार ये नीलेकणि, पाई, चंद्रशेखर से लेकर और अम्बानी, अडानी, टाटा, भारती, धूत, गोयल, आदि बहुत से ऐसे ही वित्तीय-औद्योगिक पूँजीपति हैं जो ऊपर से बड़े सभ्य उद्यमी बने रहते हैं| लेकिन इनके नियंत्रण वाला मीडिया, एनजीओ, थिंकटैंक, धार्मिक-शैक्षिक-खैराती संगठनों का तंत्र फासीवादी गिरोहों का संचालन भी करता है, उन्हें न्यायोचित ठहराने के ‘बौद्धिक’ तर्क भी तैयार करता है और इससे मुनाफा भी कमाता है| ऐसे घनघोर पाखंडी, ढोंगी, लालची, अनैतिक गिरोह ही फासीवादी राजनीति के पीछे के चेहरे हैं|
    See TranslationMukesh Tyagi
    9 hrs ·
    जीडीपी वृद्धि दर
    आखिर विश्व की सबसे तेज अर्थव्यवस्था के प्रचार से पर्दा उठ गया और वो हक़ीक़त सामने आ गई जिसके बारे में हम जैसे पर्यवेक्षक बहुत पहले से बता रहे थे लेकिन भोंपू बना कॉर्पोरेट मीडिया शोर में असलियत को छिपाने की कोशिश में लगा था| जनवरी-मार्च 2017 की तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर घटकर 6.1% रह गई जो लगातार चौथी तिमाही में गिरावट है अर्थात अर्थव्यवस्था की सुस्ती की निरंतर प्रवृत्ति की परिचायक है|
    लेकिन इस दर को भी ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि यह दर भी माँग की दर है, अगर पूर्ति अर्थात उत्पादन की दिशा से देखें तो यह 5.6% ही है| फिर अगर गणना की 3 वर्ष पहले तक की पद्धति अपनाई जाये तो यह दर मात्र 4% ही रह जाती है| इसमें भी यह मान लिया गया है कि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर औपचारिक अर्थव्यवस्था के समान ही है| लेकिन हम सब अवगत हैं कि नोटबंदी का सर्वाधिक नुकसान अनौपचारिक क्षेत्र को ही हुआ जिसमें सभी गैर सरकारी विश्लेषकों का मानना है कि भारी गिरावट आई है| अगर उसे भी ध्यान में रखें तो यह वृद्धि दर मात्र 0.9% ही रह जाती है|
    अब इस वृद्धि को ओर बारीकी से देखें तो पता चलता है कि सर्वाधिक रोजगार देने वाले निर्माण, उद्योग, वित्तीय सेवायें और व्यापार में वृद्धि बहुत कम है; निर्माण में तो नोटबंदी के बाद तीव्र गिरावट है| नया निवेश लगातार गिर रहा है| निजी उपभोग में भी वृद्धि नहीं है अर्थात लोग बाजार में ख़रीदारी नहीं कर रहे| करें भी कैसे, शहरी श्रमिकों की वेतन वृद्धि दर बहुत गिरी है| फिर यह वृद्धि कहाँ से आ रही है? सरकारी आँकड़े कह रहे हैं कि सरकारी उपभोग अर्थात खर्च बढ़ने से यह वृद्धि हुई है| अब समझना होगा कि सरकार खर्च कहाँ कर रही है| शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला-बाल कल्याण, गरीब कल्याण, ग्रामीण विकास पर तो व्यय कम हो रहा है| फिर क्या प्रशासनिक ढाँचे, पुलिस और फ़ौज-शस्त्र ख़रीद का बढ़ता व्यय है यह? लेकिन यह तो अनुत्पादक खर्च है, इससे अर्थव्यवस्था में विकास कैसे होगा? निजी क्षेत्र पहले ही नया निवेश अर्थात नए उद्योग लगाना बंद कर चुका है|
    एक और क्षेत्र जहाँ भारी वृद्धि – 5% दिखाई गई है वह है कृषि| कहा गया है कि पिछले वर्ष के अच्छे मानसून से कृषि में रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है| लेकिन यह समझ में नहीं आ रहा है कि इतने रिकॉर्ड उत्पादन के बाद भारत को अनाज का भारी आयात क्यों करना पड़ रहा है? दूसरे, उत्पादन में इस वृद्धि का कोई लाभ किसानों को मिलता नजर नहीं आ रहा| उनकी आमदनी में गिरावट इस भारी उत्पादन के बावजूद जारी है|
    फिर इस स्थिति में रोजगार कहाँ से आयेंगे? इसीलिए चारों ओर से नौकरियों में कटौती की खबरें आ रही हैं जबकि मोदी जी ने दो करोड़ रोजगार प्रति वर्ष सृजन का ख्वाब दिखाया था| लेकिन अब वह सिर्फ कौशल प्रशिक्षण और अप्रेंटिस योजना की बात कर रहे हैं| लेकिन प्रशिक्षण रोजगार नहीं दे सकता, अगर अर्थव्यवस्था में रोजगार होगा ही नहीं| रोज़गार और मजदूरी-वेतन में वृद्धि नहीं होगी तो जनता की आमदनी कैसे बढ़ेगी? नहीं बढ़ेगी तो उनके जीवन स्तर में कोई सुधार कैसे होगा? अगर नहीं होगा तो जीडीपी की दर कितनी है, इससे देश के आम नागरिक को क्या लेना-देना?

    Reply
  13. सिकंदर हयात

    Himanshu Kumar
    Yesterday at 12:54 · Dharamsala ·
    मैंने अपने विद्यार्थी काल में गो रक्षा के लिए पांच दिन का उपवास किया था,
    यह तब की बात है जब विनोबा भावे गोरक्षा पर जोर देते थे,
    तब हम यह मानते थे कि भारत में छोटे किसान को बचाना है तो बैल से होने वाली खेती बचानी पड़ेगी,
    इसके अलावा रासायनिक खेती रोकने,
    किसानों के क़र्ज़ में डूबने और खेतीबाडी छोड़ने की रोकथाम,
    के लिए गोबर खाद का इस्तेमाल और ट्रैक्टर की बजाय बैल से खेती के लिए गाय बैल बचाना एक रचनात्मक काम की तरह किया जाता था,
    हमारे मन में या किसी भी साहित्य में या बातचीत में मुसलमानों के खिलाफ कोई विचार नहीं था,
    बल्कि हम लोग बड़े औद्योगिक कत्लखानों को बंद करने के लिए कहते थे,
    विनोबा की प्रेरणा से मुंबई के देवनार के कत्लखाने पर हमारे वरिष्ठ सर्वोदयी कार्यकर्ता अच्युत देशपांडे द्वारा अट्ठारह साल तक सत्याग्रह किया गया जिसमें हजारों कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारी दी,
    इस सत्याग्रह में मुसलमान कार्यकर्ता भी शामिल होते थे,
    भारत में गाय पर खतरा कभी भी मुसलमानों की वजह से नहीं हुआ,
    गाय पालने, गाय की सेवा करने में मुसलमान किसान, हिन्दु किसानों से कभी कम नहीं रहे,
    भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा गाय के प्रतीक को इस्तेमाल करके अल्पसंख्यक मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुओं की नफरत को भड़काने का काम लम्बे समय तक किया गया,
    अगर आप सरस्वती शिशु मंदिर की किताबें देखंगे तो आपको उसमें इस तरह की कहानियां मिलेंगी जिसमें शिवाजी गाय ले जा रहे किसी मुस्लिम कसाई का हाथ काट रहे हैं,
    अपनी शाखाओं और शिशु मन्दिरों के माध्यम से संघ ने हिन्दू युवाओं के बीच इस तरह की झूठी कहानियां पहुंचाईं और उनके मन में अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत पैदा करी,
    वर्तमान में देश भर में मुसलमानों पर हमले करके उन्हें गाय की हत्या करने वाला साबित करने की कोशिश भी संघ की योजना का ही हिस्सा है,
    जबकि सच्चाई यह है कि मुग़ल बादशाहों ने गाय की हत्या को अपराध घोषित किया था और गोकुशी पूरी तरह बंद करवाई थी,
    आज भी भारत के मुसलमान गाय काटने के धंधे में नहीं हैं,
    गाय बैल काट कर विदेशों को भेजने के ज़्यादातर कारखाने हिन्दुओं के हैं, जिनमें से कुछ तो भाजपा के नेताओं के ही हैं,
    गाय के मांस का व्यापार करने वाले समूह से भाजपा बड़ा चंदा लेती है,
    भाजपा को गाय से कोई लेना देना नहीं है,
    बल्कि भाजपा सत्ता पर कब्ज़ा हेतु हिन्दुओं से वोट लेने के लेने उन्हें मुसलमानों के खिलाफ भडकाने के लिए गाय के प्रतीक का इस्तेमाल करती है,
    भारत के मुसलमान चाहते हैं कि गाय काटने पर रोक लगा दी जाय,
    लेकिन भाजपा ऐसा नहीं कर रही है,
    भाजपा अगर ऐसा करेगी तो भाजपा के नेताओं के गाय कत्लखाने बंद हो जायेंगे और भाजपा को मिलने वाला चंदा बंद हो जायेगा,
    इसके अलावा वोट दिलाने वाला यह मुद्दा भी खत्म हो जाएगा,
    भाजपा ने अभी जो नया कानून बनाया है जिसके बाद गाय भैंस का खरीदना और बेचना असम्भव हो जाएगा उसका सबसे बड़ा नुकसान गाय भैंसा पालने वाले छोटे किसान को होगा,
    अगर किसान बूढ़े और बेकार जानवरों को बेचेगा नहीं,
    तो बेकार पशु को खिलाने में खर्चे और बिक्री से मिलने वाले पैसे के नुकसान की वजह से उसकी सारी अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जायेगी,
    भाजपा के इस कदम से भारत में गाय भैंस पालन पूरी तरह समाप्त हो जाएगा,
    इससे दूध और उससे बनने वाले खाद्द्यान्न की कीमतें बढ़ेंगी,
    उस समय बड़े पूंजीपतियों को दूध और डेरी पशुओं के कारोबार से बड़ा फायदा होगा,
    तब बड़े उद्योगपति दूश और डेरी उद्योग में पैसा लगायेंगे,
    बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए भारत के गाय भैंस पालन को सरकारी कानून बना कर नष्ट किया जा रहा है,
    इस काम को सरकार, सत्ताधारी दल, उसके गुंडे और उसके मीडिया के लोग मिलकर कर रहे हैं,
    भाजपा अगर सफल हो गई तो छोटे किसान और छोटी डेरियाँ खत्म हो जायेंगी और भारत का पशुपालन खेती और डेरी उद्योग पूरी तरह कारपोरेट के हाथों में चला जाएगा,
    यही भाजपा की योजना भी है,Himanshu Kumar

    Reply
  14. prasad joshi

    कट्टर हिंदुत्व की विचार धारा बढने लगी तो उसे रोकना चाहीये,
    कट्टर ईस्लामियत बढने लगे तो ऊसे रोकना चाहीये,
    कट्टर माओवाद बढने लगे तो ऊसे भी रोकना चाहीये,
    कट्टर राष्ट्रवाद बढे तो उसे भी रोकना चाहीये…

    हर तरह कि कट्टर विचार धारा को रोका जा सकता है.

    पर कट्टर बुद्धीजिवीयो को कभी रोका नही जासकता है. क्युंकी ये सब बुद्धीजिवी ईस भ्रम मे जिरहे है कि अच्छाइ और बुराइ कि सारी समज सिर्फ इनके पास है. और ईस पृथ्वी पर सदीयो से रहने वाला मानव बस एक वहशी दरींदा था. जिसे ना तो कुछ समझ थी और ना है. बुद्धीजिवीयो कि दृष्टीसे इस दरींदे मानव को Civilize करने की प्रक्रीया को परीवर्तन या विकास का नाम दिया गया. अब ये बुद्धीजिवी पुरी मानव जाती कि अच्छाइयो के ठेकेदार बने घुम रहे है. शांती के ठेकेदार बने घुम रहे है.
    हम आतंकवाद को खत्म कर सकते है क्युं की आतंकवाद एक बुरा दौर है मानव जाती का. हम जाती व्यवस्था और धार्मीक विद्वेष से भी ऊपर ऊठ रहे है. और मै सच कहता हु लोगो के दिलो मे इतनी नफरत नही है एक दुसरे के प्रती कि हर कोइ अपने काम धाम छोड छाड कर मरने मारने पर ऊतरने वाला है.

    पर ये बुद्धीजिवी है के मानते ही नही है. ये बुद्धीजिवी ने मन ही मन मे ये तै किया है के जातीय और धार्मीक महा प्रलय आने वाला है. इस सदिकी सबसे बडी और कभी भी न खत्म होने वाली समस्या ये बुद्धी जिवी है. हर साल लोग मर ते है, कुछ बुढापे कारण, बिमारी के कारण, किसी प्राकृतीक आपदा के कारण, अतर्गत कलह, विवाद, युद्ध, साप के काटने से, पाणी मे डुब कर, viral infection, road accident. ये नियम है हम सबको मरना है.
    पर ये बुद्धी जिवी है के लिखे जार हे है. मौत का कारण दंगे फसाद के अलावा और कुछ है ही नही. अपनी जिंदगी का सारा समय बस यही समस्या सुलझाने मे लगे हुवे है.

    धार्मीक कट्टर पंथीयो के साथ इन बुद्धी जिवी कट्टर पंथी भि ऐक बहोत बडी सामाजीक समस्या है

    Reply

Add Comment