एक सकिर्य पाठिका वर्षा जी ने लिखा वर्षा- to सिकंदर हयात • मुद्दे से हटकर कुछ लिख रही हूँ सिकन्दर हयात जी आप बाद्धय नही है जवाब देने के लिए ,मूल मे हम सब एक ही है पर धर्म के आधार पर अगर बात करे तो हिन्दू धर्म मे भी कई कुरीतियाँ थी जिनमें सबसे ज़्यादा एक औरत पर ही अत्याचार होताथा जैसे सतिप्रथा जिसमें एक औरत को मृत पति के साथ ज़िंदा जला दिया जाता था परंतु बहुत सालों पहले इसका घोर विरोध हुआ और हिंदू पुरूषों ने आगे बढ़कर इसमे हिस्सा लिया अब यह प्रथा बीते ज़माने की बात हो गई हैऐसे ही हिन्दूओं मे भी बहुविवाह को कानुनी मान्यता प्रदान थी पर इस कानुन को बदलने के लिए हिन्दू औरतों को कोई बड़ा आन्दोलन नही करना पड़ा बल्कि पुरूषों ने आगे बढ़कर उसका साथ दिया या कहो ख़ुद ही बहुविवाह को ख़त्म कर नया क़ानून बनाया, मै नही जानती कि इस क़ानून का कोंई विशेष विरोध हुआ हो,तो कया हिन्दू पुरूष की सोच ज़्यादा उदार है औरतों को लेकर बनिस्बत मुस्लिम पुरूषों के ?एक औरत होने के नाते समझ सकती हूँ कि एक महिला कितना असुरक्षित महसुस करती होगी जबकि उसे पता है कि एक शब्द के तीन बार बोलने पर उसकी शादी किसी भी क्षण टूट सकती है एक लड़का जिसने अपनी तलाक़शुदा माँ को देखा है बड़े होते हुए, उसी लड़के ने जब अपनी बहन को तलाक मिलने के बाद फूट फूटकर रोते देखा होगा तो कया उसका दर्द नही महसूस किया होगा ? और जब वो बड़ा हुआ होगा उसकी ख़ुद की बेटी किसी दिन अपने बच्चों की ऊँगलियाँ थामे आकर सिमटकर घर के किसी कोने मे बैठी होगी टूटी हुई सी तो कया उसके कलेजे मे हूक नही उठी होगी ?

उस आदमी को अपनी माँ ,बहन और बेटी की आवाज़ मे आवाज़ नही मिलानी चाहिए उसे इस पीड़ादायक प्रथा से मुक्ति दिलाने के लिए,जब मुस्लिम पुरूष ही औरतों के साथ होगे तो विरोध कौन करेगा और क्यूँ करेगा ? धर्म के नाम पर मिलने वाली एक आज़ादी उनकी ज़िन्दगी मे आई सबसे प्यारी औरतों (माँ,बहनऔर बेटी) की ज़िंदगी के लिए सबसे बड़ी तकलीफ़ का सबब है तो कया उनके लिए वह इस आज़ादी को छोड नही सकता ?(ये मेरी भावनाएँ है जो मै आपसे बाटँ रही हूँ आपको तकलिफ पहुँचाने का कोई इरादा नही है सिकंदर हयात जी ) ”

सिकंदर हयात to Varsha •

वर्षा जी ने लिखा ”(ये मेरी भावनाएँ है जो मै आपसे बाटँ रही हूँ आपको तकलिफ पहुँचाने का कोई इरादा नही है सिकंदर हयात जी ) ” वर्षा जी पहले तो शुक्रिया आपका , दूसरा की आपको क्यों मेरी निष्पक्षता और मेच्योरिटी पर संदेह हुआ ————- ? आपने कैसे सोच लिया की में इन बातो से हर्ट होऊंगा —— ? और ये सोचूंगा की वर्षा मेरे धर्म का मजाक उड़ा रही हे ———- ? अब वैसे तो ऐसा नहीं हे मेने उज्जयिनी जी से कहा था की कुछ असहमत असहमति हो भी तो भी दो लोग सही रस्ते पर भी हो सकते हे अगर इरादा नेक हो तो . में आपका नेक इरादा जानता हु इसलिए हर्ट होने का सवाल ही नहीं हे अगर एक पल को मान भी ले की खुदा न खास्ता आपका इरादा कुछ और हे तो भी मेरी भावनाय आहत नहीं होती हे क्योकि में एक जीरो स्प्रिचुअल नीड और एक्टिविटी का आदमी हु भगत सिंह के साथी लेखक यशपाल ने कहा था ” हिन्दू होने पर ना मुझे गर्व हे ना मुझे शर्म हे , हु में हिन्दू ही ” वैसे ही मुस्लिम होने पर ना मुझे गर्व हे न कोई शर्म हे , हु में मुस्लिम सुन्नी देवबंदी मुस्लिम ही बस जीरो स्प्रिचुअल नीड का मुस्लिम , बहुत से लोग इस कारण व्यंगय में कहु तो हमारे ” खून के प्यासे ” भी हे मगर भारत में उपमहाद्वीप में .दुनिया में मुस्लिम आबादी के एक ठीक ठाक हिस्से को ऐसा बनाना ही होगा जैसे की खबर की खबर पर सुहेल वाहिद साहब का लेख हे”गैर मज़हबी मुस्लिम समाज की जरुरत ” हे जो भारत और दुनिया में गैर मुस्लिमो के साथ सह अस्तित्व बनवा सके एक पुल बने जिससे सभी क्लेश खत्म हो सहअस्तित्व हो सबका भला हो . वही बनाने का हमारा प्रयास हे अब रही बात तीन तलाक की तो जितनी मुझे समझ हे इस मुद्दे की तो , इस्लाम में तो तलाक का कानून बेहद सरल और बढ़िया हे शादी और तलाक आसानी से ही होने चाहिए तलाक का मामला अगर लम्बा खीचेगा तो मानसिक पीड़ा तो होगी ही कब सेपरेशन होगा कब लोग फिर से नयी जिंदगी शरू कर पाएंगे शादी कर पाएंगे —————- ?

तो ये तो तय हे की तलाक सरल होना चाहिए इस्लाम में तो ये हे की तीन महीने में तीन तलाक बोलो ये सटीक वयवस्था हे इसमें सेपरेशन की भी गुंजाईश कम हे क्योकि तीन महीने में तो बहुत कुछ हो जाएगा गुस्सा ठंडा हो जाएगा लोग समझायेंगे दोनों पक्ष आगा पीछा सोचेंगे आत्मनिरीक्षण करेंगे बच्चे हो तो उनकी तो चिंता होगी ही .तो ऐसे में तलाक के चांस कम ही हे इसलिए तीन महीने में तलाक के केस नॉर्मली सुनते ही नहीं हे मगर जितना में समझता हु की मुल्लागर्दी कहती हे की हे तो यही सही तरीका , मगर अगर एक साँस में भी बोल दिया तो भी तलाक हो गया . हे तो ये गलत ही मगर मुल्लागर्दी अडिग ही रहेगी क्योकि लोग जितना परेशान दुखी तनाव असुरक्षा में रहेंगे उतना ही वो अधिकाधिक् धर्म- धर्मगुरुओ की शरण में जाएंगे उनके गुलाम बनेगे नेताओ को भी ये इस्थिति सूट करती हे पिछले सालो में भारत में धर्मगुरुओ बाबाओ की बढ़ती फौज देखि ही जा सकती हे हे खेर तीन तलाक तो इसका इलाज यही हे की लोग लड़कियों को भी पढ़ाये सिर्फ पढ़ाये ही नहीं बल्कि लड़को की तरह ही जितना काबिल हो सके बनाये फिर लड़की वाले और खासकर लड़की महिला एक तो निकाह के समय ही सारी सारी बाते तय कर ले फिर चाहे तो निकाह के साथ साथ , रजिस्टर्ड भी करवा ले ( मेरे बड़े भाई की ऐसी ही हुई ) हां तीन तलाक ( एक साँस में ) और चार शादियों की अब कोई तुक नहीं हे शादी आदमी सौ करे मगर तलाक और सेटेलमेंट देकर एक साथ दो बीवी अब नहीं . ये काम होने चाहिए . मगर ये भी तय हे की हिन्दू कठमुल्लावादी कटटरपन्ति अंधविश्वासी सरकार और उसके लग्गू भग्गू लोग , मुस्लिम कठमुल्लावाद से लड़ और उसे कमजोर नहीं कर सकते हे उसे भड़का कर और ताकतवर ही कर सकते हे यही होगा आप देखना . हालात सही करना हे तो आपका मेरा फ़र्ज़ हे की हम सभी शुद्ध सेकुलर लिबरल ताकतों को बढ़ावा दे पुरे जोर से हिन्दू मुस्लिम एकता और भारत पाक महासंघ की बात करे , कही भी कोई भी हल्की सी भी मुस्लिम या इस्लाम विरोधी बात हो रही हो तो वर्षा जी आप उसका विरोध करे कही कोई हिन्दू विरोधी बात हो रही होतो में उसका विरोध करू करता भी हु ज़्यादा से ज़्यादा लोग को शुद्ध सेकुलर बनाया जाए एकदूसरे का फुल विश्वास जीता जाए साम्प्रदायिकता कटटरता के साथ कोई समझौता न किया जाए न चुप रहा जाए तो ही कोई अच्छा परिवर्तन आएगा .

हमने हमेशा लिखा की इन बड़े बड़े मुस्लिम लेखकों बुद्धिजीवियों अकादमिकों ने कभी अपना फ़र्ज़ नहीं निभाया सेकुलरिज्म की मलाई तो खायी उसकी जड़े गहरी करने की जिम्मेदारी नहीं निभाई वही रविश जी ( व्यक्ति विशेष नहीं बहुत लोग ) जेसो को भी इन बातो की समझ भी नहीं रही और कुछ मुस्लिम लोकप्रियता का भी मोह रहा इन्होने भी कभी हमारी खैरियत ( सोच की ) नहीं ली . तो खेर अब पिछले सालो में सबसे बढ़िया सरकार वही रही जो 86 साल के बूढ़े शेर हरकिशन सुरजीत ( राहुल प्रियंका का चालीस में भी आलस ) ने अपने पसीने से बनवाई थी यु पि ए फर्स्ट , तब उस सरकार में करप्शन कम था महगाई काबू में थी नरेगा आया जिसने अगला चुनाव जितवाया साम्प्रदायिकता विलुप्त सी थी सीमा पर शांति थी कश्मीर समस्या के हल के तो मनमोहन मुशर्रफ इतने करीब हो चुके थे की आई एस आई और पाक फौज ने घबराकर मुंबई हमला करवा डाला था तो ये था मगर कुलीन करात ने सब कुछ तबाह करवा दिया खेर लेकिन तभी सही समय था तीन तलाक ( एक साँस -मे ) और एक से अधिक शादियों ( शादी चाहे जितनी करे मगर तलाक देकर ) और फ़र्ज़ी हज सब्सिडी पर रोक का मगर मुस्लिम लेखकों बुद्धिजीवियों अकादमिकों नेताओ को मलाई खाने से ही फुर्सत नहीं थी उन्होंने कोई कोशिश भी नहीं की वो इस पचड़े में पड़े नहीं ज़हमत नहीं ली तब मस्त रहे तब ही इन पर रोक हो जाती थी या तीन तलाक का विरोध करने वाली मुस्लिम महिलाओ के साथ बैठ कर ईमानदारी से कोई सर्वसहमति से कोई हल निकाल लिया जाता तो आज कम्युनल संघी फौज इन सब मुद्दों का फायदा नहीं ले पाती .अब अगर आज घोर कम्युनल संघी फौज कोई मुस्लिम सुधार का मसला उठाएगी तो उससे तो साम्प्रदायिकता ही फैलेगी फायदा कुछ नहीं होगा जो नॉनसेंस लोग जानवर की हत्या पर इंसान को मार डालेंगे टांग देंगे सौ सौ गुंडे एक पर चढ़ा देंगे जैसी घिनौनी ज़हरीली सोच रखते हो वो भला कैसे कोई सुधार करवा सकते हे ————– ? या इनसे हो सकता हे. इनसे तो केवल और गंद और क्लेश ही होना हे वही हो रहा हे और ये चाहते भी हे की क्लेश हो उसी में इनका फायदा हो रहा हे फ़िलहाल तो . संघी फौज ने इंटरनेट के आने से बहुत फायदा उठाया फ़र्ज़ी हज सब्सिडी को खूब उछाला इन्होने कहा की हिन्दुओ के किसी धर्मग्रन्थ में दूसरी शादी की मनाही नहीं हे फिर भी हिन्दू दूसरी शादी नहीं कर सकता हे दूसरी शादी को खूब उछाला तलाक पर इनका कहना हे की हिन्दुओ को तो बरसो कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते हे मुसलमान आराम से तलाक ले लेता हे मुसलमान कहते रह गए की मुसलमानो में कम लोगो ने दूसरी बीविया रखी हे तलाक की दर कम हे आदि आदि मगर बात तो कानून की थी तो संघियो ने एक की चार लगाकर भड़का कर हिन्दुओ को अपनी तरफ खिंचा नेट पर इनका ज़बर्दस्त मुस्लिम और इस्लाम विरोधी प्रोपेगेंडा रहा हे .अब इनसे तो केवल और गंद और क्लेश ही होना हे वर्षा जी . .