सुप्रीम कोर्ट ने एक कॉमन सिविल कोड के सबसे बड़े सवाल से मुसलमानों के बीच प्रचलित तुरंत तलाक के मामले को अलग करके एक अच्छा कदम उठाया है। इससे इस विवादास्पद मुद्दे की तरफ लोगों का ध्यान दोबारा लौटेगा और यह मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) को मामले में जटिलता पैदा करने से भी रोकेगा।

कई आम मुसलमान और महिलाएं इस्लामी फिकह (न्यायशास्त्र) से अनजान हैं इसलिए उन्हें लगता है कि यह सार्वभौमिक रूप से लोकप्रिय एक इस्लामी सिद्धांत है, इसलिए उन्हें इस का समर्थन करना चाहिए। यह भ्रम दास के रूप में अपनी पत्नियों के साथ व्यवहार करने के पुरुषों के अपने तर्कहीन “अधिकार” पर सभी मतों से संबंधित भारतीय उलेमा के बीच एकता के प्रदर्शन से पैदा होती है।

भारतीय केंद्र सरकार ने कहा है कि तीन तलाक को एक धर्मनिरपेक्ष देश में ‘गलत’ शैली में प्रस्तुत किया गया हैl

हालांकि उलेमा मामूली फ़िक़्ही मतभेद पर आपस में लड़ते रहते हैं, लेकिन इस मामले में उनके बीच पूरी तरह से एकता है। यहां तक कि जिन उलेमा के मसलक में यह गलत प्रक्रिया वैध नहीं है वह भी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इस गैर इस्लामी स्टैंड का समर्थन करते हैं। उदाहरण के लिए, अहले हदीस भी सऊदी अरब की तरह हम्बली पंथ का पालन करते हैं जिसमें एक ही बार में तीन तलाक देना उचित नहीं है। लेकिन अहले हदीस के महासचिव मौलाना असगर अली इमाम महदी इस बात पर अड़े हैं कि “केंद्र सरकार और अदालतों को धर्म के निजी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।” और इस मामले में यही रुख ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ के अध्यक्ष और प्रमुख शिया धर्मगुरू मौलाना कल्बे सादिक का भी है। शिया जिस फ़िक़्ह का पालन करते हैं यानी फ़िक़्ह जाफरी में भी एक बार में तीन तलाक की प्रक्रिया अवैध है।

शिया खुद इस पर अमल नहीं करते। मौलाना सादिक ने सुन्नी मुसलमानों को इस मुद्दे पर पुनर्विचार करने की सलाह दी है, लेकिन वह अभी भी सुप्रीम कोर्ट में काउंटर हलफनामा में तीन तलाक का समर्थन करने वाले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ के साथ हैं।

भारत में एक और प्रमुख मुस्लिम आलिम ने भी इस मामले में अपनी एक विरोधाभासी रुख व्यक्त की है। उदाहरण के लिए, जमीयत उलेमा से संबंधित मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी ने टीवी पर एक चर्चा में इस बात को स्वीकार किया कि एक बार में तीन तलाक के मामले में इमामे आज़म अबू हनीफा ने यहां तक कहा है कि, “जिसने यह काम किया वह हराम काम का दोषी हुआ “।

इमाम आज़म अबू हनीफा कि हनफ़ी विचारधारा के संस्थापक हैं अक्सर भारतीय मुसलमान उन्हीं का पालन करते हैं। वह एक बार में तीन तलाक को हराम कहते हैं। यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि पाकिस्तान की स्थापना के तुरंत बाद ही पाकिस्तान में एंग्लो मोहम्मडन लॉ में मौजूद अन्य गैर इस्लामी दिनचर्या सहित इस मामूल को भी समाप्त कर दिया गया, लेकिन यह अभी भी भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम प्रचलित है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला का भी स्टैंड विरोधाभास का शिकार है। और यह निश्चित रूप से एक बहुत अजीब बात है। क्योंकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसका समर्थन भी करता है और साथ ही साथ यह भी कहता है कि एक ही बार में तीन तलाक एक घृणित और हराम काम है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कानून की किताब मजमुआ क़वानीने इस्लामी के अनुच्छेद (267) में है:

”तलाके बिदअत (एक बार में तीन तलाक, जो कि तलाक देने का गैर कुरआनी तरीका है) निषेध है, हालांकि, अगर कोई ऐसी तलाक यानी तलाके बिदअत देता है तो तलाक स्थित हो जाएगा और तलाक देने वाला पापी होगा। ”

हालांकि, नियमों के अनुच्छेद 269 में तो मूर्खता के चरम नज़र आती है। इसलिए कि औसतन हर मुसलमान यह मानता है कि इस्लाम में नीयत को सबसे अधिक महत्व प्राप्त है। यहां तक कि जब एक मुस्लिम नमाज़ के लिए खड़ा होता है तो उसे पर्याप्त नहीं माना जाता है कि वह नमाज़ के अंदर सब कुछ अदा कर रहा है, बल्कि उसे यह भी कहना होगा कि वे विशिष्ट रूप में एक विशेष नमाज़ का इरादा रखता है। अब आप ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ की व्यवस्था की पुस्तक का अध्ययन करें कि तीन तलाक के मामले में इस किताब का क्या कहना है:

”तलाके सरीह ” यानी तलाक के लिए स्पष्ट और आसान शब्द के इस्तेमाल से भी तलाक हो जाती है चाहे उसने तलाक का इरादा हो या न हो।”

बेशक इस का आधार उस देवबंदी फतवा पर होगा कि जिसमें एक युवा मुस्लिम पति को यह बताया गया है कि आप ऑनलाइन अपनी नई नवेली पत्नी के साथ चैट (chat) करते हुए मजाक में भी तीन बार शब्द तलाक लिख देते हैं तलाक स्थित हो जाएगा, और आप उससे तब तक फिर से शादी नहीं कर सकते जब तक वो हलाला न करवा ले। और हलाला यह है कि वे किसी और पुरुष से शादी करे और उस पुरुष के साथ स्त्री की एकांत में होना भी पाया जाए तो उसके बाद वह नया पति उसे तलाक दे दे।

हलाला भारतीय मुसलमानों के अंदर सबसे अश्लील सामाजिक कर्म है जिसे उलेमा के सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त है। अगर तीन तलाक की प्रक्रिया समाप्त कर दिया जाए या एक ही बार में दी जाने वाली तीन तलाक को एक ही कुरआनी तलाक माना जाए तो यह सामाजिक मामूल खुद बखुद खतम हो जाएगा। जैसा कि मोरक्को, कुवैत, यमन, अफगानिस्तान, लीबिया, कुवैत, कतर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, इराक, सूडान सहित 22 मुस्लिम देशों में इस पर अमल किया जाता है ।

यहां तक कि श्रीलंका ने भी अपने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार को परिचित कराया है और लैंगिक समानता के अनुपात में वृद्धि की है, जहां मुसलमानों की आबादी 10 प्रतिशत से भी कम है। केवल भारत ही सुधार की दिशा में अब तक कदम आगे नहीं बढ़ा सका है। अगर सरकार इस बात का इंतजार करती है कि वह इस पर उलेमा का समर्थन भी हासिल कर ले तो ऐसा कभी नहीं होने वाला। उलेमा अब तुरंत कुरआन को अपना रहनुमा स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होने वालेl उनके लिए शरीअत ही कानून की मूल आधार है जो कि 90 प्रतिशत अरब आदिवासी परंपराओं पर आधारित है। वे शरीअत को इल्हामी मानते हैं, हालांकि सबसे पहले इसकी संपादित नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के 120 साल के बाद अमल में आई थी, और समय और समय के हिसाब से उसमें परिवर्तन होता रहा है। अब सारी उम्मीदें केवल सुप्रीम कोर्ट के साथ ही जुड़ी हैं।

सुल्तान शाहीन दिल्ली में एक प्रगतिशील इस्लामी वेबसाइट NewAgeIsalam.Com के संस्थापक संपादक हैं!
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