फिल्‍म समीक्षा – अनारकली ऑफ आरा

Category: साहित्य व कला 484 views 5

by — अमित कर्ण

21 वीं सदी में आज भी बहू, बेटियां और बहन घरेलू हिंसा, बलात संभोग व एसिड एटैक के घने काले साये में जीने को मजबूर हैं। घर की चारदीवारी हो या स्‍कूल-कॉलेज व दफ्तर चहुंओर ‘मर्दों’ की बेकाबू लिप्‍सा और मनमर्जी औरतों के जिस्‍म को नोच खाने को आतुर रहती है। ऐसी फितरत वाले बिहार के आरा से लेकर अमेरिका के एरिजोना तक पसरे हुए हैं। लेखक-निर्देशक अविनाश दास ने उन जैसों की सोच वालों पर करारा प्रहार किया है। उन्‍होंने आम से लेकर कथित ‘नीच’ माने जाने वाले तबके तक को भी इज्‍जत से जीने का हक देने की पैरोकारी की है। इसे बयान करने को उन्‍होंने तंज की राह पकड़ी है।

इस काम में उन्हें कलाकारों, गीतकारों, संगीतकारों व डीओपी का पूरा सहयोग मिला है। उनकी नज़र नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से फिल्‍म को लैस करती है। अविनाश दास ने अपने दिलचस्‍प किरदारों अनारकली, उसकी मां, रंगीला, हीरामन, धर्मेंद्र चौहान, बुलबुल पांडे व अनवर से कहानी में एजेंडापरक जहान गढा है। हरेक की ख्‍वाहिशें, महत्‍वाकांक्षाएं व लालसा हैं।

फिल्‍म का आगाज दुष्‍यंत कुमार की लाइन से होता है- ‘’ये सारा जिस्‍म बोझ से झुक कर दोहरा हुआ होगा।। मैं सजदे में नहीं था, आप को धोखा हुआ होगा।।‘’ आरा जैसे इलाके में आज भी मनोरंजन का साधन बाइयों के नाच-गाने हैं। शादी-विवाह के मौके पर उन्हें नचवाना व गवाना शान का विषय है। एक वैसे ही समारोह में अनारकली की मां नाच- गा रही है। वह रायफल की दुनाली से पैसे निकाल रही होती है कि गलती से गोली चलती है और वह वहीं ढेर। पर हमारे कथित सभ्‍य समाज का उसूल देखिए उस गाने वाली के जान की कीमत कुछ नहीं। कोई आवाज नहीं उठाता। कहानी 12 साल आगे बढ़ती है। अनारकली इलाके की मशहूर गायिका है। उसके कार्यक्रम के आयोजन का ठेका रंगीला के पास है। एक वैसे ही कार्यक्रम में वाइस चांसलर धर्मेंद्र चौहान नशे में जबरन अनारकली से छेड़छाड़ करता है। अनारकली आजिज आ उसे थप्‍पड़ जड़ती है। बात आगे चलकर उसकी अस्मिता की सुरक्षा के आंदोलन में तब्‍दील हो जाती है। इस मुहिम में‘व्‍यावहारिक’ रंगीला तो साथ छुड़ा चला जाता है। साथ देते हैं अनवर और हीरामन तिवारी, जो अनारकली को नि:स्‍वार्थ भाव से प्रेम व आदर करते हैं। हीरामन यहां ‘तीसरी कसम’ वाले हीरामन की आधुनिक विवेचना है।

सभी किरदार रोचक हैं। उन्‍हें बड़ी खूबी से निभाया भी गया है। स्‍वरा भास्‍कर पूरी फिल्‍म में अनारकली के किरदार में डूबी नजर आती हैं। यह उनका करियर बेस्ट परफॉरमेंस है। साहस से भरा हुआ। क्‍लाइमेक्‍स में ‘नार देख के लार’ गाने पर उनका तांडव नृत्‍य प्रभावी फिल्‍म को अप्रतिम ऊंचाइयों पर ले जाता है। उन्होंने कहीं भी किरदार की ऊर्जा प्रभावित नहीं होने दी है। फिल्‍म में छह गाने हैं। उन्हें रविंदर रंधावा, डा सागर जेएनयू, रामकुमार सिंह और अविनाश दास ने लिखा है। सब में हार्टलैंड व कहानी के मिजाज की सौंधी खुशबू है। सब हकीकत के बड़े करीब। रोहित शर्मा के सुरबद्ध ये गाने फिल्‍म को आवश्‍यक गति प्रदान करते हैं। गीत-संगीत फिल्‍म का प्रभावी किरदार बन कर उभरा है। वह कहीं कहानी पर हावी नहीं होता।

रंगीला अनारकली के काम का प्रबंधन करता है। शादीशुदा है, पर अनारकली के साथ भी उसके संबंध हैं। पंकज त्रिपाठी ने इसे पुरजोर विस्‍तार दिया है। धर्मेंद्र चौहान के अवतार में संजय मिश्रा चौंकाते हैं। ठरकी व खूंखार अवतार वाले शख्‍स से उनकी अदायगी की एक और खूबी जाहिर हुई है। इंस्‍पेक्‍टर बुलबुल पांडे की भूमिका में विजय कुमार व हीरामन तिवारी के रोल में इश्तियाक खान थिएटर जगत के लोगों की कुव्‍वत जाहिर करते हैं। इन जैसों को अंडररेट करना ग्‍लैमर जगत का दुर्भाग्‍य है। अनवर के रोल में मयूर मोरे किरदार में स्‍थायी अनुशासन व समर्पण के साथ रहे हैं। इन कलाकारों को खोजने वाले जीतेंद्र नाथ जीतू का काम उल्‍लेखनीय है।

बिहार के आरा की असल कायनात क्या होनी चाहिए, इसे ‘एनएच10’ फेम अरविंद कन्‍नबिरन ने बखूबी पेश‍ किया। उजड़ी हुई गलियां, अनारकली व बाकी किरदारों के भाव सब को उन्होंने रॉ रूप में कैप्‍चर किया है। जबिन मर्चेंट ने इसकी उम्‍दा एडीटिंग की है। तेज गति से बदलते घटनाक्रम ने फिल्‍म को सधा हुआ बनाया है। आज की फिल्‍मों में ठेठ हिंदी बेल्‍ट गायब रहे हैं। उसकी फील यहां जर्रे-जर्रे में है। वह किरदारों की भाषा, व्‍यवहार और परिवेश में बिना किसी अपराधबोध के भाव से मौजूद है।

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5 thoughts on “फिल्‍म समीक्षा – अनारकली ऑफ आरा

  1. सिकंदर हयात

    अनारकली ऑफ़ आरा’ हिट है या फ्लॉप? कमाई की सच्चाई क्या है??
    March 28, 2017 Written by अश्विनी कुमार श्रीवास्तव Published in वेब-सिनेमा
    Ashwini Kumar Srivastava : दैनिक भास्कर जैसे हिंदी अख़बार में बड़े पद पर पत्रकार रह चुके अविनाश दास की पहली फिल्म ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप है या सुपर हिट, कुछ पता ही नहीं चल पा रहा है… पत्रकार से फ़िल्मकार बने अविनाश की फिल्म के बॉक्स ऑफिस आंकड़े न जाने कौन से सूत्रों से मीडिया को मिल रहे हैं कि दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे अखबारों ने जहाँ उसी दिन रिलीज़ हुई अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘फिल्लौरी’ को ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ के सामने फिसड्डी बता दिया, वहीँ बॉलीवुड में बॉक्स ऑफिस की विश्वसनीय रपट देने वाली वेबसाइट ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ को बॉक्स ऑफिस पर सुपर फ्लॉप और ‘फिल्लौरी’ को औसत करार दे भी चुकी हैं।
    दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और अमर उजाला में तो बाकायदा बॉक्स ऑफिस आंकड़े देते हुए ख़बरें चलाई गई हैं कि कुल 4 करोड़ में बनी अविनाश की फिल्म के पहले दिन की बॉक्स ऑफिस की कमाई 10 करोड़ है…इसी के साथ आज तक जैसी कुछ और वेबसाइट ने भी 10 करोड़ ही लिखा ….
    हालाँकि फिर जब आईएमडीबी और बॉलीवुड हंगामा जैसी वेबसाइट ने फिल्म की पहले दिन की कमाई महज 10 लाख रुपये बताई तो आज तक ने भी इसे बदल कर अब 10 लाख ही कर दिया है… मीडिया में फैली इतनी भारी गफलत के बावजूद फिल्म के निर्माता की तरफ से फिल्म रिलीज़ होने के तीन दिन बाद भी बॉक्स ऑफिस आंकड़े नहीं मुहैया कराए जा रहे हैं जबकि अनारकली ऑफ़ आरा के साथ ही रिलीज हुई फिल्लौरी के बॉक्स ऑफिस आंकड़े बराबर आ रहे हैं…अगर वाकई अनारकली ऑफ़ आरा ने अपने बजट की दोगुनी कमाई पहले दिन ही कर ली है तो यह बेहद बड़ी कामयाबी ही मानी जायेगी। इससे फिल्म के सुपरहिट होने की पूरी उम्मीद भी लगाई जा सकती है। लेकिन महज 10 लाख रुपये ही इस फिल्म ने पहले दिन कमाए हैं तो अनारकली ऑफ़ आरा को अपनी लागत तो दूर, एक करोड़ रुपया कमा पाना भी मुश्किल ही होगा।
    यही नहीं, मीडिया से मिल रही चौतरफा वाहवाही और बॉक्स ऑफिस पर पहले ही दिन 10 करोड़ कमा लेने की मीडिया की प्लांटेड ख़बरों से भी यह फ़िल्म सुपरहिट में नहीं बदल पाएगी।पत्रकार होने के नाते अविनाश दास की फिल्म की कामयाबी की कामना बाकी पत्रकारों की ही तरह मैंने भी की थी लेकिन लगता है कि भास्कर, जागरण और अमर उजाला के पत्रकारों ने पत्रकार धर्म को ताक पर रख कर मित्रता धर्म निभाते हुए अविनाश दास की कामयाबी के लिए फर्जी आंकड़ों से भरी खबर ही प्लांट करा दी।वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट जिस फिल्म की पहले दिन की कमाई को महज 10 लाख रुपये और फिल्म को फ्लॉप बताये….वहीँ दूसरी तरफ हिंदी के अख़बार उसी फिल्म को फिल्लौरी की पहले दिन की कमाई 4 करोड़ के मुकाबले अनारकली की कमाई 10 लाख से सीधे 10 करोड़ पहुंचा कर फिल्म को सुपरहिट ही घोषित कर दें। जबकि बॉक्स ऑफिस के वास्तविक आंकड़े मिलने में इतनी बड़ी गलती होने की गुंजाईश न के बराबर ही है।ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि फिल्म के निर्माता खुद ही बॉक्स ऑफिस के आंकड़ें जारी कर दें ताकि हम सभी को पता चल सके कि आखिर मीडिया में यह परस्पर विरोधाभासी ख़बरें चलने और बॉक्स ऑफिस आंकड़ों में इतना भारी अंतर आने की वजह क्या है? आखिर कौन सही जानकारी दे रहा है और कौन गलत?हालाँकि मीडिया से बाहर बैठे लोगों को शायद यह गलती मामूली लगे लेकिन पत्रकार और बुद्धिजीवी अच्छी तरह से जान-समझ रहे हैं कि पत्रकारों द्वारा मित्रता और शत्रुता निभाने का यही खेल तो मीडिया और पत्रकारों को जनता की नजर में दलाल में बदल चुका है।लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव

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  2. सिकंदर हयात

    yashwant Singh : अनारकली आफ आरा कल देख आया. नोएडा सिटी सेंटर के पास वाले मॉल के सिनेमा हॉल में. इंटरवल से पहले ही फिल्म छोड़कर निकल गया. मेरे साथ एक संपादक मित्र थे. फिल्म बहुत सतही थी. जैसे मीडिया वाले टीआरपी के लिए कुछ भी दिखा देते हैं, पढ़ा देते हैं, वैसे ही सिनेमा वाले बाक्स आफिस के चक्कर में कुछ भी बना देते हैं. याद करिए वो दौर, जब सेमी पोर्न सिनेमा रिक्शे वालों के लिए बना करती थी और वो अच्छी कमाई भी करती थी. इन सिनेमा के बीच बीच में रियल पोर्न क्लिप भी चला दिया जाता था ताकि काम कुंठित दर्शक पूरा पैसा वसूल वाला फील लेकर जाए.अनारकली आफ आरा में कुछ भी नया नहीं है. एक फूहड़ गाना गाने वाली सिंगर जो ढेर सारे लोगों से रिश्ते बनाती फिरती है, उसका पंगा एक शराबी वीसी से पड़ गया जो उसे सरेआम नंगा कर रहा था. जाहिर है, फूहड़ गायिका उर्फ सेमी रंडी को इसका बुरा लगना था क्योंकि वह यह सब बंद कमरे में करती थी, आज काम कुंठित और प्रभावशाली वीसी ने उसके साथ सरेआम करने की कोशिश की. बस, वह वीसी को सबक सिखाने में लग गई और सिखा भी दिया. कहानी बस इतनी ही है. इंटरवल से पहले फिल्म छोड़ आया इसलिए मुझे बस इतना बताना है कि मैंने ऐसा क्या फील किया जिससे फिल्म छोड़ आया. फिल्म का ज्यादातर हिस्सा फूहड़ गानों, काम कुंठाओं, कामुकता, वासना और जुगुप्साओं से भरा पड़ा है. आपको मिचली भी आ सकती है. फिल्म का पिक्चराइजेशन पूरी तरह से अनुराग कश्यप मार्का बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन बन नहीं पाई है.
    ऐसे दौर में जब बहुत अलग अलग किस्म के टापिक पर सुंदर फिल्में बन और हिट हो रही हैं, सिर्फ वासना वासना वासना और काम काम काम से बनी फिल्म का औचित्य समझ नहीं आता. अनारकली का दलाल बार बार अनारकली को छेड़ता नोचता परोसता दिखता है लेकिन इससे कोई दिक्कत नहीं अनारकली को. सोचिए, जिसकी मानसिक बुनावट सिर्फ देने लेने भर की हो उसे एक प्रभावशाली से दिक्कत क्या, बस इतने भर से कि यह सरेआम करने की कोशिश की गई. ये ठीक है कि बदन पर आपका हक है और आप तय करेंगी किसे देना लेना है, लेकिन जब आप चहुंओर देती परसोती दिखती हैं तो आपको लेकर कोई खास नजरिया नहीं कायम हो पाता. यौन अराजकता को परोसती यह फिल्म भले ही पुलिस और पावर से टक्कर का नौटंकी करती हो लेकिन इसकी आड़ में असल में केवल वासना और सेक्स परोसा गया है. बेहद घटिया और फूहड़ फिल्म.
    इस फिल्म के शुरू होने से पहले पहाड़ पर चढ़ने वाली एक बच्ची की आने वाली फिल्म का प्रोमो दिखाया गया. मैं सोचता रहा कि क्या अविनाश के दिमाग में ऐसे थीम नहीं आते जिसमें जीवन का मकसद और जिजीविषा की कहानी बयां हो जो प्रेरणा देती हो. हमारे हिंदी पट्टी के नए फिल्मकारों के साथ दिक्कत ये है कि वे पहली बार हिट देने के चक्कर में ऐसे विषय उठा लेते हैं जो न सिर्फ फूहड़ और आउटडेटेड होते हैं बल्कि नए जमाने के दर्शकों को पचते भी नहीं. अविनाश की बड़ी सफलता इस बात की है कि उनने बिना खर्च ठीकठाक पीआर किया और ढेरों बढ़िया वाह वाह करती समीक्षाएं फेसबुक से लेकर अखबारों मैग्जीनों में छपवा लीं. वे फिल्में खर्चा निकाल लिया करती हैं, जो मॉल से लेकर सिनेमाघरों में रिलीज हो जाया करती हैं क्योंकि फिल्मों के ढेर सारे राइट मसलन म्यूजिक, टीवी रिलीज, फारेन रिलीज आदि अच्छे खासे पैसों में बिक जाया करते हैं.हफ्ते भर में रो गा कर काफी लोगों ने फिल्म देखी है (हालांकि हाउसफुल कहीं नहीं रही यह फिल्म और आरा से लेकर भोपाल तक में एक शो में बस बीस लोगों तक के होने की खबर है) और देख रहे हैं. मेरे साथ सिनेमा हाल में कुल साठ लोग तक रहे होंगे. गोल्ड कैटगरी की सीटों पर ही लोग थे और वह भी पूरे नहीं. तब भी कहा जा सकता है कि जिनने इस फिल्म को बनाने में पैसा लगाया उनका पैसा निकल गया होगा. अविनाश को चाहिए कि वह माडर्न थीम सोचें और प्रगतिशील ढंग का सिनेमा बनाएं. मैंने बिना देखे अविनाश को दो बार फोन कर इतनी अच्छी समीक्षाओं और इतने ढेर सारे स्टार के लिए बधाई दी थी, अब उसे वापस लेता हूं. वो कहते हैं न, दूर के ढोल सुहावने होते हैं.सिर्फ आलोचना के लिए यह आलोचना कतई न समझा जाए, यह जानते हुए भी कि लोगों को आजकल आलोचना का मतलब निंदा ही लगता है. मैं पूरी साफगोई से इसलिए लिख रहा ताकि प्रतिभावान अविनाश आगे कुछ अच्छी फिल्में बना सकें. और हां, यह भी जानता हूं कि ढेर सारे लोगों ने फिल्म देखकर जो वाह वाह लिख मारा है, उन्हें कतई यह मेरी समीक्षा पसंद न आएगी लेकिन उनसे फिर आग्रह करूंगा कि वह तटस्थ ढंग से सोचें और फिल्म के बारे में पुनर्विचार करें. मेरी तरफ से फिल्म को मात्र एक स्टार. मैं कम ही फिल्मों को इंटरवल से पहले छोड़कर निकलता हूं क्योंकि मेरा मानना है टिकट खरीद कर पैसा बेकार कर दिया है तो फिल्म लास्ट तक देख ही ली जाए, लेकिन लस्ट और भौंडेपन से सनी अनारकली आफ आरा को इंटरवल से पहले तक ही उबकाई के मारे छोड़ आया.भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह . ” में फिल्मे नहीं देखता हु बरसो हो गए सिनेमा हाल गए लेकिन ट्रैलर से ही मुझे भी फिल्म कोई खास नहीं लगी

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  3. qutubuddin ansari

    पिछले पांच दिन से Anaarkali of Aarah पर फीडबैक मिल रहा है। लगता है कि यह फिल्म दोस्ती-यारी में फेसबुक पर हिट करवा दी गयी है क्योंकि सिनेमाहाल में सामान्य दर्शकों की मौजूदगी की रिपोर्ट उदास करने वाली है। जब मैं देखने गया था तब 27 लोग बैठे थे। परसों एक कवि फिल्म देखने गया, तो उसे पता चला कि टिकट लेने वाला वह छठवां दर्शक है। आज एक मित्र 20 लोगों की रिपोर्ट दिए।
    वैसे इसमें कोई बुराई नहीं है कि आपस में मिल बैठ कर चर्चा कर ली जाए और पीठ की खुजली मिटा ली जाए। प्रॉब्लम वहां भी एक है, जिसे सार्त्र power of suggestion कहते हैं। मैंने अगर किसी को सकारात्मक फीडबैक दिया तो वह उसी चश्मे से फिल्म को देखेगा। यहाँ तो बाकायदे गिरोहबंदी ही हो गयी है। चौतरफा लिहो-लिहो टाइप!
    मैं इंतज़ार कर रहा हूँ कि इस फिल्म की एक ईमानदार रिव्यू पढ़ने को मिले। ईमानदारी तो मैंने भी बरती थी, लेकिन वो निजी थी। उसका कोई सामूहिक मूल्य होगा, इस पर मुझे शक़ है! ईमानदारी दूसरों ने भी बरती होगी, लेकिन कई लोग इस बहाने निर्देशक को पुरानी पहचान के बहाने पोटने की कोशिश कर रहे हैं। इतनी तुच्छता ठीक नहीं है यारों! क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा!

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    1. सिकंदर हयात

      बहुत अच्छा कमेंट अंसारी जी , बात सहमति असहमति की नहीं हे बस बात शालीन हो उसमे विचार हो और बात रोचक हो वही आपने की बधाई , हिंदी साइट्का चलना बहुत जरुरी हे और साइट्स का भविष्य सिर्फ लेखको से नहीं , आप जैसे लोगो से भी हे . आपने बिलकुल सही बताया ट्रैलर से ही फिल्म सामान्य ही लग रही थी कोई खास नहीं , फिर सेम विषय पिंक में अभी चल भी चूका था . असल में अविनाश जी ने भी चतुराई से वही खेल खेला जो बहुत लोग खेलते हे की जैसे बड़े बुजुर्ग बता कर गए हे की दो सयाने दरजी एक राजा से मोटा माल कमाते हे की तुम्हारे लिए आएसी ड्रेस सी रहे हे जो सिर्फ अक्लमंदों को दिखाई देगी ये लो ये हे ड्रेस ये सुनते ही सारे दरबारी ड्रेस की तारीफ करने लगते हे ( जबकि कोई ड्रेस नहीं होती हे ) घबरा कर राजा भी तारीफ करने लगता हे की भाई क्या कमाल की ड्रेस हे तो बहुत लोग ये खेल करते हे की हमारी रचना ऐसी हे जो सिर्फ अक्लमंदों को समझ आएगी ये सुनते ही चारो तरफ से ”अक्लमंदों” का झुण्ड आकर टूट पड़ता हे की वाह क्या बात बहुत अच्छे बहुत ही अच्छे मरहबा वेल्डन ये खेल बहुत चतुर लोग खेलते हे और अविनाश जी की चतुराई तो हमने चार साल पहले ही समझ ली थी फिल्मो में जाना था इसलिए मोहल्ला लाइव के दिनों में अनुराग कश्यप की खूब जयजयकार की जाती थी खेर अनुराग तो हे भी बेमिसाल , मगर हद तो तब हो गयी थी जब अविनाश के मोहल्ला लाइव पर अनुराग के भाई की ”बेशर्म ‘ का भी ——– बचाव किया गया था जो सर्वकालिक घटिया फिल्मो से थी कहने का आशय ये हे की और सब तो अपनी जगह हे मगर आज किसी से भी आज किसी शुद्ध आदर्शवाद शुद्ध उसुलता की उमीद मत कीजिये आज हर कोई अपने अपने हितो चाहतो महत्वाकांशाओ कम्फर्ट ज़ोन का गुलाम हे तो ये बात पहले ही समझ ले ताकि बाद में कोई गहरी निराशा न हो

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  4. सिकंदर हयात

    फिल्म देखि तो नहीं हे मगर इतना तो तय हे की फिल्म ठीक ठाक तो हे ही और पहले प्रयास के हिसाब से अविनाश सफल ही कहा जा सकते हे बाकी इसमें कोई शक नहीं हे की फिल्म को जरुरत से दस गुणा अधिक तारीफ तो मिली ही हे ये तारीफ सबसे अधिक हिंदी वालो ने की हे हिंदी और हिंदी वालो का कितना बुरा हाल हे उन्हें कुछ नहीं मिलता कोई नहीं पूछता , सब जानते ही हे ऐसे में हिंदी वाले फिल्मो की तरफ बड़ी आशा भरी नज़रो से देखते रहते हे उन्हें आस रहती हे की एक दिन हिंदी फिल्म से ही उन्हें भी मन सम्मान यश धन आदि मिलेगा अब अफ़सोस की बॉलीवुड ना हिंदी को न हिंदी वालो को ही ज़रा भी तवज्जो और घास देता हे ऐसे में जैसे ही कोई अपवाद दीखता हे लोग फ़ौरन उसके दीवाने और उससे अच्छे रिश्ते की कोशिश में जुट जाते हे अनुराग कश्यप काबिल तो हे ही लेकिन उन्हें तारीफ और तवज्जो भी हिंदी वालो ने कई गुना अधिक दी क्योकि वो हिंदी वालो को कुछ घास डालते थे अविनाश जी भी उन्ही में से एक थे अब शायद कई लोग अविनाश की तरफ आस लगाए हे इसलिए उन्होंने फिल्म को जितनी बेहतर थी उससे कई गुणा अधिक बेहतर बतया

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