ताबिश सिद्दिक्वि

हाफ़िज़ जी.. अब दुनिया को उल्लू नहीं बना सकते हैं आप!

कल हाफ़िज़ जी मुझ से कहने लगे कि “देखिये.. ताबिश भाई.. इसका मतलब ये निकला कि बहुसंख्यक चाहते हैं कि आतंक का राज हो.. परिणामो से तो यही लगता है”

मैंने कहा “आप पहले ये बताईये कि आप या आपके नदवा (इस्लामिक संस्था) ने आतंकवाद (आतंक के राज) के खात्मे के लिए क्या किया है अब तक.. किस तरह का विरोध किया?”

कहने लगे “क्या बात करते हैं.. आप उर्दू अखबार नहीं पढ़ते.. वहां कितनी मज़म्मत कि थी आलिमों ने”

मैंने कहा “ये गोली आप किस को दे रहे हैं? यहाँ मैं हूँ और आप हैं और कोई दुसरे मज़हब का नहीं है.. ये चार आलिम आपके अखबार में लिख देंगे तो काम बन जाएगा? जो इतनी बड़ी वैश्विक समस्या है उस के लिए अखबार में आर्टिकल लिखने से काम बन जाएगा? वो आतंकवादी आपके अखबार पढ़ते हैं? जब मुहम्मद साहब का कार्टून बनाया गया आप लाखों की तादाद में सड़कों पर उतरे.. तोड़ फोड़ की.. पाकिस्तान और बाग्लादेश में आगज़नी हुई.. ऐसी मज़म्मत हुई कि देश कांप गया.. और अंत में आप ही के लोगों ने जा कर उन कार्टून बनाने वालों को मार डाला.. ये बताईये आप ये सब आतंकवाद के लिए न कर सके कभी? आपने कितने आतंकवादी मारे अभी तक? जैसे कार्टूनिस्ट को ढूंढ के मारा गया वैसे आतंकी भी तो ढूंढ सकते थे एक दो.. एक दो को ही टपका देते कभी.. कब कितने लाख कि संख्या में आप पहुंचे जंतर मंतर पर?”

कहने लगे “ये तो सारा सर आप हम पर इलज़ाम रख रहे हैं.. कहीं हम आतंकवाद फैलाते हैं?”

मैंने कहा “हाफ़िज़ जी.. अब दुनिया को उल्लू नहीं बना सकते हैं आप.. बरसों से धमाके हो रहे थे भारत में.. आज यहाँ ब्लास्ट.. कल वहां ब्लास्ट.. ये क्यूँ हो रहे थे? क्या मानसिकता थी इन ब्लास्ट के पीछे? कौन मुसलमानों के पीछे पड़ा था यहाँ? क्यूँ ये लोग बम फोड़ कर मासूमों को मार रहे थे? आप लोग कब निकले इनके खिलाफ? सारा भारत देखता रहा.. और एक वक़्त तक तो लोगों ने समझ लिया था कि ये शायद उनकी नियति है.. मगर अब वो ये समझ रहे हैं कि जब आतंकवादियों के ही धर्म के लोगों ने अपने आतंकियों को डराया धमकाया नहीं तो अब जब हमारे कट्टर लोगों के डराने धमकाने से बात बन रही है तो फिर सही है.. ऐसे ही लोगों को लाया जाय अब आगे.. पूरे विश्व ने इंतज़ार किया मॉडरेट मुसलमानों का मगर मुसलमान दिन रात सिर्फ इस्लाम ही बचाता रहा और दलील देता रहा.. इंसानियत कभी न बचाई.. और अब विश्व एकजुट है”

हाफ़िज़ जी कहने लगे “मगर ताबिश भाई.. इस्लाम तो सिखाता नहीं है नफरत.. फिर ये आतंकवादी तो नफरत करते हैं सबसे.. ये इस्लाम के मानने वाले तो हो नहीं सकते.. दुनिया इन्हें मुसलमान कहती है और हमे गाली देती है इनके बहाने”

मैंने कहा “आपने कभी अपनी हदीसों को पढ़ा है हाफ़िज़ जी? अब आप दुनिया को और उल्लू नहीं बना सकते हैं.. क्यूंकि सारा इस्लामिक साहित्य इन्टरनेट पर उपलब्ध है.. क्या क्या झुठ्लायेंगे अब? आप हदीसें बचायेंगे कि इंसानियत ये अब आपके ऊपर निर्भर है?”

हाफ़िज़ जी समझ गए कि मैं क्या कह रहा हूँ.. इसलिए चुपचाप सुनने लगे

मैंने कहा “आप नफरत सिखाते हैं.. इस्लाम ने मूर्ति पूजा से मना किया आप मूर्तिपूजकों से नफरत करने लगे.. काफ़िर शब्द को आप गाली जैसा इस्तेमाल करते हैं.. कुरान ने शराब पीने से मना किया आप शराबी से नफरत करने लगे.. सुवर खाने से मना किया आप सुवर खाने वालों से नफरत करने लगे.. कुरान चीख चीख कर कह रहा है कि यहूदी, इसाई आपके ही समकक्ष हैं क्यूंकि उनके पास भी अल्लाह कि किताब है.. मगर आपका दावा ये कि उन्होंने किताब बदल दी और इस बिना पर आप उनसे नफरत करते हैं.. शियों ने क्या बिगाड़ा है आपका? शिया कुरान मानते हैं और पैगम्बर को मानते हैं और आप कि जिद ये है कि खलीफाओं को मानो और हमारी आतंकी हदीसों को मानो.. और वो ये नहीं मानेंगे तो आप उनके मरने पर खुश होंगे.. यहूदी मरेगा आप खुश.. शिया मरा आप खुश.. काफ़िर मरा आप खुश.. आप किसी के जीने में भी खुश होते हैं सिवाए मरने के?”

हाफ़िज़ जी चुप थे.. पहले तो उनकी आखों में खून उतर आया था गुस्से से मगर फिर मेरी बात को ध्यान से सुनने लगे

मैंने कहा “आपने संगीत हराम कर दिया.. ये हराम वो हराम.. जीना हराम कर दिया.. औरतें गाती थीं नाचती थी पैगम्बर के समय.. युद्ध में नाचती थीं.. जीत का जश्न मनाती थीं.. काबा के भीतर 683 तक जीसस और मरियम कि पेंटिंग बनी थी.. जिसे पैगम्बर ने न मिटाने को कहा था.. यानि कि पैगम्बर के दुनिया से जाने के 51 साल तक वो पेंटिंग काबा में मौजूद थी.. मगर बाद के खलीफाओं ने सब मिटा दिया और पेंटिंग हराम कर दी.. सोचिये अगर आपके मदरसे ये बताने लगें बच्चों को कि काबा में रसूल ने जीसस और मेरी कि पेटिंग बनी रहनी दी थी. तो एक झटके में मूर्ति पूजकों के प्रति नफरत ख़तम हो जायेगी.. तेरह साल (13) तक यहूदियों के जेरुसलम की तरफ मुह कर के मुसलमान नमाज़ पढ़ते रहे.. उसके बाद किबला (जिधर मुह करके नमाज़ पढ़ा जाता है) को बदला पैगम्बर ने और मक्का में काबा कि तरफ मुह करके नमाज़ पढ़ी जाने लगी.. 624 में ये बदला उन्होंने और फिर 630 तक मुसलमान उसी काबे कि तरफ मुह करके नमाज़ पढ़ते रहे जिसमे 365 मूर्तियाँ थीं.. 630 में वहां से मूर्तियाँ हटाई गयीं.. मूर्तियों से इतनी नफरत होती तो 6 साल तक पैगम्बर और उनके साथी 365 मूर्तियों वाले काबे के आगे झुकते रहते?

अगर आपके मदरसे ये बताने लगें बच्चों को कि पैगम्बर की “उम्माह” का मतलब यहूदी, इसाई और मुसलमान तीनो थे तो एक झटके में सदियों से चली आ रही यहूदियों और इसाईयों के प्रति नफरत ख़त्म हो जायेगी.. अगर आपके मदरसे ये बताने लगें कि पैगम्बर का पूरा खानदान मूर्तिपूजक था और पैगम्बर भी उसी परंपरा को मानने वाले थे.. और उनके दादा, चाचा ने आखिरी समय तक इस्लाम नहीं माना और जाने कितने लोगों ने नहीं माना और पैगम्बर ने उन्हें कभी दुत्कारा नहीं.. तो एक झटके में मूर्तिपूजकों के प्रति सारी नफरत ख़त्म हो जायेगी.. मगर आप ये पढ़ाएंगे बच्चों को? आप वही हदीसें बताएँगे जिसमे ये कहा जाएगा कि अली ने उन चार लोगों को जिंदा जला दिया जिन्होंने इस्लाम छोड़ दिया था.. आप ये बताएँगे कि कैसे पैगम्बर स्वयं बनू खुरैज़ा के यहूदियों के गले काटे थे और जब थक गए काट काट के तो अली ने काटे.. ये सब आप बताते हैं.. और आप कहते हैं कि आप नफरत नहीं सिखाते हैं?”

मैंने कहा “अभी वक़्त है.. मुसलमान आपकी बात सुनते हैं.. हमारी नहीं सुनते.. आप लोगों ने कौम को ऐसा पागल बना दिया है कि अगर मैं उन्हें कुछ समझाता हूँ तो मुझ से पूछेंगे कि “ताबिश भाई आप ने आज नमाज़ पढ़ी”.. अगर मैं कहूँगा नहीं तो वो कहेंगे कि “जाईये.. आप की बात का क्या भरोसा.. आप नमाज़ पढ़ते नहीं और इस्लाम हमको सिखा रहे हैं”.. ऐसी घुट्टी पिला रखी है आपने अपने लोगों को.. इन्हें दाढ़ी टोपी वाला नेता चाहिए.. इन्हें हर बात में अल्लाह और रसूल और कुरान बोलने वाला नेता चाहिए.. इन्हें डॉक्टर वो पसंद आता है जो पांच टाइम नमाज़ पढ़े.. इन्हें साइंटिस्ट वो चाहिए जो इस्लाम माने.. इसलिए ये हमारी नहीं आप मदरसे वालों कि जिम्मदारी है अब.. आप इन भेड़ों को अब ढंग से हकियें.. इन्हें इंसान बनाईये.. इस्लाम बहुत सीख चुके हैं ये अब इन्हें इंसानियत का पाठ सिखाईये.. और आप नहीं सिखायेंगे तो हर मुल्क और हर मज़हब आज नहीं तो कल आपके मदरसों पर ताले जड़ देगा.. और ये होना है सौ प्रतिशत होना है”

हाफ़िज़ जी ने कहा अब इजाज़त दीजिये.. और कहने लगे “ताबिश भाई.. मैं स्वीकार करता हूँ कि ग़लती हम में है.. और बहुत बड़ी ग़लती है”

Related Articles

19 thoughts on “हाफ़िज़ जी.. अब दुनिया को उल्लू नहीं बना सकते हैं आप!

  1. विकास

    बहुत ही विचारपरक , चिंतनपरक एवं सारगर्भित lekh

    Reply
  2. vijay

    बहुत ही अच्छा ज्ञान बर्धक लेख हर धर्म के लोगों को बिचार करना चाहिए

    Reply
  3. wahid raza

    पहले ही सिकंदर हयात , अफ़ज़ल खान क्या काम थे जो ताबिश सिद्दीकी भी आगये , जाहेलियत और इस्लाम के खिलाफ हवा फैलाने !!! लगता है इस साइट का वहिष्कार करना पड़ेगा !

    Reply
    1. rajk.hyd

      इस्लाम को आलोचना प्रूफ क्यों रखा जाये
      जब की इस्लाम बुनियादी रूप से ही गलत है

      Reply
    2. सिकंदर हयात

      अरे वाहिद साहब साइट का बहिष्कार करके कहा जाईयेगा ————-? पढ़ने की सामग्री हे ही कहा ——- ? कही हो तो हमें भी बताइये——- ? हे ही कहा सोशल मिडिया पर थोड़ी बहुत हे पर उस 10 % अच्छी सामग्री के लिए आपको 90 % गन्द से गुजरना और टाइम खराब करना पड़ता हे . प्रिंट का पतन हो रहा हे चेनलो पर रविश को छोड़ कर लगभग सभी खबीस भरे पड़े हे वेबसाइट्स अभी उभर नहीं पा रही हे पढ़ने और विचार विमर्श के लिए जाये तो कहा जाये — ? वो तो भला हो अफ़ज़ल भाई की जिनकी साइट्स पर ठीक ठाक सामग्री मिल ही जाती हे इसे छोड़ कर कहा जाइएगा वाहिद भाई —— ? ये गीत हमारे वाहिद साहब जैसे ”फौजी भाइयो ” के लिए https://www.youtube.com/watch?v=lNZdQR-fK7c

      Reply
  4. zakir hussain

    देश मे हिंदूवादी ताकतों का इस तेज़ी से उभार, इस देश के लिए बेहद चिंताजनक है. बावजूद इस सबके मेरा मानना है क़ी मुस्लिम समुदाय को, मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई को ही तरजीह देनी चाहिए. बहुसंख्यक हिंदू भी, अगर कट्टर हिंदुत्व से जुड़े नज़र आए, तो भी इसके खिलाफ लड़ाई, उदारवादी हिंदुओं को करने दे, उसे ही इस लड़ाई का चेहरा बनने दे, और हर मुस्लिम कट्टरपंथी से दूरी बनाते हुए, हिंदू समुदाय के उदारवादी तबके को समर्थन दे. ऐसे किसी भी नेता के साथ गोलबंद ना हो, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ज़्याददती पे ही अपनी आवाज़ बुलंद करता हो. लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ स्वरो मे स्पष्टता और मुखरता हो. तब तो इस चिंताजनक उभार को रोका जा सकता है, वरना ये दौर इसी दिशा मे और आगे जाएगा.

    सिकंदर भाई, कई सालो से इस ओर इशारा कर रहे थे कि इसी वजह से लोकसभा चुनावों मे बीजेपी ने 72 सीटो पे कब्जा जमा लिया, और आगे भी ऐसा होगा.

    बंगाल के हवाले से भी, वो आज आगाह कर रहे हैं. समय रहते संभल जाओ.

    इस तरह की टिप्पणियो मे मुस्लिमो से मेरा तात्पर्य, प्रचलित परिभाषा से है. मेरी मुस्लिम से समझ अलग है.

    Reply
    1. dilip

      हिन्दुओ ने कभी कट्टरवादियो को भाव नहीं दिया अगर दिया होता तो भाजपा राज कर रही होती और राम मंदिर भी बन गया होता लेकी जब उसने देखा की मुस्लिम अपना कट्टरपन न तो छोड़ रहा है और न ही उसका विरोध कर रहा है तब उसके पास भाजपा के पास जाने के अलवा और कोई विकल्प नहीं बचता है जब तक मुस्लिम तुस्तिकर्ण ख़तम नहीं होगा और मुस्लिम कोम के उंदर से कट्टर्पन्तियों और आतंकवाद के खिलाफ आवाज नहीं उठेगी तब तक हिन्दुओ का भय ख़तम नहीं होगा

      Reply
  5. सिकंदर हयात

    आज बंगाल जैसे राज्य और ममता जैसी बेहतरीन नेता पर मुस्लिम कटरपंथ का खतरा मंडरा रहा हे न ममता न वाम बंगाल में बढ़ते मुस्लिम कट्टरपंथ पर सख्ती कर सकते हे और इस चक्रव्यूह में वहाँ भी भाजपा और संघ फायदा उठा लेंगे देखा जाये तो भाजपा संघ मोदी वही जित रहे हे जहा जहां या मुस्लिम कटरपंथ भी हे या सामने कोंग्रेस हे ( असम , बिहार दिल्ली में नहीं ) ऐसे में मुसलमानो और सेकुलर लोगो को ही मिलजुल मुस्लिम कटरपंथ को काबू करना ही होगा पाठको पिछले दिनों जाकिर भाई ने और मेने कोशिश की की रविश कुमार जिनका की मुस्लिम समाज में बेहद समर्थन और विश्वसनीयता हमने उनके कान में बात डालने की कोशिश की की वो मुस्लिम समस्याओ और विचार विमर्श को कभी भी अल्पसंख्यक के चश्मे से ना देखे बल्कि उपमहादीप में हिन्दू मुस्लिम कट्टरपंथ के बीच लालकिले से तिरंगा हटाकर हरा या भगवा फहराने के सपनो और साज़िशो से समझे . अल्पसंख्यक अल्पसंख्यक के चक्कर में गलत नतीजे ही नहीं आते रहते बल्कि मुस्लिम समाज के निहित स्वार्थी तत्व भी इसका पूरा फायदा उठाते रहे यहाँ तक की बहुत से मुस्लिम बुद्धिजीवी भी अल्पसंख्यक अल्पसंख्यक की आड़ में अल्पसंख्यक कोटे की मलाई खाते रहे और मुस्लिम कटरपंथ पर जानबूझ कर लापरवाह बने सरदर्दी से बचे रहे ———— ? याद आते हे एक ओमेर अनस भाई ये जे एन यु के रिसर्चर हे 2012 में इनके और विश्वदीपक के एक लेख में मोहल्ला लाइव पर बहस हुई थी लेख का मुद्दा वही था कुछ मुसलमानो पे अत्याचार टाइप मेने वहाँ यही बात रखी थी उन दिनों भी पाकिस्तानी हिन्दू लड़कियों और हिन्दुओ पर ज़ुल्म का मुद्दा बहुत गरम था मेने दोनों से रिक्वेस्ट की साथ साथ ये सब बाते भी समझते रहे स्टेण्ड लेते रहे वार्ना कल को मोदी इसका जमकर फायदा लेने विश्वदीपक ने तो कुछ समझी मगर जे एन यु के अनस टस से मस नहीं हुए अब पिछले साल कैराना के बाद बहुत ही बदतमीज संघी कार्टूनिस्ट जो खुद देखने में गैंडे का कार्टून लगता हे उसने कार्टून बनाया की ”हम पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी हे तुम- हम भारतीय हिन्दू शरणार्थी हे ” तो इन बातो का संघी फौज को ज़बरदस्त फायदा मिला ये न होता अगर हम सही समय पर मुस्लिम कट्टरपंत पर भी सख्त रहते

    Reply
    1. सिकंदर हयात

      मुस्लिम कटरपंथ और उसके प्रभाव को उसमे शोषण के आयाम को न समझा न समझाया बस यु ही भोले भाले अल्पसंख्यक अल्पसंख्यक बन कर कुछ लोग मलाई खाते रहे सेकुलरिज्म की लड़ाई नहीं लड़ी लेकिन नाख़ून कटवा कर शहीद बनते रहे ये तो बात उनकी हे जो फिर भी ठीक ठाक हे औरो की तो पूछिये ही मत पढ़िए http://www.bhadas4media.com/article-comment/12243-munavvar-meeting-modi

      Reply
  6. Mohammad Aslam

    Brothe सिकंदर हयात व Brother Zakir hussain जी मैंने कई बार आप लोगो से ये पूछा हू कि कट्टरपंथी की परिभाषा क्या है?????
    आज कुछ मुसलमान व हिन्दू भाई कहते है की मुसलमान कट्टरपंथी होते है?????
    तो कुछ हिन्दू और मुसलमान भाई कहते है की हिन्दू कट्टरपंथी हो रहे है?????
    आखिर कट्टरपंथी की परीभाषा क्या होती है?????
    क्या मै (मोहम्मद असलम ) या Brothe सिकंदर हयात या Brother Zakir hussain जी या ताबिश सिद्दीकी (जिसका उपरोक्त लेख है) कट्टरपंथी नहीं हो सकते???
    क्योकि ये चारो लोग अपने अपने सोच के अनुसार इस्लाम की परिभाषा बता रहे है ऐसे स्थिति में सही इस्लाम के बारे में अंतिम निस्तारण कहा से होगा, क्योकि उपरोक्त लेख में लेखक ने कुछ मुसलमानों के व्यक्तिगत अमल या कुरीतियो को आधार बनाकर लेख पोस्ट किया है

    Reply
    1. rajk.hyd

      आज के समय में जो दुसरे समुदाय की अंधे तरीके से बुराई ही करता रहे
      उस्को कट्टरवादी सकता है

      Reply
    2. सिकंदर हयात

      असलम भाई इसलिए आपसे रिक्वेस्ट की थी की साइट के सारे लेख और बहस जरूर पढ़ ले इनमे बहुत जरुरी बाते हे ——— ? कट्टरपंथी की परिभाषा हमारे हिसाब से यही हे की जो भी आस्था के आधार पर किसी क्लेश को बढवा दे किसी को सताए दबाये वो हुआ कटरपंथी कट्टरपंथ का मतलब केवल दंगे ब्लास्ट ही नहीं हे इसके और बहुत से आयाम होते हे और हर आयाम में शोषण छुपा हुआ होता हे बहुत से लोग खुद को उदारवादी भी दर्शाते हे मगर अंदर से कट्टरपंथी होते हे और ये शोषण जरूर ही करते हे इसका किसी खास हुलिए से भी लिंक नहीं हे मेरा एक परिचित हे बेहद पढ़ा लिखा हे क्लीनशेव हे में मगर उसे हल्का फुल्का कटरपंथी मानता हु क्योकि वो औरतो की आज़ादी के खिलाफ हे नतीजा उसके घर की लडकिया दसियों सालो से घर में कैद हे इंटर के बाद पढ़ाया नहीं गया शादी हुयी नहीं , इतफ़ाक़ से नहीं हुआ ऊपर वाले का हुकुम अब वो बेचारी लडकिया दसियों सालो से लगातार घर बैठी बिरयानी पका रही हे घर का एक एक तिनका साफ़ रखती हे लेकिन हे तो ये जुल्म ही . तो कटरपंथी ये शोषणकारी लोग होते हे कट्टरपंथी हिन्दू मुस्लिम सभी होते हे पूंजीवादी कटरपंथी भी होते हे और सभी शोषण करते हे लोगो का खून चूसते हे

      Reply
      1. Mohammad Aslam

        Brother सिकंदर हयात जी मैंने एक ऐसा शब्द के बारे में पूछा था जिसका आप और अन्य लोग खूब करते है मै उसकी आसान परिभाषा बताता हु क्या आप इससे सहमत है की नहीं अगर है तो सिर्फ हां में जवाब दीजिये अगर सहमत नहीं है तो कारण बताये लेकिन व्यक्तिगत उदहारण मत दीजियेगा कृपया करके
        ————————————
        कट्टरपंथी कौन होता है ?,
        कट्टरपंथी वह होता है जो सत्य आने के बाद भी सत्य को नहीं स्वीकारता बल्कि यह चाहता है जो उसका विचार है, वही सच मान लिया जाए बिना किसी तर्क के। जिस समाज में यह चलन आम हो जाए, वह विदेशियों का ग़ुलाम हो जाता है या फिर आपस में ही गृहयुद्ध और दंगे शुरू हो जाते हैं।
        ———————————-
        इस प्रवृत्ति के लोग धर्म में होते हैं तो धर्म की मूल भावना का लोप हो जाता है और कट्टरता का दौर शुरू हो जाता है। इस तरह के लोग जब राजनीति में आते हैं तो वहां से भी सत्य और न्याय का सफ़ाया करके बस अपने लिए ही सारी सुविधाएं एकत्र कर लेते हैं।
        ————————–
        धर्म की किताब हो या राजनीति की किताब, ये इंसानों के हाथों के हाथों में ही रहती हैं और बहुत कम ऐसा हुआ कि उनमें इन कट्टरपंथियों ने अपनी सुविधानुसार बदलाव न किए हों !
        धर्म की किताबों जो अनाप शनाप आपको लिखा हुआ मिलता है, वह ऐसे ही ख़ुदग़र्ज़ लोगों का लिखा हुआ मिलता है।

        Reply
        1. rajk.hyd

          धर्म क्या है ?
          किसी भी किताब पर
          किस भी व्यक्ति पर आस्था रखना
          अवह धर्म हर्गिजं नहीं होता है

          कोई बात सत्य इस्लिये नहीं होती की
          ===============
          वह वेद में लिखी है
          गीता में लिखी है
          रामायण में लिखी है
          बाइबल में लिखि है
          या
          कुरान में लिखी है

          कोई बात सत्य इस्लिये नहीं हो जाती की
          =====
          राम ने कहा था
          हनुमान ने कहा था
          कृष्ण ने कहा था
          कोई शिव या गनेश् वाक्य है
          या
          बुद्ध ने कहा था
          महावीर ने कहा था
          नानक- कबीर ने कहा था
          दयानन्द विवेकानन्द ने कहा था
          या
          मूसा इसा इब्राहीम मुहमम्द ने कहा था
          —–
          धर्म वह है
          जो जीवन में अछे गुण अपनाये जाए
          “दुसरे के साथ वही व्यहार करो जो अपने लिए भी पसंद आये ”
          जब हम सबको गाली गलौज पसंद नहि है तो
          स्वयं पहल कर्के किसी कोगाली मत दो
          भले ही गाली अपने को मिलजाए
          पलट करके भी गाली मत दो
          जब हम सब नही चाहते की
          कोई जानवर हमारी संतान जरा सा भी घायल करे
          तो मनुष्य की बुद्धि होते हुये अपने से कम्जोर जानवर कि क्यो हत्या करे
          और क्यों उसका मांस खाए
          सत्य क्या है
          जो तर्कों से
          बहस करके
          जो निचोड़ निकले
          वह सत्य है
          सत्य निरंतर खोज का विषय है
          संभव है की जो सत्य आज लगता हो आगे चलकर वह असत्य हो जाये
          क्योकि निरंतार खोज चलती रहती है आगे भी चलेगी
          सत्य किसी किताब में कैद नहीं हो पाता
          सत्य सरे ब्रह्माण्ड में बिखरा हुआ है
          तो कोई भी खोजि उसको पा सकता है
          =================

          Reply
  7. सिकंदर हयात

    असलम भाई जैसे सोशल मिडिया पर इलाहाबादी ज़ाहिद साहब हे और दूसरे कई मुस्लिम नाम हे जो लिबरल होने का दिखावा करते हे लेकिन अंदर से कटरपंथी हे चाहे एक % हे या दस % हे मगर हे इसलिए ये ज़ुल्म ज़बर के साथ भी खड़े हो जाते हे मुसलमानो में ऐसे लोग बढ़ते ही जा रहे हे इनकी पहचान और इनकी काट नहीं हो सकी हम तो ये सब बहुत पहले ही समझ चुके थे अफ़सोस हालात साज़गार नहीं थे इसलिए कुछ ना कर सके इन्ही लोगो ने हिन्दुओ को भर भर कर मोदी संघी योगी खेमे में धेकेला मेरे कज़िन्स भी कई ऐसे हे इतफ़ाक़ से चुनाव नतीजे से ठीक पहले ही मेरी खासी झड़प हुई थी उसे पूरा विश्वास था की अखलेश ही आएगा मगर जो हुआ ——– ?

    Reply
    1. Mohammad Aslam

      अब अगर किसी भी हिंसावादी व्यक्ति के स्वयं कर्म को उस के धर्म, देश और समुदाय से जोड़ कर देखा जाने लगे तो शायद कोई भी देश धर्म और समुदाय हिंसा और कट्टरता के हीन भावना से मुक्त नज़र नहीं आयेगा क्योंकि दिन के साथ रात का होना स्वाभाविक हैं।
      Brother सिकंदर हयात जी ताबिश सिद्दीकी के लेख इसी दुर्भावना से ग्रसित है

      Reply
  8. सिकंदर हयात

    Sanjay Tiwari
    7 hrs ·
    मुसलमान की बात है तो कौन विरोध करेगा और क्यों? कम से कम मैं तो नहीं करुंगा। लेकिन अगर बात सभ्यता की हो तो मैं कभी भारतीय के लिए अरब की सभ्यता का समर्थन नहीं कर सकता। अरब की सभ्यता अरब के लिए है। उसमें कई ऐसी बातें हैं जो खुद मुझे बेहद पसंद हैं। मसलन, किसी अरबी द्वारा दी जानेवाली अजान। सुनकर ऐसा लगता है जैसे कान में कोई मिस्री घोल रहा है। सुनो तो सुनते रह जाओ।
    लेकिन मैं कितनी भी कोशिश कर लूं मैं अरबी नहीं हो सकता। मसलन अजान को ही ले लें। अजान अरबी जबान के लोगों के लहजे से निकलती है तो सुनने में बहुत कर्णप्रिय लगती है लेकिन उसी की नकल करने की कोशिश जब कोई करता है तो बहुत भौंड़ा लगता है। भारत के लोगों की लहजा कभी अरबी नहीं हो सकता। लहजा हमेशा मिट्टी से जुड़ा होता है। उनका जो कुछ है वह उनके लिए स्वाभाविक है उसकी जो भी नकल करेगा वह अस्वाभाविक हो जाएगा।
    दुर्भाग्य से भारत में अरबी पैसों से पलनेवाले मौलवियों ने इस्लाम की जगह अरबी सभ्यता को सुन्नत घोषित कर दिया है। खान पान, पहनावा, भाषा, रहन सहन जिनका मजहब से कोई मतलब ही नहीं होना चाहिए उसे ही सच्चा इस्लाम बता दिया गया है। यह सब हुआ है इधर के तीस चालीस सालों में। इधर भारत में तो उधर पाकिस्तान में भी। बीस तीस साल पहले बुर्के और हिजाब में कोई दिखता नहीं था आज बीस तीस साल बाद बिना बुर्के और हिजाब के शायद ही कोई दिखता हो। ऊंचा पाजामा, लंबा कुर्ता मुस्लिम ड्रेस घोषित हो ही गयी है। जिस अल्लामा इकबाल ने हिन्दुस्तानी इस्लाम के लिए एक अलग राज्य मांगा था आज वह अरबी इस्लाम का मॉडल स्टेट बन गया है।
    ये सब बदलाव स्वाभाविक तो बिल्कुल नहीं हैं। गंगा और ब्रह्मपुत्र के किनारे पैदा होनेवाले लोग कभी वैसा व्यवहार नहीं कर सकते जैसा थार के मरुस्थल में पैदा होनेवाला करता है। खुद भारत के भीतर इसीलिए एक धर्म होने के बावजूद हिन्दुओं के भीतर दर्जनों संस्कृतियां पलती बढ़ती हैं। लेकिन बतानेवालों ने इतना भ्रम पैदा किया है कि दीन को ही संस्कृति बता दिया है। यही मुसलमान के लिए सबसे बड़ा खतरा है।Sanjay Tiwari· 1 · 3 hrs · Edited
    Nafisul Hasan
    Nafisul Hasan to Sanjay Tiwari ji
    आपकी पोस्ट अच्छी है लेकिनमेरी सलाह है कि किसी बिंदु पर निर्णय लेने से पहले इस्लाम धर्म को अच्छी तरह समझ लीजिए। हो क्या रहा है कि हमारे हिन्दू धर्मगुरु TV चैनल पर बहसों में भी इस्लाम पर अपने अधकचरे ज्ञान के बावजूद अपनी टिप्पणी इस प्रकार करते है जैसे कि
    उन्होंने इस्लाम पर P.hd कर रखी है चाहे मुद्दा वन्दे मातरम गाने का हो या भारत माता की जय का हो।
    इस्लाम अरब में पैदा अवश्य हुआ लेकिन जिन देशों में भी यह फैला उसने वहां की तहज़ीब और सामाजिक सभ्यता को अरबी सभ्यता में नहीं बदला।
    आपकी जानकारी के लिए इस्लाम के 3 श्रोत है। पहला परम पिता परमात्मा या अल्लाह के द्वारा समाज को पैग़म्बर द्वारा दी गई वाणियां (verses/श्लोक) जिसे क़ुरान कहते हैं, दूसरा पैग़म्बर मुहम्मद द्वारा क़ुरान के अनुसार आदेशित अदा की गई इबादतें और जीवन शैली जिन्हें “सुन्नत” कहते हैं और तीसरे पैग़म्बर द्वारा दिए गए प्रवचन जिन्हें “हदीथ” कहते हैं।

    भारत में कोई मुसलमान या मौलवी अरब की सभ्यता या सामाजिक रीती रिवाज का अनुसरण नहीं करता यहाँ हर भारतीय भारत के रीती रिवाजो का ही अनुसरण करता हो कि जैसे विवाह, वैवाहिक आयोजन, दहेज़ प्रथा, परिवारों में लेन देन,
    लड़किओं को पैतृक भूमि में उनका हिस्सा, स्त्रियो और परुषों का पहनावा, (चाहे वह राजस्थान हो या हरियाणा, मणिपुर हो या मिजोरम आदि).
    इस्लाम का अनुसरण करने वाले भारतीय इस्लाम के उन्ही अंगों का अनुसरण करने की कोशिश ,जी हां, कोशिश,नकारते हैं जो आवश्यक है जैसे क़ुरान ,सुन्नत और हदीथ।
    सच कहूँ तो मैं स्वयं भी पूरी तरह से पैग़म्बर की हर सुन्नत अदा नही कर पाता। क्योंकि दुनियावी झंझावात में उलझे ब्यक्ति के लिए थोड़ा मुश्किल ज़रूर है। दूसरी बाटनये की कोई मुसलमान् पैग़म्बर के पैरों की धूल के बराबर भी नहीं हो सकता ( कृपया पैग़म्बर जीवनी पढें)
    रहा सुन्नतों के अनुसरण का चलन तो
    आपकी जानकारी के लिए पैग़म्बर की सुन्नतों यानी उनके पूजा पाठ , रहन सहन , बात चीत करने के तरीकों का अनुसरण उनके शिष्यों/अनुयायों (सहाबा) ने उनके जीवन काल में ही करना शुरू कर दिया था। पैग़म्बर के आदेशों और प्रवचनों जो क़ुरान के आदेशों पर आधारित है और जिनको हदीथ कहते है का अनुसरण भी पैग़म्बर के जीवनकाल में उनके अनुयायुओं द्वरा शुरू हो गया था।
    जहाँ तक मुसलमानों में “हिजाब” या पर्दे के चलन के प्रारंभ होने का प्रश्न है , उसके लिए क़ुरान में हुक्म आया कि औरतें अपने सर के रूमाल (अरब में तब औरतें केवल सर पर ही रूमाल बांधती थी) की लंबाई बढाकर अपने वक्षस्थल तक कर लें या ढीला ढाल कोट जैसा वस्त्र पहने जिस से की उनकी देह का वोह भाग जिस से कि हया का सम्बन्ध है उसका लिहाज़ हो सके।

    मेरी उन सभी हिन्दू भाइयों से हाथ जोड़कर विनती है कि आपसी सौहाद्र बढाने हेतु हर धर्म का आदर करें और किसी भी धर्म पर नकारात्मक टिपण्णी करने से पहले उसके साहित्य और नियमो।का अध्ययन अवश्य कर लें।
    एक सलाह यह भीं कि केवल टी वी चैनलों पर होने वालीं बहसों को देखकर ही किसी धर्मं ,उसके नियमों और उसके मानने वालों के बारे में अपनी धारणा न् बनाये। क्योंकि टी वी पर होने वाली अधिकांश बहसें अपना अपना तर्क और पक्ष जीतने के लिए होती हैं। उन बहसों को टीवी चैनल वाले इसलिए भी आयोजित करते है कि वह विवादित मुद्दों पर हिन्दू और मुसलमानों के धर्म गुरुओं अथवा राजनितिक पार्टिओं के प्रतिनिधियों को अपने उत्तेजित करने वाले प्रश्नों के द्वारा आपस में लड़वाये और अपने चैनल का ज़्यादा से ज़्यादा T R P और लाभ बढा सके।
    याद रहे
    जब जुड़ेगा इंडिया
    तभी आगे बढ़ेगा इंडिया।
    धन्यवाद।

    Reply
  9. सिकंदर हयात

    tabish Siddiqui : कामसूत्र भारत में लगभग 300 BC में लिखी गयी.. उस समय ये किताब लिखी गयी थी प्रेम और कामवासना को समझने के लिए.. कामसूत्र में सिर्फ बीस प्रतिशत ही भाव भंगिमा कि बातें हैं बाक़ी अस्सी प्रतिशत शुद्ध प्रेम है.. प्रेम के स्वरुप का वर्णन है.. वात्सायन जानते थे कि बिना काम और प्रेम को समझे आत्मिक उंचाईयों को समझा ही नहीं जा सकता है कभी.. ये आज भी दुनिया में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली किताबों में से एक हैभारत किसलिए अलग था अन्य देशों से? संभवतः इसीलिए.. क्यूंकि भारत जिस मानसिक खुलेपन की बात उस समय कर रहा था वो शायद ही किसी सभ्यता ने की थी.. मगर धीरे धीरे विदेशी प्रभावों से यहाँ की मानसिकता दूषित हो गयी.. खजुराहो के मंदिर इस्लाम के आने के कुछ ही सौ साल बाद बने.. ये बताता है कि उस वक़्त तक यहाँ अपनी संस्कृति और समझ को स्वीकार करने की हिम्मत थी.. यहाँ तक की भारत की पूजा पद्धति में अभी तक नग्नता पूजनीय है.. जीवन कि उत्पत्ति के अंग पूजनीय स्वीकार किये गए हैं मगर आज वही पूजने वाले शर्माते हैं अगर कोई उनसे सवाल करे तो वो लिंग और योनी के दार्शनिक पहलू समझाने लगते हैं.. ये बताता है कि भीतर से उन्हें ये स्वीकार्य नहीं है.. विदेशी प्रभावों द्वारा ये अपनी परंपरा से शर्मिंदा हैं.. बस परंपरा निभा रहे हैं किस तरहबैन (निषेध) तो भारत ने शायद कि किसी चीज़ पर लगाया हो.. खासकर जहाँ प्रेम कि बात आये वहां तो ये संस्कृति और सभ्यता के हिसाब से एक असंभव बात लगती है.. निषेध की मानसिकता इस्लामिक मानसिकता है.. शराब लोग ज्यादा पियें तो शराब बंद कर दो.. काम (सेक्स) निषेध कर दो.. साथ घूमना.. गले में हाथ डालना.. आलिंगन करना.. ये सब निषेध है इस्लामिक मानसिकता में.. भारत का इस से कोई लेना देना नहीं है.. मगर चूँकि उनसे नफरत करते करते हमने कब उनही की चीज़ें ओढ़ लीं ये पता ही न चल पाया.. साधू और साध्वी हमे जो ब्रहमचारी हों वो अधिक भाने लगे.. इस्लाम के तरह ही जो हर चीज़ के निषेध कि बात करता हो उसे हम सर आखों पर बिठाने लगेसोचिये अगर तालिबान को कामसूत्र दे दी गयी होती पढने को.. और ये कहा गया होता कि ये बिलकुल भी निषेध नहीं है.. जैसे जीना चाहते हो वैसे जियो.. प्रेम तुम्हे किसी से भी हो सकता है और अल्लाह तुम्हारे प्रेम पर पहरा नहीं लगा रहा है.. तो क्या उन्हें किसी हूर कि चाहत होती कभी? यूरोप के लोग क्यूँ नहीं मरते हैं हूर की चाहत में? वो क्यूँ नहीं शराब की नदियों के लिए जन्नत कि कल्पना करते हैं? क्यूंकि उनके लिए ये निरी बेवकूफी भरी बातें हैं.. उनके डिस्को में हूरों की कमी नहीं है.. और ऐसा नहीं है कि वो उनसे रेप कर रहे हों.. मर्ज़ी का सौदा होता है प्रेम का वहां.. शराब उनके यहाँ अथाह है और हर तरह की है.. उन्हें किसी जन्नत की ज़रूरत नहीं है शराब पीने के लिए.. उन्होंने अपने देश को ही जन्नत बना रखा है.. और इसीलिए हर मुल्क का हर नागरिक अमेरिका में रहने के सपने देखता है.. क्या है अमेरिका में? वहां कुछ नहीं है बस आपके जन्नत कि कल्पना को धरती पर साकार कर दिया है उन्होंने.. वहां वो खुलापन है जो कभी भारत में था.. इसीलिए आप मरते हैं वहां जाने के लिए
    भारत अमेरिका हो सकता था.. और अभी भी हो सकता है.. अगर किसी चीज़ की ज़रूरत है हमे तो वो है सख्त कानून और मानवाधिकार.. बाक़ी किसी भी चीज़ पर बैन लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है.. और वैसे भी ये निषेध हमारी संस्कृति के ही विरुद्ध है.. और प्रेम पर बैन तो ये बताता है कि आपको अपने धर्म की रत्ती भर समझ नहीं है.. आप के भीतर सिर्फ इस्लाम की कुंठा भर गयी है बस
    निषेध लोगों को जीवन विरोधी बना देता है.. उन्हें कुंठित कर देता है.. जिन नौजवानों को स्त्री/पुरुष से प्रेम करना है उन्हें आप गाय से प्रेम करना सिखा रहे हैं और जिन्हें इस जीवन में कामसूत्र पढनी चाहिए उन्हें आप हूरों के सपने दिखा रहे हैं.. और ऐसा करके आप सुसाईड बॉम्बर पैदा कर रहे हैं.. एक की परिकल्पना साकार रूप ले चुकी है और वो इस निषेध से तंग आकर अब हूरों से मिलने को लालायित हैं और दुसरे बस तय्यारी कर रहे हैं.. ये बहुत धीरे धीरे होता है मगर आज नहीं तो कल आप उन्हें भी यही समझाने में सफल हो जायेंगे कि कहाँ इन गंदे मांस के लोथड़ों के पीछे पड़े हो.. वहां स्वर्ग की अप्सराओं का सोचो.. और शराब यहाँ नहीं वहां सवर्ग में मिलेगी भरपूर.. यहाँ बस तुम लट्ठ ले कर जैसा हम कहते हैं वैसा करते रहो बस-ताबिश सिद्दकी लखनऊ

    Reply

Add Comment