manohar-shayam-joshiसिकंदर हयात

सवर्गीय वरिष्ठ लेखक पत्रकार और साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी जी ने देश दुनिया में वैश्वीकरण संचारक्रांति आदि आदि से हो रहे नए बदलाव और हालात पर सरल भाषा में काफी कुछ लिखा था जो खूब पसंद किया गया था पेश हे मनोहर श्याम जोशी जी के कुछ विचार जिन पर हम सभी लोगो को चिंतन और विचार विमर्श करना ही चाहिए पेश हे कुछ विचार ”’ रहन सहन का स्तर जितना ऊपर उठ रहा हे अमीरो और गरीबो के रहन सहन में अंतर उससे कही कही ज़्यादा बढ़ रहा हे अमीरो की संस्कर्ति और अमीरो की बोली के सामने गरीबो को अपनी संस्कर्ति और अपनी बोली भी महत्वहीन लग रही हे संपन्न देशो में भी महत्वहीनता एक महामारी का रूप ले चुकी हे . कच्ची उम्र के लड़के लडकिया तक नशे की और झुक रहे हे उपभोग को ही एक महान उपलब्धि मानते हुए वे उपभोग के लिए पैसा अपराध दुआरा कमा रहे हे वे महंगे बाज़ारो और मौज़मस्ती के स्थलों पर भटक – भटक कर व् भांति भांति के नशे कर करके किसी सार्थकता की तलाश करते हे वे इतनी समझ नहीं रखते की जिंदगी के बेमतलब हो जाने पर ही कुछ सोच विचार करे . वे तो धमाकेदार मनोरंजन और बेतुकी हिंसा में ही खुद को भुलाय रखना चाहते हे ” ” आज विज्ञापन एजेंसियों दुआरा मास मिडिया के जरिये नयी पीढ़ी पर उन्मुक्त भोग को समर्पित एक नयी संस्कर्ति थोपी जा रही हे वो भी इतनी तेज़ी से की माँ बाप और संतान एक दूसरे के लिए सांस्कर्तिक दर्ष्टि से अज़नबी बनते जा रहे हे . यह संस्कर्ति उपभोग को समर्पित होने के कारण अमीरो अय्याशों की संस्कर्ति हे , इसके कारण गरीब उसके बाहर हो जाता हे एक ही देश के अमीर और गरीब एक दूसरे के लिए अज़नबी हो जाते हे गरीब को ज़ाहिल ठहराया जाता हे इस तरह हर कही विस्फोटक इस्थिति पैदा हो रही हे ” ” मीडिया उपभोग और मनोरंजन के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा छापता और प्रसारित करता हे अगर किसी नए फैशन को किसी नए उत्पाद को , किसी नयी जीवन शैली को 5 – 6 % लोगो ने भी अपना लिया हो तो वह ऐसे जताता हे की 50 – – 60 % इसे अपना चुके हे और य 50 – 60 % वो हे जिनकी गिनती ऊँचे और पहुंच वाले लोगो में की जाती हे इस तरह की बाते कर कर के वह अंततः अगर 100 नहीं तो 50 – 60 % लोगो को उस नयी चीज़ का कायल बना ही देता हे बाजार विशेषज्ञ और मीडिया दोनों ही गंभीरता और श्रेष्ठता और सुरुचि तीनो का विरोध करते क्योकि ये ग्राहक को अपना पूरा जीवन उपभोग के लिए ही समर्पित कर देने से रोक सकती हे ” ” फ़्रांसिसी समाजशास्त्री एमिली दुर्हिम ने बहुत पहले ही य आशंका व्यक्त कर दी थी की अगर समुदाय की व्यक्ति से बड़ी कोई सत्ता नहीं रही और व्यक्तियों को आपस में जोड़ने वाले कोई सामाजिक मूल्य न बचे तो व्यक्ति और समाज दोनों ही अराजकता और आत्मघात की दिशा में बढ़ने लगेंगे आज हर और वैसा ही होता देख रहा रहे हे आर्थिक और सामाजिक विषमताय बढ़ रही हे एक और जहा दुनिया तेज़ी से सिमट रही हे वही दूसरी और इंसान और इंसान के बीच आर्थिक और सामाजिक फैसले बढ़ रहे हे और दूसरे के प्रति आदर एवं करुणा भी ख़त्म होती जा रही हे जहा देखिये मामूली से मामूली बात पर छोटे मोटे महाभारत मचते रहते हे और मानवीय सरोकारों को भुला दिया जाता हे ” नवपूँजीवाद आज हर इंसान को यह सीख दे रहा हे की जीवन का सारा अर्थ अर्थोपार्जन में ही सीमित हे तो कमर कसो और दुसरो को पछाड़ने और पीछे छोड़ने की निर्मम प्रतियोगिता में जी जान से जुट जाओ और उसमे न बेईमानी से परहेज़ करो न बदतमीजी से . जो इंसान ऐसा नहीं कर पाता या करने के बावजूद भी टॉप पर नहीं पहुंच पाता हे वह दूसरे की क्या खुद अपनी नज़रो में गिर जाता हे . महत्वहीनता में खोय इस आम इंसान को कही से सहज मानवीय करुणा का स्पर्श मिलने की भी कोई गुंजाईश नहीं हे क्योकि नवपूँजीवादी जीवन दर्शन में में भाईचारे को स्वार्थपूर्ति के लिए दौड़ते पांवो तले कुचल दिया हे और एक कुरूर और अमानवीय समाज रच डाला हे आम इंसान इसमें महत्वहीनता के गम को गलत करने के लिए मुटाते जाने से लेकर आतंकवादी बन जाने तक तरह तरह के उपाय आज़मा रहा हे ” ”

आधुनिकता इंसान को हर तरह के बोध से काटकर स्वामित्व के बोध से जोड़ देती हे वह चीज़ो को तभी अपना समझ पता जबतक की वह उसकी अपनी पूंजी हो वाही उन्हें खाता पीता और बरतता रहे दूसरे नहीं . आधुनिकता की यह पूंजीवादी व्याख्या इंसान को इंसान से जोड़ नहीं सकती . वह तो हर इंसान को अलगाव का भाव ही पैदा कर सकती हे आज इस्तिति यह हे की जिस रफ़्तार से अमीरी बढ़ रही हे उससे कही अधिक रफ़्तार से इंसान में ओछापन बढ़ रहा हे ”जिन वैज्ञानिको ने अगले पचास वर्षो के बारे में अपने अनुमान प्रकाशित कराय हे उनमे इस बात पर पूरी सहमति हे की बच्चो में डिप्रेशन उर्फ़ आत्मघाती उदासी का रोग बढ़ता ही चला जाएगा इसलिए 2050 तक उदासी की महामारी हर कही फेल जायेगी और आत्महत्या एक बड़ी वजह बन जाएगी मृत्यु की ” ” सुख सुविधा बढ़ने से दुःख दुविधा क्यों बढ़ रही हे इसलिए की इंसान सुख को संतोष के साथ जोड़ता आया हे और प्रगति विश्वासी आधुनिकता संतोष को अवगुण मानती हे वह हमें सिखाती हे की भौतिक सुख साधन जुटाने के लिए संघर्ष करते रहे इस होड़ में विफल होने वाला तो दुखी होता ही हे सफल होने वाला भी उदास रहता हे ” ”टीवी के धारावाहिक और समाचार दोनों दिन रत सेक्स हिंसा और बर्बरता परोसते रहते हे और इस अहसास को बढ़ाते हे की दुनिया एक बड़ी बेरहम सी चीज़ हे और इंसान सबसे गन्दा जानवर . यह अहसास तनाव और बेबसी को बढ़ाता हे और उनसे पैदा होते वे नए रोग जो पुराने रोग को मिटा चुकी आधुनिकता की अपनी देंन हे आत्मघाती उदासी इन नए रोगो में प्रमुख हे ” ” संकेत मिलता हे की हर क्षेत्र में विरोधाभासों का बोलबाला हो जाने से धर्म को ही ले लोगबाग आचरण में धर्मसम्मत नैतिकता से जितना दूर हो रहे हे उतना ही इनमे धार्मिक ढोंग और उग्रता जोर पकड़ रही हे . तंत्र मन्त्र जादू टोन और फलित ज्योतिषी आदि में जनरुचि बढ़ रही हे ग्लैमरदार गुरुओ की दुकाने टीवी चैनेल धड़ल्ले से चल रहे हे ”