by — गौस सिवानी

जल्द ही दुनिया की अधिकांश आबादी मुसलमान होगी और सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश भारत है। यूरोप में ईसाई अल्पसंख्यक होंगे और मुसलमानों की आबादी अधिक बढ़ चुकी होगी। दुनिया के सभी देश कलमा ए तौहीद पढ़ने वालों से परिपूर्ण होंगे और मुसलमान गर्व से कह सकेंगे कि:

चीनो अरब हमारा, हिन्दोस्तां हमारा
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहां हमारा

मगर सवाल यह है कि जब दुनिया में मुस्लिम आबादी में नंबर एक होंगे तब क्या वह शिक्षा में भी पहले नंबर पर होंगे? विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भी वह सबसे आगे होंगे? सैन्य शक्ति उनके पास सबसे अधिक होगी? राजनीतिक सूझबूझ और दीनी और नैतिक चेतना में भी सारी दुनिया पूर्ववर्ती होंगे या तब भी किसी अमेरीका ही का राज होगा और मुट्ठी भर यहूदी दुनिया पर राज कर रहे होंगे? जिस तरह अरब देशों के संसाधनों पर आज अमेरिका और यूरोप का कब्जा है उसी तरह मुस्लिम देशों के संसाधनों पर पश्चिमी ताकतें काबिज रहेंगी? भारत में मुसलमान दलितों से बदतर ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं और उनका जीवन स्तर तेजी से गिरता जा रहा है, इसी तरह और अधिक गिरेगा और मध्य युगीन दलितों के स्थान पर पहुँच चुके होंगे? जिस तरह पांच हजार साल तक दस प्रतिशत ब्राह्मणों ने नब्बे प्रतिशत आबादी पर राज किया इसी तरह मुसलमानों की गर्दन पर सवार होंगे और मुसलमान गुलामों की तरह जीवन व्यतीत कर रहे होंगे? प्यू रिसर्च सेंटर ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में मुसलमानों की आबादी बढ़ने की अटकलें तो की है मगर उन सवालों का कोई जवाब नहीं दिया है जिन्हें हम उठा रहे हैं। उसने यह भी नहीं बताया कि जिस तरह से अरब देशों में मुसलमान ही मसलक के नाम पर मुसलमानों की गर्दनें काट रहे हैं, उस समय भी काटते रहेंगे? जिस तरह इराक और सीरिया में ‘आईएस’ खून खराबा कर रहा है करता रहेगा? जिस तरह मिस्र में इस्लाम दुश्मनों के इशारे पर लोकतंत्र की जड़ें खोदी जा रही हैं, खोदी जाती रहेंगी? जिस तरह सऊदी अरब में इस्लाम के नाम पर नागरिकों का नातेक़ा बंद किया जा रहा है और महिलाओं की जीवन दुभर की जा रही, ये जारी रहेगा? जिस तरह पाकिस्तान की मस्जिदों में बम फट रहे हैं फटते रहेंगे ? जिस तरह अफगानिस्तान से अफ्रीका तक इस्लाम के नाम पर संकीर्णता का दौर दौरा है, जारी रहेगा?

प्यू रिसर्च का कहना है: भारत वर्ष 2050 तक दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश हो जाएगा और इस मामले में वह सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया को पीछे छोड़ देगा जबकि उस समय तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आबादी हिंदुओं की हो जाएगी। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा गुरुवार को जारी धर्म से संबंधित अनुमानों के आंकड़ों के अनुसार दुनिया की कुल आबादी की तुलना में मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ने का अनुमान है और हिंदू और ईसाई आबादी वैश्विक जनसंख्या वृद्धि की गति के अनुसार रहेगी। इसमें कहा गया है कि भारत हिंदू बहुल देश बना रहेगा लेकिन वह इंडोनेशिया को पीछे छोड़ते हुए दुनिया में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश बन जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार भारत की 717 करोड़ मुस्लिम आबादी की तुलना में अभी इंडोनेशिया में करीब 520 करोड़ आबादी है। तदनुसार अगले चार दशकों में ईसाई सबसे बड़ा धार्मिक समूह बना देंगे लेकिन इस्लाम किसी अन्य बड़े धर्म की तुलना में तेजी से बढ़ जाएगा।

बराबर हो जाएगी मुसलमानों और ईसाइयों की आबादी: प्यू रिसर्च की रिपोर्ट में भविष्यवाणी की गई है कि वर्ष 2050 तक इतिहास में पहली बार मुसलमानों (2.8 अरब या जनसंख्या का 30 प्रतिशत) की संख्या और ईसाइयों की संख्या (2.9 अरब या जनसंख्या का 31 प्रतिशत) लगभग इसी तरह की होगी। इसमें कहा गया है, मुसलमानों की आबादी दुनियाभर में ईसाइयों के करीब होगी और अगर यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो 2070 के बाद इस्लाम सबसे लोकप्रिय धर्म होगा। साल 2050 तक मुस्लिम यूरोप की आबादी के करीब 10 प्रतिशत होंगे जो 2010 के 5.9 प्रतिशत से अधिक होगा। प्यू रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार हिंदुओं की आबादी दुनिया भर में 34 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है जो एक अरब से कुछ ज्यादा बढ़कर 2050 तक लगभग 1.4 अरब हो जाएगी। इसमें कहा गया है कि वर्ष 2050 तक दुनिया की कुल आबादी में तीसरे स्थान पर हिंदुओं की आबादी होगी। वह दुनिया की कुल आबादी का 14.9 प्रतिशत होंगे। इसके बाद वे लोग होंगे जो किसी धर्म को नहीं मानते। उन लोगों की संख्या 13.2 प्रतिशत होगी। फिलहाल किसी भी धर्म में विश्वास न रखने वाले लोग दुनिया की कुल आबादी में तीसरे स्थान पर हैं। उस अवधि तक यूरोप में हिंदुओं की आबादी करीब दोगुनी होने की उम्मीद है। यह मुख्य रूप से आव्रजन के चलते करीब 28 लाख 40 प्रतिशत हो जाएगी।

ब्रिटेन में ईसाई अल्पसंख्यक धर्म बनेगा: उत्तरी अमेरिका की आबादी में हिंदुओं की संख्या अगले दशकों में लगभग दोगुनी होने की उम्मीद है, बौद्ध एकमात्र ऐसा धर्म है जिसके अनुयायियों के बढ़ने की संभावना नहीं है। ऐसा इस धर्म के अनुयायियों के वृद्ध होने और बौद्ध देशों (चीन, जापान और थाईलैंड) में स्थिर प्रजनन दर की वजह से होगा। अध्ययन में यह भी अनुमान है कि 2050 तक हर नौ ब्रिटिश में एक मुसलमान होगा। वहाँ ईसाई अल्पसंख्यक धर्म बनने वाला है। अनुमानों के अनुसार ईसाई के रूप में पहचान रखने वाली ब्रिटेन की जनसंख्या 2050 तक लगभग एक तिहाई रह जाएगी और यह मात्र 45.4 प्रतिशत होगी।

एशिया में दुनिया की 62 प्रतिशत मुस्लिम आबादी: पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तशरीफ़ आवरी अरब की धरती पर हुई। इस लिहाज से यह धरती मुसलमानों के लिए हमेशा सम्मान योग्य रही। यहीं कुरान उतारा गया और यहीं से इस्लाम का संदेश पूरी दुनिया में फैला। इस ऐतिहासिक तथ्य से इनकार संभव नहीं, लेकिन मौजूदा दुनिया को देखा जाए, तो मुसलमानों के बहुमत गैर अरब है। मुसलमान यूं तो सारी दुनिया में रहते हैं। दुनिया का कोई हिस्सा ऐसा नहीं, जो बादा ए तौहीद के मतवालों(मुसलामानों) का निवास स्थान न हो। अफ्रीका के तपते रेगिस्तानों से लेकर यूरोप की बर्फीली वादियों तक, हर जगह मुसलमान फैले हुए हैं, लेकिन उनकी बहुमत एशिया में रहती है और वह भी अरब के बाहर रहती है। सभी अरब देशों की आबादी का मिश्रण किया जाए तो भी वह कुल मिलाकर इंडोनेशिया की आबादी के बराबर न पहुंचें। इसी तरह जनता पर प्रभाव डालने वाली हस्तियों में अधिकांश का संबंध भी गैर अरब इलाकों से ही है। अधिकांश मुसलमान भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, अफगानिस्तान और पूर्व सोवियत संघ के इलाके में रहते हैं। अगर देखा जाए तो सभी मुसलमानों में लगभग 80 प्रतिशत का नाता इन्ही देशों से है। इस तरह यह एक सबसे शक्तिशाली मुस्लिम क्षेत्र है। यह अलग बात है कि मुसलमानों ने कभी शक्ति का एहसास नहीं किया और हर मामले में उनकी नज़र अरब देशों की ओर उठती है। वह चाहते हैं कि उनका नेतृत्व अरब के आलिम ही करें। हालांकि जिस तरह से गैर अरब क्षेत्र मुसलमानों के बहुमत के निवास हैं इस तरह बड़े बड़े नेता, विद्वान और बड़े संस्थान भी गैर अरब एशियाई देशों में ही हुए। मौलाना अशरफ अली थानवी, मौलाना कासिम नानोतवी, मौलाना अहमद रज़ा खान बरैलवी (आलाहजरत), मौलाना मोहम्मद अली जौहर, अल्लामा इकबाल, मौलाना अबुल आला मौदूदी, मोहम्मद अली जिन्नाह, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना अहमद नूरानी, सर सैय्यद अहमद खान, सैयद अमीर अली, डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम, डॉक्टर अब्दुल क़दीर खान, काजी नजरुल इस्लाम आदि वे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक और देर तक रहनें वाले प्रभाव छोड़े। ये सभी गैर अरब और दक्षिण एशिया से संबंधित हैं।

दक्षिण एशिया के शैक्षणिक संस्थान पाकिस्तान, बांग्लादेश और अन्य देशों में कई बड़े बड़े विश्वविद्यालय और मदारिसे इस्लामिया हैं। भारत जहां आम तौर पर मुसलमानों की सरकार से शिकायतें रहती हैं ‘यहां भी कई बड़े संस्थान हैं’ जो विभिन्न अनुभाग के विशेषज्ञ पैदा कर रहे हैं और यहां अरब के छात्र भी लाभ उठानें के लिये आ रहे हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और हमदर्द विश्वविद्यालय भारत में मुसलमानों के महान शिक्षण संस्थान हैं, जहां समकालीन और आधुनिक तकनीकी शिक्षा दी जाती है। इसके अलावा दीनी तालीम के लिये यहां विश्व प्रसिद्ध दारुल उलूम देवबंद है, जहां अफ्रीका, यूरोप से भी छात्र आते हैं। अल जामियातुल अशरफिया मुबारकपुर, नदवतुल उलेमा लखनऊ, अल सकाफतुल सुन्निया कालीकट, अल जामियातुल फलाह बिलरियागनज आजमगढ़, अल जामिया तुल इस्लाह सराय मीर आजमगढ़, मज़ाहिर ए उलूम सहारनपुर और जामिया सलफिया बनारस ऐसे धार्मिक शिक्षण संस्थान हैं, जिनके नाम जामिया अज़हर (मिस्र) के बाद लिए जाते हैं, जो इस्लामी विषयों पर काम करते हुए अपने जीवन व्यतीत करते हैं। इस प्रकार के मदरसे दक्षिण एशिया में बड़े पैमाने पर रहे हैं, जहां अरब वाले भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते हैं।

गैर अरब मुसलमान शिक्षा में आगे: खास बात यह है कि अरब मुसलमानों से गैर अरब मुसलमानों में साक्षरता की दर अधिक है, इसलिए उनके अंदर प्रभावित करने की क्षमता भी अधिक है। अरब देशों में धन की बहुतायत है, क्योंकि वहां की जमीन ” तरल सोना ” उगलती है। जहां लोगों के पास विलासिता के सामान मौजूद हैं। अगर वह अपने धन का सकारात्मक उपयोग करते, तो वह ज्ञान, कौशल और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में यूरोप से आगे होते, मगर अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ। इस लिहाज से देखा जाए तो एशिया के गैर अरब देशों में रहनेवाले मुसलमानों की माली हालत चाहे बहुत अच्छी ना हो मगर वे अन्य क्षेत्रों में अरबों से बहुत आगे हैं। आज जिस कदर विद्वान और हुनर वाले दूसरे इलाके के मुसलमानों में पैदा हो रहे हैं ‘अरब में नहीं होते। सऊदी अरब में साक्षरता दर 77 प्रतिशत है, जबकि इराक में 74 प्रतिशत है। यह दोनों बहु आबादी वाले अरब देश हैं। उनके मुकाबले इंडोनेशिया और मलेशिया में साक्षरता दर 100 प्रतिशत के आसपास है ‘कुछ ऐसी ही स्थिति सोवियत संघ से मुक्त होने वाले मुस्लिम देशों का है। ज़ाहिर है कम्युनिस्ट शासन ने उन्हें इस्लाम से दूर कर दिया है मगर बहुत तेजी के साथ इन देशों में जागरूकता की लहर आ रही है। बांग्लादेश और अफगानिस्तान में साक्षरता दर कम है।

बहु मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र: प्यू फोरम की 2010 की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र है। यहाँ दुनिया की 62 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है। यहां की कुल आबादी का 24.8 प्रतिशत हिस्सा मुसलमान है, यानी यहां का हर चौथा व्यक्ति मुस्लिम है। प्यू फोरम की यह रिपोर्ट 2010 में सामने आई थी और संभावना जताई गई थी कि यहां जिस तरह से मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है, भविष्य में उनकी आबादी का अनुपात बढ़ सकता है। उल्लेखनीय है कि एशिया में अधिकांश मुस्लिम आबादी वाले देश आते हैं जिनमें इंडोनेशिया, मलेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, उजबेकिस्तान, ईरान, तुर्की और चीन शामिल हैं। यूं तो सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश इंडोनेशिया है, लेकिन दक्षिण एशिया की 90 प्रतिशत मुस्लिम आबादी भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहती है। मुसलमानों की बड़ी आबादी वाले देशों में चीन और भारत शामिल हैं। यह अलग बात है कि बड़ी आबादी के बावजूद यहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। जहां मुसलमानों के हाथ में सत्ता है, वहां कुछ समस्याएं ज़रूर हैं। मगर पहचान की समस्या नहीं है। लेकिन भारत और चीन जैसे देशों में हालांकि करोड़ों मुसलमान हैं, लेकिन वहां उनके साथ पहचान की समस्या भी है और वह अपने अस्तित्व को दूसरों से अलग पहचान के साथ बाकी रखने की जिद्दो जहद कर रहे हैं। इसमें उनकी सहायता करते हैं वह इस्लामी शिक्षण संस्थान , जिनका गठन ही इस्लामी शिक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए होता है।

मुसलमान पूरी दुनिया में करोड़ों की संख्या में फैले हुए हैं। विशेष रूप से वे एशिया में अधिक घनी आबादी रखते हैं, लेकिन वर्तमान में उनकी न तो कोई वैश्विक नेतृत्व बन पाई है और न ही क्षेत्रीय नेतृत्व। वह जहां कहीं भी बिना किसी नेता के जीवन बिता रहे हैं, मुस्लिम बहुल देशों में तो खानों में बटे हुए हैं। इसी तरह उन देशों में जहां वे अल्पसंख्यक हैं, नेतृत्व की कमी के कारण अस्थिर समस्याओं से जूझ रहे हैं। हालांकि उनके कई व्यक्ति विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं और प्रभावित करते हैं, मगर सभी मुसलमान उन्हें अपना नेता मानने को तैयार नहीं।

लोकप्रिय हस्तियाँ: एक वैश्विक संस्था The Royal Islamic Strategic Studies Centre

रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 500 प्रभावित करने वाली मुस्लिम हस्तियों में से कई लोग एशिया के हैं। हालांकि इस सूची में अधिकांश मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष हैं, लेकिन कुछ गैर राजनीतिक हस्तियाँ भी हैं। ऐसी हस्तियों में पाकिस्तान के तबलीगी जमात के अमीर हाजी मोहम्मद अब्दुल वहाब, इंडोनेशिया के मुस्लिम संगठन नह्दतुल उलेमा के चेयर मैन डॉक्टर एच सैयद अकील सरादी, भारत के अहले सुन्नत के पेशवा मुफ्ती अख्तर रजा खां अज़हरी मियां, मारहरा शरीफ की खानकाहे बरकातीया के सज्जादा नशीन मौलाना सैयद मुहम्मद अमीन मियां, पाकिस्तान के मौलाना मुहम्मद तक़ी उस्मानीं, जमीअत उलेमा ए हिंद के नेता और सांसद मौलाना महमूद मदनी, बोहरा समुदाय के धार्मिक पेशवा सैयदना बुरहानुद्दीन (अब वह दुनिया में नहीं रहे) शामिल हैं। ज़ाहिर है यह सभी लोग एक विशेष वर्ग या किसी विशेष विचारधारा को ही स्वीकार्य हैं। दूसरा वर्ग उन्हें स्वीकार नहीं करता। यही कारण है कि मुसलमानों की एक बड़ी भीड़ के बावजूद यहां वे बिखरे हुए हैं और उनके अधिकांश समस्याओं का कारण उनकी यही अराजकता है। ज़ाहिर है सैयदना बुरहानुद्दीन का प्रभाव क्षेत्र बोहरा समुदाय तक सीमित है। इस तरह हाजी मोहम्मद अब्दुल वहाब के प्रभाव तबलीगी जमात के लोगों तक ही हैं। मौलाना सैयद मोहम्मद अमीन मियां और मुफ्ती अख्तर रजा खां अज़हरी मियां अपने मुरीदीन में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं, तो मौलाना महमूद मदनी की लोकप्रियता जमीअत उलेमा ए हिंद तक ही सीमित है। इन लोगों को दूसरे मसलक (समूह) के लोग स्वीकार नहीं करते, बल्कि उन्हीं लोगों की स्वयं की विचारधारा में ही कई समूह हैं, जो उन के विरोध में आवाज बुलंद करते रहे हैं। एक छोटे से वर्ग में लोकप्रियता के बावजूद यह लोग लोकप्रिय पेशवा हैं, लेकिन अफसोस कि मुसलमानों में एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं, जो हर वर्ग के लोगों के लिए स्वीकार्य हो।

यह मुसलमान हैं?: इस समय महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि मुसलमानों की आबादी दुनिया में कम होगी या अधिक? महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वे दुनिया को कितना प्रभावित करने की क्षमता वाले होंगे? आज की दुनिया में प्रभावित करने के लिए ज्ञान और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में विशेषज्ञता की ज़रूरत है और हम देख रहे हैं कि मुसलमान इन क्षेत्रों में सारी दुनिया से पीछे हैं। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ्रीकी देशों के मुसलमान गरीब हैं और उनके पास शैक्षिक संस्थानों की कमी है तथा वित्तीय संसाधन नहीं हैं फिर भी वह समय के साथ आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं मगर अरब मुसलमानों के पास धन की मुद्रास्फीति है। वे बड़े शैक्षिक संस्थान स्थापित कर सकते हैं और साइंसी जांच में पूंजी लगा सकते हैं, लेकिन जो स्थिति सामने है, वह अधिक खुश करने वाली नहीं है।

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