प्रश्न: हाल के वर्षों के दौरान कई देशों में मुस्लिम विरोधी भावनाओं में वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए पश्चिम में मुसलमानों को रेस्तरां से रोके जाने और उन्हें शारीरिक और मौखिक रूप से यातना दिए जाने के मामले सामने आए हैं। गलत शक के आधार पर मुसलमानों को विमान से उतरने के लिए कहा गया। मुस्लिम महिलाओं को नकाब पहनने की वजह से उनको नौकरी से निकाला जा रहा है। क्षेत्रीय गैर मुस्लिम अपने क्षेत्रों में मस्जिद निर्माण के प्रस्ताव के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, आदि।

आपको क्या लगता है कि उनके बढ़ते मुस्लिम विरोधी भावनाओं के कारण क्या हैं?

उत्तर: इसका जवाब पवित्र कुरआन की इस आयत के अध्ययन से प्राप्त किया जा सकता है। इस आयत में कुरआन का फरमान है: “और उस प्रलोभन से डरो जो विशेष रूप से केवल उन ही लोगों को नहीं पहुंचेगा जो तुम में से ज़ालिम हैं।”

अगर हम इस आयत का अध्ययन करें और इसका अनुपालन मुसलमानों की वर्तमान स्थिति से करें तो हमें इस बात का अंदाजा हो जाएगा कि आज दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है वह “मुस्लिम विरोधी” भावनाओं की वजह से नहीं हो रहा है, बल्कि यह खुद मुसलमानों की नकारात्मक गतिविधियों की प्रतिक्रिया है।

मुसलमानों का कहना है कि यह आतंकवादी सरगर्मियां केवल कुछ मुसलमान कर रहे हैं और इसमें पूरी मुसलमान कौम शामिल नहीं है। मुसलमानों का यह दावा हो सकता है कि सही हो लेकिन इस समस्या का दूसरा गंभीर पहलू यह भी है कि आज तक मुसलमानों ने खुलकर स्पष्ट शब्दों में आतंकवाद से अपनी त्याग की घोषणा नहीं की है। मैंनें पूरी मुस्लिम दुनिया में एक मुसलमान को भी मुसलमानों के इन नकारात्मक गतिविधियों की खुलकर निंदा करते हुए नहीं देखा है। अगर कोई इस विषय पर कुछ बोलता भी है तो उसकी बातें अस्पष्ट होती हैं। उदाहरण के रूप में वे कहते हैं कि “हां यह सही है कि मुसलमान आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं लेकिन उनकी ये गतिविधियाँ एक प्रक्रिया का प्रतिक्रिया है, और वह अपने खिलाफ भेदभावपूर्ण रवैये के खिलाफ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं”। निश्चित रूप से इस प्रकार की निंदा कोई निंदा नहीं है। बल्कि यह तो अप्रत्यक्ष रूप में मुसलमानों की हिंसक गतिविधियों को औचित्य प्रदान करना है।

अगर तथ्यों का विश्लेषण किया जाए तो हमें यह मालूम होगा कि जो उदाहरण अभी आपने दिया है वह भेदभाव की श्रेणी में नहीं आती हैं। लेकिन यह स्थिति खुद मुसलमानों के संदिग्ध व्यवहार का परिणाम है। इस भेदभाव के जिम्मेदार खुद मुसलमान ही हैं। एक हदीस के अनुसार, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि “खुद को संदिग्ध होने से बचाओ”। चूंकि मुसलमान गलत गतिविधियों में शामिल मुसलमानों का खुलकर इनकार नहीं करते हैं इसलिए इस समुदाय के अन्य लोगों को भी “भेदभाव” का सामना करना होगा। अगर मुसलमान गलत गतिविधियों में शामिल मुसलमानों की खुलकर निंदा करते तो “भेदभाव” का सामना केवल उन्हीं मुसलमानों को करना पड़ता जो उन गलत गतिविधियों में लिप्त हैं।

प्रश्न: हो सकता है कि कुछ मुसलमान मुस्लिम विरोधी भावनाओं का जवाब उसके खिलाफ प्रदर्शन करके और भेदभाव की निंदा करके दें।उदहारण के रूप में हो सकता है कि वह इस रेस्तरां के बहिष्कार का आंदोलन छेड़ दें जिनसे उन्हें रोका गया है।या वे इस बात की मांग कर सकते हैं कि जिस एयरलाइन कंपनी के कर्मचारी ने मुस्लिम यात्री को गलत शक के आधार पर आतंकवादी समझकर विमान से उतार दिया था वह माफी की घोषणा करे। या वे इस बात की भी मांग कर सकते हैं कि सभी देश मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव को रोकने के लिए सख्त कानून बनाएं।

मुस्लिम विरोधी भावनाओं का मुकाबला करने के लिए इस प्रक्रिया के बारे में आपकी क्या राय है?

उत्तर: यह सभी मुद्दे प्रकृतिक विधि के कारण हैं। उनकी समस्या यह नहीं है कि सभी देश मुसलमानों के प्रति भेदभाव के खिलाफ कानून पारित करें। इस स्थिति में मुसलमानों के पास केवल दो ही रास्ते हैं। पहला रास्ता यह है कि वे इस बात की घोषणा करें कि वे एक ही समुदाय नहीं, बल्कि प्रत्येक मुसलमान का मामला अलग है। और इस तरह अगर एक मुसलमान के साथ कोई समस्या है, तो मुसलमान सामूहिक रूप में इसे अपना मुद्दा नहीं मानेंगे बल्कि उसे केवल एक विशेष मुसलमान की समस्या मानेंगे। यदि मुसलमान ऐसा नहीं कर सकते और वह खुद को एक उम्मत मानते हैं तो उन्हें उन लोगों की खुलकर स्पष्ट शब्दों में निंदा करनी होगी जो नकारात्मक गतिविधियों में लिप्त हैं। अगर वह उन की निंदा नहीं करते हैं तो निश्चित रूप से उन नकारात्मक गतिविधियों से पूरी दुनिया यह निष्कर्ष करेगी कि पूरी उम्मते मुस्लिमः इसके लिए जिम्मेदार है, इसलिए कि खुद मुसलमान कहते हैं कि हम सभी मुसलमान एक उम्मत के लोग हैं।

अपने प्रश्न में भेदभाव का जो उदाहरण आपने दिया है वह रोजाना की जिंदगी में धर्मनिरपेक्ष लोगों के साथ भी पेश आती हैं, लेकिन पूरी धर्मनिरपेक्ष दुनिया उसे “धर्मनिरपेक्ष समुदाय” मुद्दा नहीं मानती है।धर्मनिरपेक्ष दुनिया में हर इंसान के साथ भेदभाव का व्यवहार किया जाता है। और चूंकि “धर्मनिरपेक्ष उम्मत” की कोई कल्पना नहीं है इसलिए जब ऐसी कोई समस्या धर्मनिरपेक्ष लोगों के साथ साथ पेश आती है तो धर्मनिरपेक्ष लोगों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचता है, इसलिए कि धर्मनिरपेक्ष लोग खुद को एक ही समुदाय नहीं मानते हैं । वह उसे एक ही व्यक्ति की समस्या मानते हैं जिसके साथ यह हुई लेकिन जब ऐसे मामले मुसलमानों के साथ पेश आते हैं तो पूरे मुस्लिम समुदाय की भावना आहत हो जाती हैं। जो एक मुसलमान के साथ बीतता है उसका प्रभाव पूरे मुस्लिम समुदाय पर पड़ता है। यही कारण है कि जब कोई एक मुसलमान कोई गलत कार्रवाई कर देता है तो पूरी दुनिया दूसरे मुसलमान पर भी संदेह की नजर डालना शुरू कर देती है। इससे बचने के लिए मुसलमानों को अपने बीच मौजूद गलत कामों में लिप्त व्यक्तियों (मुसलमानों) की निंदा करनी चाहिए और अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें एक उम्मत की अवधारणा को त्याग देना चाहिए। जिसका मतलब यह है कि हर मुसलमान का मुद्दा उसकी अपनी समस्या है और जो कुछ वह करता है इससे दूसरे मुसलमानों का कोई संबंध नहीं है।

प्रश्न: आपको क्या लगता है कि इस्लामोफोबिया के खिलाफ विरोध का तरीका जिसका समर्थन कई मुसलमान करते है, मुसलमानों के खिलाफ नकारात्मक प्रतिक्रिया रखने वाले लोगों के दिल और दिमाग को बदलने में कैसे प्रभावी हो सकता है?

उत्तर: मुसलमानों का यह तरीका मुसलमानों के बारे में दूसरों के विचारों को नहीं बदल सकता। इस स्थिति को बदलने का एक ही तरीका है और वह यह है कि मुसलमान स्व-सुधार करें। दूसरों से बदलने की मांग करना इस संबंध में बिल्कुल कोई लाभकारी नहीं हो सकता।

प्रश्न:अगर आपको ऐसा लगता है कि यह प्रक्रिया इस संबंध में प्रभावी नहीं है तो आपको क्या लगता है कि इसका विकल्प विधि क्या है जो मुसलमानों को अपनाना चाहिए और जो मुसलमानों और इस्लाम के बारे में अपनी राय बदलनें में दूसरों के लिए सहायक हो?

उत्तर: इस मामले में प्रारंभिक बिंदु यह है कि वे सभी लोग जो मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं खुलकर मुसलमानों की आतंकवादी गतिविधियों से बराअत व्यक्त करें। उन्हें आतंकवाद में शामिल होने से मुसलमानों को रोकना चाहिए, और यदि उनके लिए यह संभव न हो तो उन्हें मुसलमानों की इन गतिविधियों की स्पष्ट रूप से निंदा करनी चाहिए।

प्रश्न: मुस्लिम विरोधी भावनाओं के खिलाफ शिकायत करने और उनकी निंदा करने से एक विशेष दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व होता है और वह मुसलमानों और अन्य लोगों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश है। यह एक नकारात्मक दृष्टिकोण है और यह कुछ के खिलाफ भी है। बल्कि इस मुद्दे पर एक दूसरा और सकारात्मक दृष्टिकोण भी है और वे उनकी ओर से भेदभाव का सामना करने के बावजूद दूसरों के साथ भलाई करके उनकी सेवा और उनके साथ भलाई करके इस्लाम और मुसलमानों के प्रति दूसरों की अवधारणाओं को अनुकूल करने की कोशिश है। यह पहले के विपरीत एक रचनात्मक दृष्टिकोण है। यह किसी नकारात्मक चीज की निंदा करने के बजाय कोई सकारात्मक कदम उठाना है।

आप इन दोनों दृष्टिकोण से मुसलमानों को कौन सा दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देंगे और क्यों?

उत्तर: इस्लाम और मुसलमानों के प्रति लोगों के नकारात्मक दृष्टिकोण को बदलने का एकमात्र तरीका यह है कि मुसलमानों के प्रतिनिधि मुसलमानों की गलत गतिविधियों की निंदा करें। उदाहरण के लिए, सामूहिक रूप से सभी विद्वानों को बिना शर्त मुसलमानों की नकारात्मक गतिविधियों की निंदा में एक फतवा जारी करना चाहिए।
– See more at: http://www.newageislam.com/hindi-section