सहवन क्षेत्र में लाल शहबाज़ क़लंदर के मज़ार पर आत्मघाती हमले से पाकिस्तान को बिल्कुल ही हैरान नहीं होना चाहिए। अब इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं रही कि इन सूफी मज़ारों पर सल्फ़ी आतंकवादियों के लिये हमले करना वैध है जिन पर उपस्थिति को वह इस्लाम के विपरीत मानते हैं और इसी आधार पर उन मज़ारों पर हाज़िरी देने वालों को मारना, इस्लाम के बारे में अलग दृष्टिकोण रखने वाले मुसलमानों को लेकर दशकों तक नफरत परवरी का एक मात्र तार्किक परिणाम है। इसी तरह के हमले बलूचिस्तान में शाह नूरानी के मज़ार पर और लाहौर के निकट दाता गंज बख्श अली हजवेरी के मजार पर भी अंजाम दिए जा चुके हैं। इन सभी हमलों में यही एक आम वर्णन साझा थी कि मज़ाराते औलिया पर उपस्थिति देने और यहां आकर प्रार्थना करने वाले लोग शिर्क में शामिल थे इसीलिए वह हत्या किए जाने के हकदार थे। इन सभी बम धमाकों में महिलाओं और बच्चों की हत्या भी आम थी लेकिन इस्लाम को शुद्ध करने की इस लड़ाई में उनकी हत्या शायद अनजाने नुकसान पर समझा जाएगा। लेकिन, अगर आतंकवादी स्कूल के बच्चों को इस तरह मार सकते हैं और हदीस की मदद से उसका औचित्य पेश कर सकते हैं तो फिर यही कहा जा सकता है कि खुद इस्लाम के भीतर ही कोई न कोई त्रुटि अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है।

एक पल गंवाए बिना ही पाकिस्तानी टेलीविज़न और अन्य स्थानों पर टीकाकारों नें उसका आरोप अफगानिस्तान में मौजूद आतंकवादियों पर डाल दिया, जबकि कुछ लोगों ने इस तथ्य पर खेद व्यक्त किया कि मुसलमान सत्य मार्ग और हिदायत से भटक चुके हैं। अब तक शायद ही ऐसा कोई विश्लेषण किया गया हो जो हमें अपने आंतरिक मामलों पर ध्यान देने और इस बात का गहराई के साथ जवाबदेही लेने को तैयार करता है कि हमारे अंदर ऐसी कौन सी गलत बात पैदा हो गई है कि अफगानिस्तान आतंकवादियों को पनाह देता है और खुद पाकिस्तान के अंदर पैदा हुए आतंकवादियों के बारे में हमारा क्या मौक़िफ़(रुख) है। यह भी एक स्थापित तथ्य है कि खुद पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देता है और केवल सुरक्षा के तंग लेंस के माध्यम से इस मुद्दे को देखता है। अच्छा और बुरा आतंकवादी जैसा कुछ नहीं होता। रणनीतिक हितों के तहत आतंकवादियों को शरण देना अंततः खुद पाकिस्तान के लिए हानीकारक होगा, जैसा कि हाल की घटनाओं से साबित होता है। यह समस्या अधिक गहरा है। और इसका संबंध इस्लाम के विश्वासों और दिनचर्या से है।

जब सलमान तासीर के हत्यारे का मजार बनाया जा सकता है और हजारों लोग इस ‘शहीद’ के मज़ार पर दैनिक उपस्थिति देते हैं तो हमें यह जान लेना चाहिए कि आज मुस्लिम समाज में कोई बड़ी बीमारी पैदा हो चुकी है। मामले तब बदतर हो जाते हैं जब ऐसे मज़ारों की आवश्यकता के बारे में कोई चर्चा नहीं होती। पाकिस्तानी समाज के भीतर लगभग इस बात पर आम सहमति हो चुकी है कि सलमान तासीर का हत्यारा एक महान आशिक़े रसूल था इसलिए, उसकी स्मृति का सम्मान किया जाना चाहए। और यही कल्पना इस समस्या की जड़ है। एक हत्यारा इस्लाम में कैसे प्रतिष्ठित और सम्मानीय बन सकता है? और यह कैसे हो सकता है कि पाकिस्तान के सहवन में मुसलमानों की हत्या करने वाले आतंकवादियों की निंदा करे लेकिन एक मुसलमान यानी सलमान तासीर के हत्यारे पर चुप रहे? निश्चित रूप से यह केवल सरकार की समस्या नहीं है, बल्कि यह सामूहिक रूप से मुसलमानों का एक सामाजिक समस्या है और इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

पाकिस्तान की समस्या यह है कि वहां मुस्लिम समाज के भीतर बड़े पैमाने पर असहिष्णुता और घृणा पाई जाती है। वहां शिया और सुन्नी और यहां तक कि खुद सुन्नियों के बीच जबरदस्त दुश्मनी है, मुसलमान इस्लाम की अन्य व्याख्याओं को गवारा नहीं करते। इसलिए सल्फियों को बरैलवियों के साथ जबरदस्त परेशानी है जिसका जवाब वह उसी ऊर्जा के साथ देते हैं। क्या यह सच नहीं है कि हजारों देवबंदी मदरसों के अंदर युवा मन में यह जहर घोला जा रहा है कि बरैलवी इस्लाम के दुश्मन हैं और क्या यह भी सच नहीं है कि बरैलवी मदरसों के अंदर नव युवकों को देवबंदियों से नफरत करने की शिक्षा दी जाती है।

क्या यह एक तथ्य नहीं है कि सल्फ़ी मदरसों में मज़ारों पर उपस्थिति को कब्र पूजा के बराबर माना जाता है और क्या इसी आधार पर दक्षिण एशियाई मुसलमानों के बहुमत को संभवतः मुशरिक नहीं माना जाता? और इस्लामी साहित्य के नाम पर इसी नफरत फरोशी का कारोबार सस्ती प्रकाशन और टेलीविजन पर उपदेश के माध्यम से जारी है। हमारे अपने घरों में, हमारे स्कूलों में और हमारे पड़ोस में जो कुछ हो रहा है उसी का एक सीधा परिणाम मज़ारों पर बमबारी है। स्वतः अपने बारे में ऐसे कठिन सवाल उठाए बिना विभिन्न पंथों के बारे में हमारी घृणा रोजमर्रा की बातचीत में एक नया मामूल अख्तयार कर चुकी है, इस प्रकार की बर्बरता की मंशा और असबाब व कारण पर कोई गंभीर चर्चा नहीं की जा सकती।

नफरत और असहिष्णुता के विपरीत जंग हमेशा वैचारिक थी और अब भी यही हाल है। इस बात पर खुशी मनाने की कोई जरूरत नहीं है कि सहवन में विस्फोट के बाद एक प्रतिशोध के रूप में पाकिस्तान सरकार ने लगभग सौ ‘आतंकवादियों’ को मारा है बल्कि, इस तथाकथित ‘कठोर राज्य’ से यह पूछने की जरूरत है कि इन आतंकवादियों की पहचान के लिए उन्होंने क्या प्रक्रिया चुनी है, या यह अपने कुछ आकाओं को खुश करने के लिए नरसंहार की एक और घटना थी । राज्य एक जानलेवा ठग नहीं बन सकती और किसी भी उचित कार्यवाही के बिना ‘न्याय’ का कोई भी कदम तय नहीं किया जाना चाहिए। बेहतर होगा कि पाकिस्तान दुश्मनों के नाम उजागर करे और सार्वजनिक रूप से यह बयान दे कि इस्लामी शिक्षाओं में कुछ त्रुटि हुई और इस्लाम के नाम पर हम जो कर रहे हैं इसे संशोधित करने और और उनका त्वरित जवाबदेही की आवश्यकता है तभी जाकर हम शायद इस घातक परिवर्तन को विधिवत समझ सकेंगे जो इस्लाम की बुनियादी शिक्षाओं में पैदा हुई है।
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