सिकंदर हयात

रवीश कुमार के बहाने कुछ विचार !

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रवीश कुमार टीवी पत्रकारिता के लीजेंड हे और रहेंगे हम भी उनके फेन हे और रहेंगे रवीश कुमार एक बेहद प्रतिभाशाली इंसान हे मगर सब इंसान ही होते हे कोई भी सुपरमैन नहीं होता हे कोई हर्ज़ नहीं होगा अगर हम रवीश के बहाने कुछ हालात पर विचार कर ले . अब जो खबरे आ रही हे जाँच से ही पता चलेगा कोई धारणा नहीं बनाने चाहिए खेर , रविश कुमार के भाई चाहे जो हो इसमें रवीश जी जवाबदेह नहीं हे . मगर कुछ और बाते समझी और समझाई जा सकती हे रविश जी ने कभी खुद कहा था की ” वो डरपोक हे ” ऐसा उन्होंने क्यों कहा था बात अब समझ में आयी रवीश कुमार की सफलता बेमिसाल हे इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती हे मगर भारत में एक बहुत ही गंभीर मसला ये हे की यहाँ सफल लोग और सफलता वैसे तो 90 % अमीर और वंशवादी लोगो को ही मिलती हे इससे इतर जो लोग होते हे जिन्हें आम आदमी की कामयाबी कहकर प्रचारित किया जाता हे ( जिनमे रवीश ) ये भी वही लोग होते हे या हो सकते हे जिन्हें तीन चार सुविधाएं जरूर ही मिली होती हे या तो घर में ठीक ठाक जमीन जायदाद होना या फिर घर में किसी की भी केसी भी सही मगर सरकारी नौकरी होना या आपका छोटी फेमली से होना घर का इकलौता लड़का या लड़की होना ताकि अधिकतम रिसोर्सिस आप पर लग सके या फिर जिस फिल्ड में कामयाब होना चाहते हे , हुए उसमे किसी अनुभवी का आपका रिलेटिव वगेरह होकर उसका आपके सर पर हाथ या पूरा मार्गदर्शन होना तो ये हे अब भारत में जिन्हें हम आम आदमी की कामयाबी कहते हे वो भी इन्ही में से होंगे इनसे बाहर आपको कोई कामयाब आदमी शायद नहीं मिलेगा इससे अंदाज़ा लगाइये की भारत में हालात कितने कठिन हो रहे हे एकतरफ अब चारो और कामयाबी की प्यास हे चाहत हे दूसरी तरफ सच ये हे आम आदमी ये सच समझ ले तो बेहतर ही हे !

अब रवीश जी के बारे में जो सूना राजनीतिक परिवार आदि तो राजनीती में भी आम तौर पर सभी ठीक ठाक वेल्थी लोग ही होते हे इसका मतलब शायद ये हुआ की रवीश जी एक मज़बूत परिवार से हे वाइफ भी उनकी शायद एक कामयाब काबिल लेडी ही हे यानि रविश जी के चारो तरफ एक बड़ा सिक्योरिटी सर्किल था जिसने उन्हें वो बेफिक्री और चिंता मुक्त जीवन दिया वो माहौल दिया जिसमे वो इतनी तरक्की कर पाए उनकी मेहनत भी खूब थी मगर मेहनत के लिए भी एक माहौल चाहिए होता हे अब इसमें वैसे तो कोई हर्ज़ नहीं हे . मगर में अधिकतर अपने जीवन के अनुभव् बयान करता हु सिर्फ किताबी नहीं तो मेने गौर किया की जो लोग इस तरह से सिक्योरिटी सर्किल के सपोर्ट से बिना किसी असली भारतीयऔर गहरे संघर्ष के आगे बढ़ते जाते हे वैसे तो कोई हर्ज़ नहीं हे मिली हुई सुविधा कोई क्यों छोड़ेगा मगर होता यही हे की फिर उनमे किसी बहुत ही बड़े संघर्ष का दमखम नहीं बचता हे क्योकि दमख़म संघर्ष से ही पैदा होता हे इसलिए रवीश जी के वो शब्द याद आ रहे हे ” में डरपोक हु ” अब जिन लोगो ने संघर्ष किया होता हे उनका डर निकल जाता हे महात्मा गाँधी इतने फियरलेस कैसे थे ——-? क्योकि बीस साल दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष करके आये थे तो इसलिए आप देखे की भारत में 90 % तो वो ( अमीर और वंशवादी ) और 10 % वो , इसलिए आप देखे की आमतौर पर भारत के कामयाब लोग बिलकुल ही पिल पिले से भी होते हे वो कोई निर्णायक काम नहीं कर पाते हे!

आज जाकिर हुसेन भाई लिखते हे ” सिकंदर भाई, इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ सबसे ज़्यादा निराश, रविश जैसे लोगो ने ही किया है. अब देखिए, कि तमाम हिंदू कट्टरपंथी, रविश से तो नाराज़ है, लेकिन एक भी मुस्लिम कट्टरपंथी का एक भी कमेंट रविश के खिलाफ, आज तक नही देखा.रविश का मैं प्रशंसक हूँ. जैसे उन्होने एक बार लिखा कि सरकार की नाराज़गी, पत्रकार के लिए एक पुरूस्कार है, उसी प्रकार धार्मिक कट्टरपंथियो की नाराज़गी भी एक प्रगतिशील लेखक का ईनाम है. लेकिन रविश ये ईनाम, मुस्लिम कट्टरपंथियो से आज तक हासिल नही कर पाए.खैर हम अपनी लड़ाई, लड़ते रहेंगे, भले ही हमे कोई साथ दे या ना दे ”. अब देखे तो हम जैसे टुच्चो से ही हिन्दू मुस्लिम कट्टरपंथी सोच बेहद खफा हे हिन्दू कटरपंती कहते हे की ”तुम्हारी शिकायत पी एम् कार्यलय में करेंगे ” वही मुस्लिम कट्टरपंथी कहते हे ”तुम पर तो फ़तवा जारी होना चाहिए ” . जबकि उधर रवीश मुस्लिम कटरपंथ पर कोई खास जानकारी नहीं रखते हे ( सबूत हे ) शायद उन्हें हिन्दू कटटरपन्तियो के खिलाफ- मुस्लिम लोकप्रियता पसंद हे अच्छा यही सेम एक केस में रवीश जी के तरबियत याफ्ता ने भी किया की शायद ” मुस्लिम टी आर पि खींचने के लिए ” हल्के फुल्के कटटरपन्तियो को हल्का फुल्का सपोर्ट सा दिया . ( उनसे भी हाथ जोड़ कर माफ़ी मांग रहे हे पहले ही की अगर पढ़े तो बात को व्यक्तिगत ना ले हमारा मकसद सिर्फ हालात समझाना हे )
संघर्ष से ही आदमी मज़बूत होता हे बहुत से लोग पूछ सकते हे की हमारी जिंदगी में तो सिक्योरिटी हे कम्फर्ट ज़ोन हे असली और गहरा संघर्ष नहीं हे तो हमारा क्या कसूर हे ———-? कोई कसूर नहीं हे आपका . लेकिन अगर मज़बूत बनना हे लोहे का तन और मन चाहिए तो जीवन में संघर्ष पैदा करो कैसा पैदा करे ———? सिर्फ एक काम करो उसूलो पर अड़ जाओ बस फिर देखो संघर्ष ही संघर्ष हे .

दो बाते हे की एक तो रविश जी को बहुत पहले साफ़ कर देना चाहिए था की उनका परिवार राजनीति में हे वो भी एक थोड़ी बड़ी सी पोस्ट पर , पहले ही घोषणा कर देते की भई- भाई के किसी भी अच्छे बुरे क्रियाकलाप से मुझे ना जोड़ा जाए मेरा उनकी किसी एक्टिविटी से कोई लिंक नहीं हे न अच्छी से ना बुरी से .लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया उसकी जगह वो कुछ वैसा ही करते रहे या थोड़ा आभास सा देते रहे थोड़ा बहुत , जैसा की सुना हे की लालू करते थे की घर का बाहरी हिस्सा गवई ग्रामीण जैसा बना रखा था जहा वो पत्रकारों से मिलते थे ( और अंदर का बेहद आधुनिक ) ताकि अपने वोटरों को बता सके की में भी तुम्हारे जैसा ही हु इसी तरह रविश जी खुद को यु ही बेहद मामूली बेकग्राउंड का आदमी पेश करते रहे ( हमें ऐसा लगा गलत भी हो सकते हे ) जो आम आदमी के लिए हर समय धक्के खाता हे और बेहद बेहद ही साधारण हे अब साफ़ हे की रवीश जी भी कोई ऐसे मामूली आदमी भी नहीं हे वो भी कोई बिलकुल ही आम आदमी भी नहीं हे थे . पांच साल पहले भी उन्होंने अपने फ्लेट और अपने पते के बारे में मोहल्ला लाइव पर ऐसे ही दर्शाया था अब ये बाते आम आदमी को बेहद अपील करती हे तो ये उन्होंने किया हलाकि इस पर मुझे कोई आश्चर्य भी नहीं हे में तो हमेशा से ये सच जानता था की आज के ज़माने में खासकर किसी भी बाल बच्चे वाले आदमी से तो कतई शुद्ध आदर्शवाद की उमीद नहीं करनी चाहिए शुद्धता की कसौटी पर अब शायद कोई खरा नहीं उतर पायेगा . अब सवाल ये उठता हे की आम न होते हुए भी ये खुद को आम क्यों पेश करते रहे कुछ साल पहले उन्होंने एक रिपोर्ट में खुद के अंग्रेजी ना आने की बात कही थी आज हर दूसरे दिन मोटी मोटी अंग्रेजी किताबो और अंग्रेजी अखबारों की ही ” धमकी ” देते हे ————– ? . तो समझिये ये भी बाजार और निजाम की व्यवस्था की एक ट्रिक होती हे आम आदमी का गुस्सा ठंडा करने के लिए की इस तरह से आम आदमी को सन्देश भेजा जाता हे की भई देखो दिमाग मत खाओ हल्ला मत करो , बस अपने काम में लगे रहो मेहनत करते रहो , देखो देखो इस निजाम में ये ये आम आदमी भी मेहनत कर कर के कहा से कहा तक पहुच गए हे देखो देखो ————- ? ( जबकि वो इतने आम भी नहीं होते हे उनके संघर्ष के झूठे किस्से गढ़े जाते हे ) ये दर्शय राजकुमार संतोषी ने जो की सुना हे की इकलौते बड़े डाइरेक्टर हे जिन्हें हिंदी साहित्य की समझ हे उन्होंने अपनी फिल्म ” हल्ला बोल ” में दिखलाया था जब अजय देवगन अपनी आत्मकथा पर बात करते हुए एक रिपोटर से कहते हे की उनकी किताब में उनके संघर्ष के झूठे किस्से हे क्योकि आम आदमी को ये सब ( कामयाब लोग के संघर्ष के किस्से ) बड़ा अच्छा लगता हे तब कुछ बदले बिना भी उसका गुस्सा उसकी निराशा कुछ कंट्रोल होता हे और जैसा की ओम थानवी जी ने बताया की उनके भाई ”चालीस साल से राजनीति में थे ” तो इन चालीस सालो में तो कोंग्रेस सत्ता में रही पिछले सालो में भी कोंग्रेस राबड़ी सरकार में रही ही थी यानि आप एक कुछ कुछ सत्ताधारी परिवार से आये ये बात हमारी जानकारी में तो आपने कभी इशारो में भी नहीं बताई —— ? फिर मान ले की दक्षिणपंथियों ने आपसे चिढ़ कर और बेहद चिढ कर बदनाम करवाने के लिए सब किया यही लग भी रहा हे तो सवाल ये हे की अगर आप हिन्दू कट्टरपंथ के साथ साथ मुस्लिम कट्टरपंथ पर सख्त स्टेण्ड लेते तो कौन जाने फिर वो आपसे इतना तो ना चिढ़ते की साज़िश करते ——- ? लेकिन रवीश जी ने ऐसा नहीं किया अब ये सोच कर निराशा हो रही हे आ गई ना फिर वही राजनीति वाली बात की मुस्लिम कट्टरपंथ पर आपका स्टेण्ड तो सेम वही था की जो कोंग्रेस का होता आया हे की ”इग्नोर करो जो होता हो होने दो वोट ( दर्शक प्रशंसक ) लो ” तो ये कहना था हमारा मकसद रवीश जी का कोई अपमान कतई नहीं हे वैसे भी वो खुद को आलोचनाओ से ऊपर नहीं मानते हे हम गलत भी हो सकते हे क्षमा . रवीश जी बेमिसाल पत्रकार थे और रहेंगे हमारा मकसद पाठको को सिर्फ आज के हालात पर कुछ विचार करवाना था !

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19 thoughts on “रवीश कुमार के बहाने कुछ विचार !

  1. सिकंदर हयात

    रविश जी अक्सर अपने प्रशंसको पत्रकारिता के छात्रों प्रशंसक आदि से कहते रहे बार बार कहते रहे मेरे फैन मत बनिए मुझे आइडल मत बनाइये . क्या उन्हें खासकर यु पि बिहार के उन हज़ारो लोगो से साफ़ साफ़ कहना चाहिए था की मुझे आइडल मत बनाइये मेरा जैसा आप बन भी नहीं पाएंगे क्योकि मुझे भी खासा ”सिक्योरिटी सर्किल ” मिला हुआ रहा———————– ? जो आम तौर पर नहीं मिलता हे आम लोगो को . . लेख रविश जी की भी इसी भावना पर आधरित हे जो उन्होंने कई बार कहा की मेरे फेन मत बनिए ” मुझे आइडल मत मानिये मुझे हीरो मत बनाइये मुझे नहीं बनना हे में नहीं हु ” लेख इसी पर आधारित हे रविश जी जिस मुकाम पर पहुच गए थे वो अदभुत हे रविश जी की मेहनत प्रतिभा और ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता हे सही हे . मगर मेहनत प्रतिभा और ईमानदारी के बावजूद आम लोगो को बढ़ने कहा दिया जाता हे ——– ? मेरी मोटी अक्ल से मुझे तो ऐसा लगता हे की रविश जी को ”सलेक्ट ” किया गया था उन्हें आगे बढ़ने की पूरी छूट और पूरा सहयोग दिया गया ये किसने किया ——– ? मुझे लगता हे की ” निजाम ने व्यवस्था ने ऐसा किया ” उसी ने बेहद प्रतिभाशाली और मेहनती रविश जी को सलेक्ट किया एक ”सेफ्टी वाल्व ” बनाने के लिए —– ? इसके अलावा मेरा शक हमारी भाभी जी पर भी हे जो एक एजुकेटिड काबिल लेडी हे इन लोगो को भारतीय मन मानस की गहरी समझ होती हे . हमारी मोटी बुद्धि से – रवीश जी की इमेज कुछ यु रही की मानो यु पि बिहार से एक बिलकुल सीधा सादा हिंदी मीडियम लड़का आया और बिना किसी बेकग्रॉउंड के , अपनी मेहनत से कितना आगे बढ़ गया हे—– इससे लोगो का व्यवस्था पर विशवास होता हे उनमे भी जोश आता हे वो भी फिर महानगरो की तरफ आते हे और रात दिन मेहनत करते हे और निजाम को सस्ता और मेहनती श्रम मिलता हे रवीश जी बेहद प्रतिभाशाली भी हे मेहनत भी उन्होंने खूब की मगर हिंदी में भला कितने लोग हे जिन्हें मेहनत और ईमानदारी का फल और आगे बढ़ने का सहयोग और रास्ता भी मिलता गया हो ———– ? जबकि रवीश जी की लोकप्रियता और उनकी पूरी ईमानदारी की ही कमाई ही चकरा देने वाली हे ( तनखा—- ? जो सुनी सुनाई हे गलत भी हो सकते हे ) ये सब जो मेने लिखा ये सब बहुत गहरे मुद्दे हे मुझे इतनी गहरी समझ नहीं हे बस ईमानदारी से लिखा . समझ ना होने के कारण में गलत भी हो सकता हु क्षमा

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  2. wahid raza

    SIKANDAR HAYAT SAHAB AAJ AAP NE DIL KHUSH KAR DIYA , RAVISH KUMAR PE MAZMOON LIKH KAR. IS DAUR ME AGAR PATRKARITA KI THODI BAHUT JO IZZAT BACHI HAI WOH RAVISH JAISE CHAND PATRKAAR KI WAJAH SE!

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  3. सिकंदर हयात

    शुक्रिया वाहिद साहब की रविश के फैन होते हुए भी आपने समझ लिया की लेख में रविश की बुराई नहीं हे सिर्फ ”आलोचना ” हे आलोचना करना व्याख्या करना हालात बताना बुराई करना नहीं होता हे ये बात मानकर उमीद हे की आप आगे भी हम पर दया दृष्टि बनाय रखेंगे और आलोचना व्याख्या बहस को कोई बुराई नहीं समझेंगे शुक्रिया . असल में लेख में रविश की आलोचना भी सिर्फ एक बहाना ही हे असल मकसद तो लोगो को आज के हालात समझाना था हालात व्यवस्था निजाम शायद कभी भी बदले नहीं जा सकेंगे कम से कम फिलहाल तो कोई आसार नहीं हे ऐसे में जनता आम आदमी हम सब हालात को समझ ले तो कम से कम इतना तो हो की हम इसके शोषण से जितना सम्भव हो सके बच और बचा सके जितना पॉसिबल हो उतना तो . व्यवस्था निजाम एक तरफ तो सेफ्टी वाल्व बनाता हे ताकि लोग बेकाबू न हो तो दूसरी तरफ वो लोगो को सपने देखते हुए जमकर मेहनत की प्रेरणा देता हे ताकि उनकी मेहनत और सस्ते श्रम का फायदा मिलता रहे इसके लिए ”संघर्ष करके बने आइडल दिखाए जाते हे ” अब ये दोनों बाते रविश जी के माध्यम से समझी जा सकती हे जैसे देखे नोट बन्दी के समय रविश जी के ही पड़ोस सबसे बड़ी अनाधिकरत बस्ती खोड़ा में हालात बेकाबू थे लाखो लोग और एक बैंक लोग बिलख रहे थे रविश वहां पहुचे बात फ़ौरन अखलेश तक पहुची उन्होंने एक दो ए टी एम् वैन लगवाई इस सबसे कोई खास बदलाव नहीं आता हे लोगो का हाल फिर भी बेहाल ही रहा होगा लेकिन जनता को तसल्ली तो हुई ही होगी की देश का नंबर वन टीवी पत्रकार ( सभी भाषो में भी ) उनका हाल पूछने दिखाने आया हे ठीक . वही दूसरी तरफ रविश से इम्प्रेस होकर उन्हें अपने जैसा बिलकुल आम बेकग्रॉउंड का लड़का समझ कर हज़ारो लड़के लडकिया दिल्ली आये होंगे ये फिर सस्ता श्रम बनते हे जिनसे इन्हें हो ना हो व्यवस्था को बेहद फायदा होता हे सस्ते श्रम ही से बहुत कुछ महंगा बहुत कुछ बड़ा बनता हे तो ये था लेख में मेने लिखा की भला कितने बिलकुल आम लोग हे जिन्हें मेहनत और प्रतिभा ईमानदारी के बाद भी आगे बढ़ने दिया गया ————- ? जैसे रविश के ही एक सन्सथान के एक हिंदी पत्रकार हे ———- सिंह ये भी रविश जी की तरह ही हमेशा अच्छी जमीनी पत्रकारिता अच्छी भाषा कायदे की बात करते दीखते हे हमेशा . लेकिन भला कितने लोग उन्हें जानते होंगे ————-? तो ये हालात हे

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  4. ramesh kumar

    हयात साहब आपने बहुत ही निष्पक्ष अंदाज में रविश कुमार के बारे में लिखा है है आप ने अंध भक्त की तरह तारीफ़ नहीं की है . रविश के पत्रकारिता का में भी कायल हु और कोई शक नहीं के रविश कुमार की अपनी छवि है या यु कहे के एक अलग सोच और अंदाज के पत्रकार है !

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  5. Ranjan

    हमें हर बात में हिंदू मुसलमान का कोण घुसाना पसंद नहीं आता. रवीश कुमार के हम बड़े प्रशंसक रहे हैं. खासकर उनके कार्यक्रम में बहस की बौद्धिकता का स्तर दूसरे चैनलों से मीलों आगे होता है. हाँ, कई बार उनके कार्यक्रम में बहस के विषय असामयिक भी होते हैं, क्योंकि हर रोज नये नये मुद्दे तो बहस के लिये मिल नहीं सकते.

    रवीश के भाई का किसी मामले में लिप्त होना और उसके लिये रवीश कुमार का दोष सिद्ध करने का प्रयास निहायत ही गलत है. रवीश को चाहिये कि अपनी बेबाकी, ऊर्जा और प्रगल्भता बनाये रखें…

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  6. सिकंदर हयात

    मेने पहले ही लिख दिया था की में गलत भी हो सकता हु मेने लेख में रविश जी कि इंग्लिश का मुद्दा व्यंग्य में उठाया था ( आदत से मज़बूर हु क्योकि व्यंग्यकार भी हु 20 के करीब व्यंग्य प्रिंट में प्रकाशित ) वो बात इसलिए कही की रविश जी भी किसी महंगे स्कूल से तो नहीं हे—- ? खेर शीबा जी बताती हे इसलिए माफ़ी में गलत था . sheeba Aslam Fehmi : जबकि पत्रकारिता पर गहरा नैतिक संकट आया हुआ है और मौजूदा दौर के लिए ज़रूरी हैं रवीश कुमार, तो सत्ता यही चाहेगी की रवीश खुद खबर बन जाएं और सफाई देने में उलझे रहें. लेकिन हमें सतर्क रहना होगा. इस मामले में रवीश खुद बेहद सतर्क हैं. अपने काम में निजी जीवन का कोई पहलू कभी आड़े ना आये इसके लिए उनके कई नियम और त्याग तो मैं भी जानती हूँ.बिहार चुनाव के दौरान जब क़रीबी रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे थे तो वो उनके क्षेत्र के आस-पास भी नहीं फटके. हालाँकि बिहार कवर कर रहे थे लेकिन राजनैतिक रिपोर्टिंग की ही नहीं जिससे कोई ये न कहे की अमुक पार्टी की तरफ झुकाव रहा या दुराव रहा. भाभी बुरा भी मान गयीं हों लेकिन नहीं गएऐसा ही एक और निषेध जो उन्होंने खुद पर लगा रखा है वो ये की सिफारिश का फ़ोन कभी नहीं करेंगे, सिर्फ क्रिटिकल मरीज़ के लिए ही अब तक फ़ोन घुमाया है वरना कोई कितना भी सगा हो या मित्रवत हो, सिफारिशी फ़ोन नहीं करेंगे.किसी ऐसी शादी में शरीक नहीं होंगे जिसमे दहेज़ का आदान-प्रदान हो चाहें परिवार में ही क्यों न हो.और हाँ बेटी के एडमिशन के समय पेरेंट्स के बतौर दोनों पति-पत्नी ने एक नयी भाषा सीखने में कितनी मेहनत की ये बात भी यहाँ बताने लायक़ है. रसूख या सेलिब्रिटी स्टेटस का इस्तेमाल नहीं किया, नियम के तहत सभी मरहले तय किये.इसके अलावा ईमानदार और बेलाग पत्रकारिता के जो नुकसान सगे संबंधी झेल रहे हैं, उनके उलाहने अलग है. दोनों तरफ से पिस कर ये शख्स संयम बनाये हुए है.इनके एक सीनियर सहकर्मी ने पिछले हफ्ते ही एक निजी बातचीत में कहा की रवीश अकेले दम पर हिंदी चैनल खींच रहे हैं अब, प्राइम टाइम के अलावा किसी कार्यक्रम में जान नहीं बची है. सिर्फ वही हैं जो मेहनत करते हैं जबकि इतने सीनियर हैं.रवीश की पत्रकारिता तो लाजवाब है ही लेकिन निजी जीवन में भी इज़्ज़त करने लायक़ इंसान हैं ये.सोशल एक्टिविस्ट शीबा असलम फ़हमी की एफबी वॉल से.sheeba Aslam Fehmi : हालांकि ये बात भी हे की कुछ मुद्दो पर जैसे रविश जी स्टेण्ड नहीं लेते दिलचस्पी नहीं लेते तो वैसे ही अब उन मुद्दो को शीबा जी भी छोड़ चुकी हे ————— ? शायद वो भी समझ गयी हे की इनमे तो बहुत ही सरदर्दी हे और हासिल कुछ भी तो नहीं हे सिफर . रंजन सर की बात का जवाब रात में —————- जारी

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  7. सिकंदर हयात

    रंजन सर ”रवीश के भाई का किसी मामले में लिप्त होना और उसके लिये रवीश कुमार का दोष सिद्ध करने का प्रयास निहायत ही गलत है ” हम भी यही मानते हे और हमने इस विषय पर यही लिखा की मामला गलत ही लग रहा हे आगे . रंजन सर लेख का मुद्दा कट्टरपंथ नहीं हे कुछ और हे और वो जो कुछ भी हे मुझे याद हे की ये बात आपको पसंद नहीं आती हे चार साल पहले भी में इस विषय पर आपकी डांट खा चूका हे हां सामपसदायिक्ता का हल्का सा जिक्र हे जो की करना पड़ा क्योकि ये बात मेरे जैसे टटपूंजिये ने नहीं बल्कि जाकिर हुसेन भाई जैसे एजुकेटिड और महाविद्वान आदमी ने कही थी सो जिक्र किया रविश जी प्रतिभा का लोहा हम भी मानते हे कोई शक नहीं मगर याद रखना चाहिए की कोई भी सुपरमैन नहीं होता हे सभी इंसान ही हे सो इस नाते ऐसा नहीं हे की हर बात की समझ सिर्फ रविश जी में ही बसी होगी बाकी सब भी घास नहीं छिल रहे हे ——— ? बाकी यहाँ हमारे तो दोनों हाथो में लड्डू हे क्योकि हम रविश जी की तरह सिर्फ एक कट्टरपंथ से ही नहीं बल्कि दोनों से झूझ रहे हे और बहुतो बहुतो की तरह हमारे सामने भी मौक़ा था की हम भी सिर्फ एक कट्टरपंथ के प्रति स्टेण्ड लेकर दूसरे की नरमी सुरक्षा और सपोर्ट ले ले या फिर इसकी आस तो रहे हे मगर हमने दोनों से ही जूते खाना असुरक्षित रहना मंजूर किया हे तो इसलिए हमारे तो यहाँ दोनों हाथो में लड्डू ही हे क्योकि ये तो हमारे लिए बहुत ही ख़ुशी की बात हे की रंजन सर जैसा महाविद्वान ( जिनका समाज पर गहरा असर होता हे ) और हल्के से दक्षिणपंथी झुकाव वाला आदमी रविश जी पर तारीफ के अलावा कुछ नहीं सुनना चाहता हे तो ये भी एक बहुत बढ़िया सिग्नल हे संकेत हे शुक्रिया रंजन सर

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  8. सिकंदर हयात

    ”Sanjay Tiwari3 hrs · पाकिस्तान के टीवी चैनल भी वैसे ही हैं जैसे अपने यहां के हैं। खबर और बहस वाले। अगर आप पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर होनेवाली बहसों को सुनेंगे तो पायेंगे कि तारिक फतेह जैसे मुद्दे उठानेवाले पाकिस्तान में कई हैं। खासकर इस्लाम और शरीयत से जुड़े मुद्दों पर होनेवाली बहसों को सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे कि यहां इस तरह से बोलनेवाले लोग भी हैं।
    मुमताज कादरी के फांसी के मुद्दे पर तो स्टूडियो में एक तरह से पूरा पाकिस्तान ही कठमुल्ला इस्लाम के खिलाफ खड़ा हो गया था। अल्लहानिंदा कानून को खत्म करने पर लगभग एकराय दिखी या फिर कम से कम मुमताज कादरी जैसे लोगों को गाजी न मानने की वकालत की गयी। बुर्का, हिजाब, निकाब, तीन तलाक, शरीयत, मदरसा और इस्लामिक आतंकवाद पर खुलकर बात भी होती है और मॉडरेट सोच भी दिखती है।
    तो फिर भारत में क्या प्राब्लम है? क्या भारत में पाकिस्तान से कम मुसलमान है? आखिर भारत में अगर तारिक फतेह इस्लाम पर एक मॉडरेट सोच सामने रखते हैं तो वो “खतरनाक” कैसे हो जाता है? सिर्फ बात करने से इस्लाम और साम्यवाद दोनों खतरे में कैसे पड़ जाता है जबकी तारेक फतेह खुद साम्यवादी भी रहे हैं और मुसलमान भी हैं। क्या इस्लाम के भीतर या बाहर भारत में इसलिए बहस नहीं होनी चाहिए क्योंकि उसे बहुसंख्यक हिन्दुओं के साथ मुकाबला करना है? या फिर हमारे यहां बहस के ठेकेदारों ने जानबूझकर इस्लाम के रुढिवादी और पिछड़े रूप को बढ़ावा दिया है ताकि वो हिन्दुओं के खिलाफ अपने संघर्ष को बनाये रख सकें। कहीं ऐसा तो नहीं भारत में भी साम्यवादी मुसलमानों का उसी तरह तालिबान के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं जैसे अमेरिका ने अफगानिस्तान में किया?Sanjay Tiwari ” —————————————– रविश के ही मित्र तिवारी ने भी एक तरह से हमारी इस बात पर मोहर लगा दी हे की सबसे मुश्किल काम एक शुद्ध सेकुलर भारतीय मुस्लिम सोच ( उसमे भी सुन्नी देवबंदी होना और भी जुल्म ) होना हे ये काम सबसे कठिन हे और इसी काम के ना होने से या हमें कोई भी सहयोग ना मिलने से ही , इस सोच के ना फैलने से ही वो सरकार वो सोच केंद्र से लेकर असम तक बहुमत पा रही हे उड़ीसा तमिलनाडु बंगाल सभी जगह दस्तक दे रही हे -जिसकी वजह से रविश जी को स्क्रीन काली करनी पड़ी थी रविश जी की महानता अपनी जगह वाज़िब हे मगर हमारी सोच फैलाने में रविश जी को कोई दिलचस्पी नहीं हे वो ये सरदर्दी नहीं लेना चाहेंगे क्योकि इसमें उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा कुछ भी नहीं सिवाय भेजा फ्राई के , शायद उन्हें पता भी होगा की उन्ही का एक बहुत ही बड़ा फैन तारिक फ़तेह के खिलाफ सोशल मिडिया पर सबसे आगे आगे- लीड कर रहा हे

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  9. सिकंदर हयात

    ”हे बाहरवीं में पढ़ने वालों, सब कुछ बनना लेकिन पत्रकार मत बननाFebruary 27, 2017 Written by राजेश कुमार Published in टीवीहे बारहवीं पास करने वाले या बारहवीं में पढ़ने वाले बच्चों, अपना कॅरियर चुनते समय तुम्हे कन्फ्यूजन हो रही होगी, सब कुछ चुनना पत्रकारिता मत चुनना. खासकर हिंदी की तो बिलकुल नहीं. इसलिए नहीं कि स्कोप नहीं है. बल्कि इसलिए कि यहाँ तुम्हारी कोइ कद्र नहीं है. ग्लैमर की दुनिया तुम्हें अपनी ओर खींचेगी…लेकिन बाहर से ये दुनिया जितनी खूबसूरत है, अन्दर से उतनी मैली. तुम्हें सोशल मीडिया से लेकर गली मोहल्लों में दलाल कहा जाएगा.भले ही तुम मोहल्ले के पानी बिजली और सीवर के लिए नेता से सवाल पूछ रहे हो, मगर उस टीवी में बैठे कुछ गिने चुने नमूनों की वजह से तुझे दलाल कहा जाएगा… बिकाऊ कहेंगे भले ही तुम 2000 रुपये किराए के एक कमरे के मकान में दो दोस्तों के साथ शेयरिंग में रह रहे हो. भले ही 40 रूपया डाईट वाला खाना खा रहे हो, दिल्ली जल बोर्ड का पानी पीकर बीमार पड़ रहे हो. लेकिन तुम बिकाऊ हो क्योंकि तुम पत्रकार हो…तुम्हें नेताओं के हाथ की कठपुतली कहा जाएगा भले ही नेता तुम्हें देखते ही दूर भागता हो…. तुम्हे बिकाऊ मीडिया कहकर संबोधित किया जाएगा, जबकि तुम्हारी कुल सैलरी तुम्हारे काल सेंटर वाले दोस्त की सैलरी के गाड़ी के पेट्रोल के बराबर होगी… तुम सोचोगे इज्जत के लिए पत्रकारिता चुनूंगा, लेकिन तुम्हारी इज्जत रोज सरे आम नीलाम होगी… तुम कहोगे विचारधारा के लिए पत्रकारिता चुनूंगा लेकिन विचारधारा का बलात्कार कर दिया जायेगा.अगर तुम ये सोचेगे की बुद्धीजीवियों के साथ रहोगे तो कुछ सीखोगे, लेकिन वो पढ़े लिखे लोग खुद नौकरी बचाओ समिति के सदस्यों की तरह जंग लड़ते नजर आएंगे… तब तुम्हें एहसास होगा कि सेल्समेन बन जाते तो ज्यादा इज्जत होती… अगर तुम लड़के हो वो भी टेलेंटिड तो लिपस्टिक लगे होठों के आगे तुम्हारा हुनर दम घोटता नजर आयेगा… हां, यहां आगे जाने के लिए या तो तुम्हें दलाल बनना पड़ेगा या फिर चापलूस… तो हे बारहवीं वालों, यहाँ आओगे तो ये ध्यान रखना, यहाँ एथिक्स नहीं, कारपरेट जगत काम कर रहा है… और हे इन बच्चों के मां-बाप, तुम भी सुन लो, पत्रकारिता के जरिए इनके सुनहरे भविष्य का सपना संजोए जिंदगी की गाड़ी को आगे बढाने की कामना छोड़ दो क्योंकि पत्रकारिता का भविष्य खुद अंधकारमय हो चुका है। राजेश कुमारएंकर चैनल वन न्यूज ” ————- सोचने वाली बात तो हे की की पत्रकारिता में जो रविश जी का स्वर्ण युग हे रहा , वही पत्रकारिता का सबसे दुर्जन युग रहा इस दौरान पत्रकारिता गर्त में चली गयी ना अच्छे पत्रकार लेखक हे हे भी तो उन्हें आगे बढ़ने नहीं दिया गया काम नहीं करने दिया गया इस दौरान पत्रकारिता में जितना शोषण अपमान रहा उतना किसी और पेशे में नहीं रहा तो फिर सवाल ये उठता हे की क्यों कोई और भी तो रविश कुमार का दस % भी दिखाई नहीं पड़ता हे जबकि रविश लगातार काम अच्छा काम करते चले गए उनका पूरी ईमानदारी से ही पूरा विकास हुआ हुआ अच्छा हुआ बहुत अच्छा हुआ पर कैसे ———— ? वो ही सवाल मन में आता हे की क्या रविश जी के बेहद प्रतिभाशाली ईमानदार होने के साथ साथ कुछ और फैक्टर भी थे —— ? आखिर कोई दूसरा रवीश तो क्या दूसरा दस % भी रविश क्यों नहीं हे ——– ? या तो फिर रविश जी ही कोई अदभुत प्रतिभा हे या फिर वजह वही हे जो लेख में दर्शाई गई हे मुझे तो यही लगता हे की पीछे से भी रवीश जी को बहुत सपोर्ट मिला होगा

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  10. सिकंदर हयात

    Dilip C Mandal8 hrs · NDTV के रवीश कुमार हर दिन आधा घंटा सेकुलरिज्म करते हैं। फिर बिहार चुनाव आता है और पूरा चैनल कम्यूनल होकर बीजेपी का प्रचार करने लगता है।लेकिन रवीश को उसके मालिक अब भी सेकुलरिज्म करने देते हैं।कुछ समय बाद असम चुनाव में एनडीटीवी फिर कम्यूनल हो जाता है। लेकिन रवीश इसके बाद भी सेकुलरिज्म करता रहता है।उस बीच सरकार एनडीटीवी पर एक दिन का बैन लगाकर उसे लागू नहीं करती। चैनल लोगों की नज़र में भरोसेमंद हो जाता है।उसके बाद यूपी चुनाव में पूरा चैनल फिर बीजेपी की हवा बनाने में जुट गया है।RSS की सारी साइट्स लिख रही हैं – “मोदी की सबसे बड़े विरोधी NDTV बता रही है कि बीजेपी यूपी में जीत रही है।”रवीश को उसके मालिक आगे भी सेकुलरिज्म करते रहने दे सकते हैं।मीडिया एक सिस्टम है। भरोसेमंद दिखते रहना उसकी ज़रूरत। रवीश जैसे प्यादों की ज़रूरत होती है। रवीश का सेकुलरिज्म शक के दायरे में नहीं है।लेकिन वह एक सिस्टम को ही मज़बूत बना सकता है।स्टूअर्ट हॉल को पढ़िए। लेख का नाम है The Whites of Their Eyes. मीडिया सिस्टम को समझने में मदद मिलेगी।Dilip C Mandalइससे इतर भी सोचे तो रविश जी के मालिकान कोई ऐसे पाकसाफ नहीं हे कई गंभीर आरोप हे चलो वो आरोप झूठे भी हो तो वो कोई राजेन्द्र माथुर प्रभाष जोशी कोई गणेश शंकर विद्यार्थी कोई गोयनका आदि आदि भी नहीं हे हिंदी का तो हाल यह हे की उनके एक कर्मचारी के लफ़्ज़ों में की उन्होंने कभी उनके मुह से एक लफ्ज़ हिंदी नहीं सुनी , जब रविश की रिपोर्ट बन्द हुई थी तो हिंदी वालो में स्यापा हो गया था रुदाली हो गयी थी सभी को लगा की जैसे परंपरा रही हे तो रविश को निपटा दिया गया हे मगर नहीं रविश ऊँचे उठते ही चले गए —————– ? तो ये बाते हेरत में तो डालती ही हे हालाँकि रविश की प्रतिभा संदेह से परे हे

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  11. सिकंदर हयात

    भाजपा की इस भारी जीत में रविश कुमार जेसो ने भी अपनी तरफ से कुछ योगदान दिया ही हे मुझे ठीक से याद नहीं मगर 2008 में ही जब मेरी रविश जी से फर्स्ट टाइम फोन पर बात और एस एम् एस हुए थे तब शायद मेने ये भी दर्शाया था की बढ़ते मुस्लिम कटरपंथ से आख़िरकार भाजपा संघ को भारी फायदा होगा तब ही एक वाम संपादक ———– कुमार जी से उनकी लघु पत्रिका के ऑफिस में भी मेने यही बात दोहराई थी अफ़सोस ना उन्होंने न रविश जी ने हमें सिरिसयली लिया उल्टा शायद हमें कोई भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे का कार्यकर्त्ता समझा होगा जबकि हम भाजपा संघ मोदी को रोकने की ही बात कर रहे थे रविश जी जैसे लोग मुस्लिम लोकप्रियता के मोह में हमेशा इन बातो को इग्नोर करते रहे जरुरी नहीं की वो खुद सख्त स्टेण्ड लेते नहीं वो चाहते तो अपने मुस्लिम प्रशंसको लेखको बुद्धजीवियों को अलर्ट कर सकते थे उन्होंने लोकप्रीयता के मोह में ये भी नहीं किया हम जैसे लोग दस साल से लिख रहे हे ( रविश जी के ब्लॉग पर भी ) कभी भी हमारी खेरियत नहीं ली इसी रवैया का नतीजा आज उन्ही की मित्र और कटरपंथ विरोधी बड़ी लेखिका—————— कुछ लिखने के बजाय सेल्फियां पोस्ट करती हे कैराना का सन्देश पकड़ने के बजाय अब वो ई वि एम् का खम्भा नोच रही हे बात इतनी बढ़ी रविश जी लोकप्रियता के मोह में यहाँ तक बोल गए की मुसलमानो की संख्या हिन्दुओ से अधिक भी हो गयी तो क्या हे उनके ऐसे बयानों ने संघियो को और भी अधिक मेहनत की प्रेरणा दी होगी की भाई ये तो हमारा वज़ूद ही खत्म करवा देंगे जैसे की हिमांशु कुमार जी ने बताया की संघी तो सुबह होने से भी पहले जमीन पर अपने काम में जुट जाता उधर रविश जी के मुस्लिम प्रशंसक सेल्फियां ही पोस्ट करते रह गए . आज हालात ये हे की रविश जी के मुस्लिम प्रशंसक ही तारिकफतेह और तीन तलाक के सपोर्ट या बचाव उछाल कूद करते दीखते हे रविश जी एन्ड पार्टी ये नहीं समझ पाई की बढ़ता मुस्लिम कटरपंथ हो या उसका बचाव हो या इग्नोर हो या मुस्लिम वोट हो या सेकुलर हिन्दू वोट हो तो वो जो भी हो मगर आख़िरकार तो वो पचास जगह डिवाइड होने ही थे जबकि मुस्लिम कटरपंथ विरोधी वोट कश्मीर कैराना बंगाल केरल जे एन यु में उम्र खालिद या कटरपंती मौलानाओ या इमरान परताप गढ़ी आज़म खान जैसे इरिटेटिंग करेक्टर विरोधी वोट तो मोदी के आने के बाद से एक ही झोली में जाएगा गया भी इसीसे इन्हें भारी सफलता मिल रही हे —————– जारी

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  12. सिकंदर हयात

    Yashwant Singh भड़ास
    1 hr ·
    रवीश कुमार की भड़ास से क्यों फटती है? इसलिए फटती है क्योंकि उसके मालिक प्रणय राय की काली करतूत को भड़ास गाहे बगाहे खोलता रहता है. उसके मालिक के प्रगतिशील खोल में छिपे भ्रष्टाचारी चेहरे को नंगा करता रहता है. जाहिर है, रवीश कुमार भी नौकर है. सो, वह खुद के मीडिया हाउस की पोल खोलने वाली वेबसाइट का जिक्र भला कैसे कर सकता है. दूसरे मीडिया हाउसों पर उंगली उठाने वाले और उन्हें पानी पी-पी कर गरियाने वाले रवीश कुमार की हिप्पोक्रेसी की हकीकत यही है कि वह करप्शन में आकंठ डूबे अपने मीडिया समूह एनडीटीवी ग्रुप की काली कहानी पर कुछ नहीं बोल सकता. यही नहीं, एनडीटीवी ग्रुप की काली कहानी का पर्दाफाश करने वालों तक का आन स्क्रीन नाम भी नहीं ले सकता. वह अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों की बेबाकी का खूब वर्णन करेगा लेकिन भारत के वे पत्रकार कतई नहीं दिखेंगे जो एनडीटीवी की नंगई व करप्शन की कहानी का पर्दाफाश करते रहते हैं. रवीश कुमार चाहे जितना आजाद खयाल और बेबाक पत्रकार बने लेकिन सच यही है कि वह एक अव्वल दर्जे का हिप्पोक्रेट है और उसे एड़ा बनकर पेड़ा खाने की रणनीति इंप्लीमेंट करने की शैली अच्छी तरह से आती है. वह खुद को भाजपाइयों से पीड़ित बता बताकर गैर-भाजपाइयों की निगाह में खुदा बनने की लंबे समय से कोशिश करने लगा है, और बनने भी लगा है. अंधों के बीच काना राजा बना रवीश कुमार यह कभी नहीं बताएगा कि किस तरह प्रणय राय और चिदंबरम ने मिलकर एक साहसी आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को इसलिए जबरन पागल घोषित कराकर पागलखाने में डलवाया क्योंकि उसने प्रणय राय-चिदंबरम की ब्लैकमनी की लंबी कहानी पर काम किया और ढेर सारे तथ्य इकट्ठा कर एनडीटीवी को नोटिस भेजने की जुर्रत की. इस पूरे घटनाक्रम को भड़ास ने प्रमुखता से और लगातार छापा. यही वजह है कि कल
    प्रेस फ्रीडम डे पर प्राइम टाइम के दौरान रवीश कुमार ने मीडिया को एक बीट मानकर इससे संबंधित खबरें छापने बताने वाली कई वेबसाइटों का जिक्र किया और उनके संचालकों का बयान दिखाया लेकिन वह भड़ास का नाम जान बूझकर गटक गया क्योंकि अगर वह भड़ास का नाम ले लेता तो प्रणय राय उसकी नौकरी ले लेता. यह सबको पता हो गया है कि किस तरह खांग्रेसी सरकार के कार्यकाल में प्रगतिशील माने जाने वाले मीडिया मालिक प्रणय राय ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर 2जी स्कैम के धन को ठिकाने लगाने के लिए दुनिया भर में चैनल खोल डाले और इस तरह काले धन को ह्वाइट करके भारत लाने में कामयाब हो पाए. कल प्राइम टाइम में रवीश कुमार मीडिया की आजादी पर लेक्चर पेल रहा था, ढेर सारे पत्रकारों का वक्तव्य सुना रहा था, कई दोयम किस्म की छायावादी मीडिया वेबसाइटों का उल्लेख करते हुए उनके संचालकों का बयान दिखा रहा था तो बिलकुल साफ साफ भड़ास4मीडिया डॉट कॉम का उल्लेख छुपा गया. हां, उसने अपने खास चिंटू विनीत कुमार का बार-बार बयान-भाषण-लेक्चर सुनवाया जो दूसरे मीडिया हाउसों को गरियाने के बहाने जनता को भी उपदेश दे रहा था. ये वही चिंटू विनीत कुमार है जो हर वक्त रवीश कुमार की जय जय करते हुए लेख फोटो सोशल मीडिया पर लिखता छापता रहता है. तू मुझे पंत कह, मैं तुझे निराला के अंदाज में रवीश कुमार अपने उन खास लोगों को ही प्राइम टाइम में आने को एलाउ करता है जिसके बारे में उसे पता है कि वह उनके चेले हैं और चेले बने रहेंगे, साथ ही गाहे बगाहे रवीशकुमारकीजैजै करते हुए लेख आदि लिखा करेंगे. हां, खुद को निष्कच्छ दिखाने को एक किसी भाजपाई या संघी का बयान भी दिखा देता है ताकि उस पर उंगली न उठ सके. रवीश कुमार असल में हमारे दौर के न्यूज चैलनों की पत्रकारिता का एक ऐसा आदर्श तलछट है जिसे नौकरी और सरोकार के बीच झूलते रहते हुए खुद को महान दिखाने बताने में महारत हासिल है. अगर सच में रवीश कुमार के भीतर एक सच्चा और सरोकारी पत्रकार है तो वह जरूर एनडीटीवी ग्रुप की ब्लैकमनी की कहानी को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम के दौरान दिखाएगा और अगर प्रणय राय राधिका राय आदि मना करता है तो इस्तीफा उनके मुंह पर मार कर आजाद पत्रकारिता करते हुए बाकी पत्रकारों के लिए राह प्रशस्त करेगा. मगर पता है ऐसा वह नहीं करेगा क्योंकि उसे लाखों रुपये महीने चाहिए जो फिलहाल तो सिर्फ एनडीटीवी दे सकता है इसलिए उसे एनडीटीवी और इसके मालिकों के तलवे चाटते हुए, इन्हें बचाते हुए ही शेष क्रांतिकारी पत्रकारिता करनी है.Yashwant SinghPrakash Govind क्या उलजलूल चण्डूखाने की उड़ा रहे हैं ?? लगता है भक्तों से अब फटने लगी है, इसीलिए उन्हें खुश करने को कचरा फैला दिया। सूरज पे मत थूकिए,, खुद पे ही गिरेगा
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    Yashwant Singh
    Yashwant Singh सूरज बाबा, सॉरी रवीश कुमार की जय 😀 बस खुश
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    Prakash Govind
    Prakash Govind पत्रकारिता जगत में एक मात्र बन्दा कुछ कायदे की बात करता है,,, वो भी आपको सहन नहीं हो रहा
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    Yashwant Singh
    Yashwant Singh रवीश के पक्ष में भड़ास पर जितना छपा है, उतना कहीं नहीं छपा होगा, पिछले आठ साल में. तो क्या, उनकी बुराई न छपी जाए, अगर बुराई है तो? मुझे भक्त टाइप आत्माएं अच्छी नहीं लगतीं जो या तो अंध समर्थन करती हैं या अंध विरोध. डेमोक्रेटिक होकर जीना चाहिए. उनकी अच्छाई को सलाम है, बुराई को शेम शेम है.

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  13. सिकंदर हयात

    Ravish Kumar
    17 hrs ·
    देशद्रोह, मुक्त अभिव्यक्ति और निजता को लेकर हाल के दिनों में काफी बहस हुई है। राजनीति ने इसे और गरमा दिया। ये बहसें बता रही हैं कि हमारे भीतर संविधान आधारित नागरिकता की हूक उठ रही है। इसके पहलुओं को समझने के क्रम में हम आधी अधूरी जानकारियों के आधार पर ही लड़ते रहे। ख़ासकर हिन्दी पब्लिक स्पेस में। इस बहस में सबकी अपनी-अपनी राजनीतिक समझ ही हावी रही। संविधानवाद पीछे छूट गया। क़ानूनी विषय को लेकर पब्लिक स्पेस में चर्चा का मौका आया है, इसका मतलब है कि इस बहस का दूसरा चरण भी आएगा। इसी बहस की देन है कि इस दौरान अंग्रेज़ी में देशद्रोह, आस्था का अपमान, कानून व्यवस्था भंग होने का भय, नारेबाज़ी को लेकर दो अच्छी किताबें भी आईं। एक 2016 में आई गौतम भाटिया की। Offend, Shock, Disturb: speech under Indian Constitution, published by Oxford university press. इस किताब पर कभी और लिखूँगा। एक और किताब आई है पेंग्विन से। Republic of Rhetoric: Free speech and Constitution of India. इसे लिखा है अभिनव चंद्रचूड़ ने। काश ऐसी किताबें हिन्दी में भी आती। हिन्दी के पाठक भी इसे पढ़कर अपनी बहस क्षमता को समृद्ध कर सकते हैं। मज़ेदार ज़ुबान में है और दिलचस्प किस्से हैं।
    अभिनव की किताब संविधान में ब्रिटिश क़ालीन निरंतरता और बदलाव को ज़बरदस्त तरीके से रेखांकित करती है। आज़ाद अभिव्यक्ति को लेकर संवैंधानिक अंतर्विरोधों को अभिनव ने उदाहरण देकर उभारा है।
    क्या आप जानते हैं कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के पहले तक सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लंदन स्थित प्रिवि काउंसिल में चुनौती दी जा सकती थी ?
    IPC 1870 का सेक्शन 124-A देशद्रोह का कानून है। सरकार के ख़िलाफ़ नफ़रत और बुरी भावना फैलाना भी इसके तहत आता है। ग़ैर ज़मानती अपराध था। हमारे संविधान मे इसे जारी रखा गया। 1908 में तिलक पर राजद्रोह का मुक़दमा चला था।
    आज़ादी से पहले प्रेस परलएक प्रकार का सेंसरशिप था Prior Restraints. कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेनी होती थी। राजा राम मनोहर रॉय ने इसके ख़िलाफ़ अपील की थी। 1950 के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक माना था!
    भारत में व्यवहार में यह कानून प्रेस पर लागू नहीं होता( दूसरे कई तरीके तो हैं ही) मगर आज भी सिनेमा रिलीज़ होने से पहले अनुमति लेनी होती है।
    2009 में ब्रिटेन ने मानहानि को अपराध की श्रेणी से हटा दिया। भारत के सुप्रीम कोर्ट में मानहानि की संवैधानिकता को चुनौती दी गई तो खारिज हो गया।
    क्या आपको पता है कि ब्रिटिश राज में। एनी बेसेंट, बी जी हॉर्निमन ने आज़ादी के आंदोलन को आगे बढ़ाया। 1919 में बांबे क्रोनिकल के संपादक हॉर्निमन के ब्रिटिश जज ने वापस ब्रिटेन भेज दिया। उनकी याद में मुंबई के एलिफिस्टन सर्किल का नाम हॉर्निमन सर्किल रखा गया। उनके नाम की पट्टिका लगी है जिसमें कहा गया है कि भारत में रहे और यहाँ के प्रेस की आज़ादी के लिए काम किया। क्या आज उनके नाती पोतों को भारत का संविधान मुक्त अभिव्यक्ति का अधिकार देता है? अभिनव कहते हैं कि हमारे संविधान निर्माताओं ने मुक्त अभिव्यक्ति का अधिकार सिर्फ भारतीय नागरिकों को दिया है। क्योंकि हम आज भी विदेशी को शक की निगाह से देखते हैं। वसुधैव कुटुंबकम !
    उसी तरह अश्लीलता को लेकर संवैधानिक प्रावधानों और सार्वजनिक समझ को अभिनव मे मज़ेदार तरीके से रखा है।
    2009 में अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना के ख़िलाफ़ अश्लीलता के आरोप में आपराधिक मामला दर्ज हो गया। एक फैसला शो में ट्विंकल खन्ना ने अक्षय की जीन्स का ऊपरी बटन खोल दिया। यह स्टंट कथित रूप से लेवी के unbuttoned line of jeans को प्रमोट करने के लिए था। किसी को हैरानी हो सकती है कि क्या वाक़ई इससे अश्लीलता फैली या कामुकता पैदा हुई होगी !
    अमरीका में जज सुप्रीम कोर्ट के बेसमेंट में जाकर पॉर्न फ़िल्में देखते थे, जब अश्लीलता का मामला आता था। एक जज नेत्रहीन थे। उनका सहायक सीन दर सीन बोल कर बता रहा था। जज ने कहा क्या शानदार मूव है। एक जज ने कहा कि वे इस तरह के obscenity test के ख़िलाफ़ हैं। एक के लिए जो अश्लील है वो दूसरे के लिए सौंदर्य हो सकता है।
    अभिनव कहते हैं कि भारत में मुक्त अभिव्यक्ति पर सांस्कृतिक धारणाएँ हावी हैं, उन पर संविधान की छाया अभी बहुत कमज़ोर है।
    मैंने एक ही चैप्टर पढ़ा है। जीवन का एक ही मकसद होना चाहिए। जानते रहिए। जानकारी ही जीवन का विस्तार है। आत्मविश्वास है। एक ही चैप्टर में इतना कुछ जाना कि आपको बताने से ख़ुद को रोक नहीं सका। अंडरलाइन करके पढ़ने वाली किताब है। कीमत 599 रुपये है। समीक्षा बाद में, ये सूचना है।Ravish Kumar
    21 mins ·
    ऑस्ट्रेलिया का abc चैनल कल दिन भर ट्विट करता रहा कि भारत के अदानी ग्रुप के बारे में बड़ा ख़ुलासा करने जा रहा है। मैं देख नहीं सका, मगर ये लिंक मिला है।ऑस्ट्रेलिया में अदानी ग्रुप को मिल चुके कोयला खदान के लाइसेंस को लेकर विवाद हो रहा है।
    तभी तो आस्ट्रेलिया का इतना बड़ा चैनल भारत आकर कई हफ़्तों तक इस ग्रुप के बारे में पड़ताल करता है। यह भी शायद पहली बार हुआ होगा कि भारत की किसी कंपनी को लेकर मोंसांटो टाइप का विवाद बाहर की धरती पर हो रहा हो।
    भारत में जब economy and political weekly ने इस समूह के बारे में ख़बर छापी तो संपाद प्रॉंजय गुहा ठाकुर्ता को इस्तीफ़ा देना पड़ा था क्योंकि EPW के ख़िलाफ़ अदानी ग्रुप ने मानहानि कर दिया था। बाद में the wire ने उस लेख को छापा भी। शायद इनके खिलाफ मानहानि का मुक़दमा नहीं हुआ। मगर मेनस्ट्रीम माडिया चुप रहा। आपको उस लेख को इस संदर्भ में दोबारा पढ़ना चाहिए।
    क्या पता अब abc चैनल के ख़िलाफ़ भी मानहानि का मुक़दमा हो जाए? यह ख़बर हट जाए। मुझे कारपोरेट के निवेश की जटिलताएँ कम समझ आती हैं, जब सब लिख लेते हैं तो उनको पढ़ समझ कर लिखता हूँ । कोयला खदान तो भारत में ही बहुत है। वहाँ जाने की क्या ज़रूरत? वैसे झारखंड के चतरा या कहीं और से लोग बहुत फोन करते हैं कि यहाँ बुर हाल है। क्या है, क्यों है, आप ख़ुद भी पता कीजिए।
    जब रिपोर्टिंग ही नहीं होगी तो आपको पता कैसे चलेगा कि करप्शन हुआ है या नहीं। तभी तो लोग दावा करके निकल जाते हैं कि एक करप्शन नहीं हुआ है। हँसा कीजिए। सबूत का दावा करते हैं मगर किसी भी योजना के करीब जाकर सूँघिये करप्शन का समंदर नज़र आ जाएगा। जब सब चुप रहेंगे तो सबूत कहाँ से मिलेगा। आप भी समझते हैं इस खेल को। मुझे ट्रोल करने वाले इसे शेयर कर सकते हैं। स्टोरी का अनुवाद हिन्दी में कर लोगों तक पहुँचा सकते हैं
    आप भी लिंक चटकाएँ और पढ़ें। थोड़ा हिन्दी में बताएँ कि क्या मामला है? जानना ज़रूरी है। जानने के लिए तो रिपोर्टिंग करनी पड़ेगी। भारत में कोई चैनल ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। बिकवा ही देंगे सब मिलकर। इसलिए कम से कम पढ़ कर ही देख लीजिए कि ऐसा क्या है कि सब अदानी ग्रुप के विवाद से डरे रहते हैं।
    वैसे इन कंपनियों को विवाद से कुछ नहीं होता है।अदानी से पहले भी किसी को कुछ नहीं हुआ। हद से हद विवाद होता हैंलेकिन नेता नया स्लोगन, नया ईंवेंट का हंगामा रचकर ऐसे विवादों को धूल की तरह ग़ायब कर देता है और उसी का जहाज़ किराए पर लेकर चुनाव जीत जाता है। सात जनम में आपको ये खेल नहीं समझ आएगा।मीनाक्षी लेखी का ट्वीट : एक अधूरा प्रसंग
    अमरीका का Adjunct लेक्चरर यानी भारत का Adhoc लेक्चरर। बीजेपी सांसद ने गार्डियन अख़बार की Adjunct लेक्चरर की एक स्टोरी ट्वीट करते हुए कहा है कि वे इस पागल दुनिया पर दुखी हैं। अगले ट्वीट में कहती है कि भारत और बांग्लादेश जैसे ग़रीब मुल्क भी सबके लिए शौचालय बना रहे हैं और कैलिफ़ोर्निया जैसा शहर बेघरों के लिए शौचालय बंद कर देता है। मजबूर करता है कि वे बाल्टी में ही शौच करें।
    ट्वीट के प्रति सांसद की नीयत ठीक है मगर अपनी सरकार की योजनाओं को इसमें ठेल देने की उनकी समझ सीमित है। उन्हें नहीं पता जिस बात के लिए अमरीका का मज़ाक उड़ा रही हैं, वही नीति भारत में भी है और भारत के लाखों अस्थायी शिक्षकों को शहरी ग़रीबी के हालात से गुज़रना पड़ रहा है। घटिया शिक्षा नीतियों के प्रति सांसद की ज़रा भी समझ होती तो वे ट्वीट करते समय ध्यान रखतीं कि यह मामला स्वच्छता अभियान के महत्व को उजागर करने का नहीं है और न ही दुनिया पागल है। कोई लेक्चरर पागलपन में अपना जिस्म नहीं बेच रही, कोई पागलपन में सड़क पर शौच नहीं कर रहा है।
    भारत में कालेज और स्कूल के स्तर पर लाखों अस्थायी शिक्षकों की यही हालत है। इसके लिए मीनाक्षी लेखी अकेले ज़िम्मेदार नहीं हैं, वे सभी हैं जो सरकार चलाते हैं और नीतियाँ बनाते हैं। मीनाक्षी जी को ज़रा भी यह पता होता कि भारत में भी यही सिस्टम कई साल से है और शिक्षकों की हालत बदतर है तो वे सहम जातीं।
    भारत में शिक्षक दिवस पर महिमामंडन एक फ्राड कार्यक्रम है। पूरे साल शिक्षक का ख़ून चूसा जाता है, उसे असुरक्षा के साथ जीना पड़ता है, एक दिन हम उनके लिए कार्ड बनाकर ख़ुश हो लेते हैं कि बड़ा सम्मान कर लिया। नेता नैतिक शिक्षा देकर चल देता है कि शिक्षक समाज के निर्माता है। भोली जनता मूर्ख बनकर ख़ुश हो लेती है कि वाह क्या बात कही है नेता जी ने। शिक्षा मित्रों की हालत देख ली होती कम से कम। बीएड करके भी शिक्षक बेरोज़गार है और ग़रीब है।
    कितना तमाशा हुआ था 2014 के साल में शिक्षक दिवस पर। घंटों पहली बार हो रहे उस तमाशे पर चर्चा हुई थी। यही डेटा दे दीजिए कि आपकी सरकार में कालेजों में कितने शिक्षतों की पूर्णकालिक नियुक्तियां हुई है? कितने पद ख़ाली हैं और कितने भरे जाने हैं? भारत के स्कूलों में कई लाख पद ख़ाली हैं। हमने इसका भी ज़िक्र प्राइम टाइम में किया था।
    भारत की सांसद अमरीकी कालेजों के अस्थायी शिक्षकों की दुर्दशा पर दुखी हैं। यह अच्छी बात है। क्या उन्हें पता है कि उनकी ही पार्टी की सरकार जहां जहाँ हैं वहाँ अस्थायी शिक्षकों की आर्थिक स्थिति कैसी है? उनके विरोधी दलों की सरकारें जहाँ बची हैं, वहाँ भी यही हालात है। पंजाब चुनाव के दौरान अस्थायी शिक्षक मिले थे, आधी सैलरी मिलती है, कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं, बता रहे थे कि हमारे पास शादियों में जाने के लिए अच्छे कपड़े तक नहीं। इसलिए नहीं जाते हैं। कालेजों में चाय पीने तक के पैसे नहीं होते हैं चालीस चालीस साल से पढ़ा रहे हैं मगर जीने लायक पैसे नहीं हैं।
    मैं अमरीकी प्रोफ़ेसरों के अस्थायी शिक्षकों के हालात से अवगत हूँ। कभी pro publica नाम की वेबसाइट पर पढ़ा था कि ज़्यादातर Adjunct लेक्चरर ग़रीबी रेखा से नीचे जीते हैं।जी मालिक। सरकारी योजनाओं पर आश्रित रहते हैं और बेघर हैं। इस सूचना का इस्तमाल प्राइम टाइम में भी किया था। तब से इस स्टोरी को वहाँ और भारत में ट्रैक कर रहा हूँ । ये सभी कई साल से कालेज में पढ़ा रहे हैं। अमरीका में शिक्षा का सरकारी बजट भारत की तरह लगातार कम होता जा रहा है।
    आप दिल्ली विश्व विद्यालय के हज़ारों तदर्थ शिक्षकों की कहानी में उतरेंगे तो अमरीका जैसा ही भयावह मंज़र दिखेगा। वे छुट्टियों के उन दो महीनों में क्या करते हैं, कैसे दुबक कर रहते हैं आप जानते भी नहीं। यहाँ के शिक्षक भी ग़रीबी की हालत में जीते हैं। तनाव में रहते हैं और कालेज उनका ख़ूब शोषण करता है। घंटों काम कराता है।
    उनके हालात के बारे में किसी सांसद को पता नहीं। मीनाक्षी लेखी भी नहीं जानती होंगी। पता भी होता तो अस्थायी तौर पर रखे जाने की नीतियों का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं। बाकी सांसदों का भी यही हाल होता। अब सांसदों का काम नेता की योजनाओं का झंडा बैनर लगाकर फोटो खींचाना ही रह गया है। नीति निर्माण में उनकी भागीदारी का ट्वीट कहाँ दिखता है किसी को। बहुत से शिक्षक भी नेता को देखते ही हिन्दू मुस्लिम करने लगते हैं, अपने हालात की बात कम करते हैं ।
    हम शिक्षा नीतियों पर ध्यान नहीं देते। नेता ने हिन्दू मुस्लिम और फर्ज़ी राष्ट्रवाद के टापिक में झोंक कर हमारी हालत भेंड़ जैसी कर दी है। हम दूहे जाते हैं, ऊन के लिए धागे देते हैं और हमीं माँस के लिए जान भी देते हैं। आज भारत के तमाम कॉलेज अस्थायी शिक्षकों से चल रहे हैं। डिपार्टमेंट के डिपार्टमेंट ख़ाली हैं। आप दिल्ली वि वि के साथ अपने ज़िले के कालेज का ही पता कर लीजिए। ज़रूरत हर जगह है मगर हर जगह अस्थायी या ठेके के शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है। फेसबुक के इसी पेज पर लिखा था कि बिहार के कालेजों में सत्तर फीसदी पद ख़ाली हैं। यूपी से लेकर मध्य प्रदेश तक यही हाल होगा, आप पता कर लीजिए।
    गार्डियन की स्टोरी भयानक है। कालेज से पढ़ाकर निकलने वाला लेक्चरर कम कमाई के कारण कार में रहता है। एक लेक्चर जीने के लिए जिस्मफरोशी करती है। डरती है कि कहीं उसका कोई छात्र न चला जाए। कोर्स का लोड कम हो जाने के कारण कमाती कम हो गई है। ये भारत में भी होता है। कोर्स का लोड कम हुआ, लेक्चरर सड़क पर। एक लेक्चरर की माँ मर गई। अगले दिन सुबह आठ बजे क्लास में थीं । भर्राई आंखों से पढ़ाती रही और जब निकली तो एक पार्क में गिर गई। कई टीचर कालेज में काफी बेहतर माने जाते हैं, उन्हें पढ़ाना ही अच्छा लगता है और यही एक काम जानते हैं। गार्डियन की स्टोरी पढ़ेंगे तो आप आख़िर तक नहीं पहुँच पाएँगे।
    ज़्यादातर शिक्षक अस्थायी हैं तो पूरी तनख़्वाह नहीं मिलती है। स्थाई शिक्षक बहुत कम होते हैं, उनका वेतन बहुत ज़्यादा होता है। उन्हें पूरी सुरक्षा मिलती है। अस्थायी शिक्षकों को हफ्ते में आधी कमाई पर चालीस घंटे से भी ज़्यादा काम करना पड़ता है। कमाई का बड़ा हिस्सा शिक्षा लोन चुकाने में चला जाता है। लिंक दे रहा हूँ । पढ़ियेगा।

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  14. सिकंदर हयात

    ऊपर लिंक में रविश का भाषण अदभुत हे बार बार सुनने को जी चाहता हे ये ”भाषण ” बहुत कीमती हे समझिये चाहते तो रविश भी किसी नए चेनेल के हेड बनकर अब तक अरबो नहीं तो करोडो तो बाए हाथ से कमा ही चुके होते मगर उन्होंने करोडो को छोड़कर ये ”भाषण ” हासिल किया हे सुनकर लगता हे की ये सब क्या हे कहा तो रविश हे कहा ये ये अर्णव सांघवी और बड़े बड़े नाम असल में कितने छोटे हे——————- ? खेर हालांकि रविश भाग्यशाली भी रहे अभषेक श्रीवास्तव जैसे प्रतिभाशाली मगर लगभग गुमनाम की पीड़ा भी बिलकुल जायज़ हे और निचे सुरेश श्रीवास्तव ने भी बड़ी सटीक बात कही हम नाकामयाब छुटभय्ये बुद्धजीवी एकतरफ गरीबो और लाचारों को देख कर अपना दिल डुबवाते रहते हे दूसरी तरफ ह्रदयहीन सम्पन्नो को देख कर कुढ़ते रहते हे और मंटो मुक्तिबोध दुष्यंकुमार की तरह ——- Abhishek Srivastava15 hrs · आज बरसों बाद पत्रिकाओं से भरे डिब्‍बों की सफ़ाई हुई। ज़ाहिर है, प्रेरणा दिवाली थी और कर्ता पत्‍नीजी। मैं अकर्मक क्रिया में अवाक् एक दर्शक भर था। देख रहा था कितना कूड़ा किया है मैंने। आपको विश्‍वास नहीं होगा कि आज मुझे पता चला मैंने कितनी समाज-सेवा की है। कम से कम दो दर्जन पत्रिकाओं में खूब लिखा है। दर्द ये है कि दूसरे के बाद कायदे से तीसरी पत्रिका ऐसी नहीं मिली जहां से कभी कोई चेक आया हो या भुगतान हुआ हो। औसतन बारह साल से जमी गर्द को हटाकर मैंने अपने लिखे का डिजिटलीकरण कर लिया। अभी काम बाकी है।इस संदर्भ में एक सूचना उन लोगों के लिए है जो पत्रिकाओं के पुराने अंकों में दिलचस्‍पी रखते हैं। अंग्रेज़ी में टाइम, न्‍यूज़वीक, इकनॉमिस्‍ट, ईपीडब्‍लू, ओपेन, कारवां, इंडिया टुडे इत्‍यादि के कई पुराने अंक पड़े हैं। हिंदी में हंस, कथादेश, पाखी, नया ज्ञानोदय, रचनाक्रम और कई अवांट-बवांट लघु पत्रिकाएं जमा हैं। दिवाली से पहले कोई भला आदमी बोझ हलका कर दे तो बेहतर वरना कबाड़ी में बेच दूंगा। कुछ सामाजिक-राजनीतिक पुस्तिकाएं भी बरामद हुईं जो मैंने पैसे के लिए अनुवाद की थीं। उन पर मेरा नाम नहीं है। कोई आए तो ले जाए।Abhishek Srivastava
    वैसे, एक बात बताऊं! अगर मैं अंग्रेज़ी में पैदा हुआ होता तो अपने लिखे से मेरे पास बहुत पैसा होता। सौ करोड़ का दो-चार मुकदमा भी लदा होता। फिर मैं चौड़े से सबसे चंदा मांग लेता। लगे हाथ साहसी भी कहलाता। हिंदी में चंदा मांगना बहुत अपमानजनक होता है। सोचिए, लघु पत्रिकाओं के लिए फोकट में लेख लिखना और उन्‍हीं के संपादकों के जेबी संगठनों के लिए चंदा मांगना कितना आत्‍महीन अनुभव हो सकता है। आदमी बकरी बन जाता है। केजरीवाल की कार बरामद होने के बहाने ही खुश हो लेता है। अच्‍छा, याद आया- अब किताबों की सफ़ाई के दौरान चांदी की मछलियां नहीं मिलती हैं। किसी ने देखा है क्‍या इधर बीचAbhishek SrivastavaLike · 1 · 12 hrs
    ManageJitendra RamprakashJitendra Ramprakash Abhishek – कबाड़ी को कतई मत बेचिएगा. पुस्तकें आप ग्रामीण क्षेत्र में शुरू हुए हमारे विद्यालय को दान दे सकते हैं. दो मित्रों ने साहित्य, कला, राजनीति सहित विभिन्न विषयों पर 200 से अधिक पुस्तकें भेंट की हैं. मैने अपनी पुस्तकें भी दी हैं. बरसों बच्चों के काम आएँगी. एक व्यक्ति को देने से भी बेहतर है.
    कबाड़ी को पुस्तकें देने की बजाए उससे कारटन ले कर पैक कर दीजिए. मैं आपके पते से मंगवा लूँगा.
    Abhishek Srivastava
    Abhishek Srivastava जी, ठीकAbhishek Srivastava replied · 1 Reply
    Suresh Srivastava
    Suresh Srivastava अभिषेक जी, जैसा मार्क्स ने समझाया था, हम जैसे निम्न मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की विडंबना यही है; विपन्न की विपन्नता से द्रवित और संपन्न की संपन्नता से लालायित, धोबी का कुत्ता घर का न घाट का। जो किसी एक तरफ जुट जाता है, अपना मुक़ाम पा लेता है।Abhishek Srivastava is with Pankaj Srivastava and Anil Chaudhary.
    17 hrs · Ghaziabad ·
    देखिए कौन-कौन पत्रकारिता का पवित्र हवाला देता है इस देश में! जिस महिला रिपोर्टर ने कल रिपब्लिक टीवी के अर्णब गोस्‍वामी पर अपनी जासूसी और प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए इस्‍तीफ़ा दिया था, उसी ने रिपब्लिक टीवी के लॉन्‍च पर अपने बॉस के कहने पर प्रतिष्ठित परमाणु ऊर्जा विरोधी कार्यकर्ता S P Udayakumaran का स्टिंग कर के देश के हज़ारों आंदोलनकारियों को बदनाम किया था। यह रिपोर्टरा एक छात्रा के वेश में एसपी के घर पहुंची, आतिथ्‍य का पूरा फायदा उठाया और ”पीठ पीछे छुरा भोंक दिया”। अब उसे दर्द हो रहा है अपने बॉस की जासूसी से, तो कह रही है कि उसके खिलाफ़ बोलना ”पत्रकारिता” है।
    पढि़ए एसपी उदयकुमार का पत्र जो उन्‍होंने जासूस पत्रकार श्‍वेता कोठारी उर्फ फर्जी छात्रा श्‍वेता शर्मा को लिखा है। शायद कभी इस रिपोर्टर को अपने अनैतिक कृत्‍य का अहसास हो, हालांकि अतीत में ऐसे सबक मिलते नहीं। याद करिए कैसे एनडीटीवी की रिपोर्टरा नीता शर्मा (तत्‍कालीन हिंदुस्‍तान टाइम्‍स) ने इफ्तिखार गीलानी को बरसों पहले बदनाम किया था। आज तक उन्‍होंने माफ़ी नहीं मांगी है, लेकिन पत्रकारिता के ढेरों पुरस्‍कार बेशक बंटोर चुकी हैं। इसे कुछ शिष्‍ट लोग सेलेक्टिव मोरलिटी कहते हैं। हम लोग पाखण्‍ड कहते हैं!———————————————– ”Abbas Pathan
    20 hrs ·
    जब 2013 में सभी पार्टियां अपने अपने झंडे गाड़ने में लगी थी तब राहुल गांधी “राइट टू फूड बिल” लागू करवाने की जद्दो जहद कर रहे थे। आखिर “राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम” लागू हो गया। इस बिल का फायदा सीधे देश के 2 तिहाई गरीब लोगों को पहुँचा, वे क्रमशः 1, 2 और 3 रु किलो अनाज खरीदने लगे। गर्भवती व प्रसूति महिलाओं को खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत आर्थिक सहायता मिलने लगी। आंगनवाड़ियों और सरकारी स्कूलों में मिड डे मील मिलने लगा। उस समय भारत hunger index में 63 वे नम्बर पे था। राहुल गांधी को भी शायद ये बात दिन रात खाई जाती होगी के क्यो भारत जैसे मुल्क में लगभग 1000 लोग प्रतिदिन भूखमरी से मर जाते है। 2011 से राहुल संसद में राइट टू फूड के लिए चिल्लाते और उस समय सारे नेता ऊंघ रहे होते थे.. संसद और मीडिया में बैठे लोगो के पेट भरे हुए होते है इसलिए भूख कभी मुद्दा नही बन सकी और भूखे में इतना सामर्थ्य नही की वे खुद का मुद्दा उठा सके.. प्राय भूखों का मुद्दा भरे हुए पेट वाले ही चर्चा में लेते है।ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2014 में भारत 55 वे स्थान पे था, तब भूख एक मुद्दा बनकर गुजरा था… लेकिन आज ऐसा विकास हुआ की कार्पोरेट वर्ग 26% मोटा हो गया और भारत भूख के इंडेक्स में 45 अंक से लुढ़ककर 100 वे रेंक पे जा पहुँचा। खैर तुम्हे भूख से लेना देना क्या है.. मध्यम वर्गीय का भाषणो से पेट भरता है। जिस रेंक पे हम पहुँचे है ये वो रेंक है जिसमे शहरी परिवार पड़ोसी से 2 किलो आटा मांगता है और ग्रामीण ये सोचता है कि कोई मरे औऱ हम उसका मृत्युभोज खाने जाए।सोचकर देखिये जिस आदमी को आप पप्पू कहते है उसने राइट टू फ़ूड पे जोर ना दिया होता तो भारत 2013 में 63 वी रेंक से 2014 में 45 वी रेंक पे ना आया होता इस तरह से आज हम ही 119 वी रेंक के सबसे बड़े भूखे हो गए होते। राहुल गांधी भी तुम्हारे अंदर विराजमान देवताओं को प्रसन्न करने के लिए धर्म की राजनीति करने लगते तो शायद पप्पू की बजाय ह्रदय सम्राट बन गए होते। उन्हें भी रोटी और रोजगार की सीधी सी बात करने के बजाय उकसाऊ भाषण देने की कला आती तो शायद उनकी आवाज़ में इस भूखे नँगे लोगो के देश को शेर की दहाड़ सुनाई देती।
    खैर आगे स्थिति और भी भयानक आने वाली है, देश मे जितने भी कमाऊ पूत है उनमें सबसे अधिक उन लोगो की संख्या है जो कड़े संघर्ष के बाद महीने में 10 हज़ार के आसपास कमा पाते है और ये 10 हज़ार बिजली पानी पेट्रोल, किराया और गैस में ही खर्च हो जाता है.. आटा उन्हें भाषणों से मिलता है या घर की औरतो की उम्दा वाणिज्य नीति के कारण ये शोध का विषय है।आखरी बात.. इस देश मे यदि पत्थर कंकर के धर्म स्थलों की बजाय आटे के धर्म स्थल और मूर्तियां होती तो हम तोड़ तोड़ कर खा गए होते।Abbas Pathan

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  15. सिकंदर हयात

    Ravish Kumar
    20 October at 17:11 ·
    बुलेट ट्रेन से संबंधित सारे विवाद थम चुके हैं। जिसे जो कहना था, कह लिया। इस बहस के दोनों पक्षों को सुनते मैंने हिसाब लगाने की कोशिश कि एक राजधानी ट्रेन कितने में पटरी पर आ जाती होगी। इधर उधर से कुछ जानकारी जुटाई है।
    आमतौर पर एक राजधानी में इंजन के अलावा दो पावर कार, थ्री एसी के बारह कोच, सेकेंड एसी के छह कोच, फ़र्स्ट एसी के तीन कोच होते हैं।
    एक इंजन चौबीस पचीस करोड़ का आता है। एक कोच की कीमत दो से तीन करोड़ की होती है। हर श्रेणी के कोच की कीमत में पंद्रह से पचास लाख का अंतर होता है। इस तरह हिसाब करें तो राजधानी एक्सप्रेस की कुल कीमत अस्सी करोड़ के करीब होती है। अब एक बुलेट ट्रेन पर ट्रेन सहित नया ढांचा तैयार करने में हम एक लाख करोड़ ख़र्च करने वाले हैं। अगर हम इस एक लाख में अस्सी करोड़ से भाग कर हिसाब लगाए तो पता चलेगा कि एक बुलेट ट्रेन के ख़र्चे में 1250 राजधानी एक्सप्रेस आ सकती है। ये आंकड़ा मोटामोटी सही है । किसी के पास और जानकारी हो तो सुधार की गुज़ाइश है।
    मुझे नहीं पता इस वक्त कितनी राजधानी एक्सप्रेस है और कितनी उसकी बाद की कैटेगरी की। अगर हम तेरह सौ राजधानी एक्सप्रेस लाँच कर दें तो भारतीय रेल की औसत गति एक ही बार में या कम समय और कम लागत में बढ़ जाएगी। कई एक्सप्रेस और सुपर फास्ट ग़ायब हो जाएँगी। हर दूसरी ट्रेन राजधानी हो सकती है ।
    क्या इस हिसाब से देखना सही रहेगा? वैसे कुछ दिन पहले पटना राजधानी आठ घंटे लेट आई थी।Ravish Kumar added 2 new photos.
    1 hr ·
    राजस्थान पत्रिका बड़ा अख़बार है। इसके संपादक गुलाब कोठरी का संपादकीय पढ़िए। राजस्थान में प्रस्तावित नए विधेयक के बारे में लिखा है। मेरा पोस्ट भी इस विधेयक पर इसी पेज पर है। राजस्थान पत्रिका ने लगातार आवाज़ उठाई है। सबसे पहले गुलाब कोठारी ने ही लिखा था कि किस तरह विज्ञापन रोक कर उनके अख़बार को वित्तीय रूप से कमजोर किया जा रहा है और अब वे बग़ैर सरकारी विज्ञापन के ही अख़बार चलाएँगे। हिन्दी में भी कुछ लोग हैं, जो अपने बिजनेस को दाँव पर लगाकर हस्तक्षेप और नियंत्रण का विरोध कर रहे हैं। मुझे पता है कि लोग इस अखबार का अतीत भी खंगालेंगे लेकिन जो वर्तमान में खड़ा होता है गिनती उसकी होनी चाहिए । वहाँ से शुरू होनी चाहिए। आज कल हर सवाल और साहस को ध्वस्त करने के लिए लोग लगा दिए जाते हैं। जब तक आप संत नहीं हैं तब तक सवाल नहीं कर सकते। संत सिर्फ सरकार और उसमें बैठे नेता हैं। जल्दी ही उन लोगों को तैनात कर दिया जाएगा जो गुलाब कोठारी पर गोले और गालियाँ दागेंगे। तब आप कहाँ थे पूछ कर । डरा देने के इस दौर में जो नहीं डर रहा है, उसकी हिम्मत को पहचानिए। आसान नहीं है इतना मुखर होकर लोकतंत्र विरोधी कानून का विरोध करना। यह बिल प्रेस और नागरिकों के ख़िलाफ़ है। अधिकारियों के भी ख़िलाफ़ है। आवाज़ दबाने की हर कोशिश का विरोध होना चाहिए। किसी भी सरकार का मूल्याकंन पहले इस बात से होना चाहिए कि प्रेस कितना स्वतंत्र है न कि फ़्लाई ओवर या एयरपोर्ट से ।Ravish Kumar
    23 hrs ·
    क्या कोर्ट को भी एफ आई आर के लिए सरकार से पूछना होगा?
    जयपुर से हर्षा कुमारी सिंह ने khabar.ndtv.com पर एक रिपोर्ट फाइल की है। ख़बर न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया ने भी इस बारे में लिखा है। मैंने विधेयक का प्रावधान तो नहीं पढ़ा है लेकिन मीडिया में आ रही ये ख़बरें डरे हुए प्रेस को और भी डराने वाली हैं।
    राजस्थान में वसुंधरा सरकार सोमवार से शुरू हो रहे विधानसभा के सत्र में एक ऐसा विधेयक लाने जा रही है जो सांसद, विधायक, जज और अफसरों को कानूनी कार्रवाई से कवच प्रदान करेगी। जजों के ख़िलाफ़ तो वैसे भी कोई न तो पब्लिक में और न ही मीडिया में बोलता है मगर जजों को इसमें जोड़ कर एक किस्म की व्यापकता का अहसास कराया जा रहा है। ये बिल पास हुआ तो
    बग़ैर सरकार की अनुमति के अफसरों के ख़िलाफ़ कोई एफ आई आर नहीं होगी। 180 दिनों तक अनुमति नहीं मिलेगी तो कोर्ट के आदेश से एफ आई आर होगी।
    180 दिन लगाकर सरकार उन सबूतों के साथ क्या करेगी, यह बताने की ज़रूरत नहीं है। मतलब आपको इंतज़ार करना पड़ेगा कि सरकार 180 दिन के भीतर सारे सबूत मिटा दे, अपने अफसर को बचा ले और अनुमति भी न दे तब आप अदालत जाएंगे कि इस बचे खुचे मामले में कोई एफ आई आर हो सकती है हुज़ूर?
    घोटाले की ख़बरों को बाहर आने से हर हाल में रोका जाए, इसका इंतज़ाम किया जा रहा है ताकि पब्लिक को बताया जा सका कि हमारी सरकार में तो घोटाला हुआ ही नहीं। फिर एफ आई आर की व्यवस्था को ही मिटा देनी चाहिए। यही सुरक्षा या कवच आम नागरिकों को भी दे दीजिए।
    हर्षा ने लिखा है कि इस बिल के अनुसार किसी जज या अफसर की किसी कार्रवाई के ख़िलाफ़, जो कि उसने अपनी ड्यूटी के दौरान की हो, आप कोर्ट के ज़रिए भी एफ आई आर नहीं करा सकते हैं। ऐसे मामलों में सरकार की मंज़ूरी लेनी होगी।
    प्रावधान देखकर ही और स्पष्टता आएगी लेकिन अगर ऐसा है तो क्या अदालत भी एफ आई आर के लिए 180 दिनों तक इंतज़ार करेगी? क्या उसे भी पहले सरकार से पूछना होगा कि एफ आई आर के आदेश दे या नहीं? क्या इसके ज़रिए लोकतंत्र के उन कार्यकर्ताओं को बांधा जा रहा है जो घोटालों का उजागर करते हुए कोर्ट चले जाते हैं और एफ आई आर का आदेश तक ले आते हैं?
    इस प्रावधान का क्या तुक है कि जब तक एफ आई आर नहीं होगी तब तक प्रेस में रिपोर्ट नहीं कर सकते हैं और ऐसे किसी मामले में नाम लिया तो दो साल की सज़ा हो सकती है। एक नागरिक के तौर पर आप सोचिए, इसके बाद आपकी क्या भूमिका रह जाती है?
    क्या सरकार का भजन करना ही आपका राष्ट्रीय और राजकीय कर्तव्य होगा? ऐसे कानून के बाद प्रेस या पब्लिक पोस्ट की क्या हैसियत रह जाएगी? आप क्या कहानी लिखेंगे कि फलां विभाग के फलां अफसर ने ऐसी गड़बड़ी की है, क्योंकि आप लिख देंगे कि समाज कल्याण विभाग के सचिव का नाम आ रहा है तो यह भी एक तरह से नाम लेना ही हो गया।
    धीरे-धीरे वैसे ही प्रेस पर नियंत्रण कायम होता जा रहा है। पूरा सिस्टम ढह चुका है। आप सिस्टम को लेकर सवाल नहीं करते हैं। इस नियंत्रण का नतीजा यह है कि अब ख़बरों में ख़बर ढूंढनी पड़ती है। दुर्घटना की ख़बरों के अलावा किसी ख़बर की विश्वसनीयता रह नहीं गई है।
    ये प्रेस से ज़्यादा नागरिकों की आज़ादी पर हमला है। प्रेस तो अपनी आज़ादी गंवा कर एडजस्ट हो ही चुका है। मालिकों और संपादकों की मौज है। जनता मारी जा रही है। वो कराह रही है मगर मीडिया में आवाज़ नहीं है।
    सरकारें ख़ुद से तो घोटाला पकड़ती नहीं हैं। प्रेस और नागरिक संगठनों के ज़रिए ही मामले सामने आते हैं। वे किसी अधिकारी की भूमिका को लेकर लगातार दबाव बनाते हैं तब जाकर सरकार एक ईंच हिलती है। क्या सरकारें मानने लगी हैं कि अधिकारी ग़लत नहीं हो सकते हैं। इस तरह के कानून खुलेआम बन रहे हैं। मालूम नहीं कि इस कानून की आलोचना की इजाज़त है या नहीं।
    किसी भी सरकार का मूल्यांकन फ्लाईओवर या हाईवे से नहीं होना चाहिए। सबसे पहले इस बात से होना चाहिए कि उसके दौर में मीडिया या लोक संगठनों को बोलने लिखने की कितनी आज़ादी थी। अगर आज़ादी ही नहीं थी तो आप किस सूचना के आधार पर किसी सरकार का मूल्यांकन करेंगे?
    यही विधेयक अगर विपक्ष की कोई सरकार लाती तब भक्त लोग क्या कहते, तब बीजेपी के ही प्रवक्ता किस तरह के बयान दे रहे होते?
    अगर इसी तरह से अपनी आज़ादी गंवाते रहनी है तो मैं आपके भले के लिए एक उपाय बताता हूं। आप अख़बार ख़रीदना और चैनल देखना बंद कर दीजिए। मैं सात साल से चैनल नहीं देखता। बिल्कुल न के बराबर देखता हूं। ऐसा करने से आपका महीने का हज़ार रुपये बचत करेंगे।
    मीडिया का बड़ा हिस्सा कबाड़ हो चुका है, कृपया आप अपनी चुप्पी का कचरा डालकर इस कबाड़ को पहाड़ में मत बदलिए।—————————————————————————————————————————————–Abbas Pathan
    16 hrs · भारत को जातिगत आरक्षण से मुक्त करना भाजपा के एजेंडे में है किन्तु इसके खिलाफ अभी बीजेपी खुलकर मोर्चा खोलने की स्थिति में नही है। आरक्षण मुक्त करने के पक्ष में केवल भाजपा ही नही बल्कि और भी सेकड़ो संघटन और दल है जो चाहते है “कोई भी सक्षम होने के बावजूद लंगड़ा घोड़ा लेकर ना दौड़े ” । भाजपा ने जिस दिन अपने संकल्प की और बढ़ना शुरू कर दिया उस दिन आरक्षण के विरुद्ध देशभर में ऐसी हवा चलेगी की हर कोई खुद बा खुद भाजपा के साथ जुड़ने लगेगा। कैसे , पढिये।Abbas Pathan
    सबसे पहले कोई नेताजी दलितों की नौकरियों के विरुद्ध विवादित बयान देंगे फिर मिडीया चार बेलगाम लोगो को लाकर बहस करने बैठा देगी। वे चार गधे ऐसे स्टाइल में बहस करेंगे मानो पूरा भारत बोल रहा हो। छोटी छोटी घटनाओं को मीडिया हाईलाइट करेगा जैसे तलाक और लव जिहाद के समय किया गया था। जरा सी चूक पे लीड स्टोरीज कवर होने लगेगी। कोई डॉक्टर यदि ऑपरेशन में सफल ना हो सका तो इस असफलता का ठीकरा आरक्षण पे फोड़ा जाएगा.. कोई कैदी जेल तोड़कर भागा तो आरक्षण प्राप्त पुलिस कर्मियो की परेड मिडीया कराएगा। कही कोई प्रशासनिक चूक हुई तो इसका कसूरवार आरक्षण को ठहराया जाएगा। अच्छे मार्क्स लाने वाले छात्रों की ढल चुकी उम्र दिखाई जाएगी जो नौकरी के लिए तरसते रह गए। गरीब जनरल परिवारों को खोज खोजकर स्टूडियो लाया जाएगा ताकि वे रोए और देश भावुक हो । जिस तरह शहीद सैनिको के परिवार वालो लाया जाता है ताकि वे रोये और आपके अंदर का देशभक्त जागे। ये भी ज्ञात रहे कि शहीद सैनिको के उन परिवारों को कभी स्टूडियो नही लाया जाता जिनकी आर्थिक सामाजिक स्थिति बेहद खराब हो चुकी है, जबकि ऐसे मजबूर परिवारों की कोई कमी नही है।
    जिस तरह गाय गोबर तलाक राष्ट्रीय समस्या बन चुके थे उससे भी तेज रफ्तार की राष्ट्रीय समस्या आरक्षण को साबित जाएगा। ऐसे लोगो को छांटकर आगे लाया जाएगा जो अनुसूचित जाति जनजाति से आते है और आरक्षण का विरोध करते है। ऐसे लोगो को राष्ट्रवादी मिडीया देशभक्त नायक की तरह प्रस्तुत करेगी। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे इस्लाम के विरुद्ध बोलने के लिए तारिक फतह को लाया गया था और पर्सनल लॉ बोर्ड के विरुद्ध बोलने के लिये चंद बुर्खे वाली औरतो को उठा लाए थे ताकि करोड़ो लोगो की आवाज दबाकर इनकी आवाज लोगो को सुनाई जाए और देश को लगे कि यही तमाम महिलाओ की शुद्ध आवाज है।
    यही तो लक्ष्य है एक देश एक कानून यानि समान आचार संहिता.. एक देश एक टैक्स यानि जीएसटी और सभी के पास चार टांगो वाला घोड़ा.. अब दोड़ो और जीतो।
    तैयार रहिये.. आपने हिन्दू मुस्लिम, जातिवाद क्षेत्रवाद के नाम पे बहुत वोट लुटाए है, अब वो समय करीब है जब देश आरक्षण के मुद्दे पे पार्टी चुनेगा।Abbas Pathan

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  16. सिकंदर हयात

    Ravish Kumar
    1 December at 00:20 ·
    कई बार उम्मीदें ज़रूरत से ज़्यादा बोझ डाल देती हैं। हर आंधे घंटे पर कोई फोन पर होता है, उसकी कहानी अर्जेंट भी होती है और दर्दनाक भी, पर मैं तो अकेला ही होता हूं। सबकी बात इसी से ख़त्म होती है कि आप ही से उम्मीद है। मैं किससे उम्मीद करूं। मैं किसकी तरफ़ देखूं। ना कहते कहते अपराध बोध से घिर जाता हूं। एक तो बोलने के लिए बुलाने वालों ने रूला दिया है और दूसरा अपनी व्यथा सुनाने वालों ने। न तो क्षमता है न संसाधन। हम बहुत सीमित संसाधन में काम करते हैं। किस किस की स्टोरी करूँ । फोन पर सुनते सुनते कान में दर्द हो गया है। व्हाट्स अप खोलो तो लोग पहले से घेरने के लिए मौजूद रहते हैं। रोज़ दस से पंद्रह लोग अपनी कहानी लेकर मिलने चले आते हैं। पता नहीं यह किस वजह से हो रहा है। क्या बाकी चैनलों में पत्रकारों ने लोगों से मिलना बंद कर दिया है? क्या वहां लोगों की स्टोरी नहीं हो रही है? कई बार ऐसे लोग मिलते हैं जिनकी स्टोरी अखबारों में कवर हो चुकी होती है, मगर कोई असर नहीं होता। आज एक किसान चुरू से चले आए। बीस दिन से उनके साथी धरने पर हैं। मैं घड़ी देखता हुआ भागा जा रहा था। उसके पहले चार लोग दो सौ पन्ने का दस्तावेज़ लेकर घेरे हुए थे। एक- एक पेज लेकर समझाने लगे। एम्स के डाक्टर जैसी हालत हो गई है। मुझे पता है कि आपको उम्मीद है, मुझे यह भी पता है कि मैं सबकी उम्मीद पूरी नहीं कर सकता। ना कह देता हूं, मगर ना कहने की प्रक्रिया इतनी सामान्य नहीं है। कहते हुए भी बुरा होता है, दूसरी तरफ की आवाज़ मायूस होने लगती है और फोन बंद करने के बाद नींद से लेकर हंसी तक ग़ायब हो जाती है। थोड़ा सोचिएगा। हो सके तो मुझे कुछ दिनों के लिए अकेला छोड़ दीजिए। अपनी लड़ाई ख़ुद लड़िए। मैं भी हारी हुई लड़ाई लड़ रहा हूं. आप भी लड़िए।अपनी उम्मीदों से मुझे अपराधी मत बनाइये। मैं इतनी उदासी नहीं ढो सकता। इस वक्त जब यह लिख रहा हूँ महाराष्ट्र से आठ लोग पिछले दो घंटे से बाहर इंतज़ार कर रहे हैं। मुझे पता है आप इसे आशा और निराशा के फ्रेम में ही देखेंगे। उसकी बात नहीं है।
    See TranslationRavish Kumar
    1 December at 0——————————–Abhishek Srivastava added 2 new photos.
    13 hrs ·
    अगर EVM में गड़बड़ी की बात वाकई अफ़वाह है और इस पर बात करने वाले अफ़वाहबाज, तो इस अफ़वाह को फैलाने का सबसे पहला और मौलिक श्रेय भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्‍ता जीवीएल नरसिम्‍हाराव तथा प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री से पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में जा पहुंचे भाजपा के शिल्‍पकार लालकृष्‍ण आडवाणी को जाना चाहिए जिन्‍होंने 2010 में यानी आज से सात साल पहले ईवीएम मशीन के खिलाफ एक किताब प्रकाशित की थी ”डेमोक्रेसी ऐट रिस्‍क” यानी ”खतरे में लोकतंत्र”।
    उनको लोकतंत्र खतरे में दिखे तो किताब लिख मारेंगे। हमको लोकतंत्र खतरे में दिखे तो अफ़वाह? ऐसे कैसे चलेगा? पूरी किताब पढ़नी है? भाजपा की नज़र से ईवीएम को समझना है? नीचे दिए लिंक पर जाएं और डाउनलोड करें। उससे पहले हालांकि एक बात समझ लें- सबसे पहले जिसे खतरा दिखता है वही सबसे पहले उसका समाधान भी खोजता है। 2010 में भाजपा ने ईवीएम का खतरा सूंघ लिया था। सात साल में उसने इस मशीन को पालतू बना लिया है। इसीलिए वह दूसरों पर हंसती है, मज़ाक उड़ाती है जब वे लोकतंत्र पर खतरे की बात कहते हैं।
    एक बार और डाल चुका हूं। फिर शेयर कर रहा हूं। यह किताब पढि़ए। Abhishek Srivastava
    15 hrs ·
    समाज के अलग-अलग संस्‍तर अपने-अपने हिसाब से चुनावों में शिरकत करते हैं। सांसदी के चुनाव से जुड़ा नागरिक समाज-समुदाय का सबसे भारी आदमी होता है। पार्षदी के चुनाव में सक्रिय नागरिक गली-मोहल्‍ले का डॉन होता है। विधायकी लेवल के लोग अकसर सूबों की राजधानियों से जुड़े होते हैं, लिहाजा काम करवाने की दृष्टि से सबसे मुफीद होते हैं। याद पड़ता है कि मार्च में यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे के वक्‍त राज्‍य के कोने-कोने से जब ईवीएम की गड़बड़ी की ख़बर आई थी, तो उस ख़बर से वे लोग ही मुतमईन थे जो विधायकी चुनाव के स्‍तर पर ऑपरेट करते हैं या उस दायरे में वोट प्रबंधन करते हैं। गली-मोहल्‍ले के आम नागरिक ईवीएम की बात करने वाले को गरिया रहे थे। बड़े रसूखदार लोग ईवीएम की बात को हंस कर उड़ा देते थे।
    इस बार यूपी के नगर निकाय चुनाव दो कारणों से अहम माने जाने चाहिए। पहला कारण ईवीएम है। मेरे मोहल्‍ले से लेकर सहारनपुर तक बेहद ग्रासरूट लेवल पर यह धारणा पुख्‍ता हुई है कि ईवीएम में समस्‍या है। आप सड़क पर निकलिए और अपने वार्ड के थोड़ा प्रभावशाली लोगों से बात करिए। जो लोग मार्च तक ईवीएम की गड़बड़ी को नकारते थे, उनकी धारणा बदली हुई मिलेगी। स्‍थानीय स्‍तर पर पार्षदी के चुनाव में सक्रिय नागरिकों को इस बार प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से महसूस हुआ है कि ईवीएम से कमल का फूल निकलता है। इस मशीन के भीतर कीचड़ ही कीचड़ भरा है। इस चुनाव के अहम होने का दूसरा कारण मीडिया की एकतरफ़ा कवरेज है 16 में से 14 वाली। कुल चार करोड़ मतदाताओं वाले त्रिस्‍तरीय चुनावों में केवल 35 लाख मतदाताओं वाले चेयरमैनी के चुनाव की असंतुलित कवरेज का गुस्सा लोगों में साफ़ दिख रहा है।
    एक छोटा सा उदाहरण इस बात को आज़माने के लिए काफी होगा। दिल्‍ली एनसीआर में रहने वाले लोग खोड़ा हो आवें। खोड़ा में बसपा की वफ़ादार फौज रहती है मतदाताओं की। वहां कुल 2400 वोट हैं जिनमें 80 फीसदी से ज्‍यादा मुस्लिम वोट हैं। इस बार यहां के 1800 मुस्लिम वोट कमल को गए हैं। लोग हतप्रभ हैं। उन्‍हें समझ नहीं आ रहा कि ये क्‍या और कैसे हो गया। एक प्रत्‍याशी तो ऐसा है जिसके परिवार में उसके समेत कुल 12 वोट थे। नतीजा आया तो पता चला कि उसे अपना ही वोट नहीं मिला है। आज शाम वह सड़क पर हंसता दिखा। उसके ग़म के साझीदार इलाके के सबसे कट्टर हिंदू मतदाता थे जिन्‍होंने त्रिशूल को वोट दिया था। बस देखते जाइए, ये ईवीएम आने वाले दिनों में सामुदायिक सौहार्द और एकता का बायस बनेगा।
    See Translation——————-Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    3 hrs ·
    जिस तरह कोई सच्चा और अच्छा मुसलमान कभी नहीं चाहेगा , कि उसके बान्धव साम्प्रदायिकता , रूढ़िवाद और अशिक्षा के अंधकार में रहें , उसी तरह एक धर्म निरपेक्ष और आधुनिक ब्राह्मण के नाते मैने कल एक पोस्ट डाली । मेरा अभिप्राय यह है कि ब्राह्मण अंध विश्वास , पोंगा पंथी और जनेऊ – चोटी में न उलझ , मॉर्डन बने । घण्टी बजा कर दक्षिणा की भीख के भरोसे रहने की बजाय इंजीनियर , डॉक्टर और विज्ञानी बनें । मैने बचपन मे अपने पुत्र को सर्व प्रथम मटन खाना सिखाया , और उसके मन से रूढ़ियों को तोड़ा , इसी लिए वह आज अभियांत्रिकी पढ़ रहा है । साम्प्रदायिक , जातिवादी , रूढ़िवादी और गतानुगतिक तथा दूसरे को स्वयं से नीचा समझने वाला ब्राह्मण सबसे पहले स्वयं का शत्रु है ।
    मेरी इस पोस्ट पर कुछ कथित गधे नुमा ब्राह्मणों ने हाय तौबा मचाना शुरू किया , लेकिन मैं डिगा नहीं । क्योंकि मैं जानता था , की उनमे अधिसंख्य कुंठित तथा लुटे पिटे मनुष्य अथवा अपराधी किस्म के नेता हैं । कुछ गधे यूं ही उनके सुर में सुर मिलाने लगे । कुछ मुझसे व्यक्तिगत रंजिश रखते थे । अतः विषय वस्तु को छोड़ , मुझ पर व्यक्तिगत आक्षेप करने लगे ।
    इसी लिए में कहता हूं कि मेरी भाषा और अभिव्यक्ति के तेवर को आत्मसात करना हर किसी के वश का नहीं । कमज़ोर ग्रहणशीलता वाले जातक मेरी पोस्ट न पढ़ें ,अथवा किसी पढ़े लिखे व्यक्ति से उसका भाष्य करा लें । मैं अपने लिखे हर शब्द पर कायम हूँ ।Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    Yesterday at 12:17 ·
    गुजरात चुनाव के मद्दे नज़र किस मूर्ख ने राहुल गांधी का जनेऊ वाला फ़ोटो प्रचारित किया है ? वह जनेऊ उसने अपनी बहन की शादी के अवसर पर किसी ब्राह्मण के कहने पर रस्म के लिए कुछ देर टांगा होगा । दीख ही रहा है कि उसने वास्कट के ऊपर झोले की तरह जनेऊ लटका रखा है ।
    भारत का ब्राह्मण समुदाय युगों से चारों वर्णों में सर्वाधिक धूर्त , मक्कार , ठग और मुफ्त खोर रहा है । ब्राह्मणों ने क्षत्रिय राजाओं के साथ गठ बन्धन , बल्कि ठग बन्धन कर उन्हें मान्यता प्रदान की , तथा शेष कृषक , श्रमिक समुदाय को लूटने का मार्ग प्रशस्त किया । क्षत्रिय फिर भी रण में तलवार ले लड़ता रहा , जबकि ब्राह्मण सिर्फ धोती , चोटी , घण्टी और जनेऊ इत्यादि आडम्बरों के सहारे मज़े लूटता रहा । इन्होंने पूर्व जन्म और परलोक जैसी स्थापनाएं गढ़ कर समाज को मूर्ख बनाया । ग्रह पूजन के नाम पर आज भी ठगी करते हैं । इन्हें भारतीय दंड संहिता की दफा 420 के तहत अंदर करना चाहिए । अगर ग्रह पूजन से समृद्धि आती है , तो तू खुद क्यों यजमान से आटा , चावल ,तेल और धन की भीख मांगता फिरता है बे ? अपने भगवान से जो सम्पदा यजमान को दिलवाने वाला है , वह पहले खुद तो हासिल कर ले ।
    ऐ मूर्ख कांग्रेसी , बन्द कर ये जनेऊ की बकवास । नहीं करता , तो इसी बात पर इन्हें माइनस वोटिंग के शिकंजे में कसो । क्या तर्क गढ़ता है , कि जनेऊ कान पर लपेटने से पेशाब खुल कर आता है । जो शेष विश्व जनेऊ नहीं पहनता , उनका आधा पेशाब अंदर ही रह जाता है क्या ? कालांतर में तेरी समवेत पिटाई हो , इससे पहले चेतRajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    Yesterday at 05:54 ·
    इतरा मत । यह नगरों का चुनाव है । 80 फीसद भारत अभी भी गांवों में बसता है । नगरों में लाला , बैंकर , ट्रांसपोर्टर , एडवरटाइजर और डिसाइनर रहता है । वह पहले से ही प्रतिक्रियावादी है । जब गांवों में लोगों को जनसंघ का ठीक से उच्चारण भी नहीं आता था , और वह इसे जनसन्ध कहते थे , जरासंध की तर्ज़ पर , तब भी यही शहरी मुफ्तखोर , हरामखोर और टुकड़खोर वर्ग जनसंघ को खाद पानी देता था ।
    आज़ादी के बाद आढ़तियों को लगा कि अब वह मनमानी करने को स्वतंत्र हैं । उन्होंने जमाखोरी स्टार्ट कर दी । कड़क केंद्रीय खाद्य मंत्री रफ़ी अहमद किदवई ने उन्हें धड़ाधड़ जेल भेजना शुरू किया । लाला बुरी तरह डर गया । अपनी आढ़त की गद्दी पर बैठे बैठे रफी अहमद किदवई का नाम याद आते ही लाला को पाद आ जाती थी । उसने जनसंघ का साथ और हाथ पकड़ लिया । आजतक पकड़े है ।
    मंहगाई की मार ग्रामीण , किसान , मज़दूर पर पड़ती है । शहरी वर्ग उस मंहगाई से मुनाफा कमाता है , इसलिए gst और नोट बन्दी कर मंहगाई बढ़ाने वाले जनसंघ से राजी रहता है । यह वही शहरी वर्ग है । यह भारत के गांवों का अन्न , दूध और पानी लूटता है । कोई भी उत्पादक श्रम नहीं करता । शहर में बैठ आढ़त , दलाली , अखबार , चैनल , ट्रांसपोर्ट और कंस्ट्रक्शन का बिजनेस करता है ।खुद हरामखोर अपने बंगले के लॉन में सब्जी की जगह दूब उगाता है , और किसान से 2 रुपये किलो टमाटर खरीद कर काला बाज़ारी कर उसे 80 में बेचता ।
    जल्द वो समय आने वाला है , जब भारत का श्रमिक – किसान वर्ग लाला और चैनल स्वामी के मोट——– पर लात मार मार उसे खेतों में ला दौड़ायेगा । तब लाला के चूतड़ों की चर्बी घटेगी । वह हार्ट अटैक और डाइबिटीज़ से बचेगा । किसान का आभार व्यक्त करेगा , एवं जनसंघ से तौबा कर लेगा ।
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  17. सिकंदर हयात

    मेरा भी यही अंदाज़ा रहा था की रविश बेहद प्रतिभा शाली और भाग्यशाली दोनों हे ये एक इतफ़ाक़ था दुनिया में अच्छे इत्तफ़ाक़ भी होते हे——————————— Shesh Narain Singh
    3 hrs ·
    Ravish Kumar का जन्मदिन देश के टीवी दर्शकों में एक अजीबोगरीब माहौल पैदा करता है . एक बहुत बड़ा वर्ग है जो रवीश को हीरो मानता है, पत्रकारिता का आदर्श पुरुष . दूसरा वर्ग है जो उसको रावण, हिरण्यकश्यप ,कंस आदि के श्रेणी में रखता है .
    दोनों गलत हैं . रवीश ने संकल्प लिया है कि सच को सच कहने की पत्रकारिता को अपना स्वधर्म मानेगें यही उनकी शख्सियत का स्थाई भाव है . इस बात को उचित मानने वाले उनको हीरो मानते हैं . और जिनके नायकों को रवीश की बोली हुई सच्चाई चुभती है वे उसको खलनायक मानते हैं .
    मैं रवीश को एक ऐसे साथी पत्रकार के रूप में याद करता हूँ जिसने सच को सच कहने का सलीका बहुत ही अच्छे तरीके से सीखा है .एन डी टी वी की हिंदी डेस्क के साथियों को याद होगा कि सच कहने की इच्छा तो सबकी होती थी .जब वहां काम करने वाले कुछ स्वयंभू किन्तु अज्ञानी महान पत्रकारों की बेवकूफियों पर हमारा खून खौलता था तो हम कैसे गुस्सा होते थे. लेकिन रवीश, मनहर और हितेंद्र का यह कहना कि ” जाने दीजिये , ” एक राहत का माहौल पैदा करता था. यह भी याद रखना होगा कि जब वहां पर विचरण करने वाले ख़ास आकाओं के चेला टाइप लोग ठेल ठाल कर बुलंदी पर पंहुचाये जाते थे तो कितना अजीब लगता था.
    मुझको वह दिन भी याद है जब एन डी टी वी की संस्थापक , राधिका रॉय ने रवीश के टैलेंट को पकड़ा था. कई लोगों के विरोध के बावजूद उन्होंने रवीश को अवसर दिया और आज पूरी दुनिया जानती है कि रवीश एक टैलेंटेड पत्रकार है .शुक्रिया राधिका , जन्मदिन मुबारक रवीशShesh Narai———————————————————————————————Ravish Kumar
    17 hrs ·
    इससे पहले कि रद्दी न्यूज़ चैनल और हिन्दी के अख़बार आपको कांग्रेस बीजेपी के कबाड़ में धकेल दें, अर्थ जगत की कुछ ख़बरों को जानने में बुराई नहीं है। कुछ नया और कुछ अलग भी जानते रहिए। बाकी 90 फीसदी से ज्यादा मीडिया में तारीफ के समाचार तो मिल ही जाते होंगे। आई टी सेल के लोग बिना पढ़े ही कमेंट कर सकते हैं। आर्थिक समाचार शुरू होता है अब।
    सितंबर में अतंर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का दाम 54 डॉलर प्रति बैरल था तब मुंबई सहित कई शहरों में पेट्रोल 80 रुपये प्रति लीटर तक बिकने लगा था।
    1 दिसंबर को कच्चे तेल का दाम 57.77 डॉलर प्रति लीटर पहुंच गया। पेट्रोल के दाम कम से कम 2-3 रुपये बढ़ने चाहिए थे मगर 2 पैसे 3 पैसे बढ़ रहे हैं। अच्छी बात है कि नहीं बढ़ रहे हैं लेकिन क्या यह सरकार के दखल से हो रहा है और क्या सिर्फ चुनावों तक के लिए रोक कर रखा गया है?
    CBDT ने सरकार से कहा है कि प्रत्यक्ष कर वसूली के लक्ष्य को घटा दिया जाए क्योंकि निवेश में लगातार आ रही कमी के कारण कारपोरेशन टैक्स में कमी का अंदेशा है। सूत्रों के हवाले से लिखी गई इस ख़बर में कहा गया है कि प्रत्यक्ष कर वसूली के लक्ष्य में 20,000 करोड़ की कमी की बात कही गई है। बिजनेस स्टैंडर्ड की ख़बर है।
    इस साल की पहली तिमाही में एडवांस टैक्स की वसूली में 11 प्रतिशत की कमी आई है। इस साल पिछले साल की तुलना में टीडीएस से होने वाली वसूली 17 प्रतिशत से घटकर 10.44 प्रतिशत पर रूक गई। सीबीडीटी के चेयरमैन ने अपने फील्ड अफसरों को कहा है कि जिन कंपनियों ने 10 प्रतिशत कम टीडीएस ज़ाहिर किया है, उनकी जांच करें।
    इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने पिछले छह महीने में 55,356 करोड़ रुपये का कर्ज़ write off, माफ कर दिया है। बैंकों ने पिछले साल इसी दौरान 35, 985 करोड़ माफ कर दिया था। 2016-17 में इन बैंकों ने 77,123 करोड़ माफ कर दिया था। पिछले नौ साल में बैंकों ने 2 लाख 28 हज़ार रुपये का लोन माफ कर दिया है। 31 मार्च 2017 तक बैंकों का कुल एन पी ए 6 41, 057 करोड़ था। क्या इससे अर्थव्यवस्था पर कोई फर्क पड़ा, सिर्फ किसानों के समय फर्क पड़ता है।
    एक्सप्रेस के इकोनमी पेज पर एक और ख़बर है। सरकारी बैंकों ने रिज़र्व बैंक को बताया है कि 51,086 करोड़ का एडवांस लोन फ्रॉड हुआ है। फ्रॉड करने वाले भी उस्ताद हैं। 51,086 करोड़ का फ्रॉड हो गया, लगता है कि फ्रॉड करने की भी कोई कंपनी बन गई है।
    भारत प्रेस की आज़ादी के मामले में दुनिया में नीचले पायदान पर है। मीडिया की साख भारत सहित दुनिया भर में गिरी है इसके बाद भी बिजनेस स्टैंडर्ड में ख़बर है कि भारत में मीडिया उद्योग 11-12 प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ेगा। लगता है कि कुछ लोग बेकार में क्रेडिबिलिटी के लिए मरे जाते हैं। जनता या पाठक को भी इससे फर्क नहीं पड़ता है शायद।

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    Ravish Kumar
    3 December at 23:04 ·
    किसी रहस्यमयी तहख़ाने से आई यह रिपोर्ट ज़हन में समा गई है। हम किसी पेशे को कई कारणों से चुनते हैं, मगर कई बार उसे पेशे में इतना रच-बस जाते हैं कि चुनने की मजबूरी जीने का कौशल बन जाती है। जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स के छात्रों के लिए ज़िंदा तस्वीर बनकर बैठने वाली लड़कियों की कहानी एक्सप्रेस की पत्रकार प्रिया पिल्लई ने क्या ख़ूब तरीके से कही है। किसी पत्रकार को इस स्टोरी को इस लिए भी पढ़नी चाहिए कि उसे अगर ऐसी स्टोरी मिलती तो कैसे लिखता। हमारे समाज में तहख़ानों में औरतों की अनेक कहानियां हैं, मगर कला के लिए ख़ुद को निर्वस्त्र समर्पित कर देना महानत योगदान है। नए नए छात्रों को किस तरह से किसी शरीर का सम्मान करना सीखाया जाता है, वह अपने आप जीवन का अध्याय है। कितने ही मर्दों को यह सलीका जीवन भर नहीं आ पाता है। जे जे स्कूल ऑफ आर्ट के छात्रों को तैयार किया जाता है कि जब वे एक शरीर को निर्वस्त्र देखेंगे तो उनके आचार व्यवहार क्या होंगे। मगर जिसे निर्वस्त्र होना होता है, उसे कोई आर्ट स्कूल तैयार नहीं करता है। उसे उसकी ग़रीबी तैयार करती है मगर बाद में वह अपने काम को कला के लिए ज़रूरी समझने लगती है। बेशक यह मुश्किल और महान जीवन यात्रा है। इन्हीं किरदारों की कहानी थी फिल्म न्यूड जिसे गोवा के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में नहीं दिखाने दिया गया। शायद किसी संस्कृति को ख़तरा था, उस फ्राड संस्कृति को शायद यह नहीं पता था कि उसके भीतर के ग़रीब कैसे अपने पेट के लिए संस्कृति में योगदान करते हैं, महान बनाते हैं जिनके सामने आने पर उस संस्कृति को लाज आती है। आप एक्सप्रेस की प्रिया पिल्लई की इस रिपोर्ट को पढ़िएगा। यक़ीनन बेहतरीन रिपोर्ट है। कुछ शुरूआती कमेंट पढ़े हैं, कई लोगों ने बिना पढ़े कुछ भी लिख दिया है। इनका कुछ नहीं हो सकता है। सोच रहा हूं पब्लिक कमेंट का विकल्प ही बंद कर दूं।
    See Translation————————————————————————————————————-रविश विरोधि सन्घि विचार
    अंजना दत्ता
    3 December at 08:56 ·
    एक न्यूज़ एंकर है जो खुद को पत्रकार भी कहता है । वो 9 बजे प्राइम टाइम पे आता है । हिनहिनाता है । फिर उसी समय फेसबुक पर भी आता है यहाँ भी बकबकाता है । थोड़ी देर में उसकी साँसे फूल जाती हैं । फिर जो वो जोर चिल्लाता है कि अलाना ट्रोल है । फलाना गुंडा है । मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा । मैं ईमानदारी का घटाटोप हूँ । वगैरह वगैरह !
    फिर जिओ के नेटवर्क चले जाते हैं और स्टूडियो में सन्नाटा पसर जाता है । जैसे कोई बुखारी की मैय्यत में चला आया हो । फिर 10 मिनट बाद चरस थोड़ी ढीली होती है । फिर असली खेला शुरू होता है ।
    आप देखेंगे वो अकेला आदमी है उसने हार्वर्ड से इकोनॉमिक्स में डॉक्टरेट की है । उसने मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से कंप्यूटर साइंस में डीलिट किया है । दिल्ली यूनिवर्सिटी से भी बीए हिंदी का फॉर्म डाल दिया है । अगली साल तक कर ही लेंगे । फेल भी हो जायेगे तो कोई गम नहीं । आधार कार्ड बनवाया है नही । आराम से स्कॉलरशिप खाएंगे चार साल । पैसा हमारा इनके बाप का । JNU में इस बार एडमिशन नहीं मिला क्योंकि अभी वो 44 साल का नाबालिग है । अभी दाखिले की उम्र नहीं हुई । उसके दूध के दाँत अभी टूटने बाकी हैं । वरना पोलिटिकल साइंस में MA भी कर लेते ।
    मैं ऐसा इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि वो अकेला अर्थशास्त्री प्राइम टाइम में रिजर्व बैंक के गवर्नर को बताता है कि उनकी नोटबन्दी असफल रही । सेम बंदा 2 दिन बाद प्लानिंग कमीशन के चैयरमेन को उनकी प्लानिंग में खोट समझाता है । वही एक एंकर विदेश नीति पर भी बोलता है कि सीरिया में क्या करना चाहिए था और मिस्र में क्या । फिर अगले दिन वो साहित्यकार बन जाता है और लप्रेक फेंक फेंक के मारता है ।
    वो आदमी एंकर नहीं है बल्कि दुग्गल साहब है । दुग्गल साहब कल अंधे थे, आज बहरे हैं और कल उनके मुँह में छाले निकल आएंगे । अब दुग्गल साहब बोल नहीं सकते । दुग्गल साहब के हफ्ते के सारे स्लॉट बुक हैं । ये आदमी भी बस टाई बदलता है और विशेषज्ञ बन जाता है । कल एंकर साहब विदेश नीति पर बोले थे आज अर्थनीति पर बोलेंगे और कल राजनीति पर । पर परसो एंकर साहब का मौन व्रत रहेगा क्योंकि परसो सहाबुद्दीन की सजा पर चर्चा होगी ।
    उस एक आदमी से सावधान रहने की जरूरत है । क्योंकि वो एक आदमी है जो पत्रकारिता की आड़ में अपने आकाओं का एजेंडा चला रहा है । वो एंकर आपको कभी नहीं बताएगा कि उसके चैनल ने कैसे काला धन सफेद कर लिया । उसके चैनल ने कैसे आतंकियों कोजवानों की पोजीशन के वीडियो दिखाए । अगर आप ये मुद्दा उठाते है तो वो आपको फासीवादी बोल देगा । जबकि खुद उसके गुरु स्टालिन है ।
    आपको सच जानना है तो इस एक एंकर को बाय कह दीजिये । मेरी तरह अखवार पढ़ना शुरू कर दीजिए । क्योंकि वो खुद तो लोकतंत्र के चौथे खम्बे पर मूत ही रहे हैं । आपसे भी जाने अनजाने में टांग उठवा ही देते हैं । फिर अपने जेटली जी निर्मोही हैं ही आपको गंदगी करता देख ऊल जलूल टैक्स लगा देते हैं और परेशानी मुझ आम आदमी को उठानी पड़ती है ।
    नोट:- जरा बताना भाई चरस उच्च क्वालिटी की है या नहीं ? इस बार 2 सौ के नए नोट से खरीदी है ।
    -अनुज अग्रवाल

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