रवीश कुमार टीवी पत्रकारिता के लीजेंड हे और रहेंगे हम भी उनके फेन हे और रहेंगे रवीश कुमार एक बेहद प्रतिभाशाली इंसान हे मगर सब इंसान ही होते हे कोई भी सुपरमैन नहीं होता हे कोई हर्ज़ नहीं होगा अगर हम रवीश के बहाने कुछ हालात पर विचार कर ले . अब जो खबरे आ रही हे जाँच से ही पता चलेगा कोई धारणा नहीं बनाने चाहिए खेर , रविश कुमार के भाई चाहे जो हो इसमें रवीश जी जवाबदेह नहीं हे . मगर कुछ और बाते समझी और समझाई जा सकती हे रविश जी ने कभी खुद कहा था की ” वो डरपोक हे ” ऐसा उन्होंने क्यों कहा था बात अब समझ में आयी रवीश कुमार की सफलता बेमिसाल हे इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती हे मगर भारत में एक बहुत ही गंभीर मसला ये हे की यहाँ सफल लोग और सफलता वैसे तो 90 % अमीर और वंशवादी लोगो को ही मिलती हे इससे इतर जो लोग होते हे जिन्हें आम आदमी की कामयाबी कहकर प्रचारित किया जाता हे ( जिनमे रवीश ) ये भी वही लोग होते हे या हो सकते हे जिन्हें तीन चार सुविधाएं जरूर ही मिली होती हे या तो घर में ठीक ठाक जमीन जायदाद होना या फिर घर में किसी की भी केसी भी सही मगर सरकारी नौकरी होना या आपका छोटी फेमली से होना घर का इकलौता लड़का या लड़की होना ताकि अधिकतम रिसोर्सिस आप पर लग सके या फिर जिस फिल्ड में कामयाब होना चाहते हे , हुए उसमे किसी अनुभवी का आपका रिलेटिव वगेरह होकर उसका आपके सर पर हाथ या पूरा मार्गदर्शन होना तो ये हे अब भारत में जिन्हें हम आम आदमी की कामयाबी कहते हे वो भी इन्ही में से होंगे इनसे बाहर आपको कोई कामयाब आदमी शायद नहीं मिलेगा इससे अंदाज़ा लगाइये की भारत में हालात कितने कठिन हो रहे हे एकतरफ अब चारो और कामयाबी की प्यास हे चाहत हे दूसरी तरफ सच ये हे आम आदमी ये सच समझ ले तो बेहतर ही हे !

अब रवीश जी के बारे में जो सूना राजनीतिक परिवार आदि तो राजनीती में भी आम तौर पर सभी ठीक ठाक वेल्थी लोग ही होते हे इसका मतलब शायद ये हुआ की रवीश जी एक मज़बूत परिवार से हे वाइफ भी उनकी शायद एक कामयाब काबिल लेडी ही हे यानि रविश जी के चारो तरफ एक बड़ा सिक्योरिटी सर्किल था जिसने उन्हें वो बेफिक्री और चिंता मुक्त जीवन दिया वो माहौल दिया जिसमे वो इतनी तरक्की कर पाए उनकी मेहनत भी खूब थी मगर मेहनत के लिए भी एक माहौल चाहिए होता हे अब इसमें वैसे तो कोई हर्ज़ नहीं हे . मगर में अधिकतर अपने जीवन के अनुभव् बयान करता हु सिर्फ किताबी नहीं तो मेने गौर किया की जो लोग इस तरह से सिक्योरिटी सर्किल के सपोर्ट से बिना किसी असली भारतीयऔर गहरे संघर्ष के आगे बढ़ते जाते हे वैसे तो कोई हर्ज़ नहीं हे मिली हुई सुविधा कोई क्यों छोड़ेगा मगर होता यही हे की फिर उनमे किसी बहुत ही बड़े संघर्ष का दमखम नहीं बचता हे क्योकि दमख़म संघर्ष से ही पैदा होता हे इसलिए रवीश जी के वो शब्द याद आ रहे हे ” में डरपोक हु ” अब जिन लोगो ने संघर्ष किया होता हे उनका डर निकल जाता हे महात्मा गाँधी इतने फियरलेस कैसे थे ——-? क्योकि बीस साल दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष करके आये थे तो इसलिए आप देखे की भारत में 90 % तो वो ( अमीर और वंशवादी ) और 10 % वो , इसलिए आप देखे की आमतौर पर भारत के कामयाब लोग बिलकुल ही पिल पिले से भी होते हे वो कोई निर्णायक काम नहीं कर पाते हे!

आज जाकिर हुसेन भाई लिखते हे ” सिकंदर भाई, इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ सबसे ज़्यादा निराश, रविश जैसे लोगो ने ही किया है. अब देखिए, कि तमाम हिंदू कट्टरपंथी, रविश से तो नाराज़ है, लेकिन एक भी मुस्लिम कट्टरपंथी का एक भी कमेंट रविश के खिलाफ, आज तक नही देखा.रविश का मैं प्रशंसक हूँ. जैसे उन्होने एक बार लिखा कि सरकार की नाराज़गी, पत्रकार के लिए एक पुरूस्कार है, उसी प्रकार धार्मिक कट्टरपंथियो की नाराज़गी भी एक प्रगतिशील लेखक का ईनाम है. लेकिन रविश ये ईनाम, मुस्लिम कट्टरपंथियो से आज तक हासिल नही कर पाए.खैर हम अपनी लड़ाई, लड़ते रहेंगे, भले ही हमे कोई साथ दे या ना दे ”. अब देखे तो हम जैसे टुच्चो से ही हिन्दू मुस्लिम कट्टरपंथी सोच बेहद खफा हे हिन्दू कटरपंती कहते हे की ”तुम्हारी शिकायत पी एम् कार्यलय में करेंगे ” वही मुस्लिम कट्टरपंथी कहते हे ”तुम पर तो फ़तवा जारी होना चाहिए ” . जबकि उधर रवीश मुस्लिम कटरपंथ पर कोई खास जानकारी नहीं रखते हे ( सबूत हे ) शायद उन्हें हिन्दू कटटरपन्तियो के खिलाफ- मुस्लिम लोकप्रियता पसंद हे अच्छा यही सेम एक केस में रवीश जी के तरबियत याफ्ता ने भी किया की शायद ” मुस्लिम टी आर पि खींचने के लिए ” हल्के फुल्के कटटरपन्तियो को हल्का फुल्का सपोर्ट सा दिया . ( उनसे भी हाथ जोड़ कर माफ़ी मांग रहे हे पहले ही की अगर पढ़े तो बात को व्यक्तिगत ना ले हमारा मकसद सिर्फ हालात समझाना हे )
संघर्ष से ही आदमी मज़बूत होता हे बहुत से लोग पूछ सकते हे की हमारी जिंदगी में तो सिक्योरिटी हे कम्फर्ट ज़ोन हे असली और गहरा संघर्ष नहीं हे तो हमारा क्या कसूर हे ———-? कोई कसूर नहीं हे आपका . लेकिन अगर मज़बूत बनना हे लोहे का तन और मन चाहिए तो जीवन में संघर्ष पैदा करो कैसा पैदा करे ———? सिर्फ एक काम करो उसूलो पर अड़ जाओ बस फिर देखो संघर्ष ही संघर्ष हे .

दो बाते हे की एक तो रविश जी को बहुत पहले साफ़ कर देना चाहिए था की उनका परिवार राजनीति में हे वो भी एक थोड़ी बड़ी सी पोस्ट पर , पहले ही घोषणा कर देते की भई- भाई के किसी भी अच्छे बुरे क्रियाकलाप से मुझे ना जोड़ा जाए मेरा उनकी किसी एक्टिविटी से कोई लिंक नहीं हे न अच्छी से ना बुरी से .लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया उसकी जगह वो कुछ वैसा ही करते रहे या थोड़ा आभास सा देते रहे थोड़ा बहुत , जैसा की सुना हे की लालू करते थे की घर का बाहरी हिस्सा गवई ग्रामीण जैसा बना रखा था जहा वो पत्रकारों से मिलते थे ( और अंदर का बेहद आधुनिक ) ताकि अपने वोटरों को बता सके की में भी तुम्हारे जैसा ही हु इसी तरह रविश जी खुद को यु ही बेहद मामूली बेकग्राउंड का आदमी पेश करते रहे ( हमें ऐसा लगा गलत भी हो सकते हे ) जो आम आदमी के लिए हर समय धक्के खाता हे और बेहद बेहद ही साधारण हे अब साफ़ हे की रवीश जी भी कोई ऐसे मामूली आदमी भी नहीं हे वो भी कोई बिलकुल ही आम आदमी भी नहीं हे थे . पांच साल पहले भी उन्होंने अपने फ्लेट और अपने पते के बारे में मोहल्ला लाइव पर ऐसे ही दर्शाया था अब ये बाते आम आदमी को बेहद अपील करती हे तो ये उन्होंने किया हलाकि इस पर मुझे कोई आश्चर्य भी नहीं हे में तो हमेशा से ये सच जानता था की आज के ज़माने में खासकर किसी भी बाल बच्चे वाले आदमी से तो कतई शुद्ध आदर्शवाद की उमीद नहीं करनी चाहिए शुद्धता की कसौटी पर अब शायद कोई खरा नहीं उतर पायेगा . अब सवाल ये उठता हे की आम न होते हुए भी ये खुद को आम क्यों पेश करते रहे कुछ साल पहले उन्होंने एक रिपोर्ट में खुद के अंग्रेजी ना आने की बात कही थी आज हर दूसरे दिन मोटी मोटी अंग्रेजी किताबो और अंग्रेजी अखबारों की ही ” धमकी ” देते हे ————– ? . तो समझिये ये भी बाजार और निजाम की व्यवस्था की एक ट्रिक होती हे आम आदमी का गुस्सा ठंडा करने के लिए की इस तरह से आम आदमी को सन्देश भेजा जाता हे की भई देखो दिमाग मत खाओ हल्ला मत करो , बस अपने काम में लगे रहो मेहनत करते रहो , देखो देखो इस निजाम में ये ये आम आदमी भी मेहनत कर कर के कहा से कहा तक पहुच गए हे देखो देखो ————- ? ( जबकि वो इतने आम भी नहीं होते हे उनके संघर्ष के झूठे किस्से गढ़े जाते हे ) ये दर्शय राजकुमार संतोषी ने जो की सुना हे की इकलौते बड़े डाइरेक्टर हे जिन्हें हिंदी साहित्य की समझ हे उन्होंने अपनी फिल्म ” हल्ला बोल ” में दिखलाया था जब अजय देवगन अपनी आत्मकथा पर बात करते हुए एक रिपोटर से कहते हे की उनकी किताब में उनके संघर्ष के झूठे किस्से हे क्योकि आम आदमी को ये सब ( कामयाब लोग के संघर्ष के किस्से ) बड़ा अच्छा लगता हे तब कुछ बदले बिना भी उसका गुस्सा उसकी निराशा कुछ कंट्रोल होता हे और जैसा की ओम थानवी जी ने बताया की उनके भाई ”चालीस साल से राजनीति में थे ” तो इन चालीस सालो में तो कोंग्रेस सत्ता में रही पिछले सालो में भी कोंग्रेस राबड़ी सरकार में रही ही थी यानि आप एक कुछ कुछ सत्ताधारी परिवार से आये ये बात हमारी जानकारी में तो आपने कभी इशारो में भी नहीं बताई —— ? फिर मान ले की दक्षिणपंथियों ने आपसे चिढ़ कर और बेहद चिढ कर बदनाम करवाने के लिए सब किया यही लग भी रहा हे तो सवाल ये हे की अगर आप हिन्दू कट्टरपंथ के साथ साथ मुस्लिम कट्टरपंथ पर सख्त स्टेण्ड लेते तो कौन जाने फिर वो आपसे इतना तो ना चिढ़ते की साज़िश करते ——- ? लेकिन रवीश जी ने ऐसा नहीं किया अब ये सोच कर निराशा हो रही हे आ गई ना फिर वही राजनीति वाली बात की मुस्लिम कट्टरपंथ पर आपका स्टेण्ड तो सेम वही था की जो कोंग्रेस का होता आया हे की ”इग्नोर करो जो होता हो होने दो वोट ( दर्शक प्रशंसक ) लो ” तो ये कहना था हमारा मकसद रवीश जी का कोई अपमान कतई नहीं हे वैसे भी वो खुद को आलोचनाओ से ऊपर नहीं मानते हे हम गलत भी हो सकते हे क्षमा . रवीश जी बेमिसाल पत्रकार थे और रहेंगे हमारा मकसद पाठको को सिर्फ आज के हालात पर कुछ विचार करवाना था !