पश्चमि बंगाल में जहां चालीस बरस से भी अधिक समय से शुद्ध सेकुलर लोगो की ही सत्ता हे पहले कम्युनिस्ट और अब ममता बनर्जी जो कोई गुजरात जैसी हिंदुत्व की प्रयोगशाला तो कतई नहीं हे वहां भी पिछले काफी समय से कम्युनल दंगो और तरह तरह के तनावों की खबरे आ रही हे http://www.bbc.com/hindi/india -38910571 और कुल मिलाकर जो खबरे मिली उससे यही लगता हे की दंगो में मुसलमानो के साम्प्रदायिक तत्वो ने खासी दबंगई दिखाई ( जितनी मेने जानकारी ढूंढी ) कुल मिलाकर समझ नहीं आता हे की एकतरफ तो मुस्लिम समाज से अक्सर आवाज़े आती हे की दंगो में उनका भारी नुक्सान होता हे तो फिर समझ नहीं आता की पुरे देश में दंगे होते ही क्यों हे क्यों आप अपनी उदारता और सयम से इन्हें टाल नहीं सकते हे ——- ? वो भी बंगाल जैसी जगह तक में भी जहां बरसो से मुस्लिम हितेषी ही सरकार रही हे कोई वाम या ममता पर तो किसी हालात में कम्युनल होने का इलज़ाम नहीं लगा सकता हे . अब समझ नहीं आता की जब दंगो से मुसलमानो का इतना ही नुक्सान होता हे तो क्यों फिर जैसा की सोशल मिडिया के ” शिकायतियो ” के अनुसार पिछले सालो में छह हज़ार दंगो से मुसलमानो को नुक़सान पहुचाया गया सवाल ये हे की जब इन दंगो से मुसलमानो का इतना ही नुक़सान होता हे तो आप उदारता से सहिष्णुता से दरगुजर करके किसी भड़काऊ कार्यवाही को नज़रंदाज़ करके , खासी संख्या में मौजूद उदारवादी हिन्दुओ को साथ लेकर वो दंगे टलवा क्यों नहीं देते हे —— ? पाकिस्तान में शिया अल्पसंख्यक हे शिया सुन्नी तनाव कभी कभी होता हे मगर कोई खास दंगे नहीं होते हे बाग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यक वहां से भी कभी ऐसे दंगो की खबर नहीं आती हे भारतीय मुस्लिम खुद को अल्पसंख्यक मानते हे दुनिया में और भी जगह अल्पसंख्यक हे मगर कही से भी ऐसे और लगातार दंगो की खबर की नहीं आती हे जैसे की भारत में जहां पुरे वर्ष कही न कही से हिन्दू मुस्लिम दंगो की खबर आती रहती हे सोचने का विषय ये हे की आखिर मुस्लिम समाज अपनी सहिष्णुता से उदारता से इन दंगो को टलवा क्यों नहीं देता हे गुस्से से ये दंगे और भड़कते हे और छोटी मोटी घटनाये ही आम तौर पर बड़े क्लेश का रूप ले लेती हे हिन्दू साम्प्रदायिकता इसके लिए दोषी हे सही हे मगर मुस्लिम समाज में पनप रहा गुस्सा और असहिणुता भी इन दंगो के लिए बराबरी का जिम्मेवार हे आइये इस असहिष्णुता और गुस्से की जड़ पर विचार करे!

पहले तो मसला यह हे की भारत का मुस्लिम खुद को शासक परंपरा के साथ जोड़ कर देखता हे इसलिए अपने साथ होने वाली कोई भी नाइंसाफी उसके अंदर अधिक गुस्सा पैदा करती हे कुछ वर्ष पूर्व हुए देवबंद वुस्तानवी हटाओ विवाद पर लिखे लेख में अमर उजाला के पूर्व संपादक शंभुननाथ शुक्ला लिखते हे ”———- लेकिन इसके उल्ट हिंदुस्तान के मुसलमानो का नेतृत्व सिवाय कट्टरता के कुछ और सीखने में नाकाम रहा हे . इसके तमाम कारण हो सकते हे मसलम यहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक जरूर हे लेकिन जनसंख्या के मामले में अन्य अल्पसंख्यको से बहुत ज़्यादा यहाँ का मुसलमान अपने को उस शासक परंपरा से जोड़ता हे जो करीब ढाईसौ साल पहले पुरे हिंदुस्तान में अक्षुष्ण राज़ कर रहा था प्लासी की लड़ाई से पहले अँगरेज़ यहाँ व्यापर के आलावा और कुछ नहीं कर पा रहे थे————- आज़ादी के पहले भी यहाँ पुलिस और प्रशासन में मुसलमानो की दखल काफी थी ————– ” अब इस साइकोलॉजी के कारण भी मुसलमानो में अपने साथ होने वाले अन्याय के प्रति अधिक गुस्सा उमड़ता हे वो यह नहीं देख पता हे की निजाम और व्यवस्था का अन्याय वो ही नहीं और भी जनता झेल रही होती हे . दूसरा वो ये भी नहीं देख पाता या देखना नहीं चाहता या उसे देखने नहीं दिया जाता की शोषक वर्ग में कुछ मुस्लिम भी शामिल रहते हे!

मुस्लिम समाज में गुस्से और पीड़ित होने का अधिक भाव फ़र्ज़ी मुस्लिम यूनिटी से भी हे ये ऐसी यूनिटी हे जो निगेटिविटी ही पैदा करती हे प्रेक्टिकल में कोई विशेष मुस्लिम एकता नहीं हे धर्मस्थलो के बाहर मुसलमानो में भी सम्प्रदाय हे जातिवाद हे ऊंच नीच हे भेदभाव हे अमीरी हे गरीबी हे सब कुछ तो वही हे जो बाकी दुनिया में हे . मगर एक फ़र्ज़ी यूनिटी का भाव कुछ लोगो दुआरा आम मुस्लिम पर थोपा जाता हे जिसके तहत कही भी मुसलमानो पर कोई जुल्म होतो उसे सारे मुसलमानो पर अत्याचार दर्शाया जाता हे यानी एकता तो होती नहीं हे मगर ” मुसलमानो पर अत्याचार” एक गुस्सा आम मुस्लिम में भरा जाता हे की देखो कितने जुल्म हो रहे हे उसे पूरी बात नहीं बताई जाती हे की भारत ही नहीं पूरा उपमहादीप ही दुनिया की सबसे बड़ी शोषक जगह हे जहां सौ करोड़ शोषित रहते हे और इस शोषण में शोषक के रूप में मुसलमान भी शोषक के रूप बराबरी के हिस्सेदार हे इस सच की जगह भारतीय मुसलमानो पर विशेष पीड़ित होने की सोच थोपी जाती हे जरा सोशल मिडिया के बुड़बकीयो को एकबार पढ़े —— ?

देखा जाए तो भारतीय मुसलमानो में जो प्रभावशाली वर्ग हे नेता हे धर्माधिकारी हे पैसे वाले लोग हे ये हे और इनके लग्गू भग्गू हे ये लोग कोई कम बड़े शोषक नहीं हे अधिकतर ये आम मुस्लिम का शोषण ही करते हे उसके बाद इनकी कोशिश रहती हे की आम मुस्लिम का ध्यान इनकी वेल्थ और शोषण की तरफ ना ही जाए सार्वजनिक तो भले ही ये खुद को कुछ नरम पेश करे मगर शायद अंदरखाने ये और इनके लग्गू भग्गू आम मुस्लिम को खूब भड़काते हे ये काम लगातार चलता रहता हे इसके पीछे इनका मकसद यही होता हे की आम मुस्लिम का ध्यान इनकी लूट और शोषण पर ना ही जाए और ये ट्रिक काम भी करती हे !

एक और बात लगती हे की भारत में एक अच्छा खासा शुद्ध सेकुलर हिन्दू बुद्धिजीवि वर्ग हे जो हिन्दू कट्टरता से हिन्दू साम्पर्दायकता के प्रति खासा सख्त स्टेण्ड रखता हे सही भी हे चाहे वो रविश कुमार हो या कोई भी और बहुत अच्छे सेकुलर पत्रकार और लेखक आदि हो मोटा मोटा कहे तो , इन्हें मुस्लिम मन मानस और मुस्लिम साम्प्रदायिकता की कट्टरता की कोई खास समझ नहीं हे ( हालांकि इसमें इनका कोई दोष नहीं हे हर आदमी को हर बात की समझ नहीं होती हे कोई भी सुपरमैन नहीं होता हे ) तो ये आमतौर पर अपने भलेपन में , मुसलमानो को भोलेभाले डरे सहमे अल्पसंख्यक का सरलीकरण करके हर मुद्दे पर मुसलमानो का पक्ष लेते हे या नरम रुख करते हे ऐसा ये अपने भलेपन में ही करते हे मगर इसका सन्देश आम पढ़े लिखे मुस्लिम में जाता हे या जैसे देखे रविश के फेन सोशल मिडिया के मुस्लिम बुड़बकीयो के रवैया में देखिये ये आत्मनिरीक्षण की बू से भी दूर रहते हे और अगर किसी आत्मनिरीक्षण की बात भी करते हे तो उदारता सहिष्णुता बढ़ाने के लिए बल्कि फिर से ” छा जाने के लिए ” टाइप बाते की जाती हे . और उपमहादीप में मुस्लिम कट्टरता साम्प्रदायिकता का ये वज़ूद ही मानने से इंकार करते हे इस रवैये से बहुत नुक्सान होता हे इस हद तक घटिया बाते करते हे की एकबानगी देखिये की ” पाकिस्तान ब्राह्मणो ने बनवाया था ” एक और उदहारण तो दिलीप मंडल जैसे हिन्दू साम्प्रदायिकता के खिलाफ अथक योद्धा तक ने पिछले दिनों एक सोशल मिडिया लेखक मोहम्मद ज़ाहिद की तारीफ की ( नोट बन्दी के मुद्दे पर ) तो उधर शायद तीस्ता सीतलवाड़ के पोर्टल ने उनके विचार छापे अब क्या इन लोगो का मालूम हे की ज़ाहिद साहब ने ( व्यक्ति विशेष नहीं बहुत लोग हे ) जाकिर नायक के बचाव में कितना कुछ लिखा था क्या जाकिर साहब का बचाव करके उनका महिमांडन करके साम्प्रदायिकता से लड़ा जाएगा —– ? क्या उन्हें पता हे की ये हिज़ाब के समर्थक हे इन्हें कंदील बलूच की मौत का गम नहीं हे इनके प्रिय ”छोटे इकबाल ” की क्या सोच हे क्या मंडलो और तीस्ता का मालूम हे ———- ? यानी हिन्दू साम्प्रदायिकता विरोधी वर्ग को मुस्लिम साम्प्रदायिकता की कट्टरता की समझ नहीं हे इससे हालात और उलझते हे और मुसलमानो के बीच आत्मनिरीक्षण , उदारता और सहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली सोच पिछड़ती हे!

समझने की बात तो इसमें पेंच ये भी हे की अगर ये मुस्लिम मन मानस को समझने का मुस्लिम कट्टरता को समझने का प्रयास करे तो शायद इस विषय पर उचित सामग्री और विचार देने में ये बड़े बड़े मुस्लिम बुद्धजिवी लेखक भी असफल रहे हे इसी की एक भयानक बानगी हमने साफ़ साफ़ देखि की जब एक बड़े भारी विद्वान और कभी शुद्ध सेकुलर और उदार रहे लेखक पत्रकार संजय तिवारी विस्फोट ने जब इस सबको समझना शुरू किया तो अंत में इसका नतीजा ये निकला की वो किसी बजरंग दल कार्यकर्ता की तरह घोर मुस्लिम और इस्लाम विरोधी हो गए http://khabarkikhabar.com/arch ives/2700 इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता हे की हालात कितने जटिल हो रहे हे इसी घोर जटिलता और सरदर्दी को देखते हुए भारतीय मुसलमानो का जो शिक्षित और कामयाब और निजी जीवन में उदार वर्ग भी हे वो आम तौर पर मुस्लिम आत्मनिरीक्षण की सोच से दूर ही रहता हे वो इस सोच के प्रचार की जिम्मेदारी नहीं लेता हे वो भी साम्पर्दयिको से कठमुल्लाओ से कोई खास लड़ता भिड़ता नहीं हे क्योकि हालात ही इतने मुश्किल हो चुके हे अब इससे नीचे तक रिसता हुआ कंफ्यूज़न और गुस्सा फैलता रहता हे और यही कन्फ्यूज़न यही गुस्सा यही विक्टिमहुड़ – हिन्दू साम्प्रदायिकता के साथ मिलकर जगह जगह पंगो और दंगो का रिजल्ट देता रहता हे बेहद जरुरी हे की मुसलमानो के बीच एक खासा और एक्टिव उदारवादी वर्ग पैदा हो जो कैसे भी करके हर टकराव और दंगो को टलवा नहीं तो ये दंगे लगातार हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतों को और अधिक मज़बूत ही करते रहेंगे मुज्जफरनगर से लेकर बंगाल असम तक ये साफ़ दिख रहा हे !