पाकिस्तानी शासन और शासक की कुर्सी शायद दुनिया का सबसे बड़ा कांटो का ताज हे जब से पाकिस्तान बना तब से ही इसके हर शासक की ये जैसे नियति ही रही हे की उन्हें बुरे दिन , बुरा अंजाम जरूर ही झेलना पड़ता हे . इलाज न मिलना गोली मिलना फांसी लंबी जेल यात्रा मुकदमेबाज़ी देश निकाला हर पाकिस्तानी शासक का अंजाम रहा हे ये सिलसिला पाकिस्तान के निर्माता और कायदेआज़म जिन्ना के साथ ही शुरू हो गया था कायदे आज़म मुस्लिम लीग के बेताज़ बादशाह थे मुस्लिम लीग में उनका कहा ही आखिर होता था उनके अलावा लीग में किसी की अहमियत नहीं थी सभी फैसले वो खुद ही लेते थे सत्ता के लालच में पाकिस्तान बनने तक कोई कुछ बोला नहीं लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद उनके अपने डिप्टी लियाकत अली खान के साथ खिंच तान शुरू हो गयी थी हद ये भी थी की गवर्नर जनरल होते हुए भी जिन्ना खुद केबिनेट की मीटिंग लेते थे और पी एम् लियाकत अली खान उनके नीचे थे धीरे धीरे जिन्ना साहब का सवास्थ्य गिरता गया और लियाकत अली खान हावी होकर उनकी अवहेलना करने लगे जिन्ना के डॉक्टर इलाही बख्श का बयान था की जिन्ना ने उनसे कहा था की अब जितनी जल्दी हो सके वो मरना चाहते हे ये कहते हुए जिन्ना की आँखों में आंसू थे इलाही बख्श कहते हे की कुछ ऐसा हुआ था की जिन्ना की जीने की इच्छा मर गयी थी शायद यही हुआ होगा की पाकिस्तान बनने से पहले जो उनके सामने आँख मिलकर बात भी नहीं कर सकते थे वो अब उन्हें पूछते भी ना थे इसके बाद आया ग्यारह सिंतबर 1948 का उनकी मौत का दिन उनकी मौत शांति से नहीं हुई बल्किउस पूरा दिन उनकी दुर्गत सी हुयी थी जब बलूचिस्तान से कराची वापस लौटते हुए बीमार होने पर उनके लिए एक खटारा एम्बुलेंस भेजी गयी जो रास्ते में ही खराब हो गयी और पाकिस्तान का निर्माता बीच सड़क पर लाचार रुक रहा था किसी के दिमाग में ये तक नहीं आया की गवर्नर जनरल की कार से ही उस हलकी सी एम्बुलेंस को खिंच उन्हें जल्द अस्पताल पहुचाया जाए कराची की उमस भरी गर्मी थी और मक्खियां उनके चेहरे पर भीन भीना रही थी इसके बाद भी उनके इलाज़ में डॉक्टर इलाही बख्श को काफी दिक्कते आयी कई जरुरी सुविधाय नहीं मिल सकी और उसी रात जिन्ना साहब का इंतकाल हो गया ( महात्मा गाँधी को जहां शहीद की मौत मिली जिससे एक तो उनकी छवि और सलीब पर लटके ईसा के जैसी हो गयी यही नहीं उनकी शहादत से उनके शिष्य नेहरू को देश में वो शांति और मज़बूती के दस साल मिल गए जिस दौरान नेहरू ने देश में सेकुलरिज्म और लोकतंत्र की जड़े बेहद गहरी क़र दी ) जिन्ना साहब के इंतकाल के साथ ही वो सपना भी टूट गया जिसकी झलक उनके मौत से ठीक एक साल पहले ग्यारह सितंबर 1947 के भाषण से मिली थी की पाकिस्तान भी एक सामान्य देश बनेगा इसी के साथ वो सिलसिला शुरू हुआ जिसके तहत हर पाकिस्तानी शासक बुरे अंजाम की नियति पाता रहा!

जिन्ना के बाद पाकिस्तान में लियाकत अली खान का एकछत्र राज़ शुरू हुआ मगर तीन साल बाद ही एक नाराज़ अफ़ग़ान शरणार्ती ने एक जनसभा में ही उनकी गोली मारकर हत्या कर दी हत्यारे को भी वही ढेर कर दिया गया केनेडी की तरह उनकी भी हत्या का भेद आजतक नहीं खुल सका हे मगर लगता यही हे की ये सत्ता संघर्ष का ही नतीजा था इसके बाद अगले बड़े और प्रभावशाली पाकिस्तानी शासक थे राष्ट्रपति इसकंदर मिर्जा जो शिया होते हुए भी सुन्नी प्रभुत्व वाले पाकिस्तान के शक्तिशाली नेता बनकर उभरे थे उन्होंने उस गलती की शुरुआत की जो शायद इसके बाद परंपरा सी बन गयी की हर पाकिस्तानी शासक किसी को अपने फुल वफादार मानकर उसे अपना राइट हेंड बनाता और कुछ दिनों बाद वही राइट हेंड उनकी गर्दन दबा देता इसकंदर मिर्जा ने ना केवल अयूब खान को एक कोर्ट मार्शल से ही बचाया था बल्कि उन्हें पाकिस्तानी सेना का पहला कमांडर इन चीफ भी बनाया था मगर 27 अक्टूबर 1958 की रात मिर्जा ये देख कर भौचक रह गया जब अचानक रात में अय्यूब के सेनिको ने उन्हें उन्ही के आवास पर घेर लिया ये लगभग तय था की ये सैनिक उन्हें मार डालते अयूब के साथी यही चाहते थे लगभग चार दिन तक मिर्जा लगभग स्टेनगन के नीचे रहे मगर उसके बाद अमेरिकी दबाव में अयूब ने उनका लन्दन भेजा जाना स्वीकार कर लिया था लन्दन में मिर्जा को बहुत बुरे दिन देखने को मिले उन्हें देश वापस नहीं आने दिया उनकी हालात इतनी ख़राब थी की वो अपनी पत्नी से यह कहते हुए 1969 में दुनिया छोड़ गए की हम मेडिकल का खर्च नहीं बरदाश्त कर सकते सो मुझे मरने दो !

मिर्जा के बाद पाकिस्तान पर अयूब का एकछत्र राज़ चलने लगा भरपूर अमेरिकी सहायता से पाकिस्तान विकास करते करते विकास दर में एशिया में जापान के बाद दूसरे नंबर पर जा पंहुचा मगर इनके राइट हेंड थे जुल्फिकार अली भुट्टो जिनका मानना था की ” चिड़िया के नीचे से सारे अंडे ऐसे निकल लो की चिड़िया को पता भी ना चले बाद ज़िया उल हक़ ने ये चिड़िया भुट्टो को ही बना दिया ” भुट्टो ने ही अयूब को पहले 65 की जंग लड़ने पर उकसाया और उसके बाद ताशकन्द समझौते पर ज़बरदस्त अयूब विरोधी प्रोपेगेंडा करके अयूब के नीचे की जमीन खिसका दी और याह्या खान के साथ मिलकर अयूब का तख्त कुछ कुछ वैसे ही अंदाज़ में उल्ट डाला जैसे मिर्जा का उल्टा गया था अयूब को भी लगभग वैसा ही अपमानित होकर राष्ट्रपति आवास से निकाला गया जिसके बाद एक समझौते के तहत वो चुपचाप तन्हाई में स्वात चले गए बिना किसी चु चपड़ बदले में उनके पुत्र की सम्पतियो को छोड़ दिया गया इसके बाद आये याह्या खान जो रात दिन शराब और अय्याशी में इतने धुत रहते थे की उन्हें पता भी नहीं चला की कब पाकिस्तान टूट गया और कब उन्हें भी लात मारकर हटा दिया गया इसके बाद पाकिस्तान के पहले लोकतान्त्रिक तरीके से जीते शासक बने जुल्फिकार अली भुट्टो उनके राज़ में सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था मगर कुछ तो तेल संकट के बाद बढ़ती महगाई बलूचिस्तान में कार्यवाही कुछ तानाशाही का रवैया और कुछ परमाणु बम बनाने की कोशिश पर अमेरिकी नाराज़गी धीरे वो भी अलोकप्रिय होने लगे मगर इस कारण तो वो सिर्फ हटाय जाते उनका फांसी जैसा अंजाम ना होता उनका ये अंजाम हुआ उस ज़िया उल हक़ के कारण जिसे उन्हें एक बेवकूफ और एक भरी वफादार समझ कर सेना सौप दी थी की ये मुर्ख सा आदमी मेरे इशारो पर रहेगा मगर कुछ ही दिनों बाद ज़िया ना केवल भुट्टो को तख़्त उल्ट डाला 1977 लोकतंत्र खत्म कर मिल्ट्री राज़ ले आया बल्कि वो किया जो शायद ही किसी और लोकतान्त्रिक प्रधानमंत्री के साथ दुनिया में हुआ हो की भुट्टो को एक झूठे राजनितिक हत्या के मुकदमे में फांसी दे दी गयी यही नहीं फांसी से पहले उन्हें काफी टॉर्चर दिया गया यहाँ तक की उनके बाथरूम में दरवाजा तक नहीं था सारी दुनिया की अपीलों के बाद भी ज़िया अपने लोगो के ये समझने पर की एक कब्र हे दो आदमी ( ज़िया भुट्टो ) किसी एक को जाना ही होगा फिर भुट्टो को फांसी चढ़ा कर ही माने !

अमेरिका आदि देश भुट्टो को बचा सकते थे मगर अफ़ग़ानिस्तान पर रूस के हमले के साथ ही ज़िया अमेरिका और वेस्ट के चहेते बन गए थे सोवियत संघ को खत्म कर देने वाली अफ़ग़ान वार का ज़िया ने बेहद फायदा उठाया ना केवल 11 साल तक एकछत्र राज़ किया बल्कि अमेरिका और अरब देशो से अंधी मदद भी हासिल की इसी मदद का एक नतीजा पाकिस्तान का एटमी ताकत बनना भी था मगर फिर वही हुआ जो होता आया हे एक विमान हादसे में जिया की ऐसी भयानक मौत हुई की उनकी बॉडी का कोई हिस्सा भी ना मिला उनकी मौत पर जो ताबूत रखा था बेनजीर भुट्टो अपनी किताब में कहती हे की वो खाली था जिया की मौत का भी रहस्य खुल नहीं पाया हे कुछ लोग इसे जिया के फैलाय वहाबीकरण से नाराज़ शियाओ का काम मानते थे तो कुछ लोग इसे कुछ मुद्दो पर भारी मतभेद के बाद अमेरिकी सी आई ए का काम मानते थे हलाकि इस हादसे में पाकिस्तान में अमेरिकी राजदुत की भी मौत हो गयी थी ज़िया की मौत के बाद से ही पाकिस्तान में लगातार चुनाव तो होते रहे और कभी बेनज़ीर तो कभी नवाज़ सत्ता में आते रहे मगर अलोकतांत्रिक तरीको से हटाय जाते रहे इस दौरान भी शासको की दुर्गत की नियति जारी रही बेनजीर को जहां देश छोड़ कर भागना पड़ा वही उन्हें शासन में मिस्टर 40 परसेंट कहे जाने वाले उनके पति आसिफ अली ज़रदारी दस साल से भी अधिक समय तक जेल में सड़ते रहे आख़िरकार जब बेनज़ीर वापस पाकिस्तान आयी तो एक तालिबानी हमले में मारी गयी दूसरे लोकतान्त्रिक शासक नवाज़ शरीफ के साथ भी वही हुआ जो पहले भी होता आया हे एक शक्तिशाली जनरल को निपटाकर हटाकर उन्होंने अपने वफादार परवेज़ मुशर्रफ को सेना सौपी मगर कारगिल के बाद दोनों के मतभेद इतने बड़े की परवेज़ ने ज़िया की तरह ना केवल नवाज़ का तख्ता उल्टा बल्कि लगभग फांसी के तख़्त तक भी ले आये थे मगर सऊदी शासको ने किसी तरह से नवाज़ को बचाकर अपने यहाँ बुला लिया जहा बरसो तक नवाज़ को जलावतनी भुगतनी पड़ी इसके बाद मुशर्रफ का एकछत्र राज़ शुरू हो गया मगर ”परंपरा ” ज़ारी रही सुप्रीम कोर्ट के ज़ज़ों के साथ भिड़ंत में कब मुशर्रफ बेहद अलोकप्रिय हो गए कब उनकी जमीन खिसक गयी उन्हें पता भी नहीं चला नतीजा वो भी पाकिस्तान से खिसक लिए इधर उधर धक्के खा कर जब पिछले सालो में वापस लोकप्रियता के भरम में पाकिस्तान पहुचे तो उन्हें नज़रबन्द कर लिया जहां से वो बड़ी मुश्किल से छूट कर देश छोड़ कर भागे तो पाकिस्तानी शासको की देरसवेर दुर्गत का ये सिलसिला जिन्ना से लेकर अब तक जारी हे अब इस समय पाकिस्तान के अगले शासक क्रिकेटर इमरान खान बताय जा रहे हे देखना दिलचस्प होगा की अगर सत्ता इमरान खान को मिलती हे तो क्या ये ” दुर्गत ” का सिलसिला रुकेगा या नहीं —————– ?