प्रस्तुति – सिकंदर हयात

प्रेमचन्द की महानता के बावजूद उन्हें नोबेल पुरुस्कार क्यों नहीं मिला – ? आई आई टी दिल्ली के निदेशक ने गपशप के दौरान मुझसे यह सवाल पूछा . मेरे पास इसका कोई संतोषजनक उत्तर न था . सिवाय यह कहने के और कुछ न था की प्रेमचन्द की रचनाओ के अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध नहीं थे जो पश्चमी दुनिया का ध्यान उनकी और ले जा सकते . यह सवाल किसी हीन ग्रंथि की अभिव्यक्ति नहीं था . यह चाहत की मेरा जुड़ाव मेरे दिए दायरे के बाहर की दुनिया से हो , खास इंसानी हे . प्रेमचन्द के वे पत्र जो वे केशोराम सब्बरवाल को लिखते हे इसके गवाह हे की केशोराम दुआरा उनकी रचनाओ के जापानी अनुवाद को लेकर वे खास उत्साहित थे , लेकिन इन पत्रो में दिलचस्प हे प्रेमचन्द का हिंदी के साहित्यिक जीवन का वर्णन ” हिंदुस्तान का साहित्यिक जीवन बड़ा हौसला तोड़ने वाला हे जनता का कोई सहयोग नहीं मिलता हे आप चाहे दिल निकालकर रख दे , मगर आपको पाठक नहीं मिलते हे शायद ही किसी किताब का तीसरा सनस्करण हुआ हो हमारा किसान गरीब और अशिक्षित हे और बुद्धिजीवी यूरोपीय साहित्य पढ़ते हे . घटिया साहित्य की बिक्री बहुत अच्छी हे मगर न जाने क्या बात हे की मेरी किताब तारीफ तो बहुत पाती हे मगर बिकती नहीं हे . ”

तेरा भी हे मेरा भी ऐसी साल पहले का यह दुखड़ा आज के हिंदी लेखक को बिलकुल अपना मालूम पड़ता हे हिंदी में पेशेवर लेखक की संस्था न बन पाने के कारणों की पड़ताल अभी बाकी हे प्रेमचन्द का पूरा जीवन इसी संघर्ष में बीता जिसमे वे लेखन को प्राथमिक और अपने आप में पूरा काम का दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ते रहे . लिखना एक समाजपयोगी उत्पादक किर्या हे यह समझ अभी भी हमारे भीतर नहीं लिखने से पहले एक पूरी तैयारी की दरकार हे यह समझ लिखे की कीमत तय करने वालो के पास नहीं . हिंदी और अंग्रेजी में लेखक को दिए जाने वाले पैसे में अंतर इसका एक उदाहरण हे समाज लेखन में निवेश करने को तैयार नहीं . वह कुछ पुरुस्कारों तक अपने कर्तव्य को सिमीत रखता हे लेकिन पुरुस्कार तो किसी पर्किर्या के नामित बिंदु पर होना चाहिए उस पर्किर्या में किसी की दिलचस्पी नज़र नहीं आती हे नतीजा लेखक का घोर अकेलापन वह अपने मध्य वर्ग दुआरा बहिष्कृत महसूस करता हे जिसने प्रयास पूर्वक अंग्रेजी को सिर्फ कामकाज तक न रहने देकर अपनी सवेंदना की भाषा भी बना लिया हे सबूत आपको उसके बुकशेल्फ में मिलते हे जहां हिंदी की जिल्दे दिखती नहीं हे यहाँ तक की अब वह प्रेमचन्द और टेगोर को भी अंग्रेजी के जरिये पढ़ना चाहता हे दिलचस्प यह हे की बांग्ला मध्यवर्ग ने एक चतुर रिश्ता अंग्रेजी से बना रखा हे और उसे बांग्ला किताबे और बांग्ला संगीत अपनी बैठक में सजाने में शर्म महसूस नहीं होती!

ज्ञानपीठ या बुकर — ? यही वजह हे की भारत के सबसे बड़े साहित्यिक पुरुस्कार ज्ञानपीठ से हिंदी कवि कुंवर नारायण को सम्मनित किये जाने को लेकर कोई उत्साह और उत्सव इन पढ़े लिखे तबके में दिखाई नहीं पड़ा , जिसने कुछ दिन पहले ही एक नवतुरिया लेखक अरविन्द अडिगा को मेन बुकर दिए जाने का ज़ोरदार स्वागत किया था बुकर अरविन्द को मिलेगा की दूसरे भारतीय लेखक अमिताव घोष को , इसे लेकर अखबारों और पत्रिकाओ में कयास आराई में पन्ने भर दिए गए थे , ज्ञानपीठ या साहित्य अकादमी पुरुस्कारों की घोषणा से पहले समकालीन लेखन में कोई उतेज़ना भरी चर्चा नहीं चलती दिखाई देती , इसलिए अगर आप हिंदी कथा के बारे में इस दुनिया से कुछ जानना चाहे तो आपको प्रेमचन्द के बाद निर्मल वर्मा कॄष्णा सोबती या गींताजलि श्री का कुछ जिक्र मिलेगा . इनका अनुवाद किसी सुचिंतित साहित्यिक निर्णय के बाद किया गया हो , इसके प्रमाण नहीं हे . एक मित्र ने ठीक ही कहाकी विक्रम सेठ ए सूटेबल बॉय के विस्तार को लेकर चमत्कृत होने वालो ने अगर अमृत लाल नागर को पढ़ा होता तो उनका ख्याल कुछ और ही होता ., अमृत लाल नागर यशपाल फणीश्वरनाथ रेनू की किसी रचना से परिचय के चिन्ह अंग्रेजी साहित्य समीक्षा संसार में नहीं मिलते तीसरी या चौथी पीढ़ी के शिक्षित वर्ग के अंग्रेजी की दुनिया में सकिर्य होने से यह उम्मीद होना चाहिए थी की दिवभाषी साहित्यिक विद्वत्ता विकसित होगी , ऐसा दुर्भाग्य से हुआ नहीं इस पीढ़ी ने तय करके खुद को एकभाषी बना लिया हे !
(समीक्षक और प्राध्यपाक अपूर्वानंद जी का यह लेख कुछ वर्ष पूर्व वेबदुनिया हिंदी पर प्रकाशित हुआ था वही से साभार . वेबदुनिया हिंदी)