हाल ही में एक वेबसाइट पर एक लेखक का लेख पढ़ने को मिला। मुझे बताना पड़ रहा है कि लेखक मुस्लिम थे और अपने लेख में वे आंकड़े देकर बता रहे थे कि यूपी के चुनावों में मुसलमानों को किस प्रकार से रणनीति बनाकर वोट करना चाहिए ताकि भाजपा को सत्ता से दूर रखा जा सके। उनकी सलाह थी कि इस समय तरक्की, विकास आदि के बारे मे मत सोचो, बस ऐसे वोट डालो की भाजपा/ संघ के “नरपिशाच” सत्ता में न आने पाएं।

“नरपिशाच” शब्द का लेखक महोदय ने अपने लेख में कई बार जिक्र किया, लेकिन अपने पूरे लेख में वे ये तर्क नहीं रख पाए कि केंद्र और विभिन्न राज्यों में सत्तासीन भाजपा ने मुस्लिमों के खिलाफ ऐसा क्या कर दिया जो उसे वोट देने पर विचार न किया जाए या भाजपा से इतर दलों ने ऐसा क्या कर दिया है जो उन्हें वोट दिया जाए। उन्हें भाजपा को लेकर बस वही भविष्य का तथाकथित अनजाना डर था जो अन्य राजनीतिक पार्टियां भी भाजपा को लेकर मुसलमानों के दिल में वर्षों से बैठाती रही हैं।

पिछले कई दशकों से जब भी कहीं चुनाव होते हैं तो इस तरह के लेख अक्सर पढ़ने को मिल जाते हैं, जिनमें बेहद कड़वे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे लेखों में तर्कों का अभाव होता है और इनका उद्देश्य यही होता है कि मुस्लिम शिक्षा, रोजगार, विकास आदि की बातों को भूल जाएं और बस डरकर भाजपा के खिलाफ एकजुट हो जाएं।

मुझे नहीं पता कि इस तरह के लेखों को पढ़कर मुस्लिम भाई-बहन क्या सोचते होंगे। हो सकता है कि उनमें से अधिकतर लेखक के उद्देश्य को पूरा करने का काम करते हों या हो सकता है कि इस पर ध्यान न देते हों, लेकिन इस तरह के लेखों या ऐसी बातों से यह जरूर सुनिश्चित हो जाता है कि ऐसी बातों को सुनकर, पढ़कर प्रतिक्रिया में अनेक हिंदू भी एकजुट हो जाते हैं और इसका परिणाम यह होता है कि भाजपा को पहले कई राज्यों में और फिर केंद्र में भी सरकार बनाने में इससे कुछ मदद मिल जाती है।

मेरा सवाल यह है कि क्या मुस्लिमों में भय पैदा करने से या उन्हें गोलबंदी के लिए उकसाने से उनकी समस्याओं का हल हो जाएगा? वास्तव में तो इससे समस्या और ज्यादा बढ़ेगी ही। जवाब में हिंदू भी गोलबंद होंगे और देश में सांप्रदायिकता का जहर फैलता ही जाएगा।

मैं यह नहीं कहता कि मुसलमान भाजपा को ही वोट दें। उनका जहां मन करे, वहां वोट दें, पर मैं यह जरूर कहना चाहता हूं कि मुसलमान भाजपा के पास जाने से न हिचकें। भाजपा को अछूत न समझें, बल्कि मैं तो कहूंगा कि वे ज्यादा से ज्यादा संख्या में भाजपा में प्रवेश करें और दूर से देखने या डरने के बजाय भाजपा के अंदर जाकर उस बात का विरोध करें जो बात उन्हें गलती लगती है।

एक उदाहरण देखिए- मान लीजिए कि मुझे लगता है कि किसी बैठक में मेरे तथाकथित विरोधी मेरे खिलाफ कोई बात कह रहे हैं या कोई योजना बना रहे हैं। इसे लेकर मैं परेशान होता हूं, चिंतित होता हूं और डर से दुबला हुआ जाता हूं कि पता नहीं बैठक में क्या होगा? अब कल्पना करिए कि यदि उस बैठक में मैं स्वयं मौजूद रहूं या मेरे कुछ साथी मौजूद रहें तो क्या होगा? पहली बात तो यही होगी कि मेरे खिलाफ कोई योजना नहीं बनेगी। मेरे खिलाफ कोई बात नहीं होगी और अगर होगी भी तो मैं या मेरे साथी उसका विरोध करने के लिए वहां मौजूद रहेंगे। किसी गलत बात को गलत कहने और उसे करने से रोकने के लिए मौजूद रहेंगे। इस प्रकार जब सारा काम मेरे सामने होगा तो न मैं चिंतिंत होऊंगा और न ही डरूंगा।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को याद करें। कोई मुझे बताए कि यदि किसी प्रधानमंत्री के सामने एक तरफ नीतिश कुमार बैठे हैं, दूसरी तरफ जॉर्ज फर्नांडीस बैठे हैं, सामने रामविलास पासवान बैठे हैं और अन्य कई नेता भी बैठे हैं जिनका सीधे भाजपा से संबंध नहीं है तो ऐसा प्रधानमंत्री किसी समाज के खिलाफ निर्णय लेना भी चाहे तो कैसे ले सकता है?

मैं तो यह भी कहता हूं कि यदि नीतिश कुमार या उनके जैसे नेता देश और समाज को बदलना चाहते हैं तो उन्हें भाजपा से हाथ छिटकने के बजाय उसके साथ आना चाहिए क्योंकि यदि आप साथ होंगे तो बहुत ही कारगर ढंग से मोदी या किसी भी अन्य साथी को कुछ भी ऐसा गलत करने से रोक सकते हैं, जिसकी आशंका आपको लगी रहती है या जिस आशंका को बताकर आप मुसलमानों को बेवजह डराते रहते हैं। लेकिन यदि आप दूर खड़े रहेंगे तो हल्ला मचाने के सिवाय कुछ भी नहीं कर पाएंगे।

आप गोवा का उदाररण देख लीजिए। गोवा में कहां है हिंदुत्व? कहां है गोमांस का मुद्दा? कहां है अल्पसंख्यकों में बेवजह का भय, जबकि वहां पर सत्ता भाजपा के पास है। वहां ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां दूसरे समुदायों ने भाजपा को अछूत समझने के बजाय उसमें शामिल होने में हिचक नहीं दिखाई। उन्होंने स्वयं को नहीं बदला, बल्कि भाजपा को ही बदल डाला।

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में 10-12 वर्षों से भाजपा सत्ता में है, लेकिन वहां ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे मुसलमानों को डर लगे। राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, असम आदि में भी भाजपा की सरकारें उसी सामान्य तरीकों से काम कर रही हैं जिस प्रकार अन्य राज्यों में अन्य दलों की सरकारें काम कर रही हैं। तो मुसलमान भाई-बहनें ये डर-वर छोड़ें और किसी पार्टी को अछूत न समझें। भाजपा के नजदीक जाएं, उसमें प्रवेश करें, कोई बात गलत लगे तो अंदर रहकर विरोध करें और इस देश की राजनीति को हमेशा के लिए बदल डालें। इससे न केवल मुसलमानों का भला होगा, बल्कि देश का भी बहुत भला होगा। हिंदू-मुस्लिम की राजनीति लगभग खत्म ही हो जाएगी।

आप कहेंगे कि भाजपा ही इच्छुक नहीं है तो वहां कैसे जाएं? यह बात सही नहीं है। भाजपा हर वर्ग में स्वीकार्य होने के लिए आतुर है। उसके कम से कम समझदार नेताओं को तो पता चल ही गया है कि बहुत ज्यादा कट्टरपन से कितनी किस सीमा तक वोट हासिल किए जा सकते हैं। उसके पास कद्दावर मुस्लिम नेता इसलिए नहीं जा पाते क्योंकि उन नेताओं को अपने समर्थकों या समाज के नाराज होने का खतरा रहता है। रिपोर्ट बताती हैं कि भाजपा में भी टिकट के लिए अनेक मुस्लिम दावेदारी करते हैं, लेकिन उन्हें टिकट इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि उन दावेदारों को अपने समाज का समर्थन नहीं मिलता। अब जब किसी दावेदार को उसके ही समाज का समर्थन नहीं मिलेगा और उसके जीतने की जरा भी संभावना नहीं होगी तो कोई पार्टी उसे क्यों टिकट देगी। जहां जीतने की संभावना होती है, जैसे कि निकाय चुनावों में तो वहां भाजपा ने अनेक मुस्लिम उम्मीदवार बनाए भी हैं।

इस प्रकार मेरा मानना है कि मुसलमान भाई-बहनों को किसी मुसलमान के भाजपा में जाने का विरोध नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे प्रोत्साहन देना चाहिए। जैसे एक परिवार के सदस्य अलग-अलग दलों में होते हैं और लाभ उठाते हैं, उसी प्रकार मुस्लिम हर दल से जुड़ें और इस सूची में भाजपा को भी शामिल करें। जितने ज्यादा मुस्लिम भाजपा से जुड़ेंगे, उतना ही ज्यादा फायदा मुसलमानों का होगा।

इससे एक तो भाजपा ऐसा तथाकथित कुछ नहीं कर सकेगी जिसके लिए भाजपा विरोधी पार्टियां मुसलमानों को डराती रहती है, दूसरे भाजपा से इतर दल मुस्लिमों को केवल वोट बैंक के रूप में देखना बंद करेंगे। ऐसा होने पर उन्हें डराने की राजनीति छोड़कर समाज के लिए कुछ काम करना पड़ेगा। भाजपा का एक हिस्सा भी तब हिंदू-हिंदू नहीं चिल्लाएगा क्योंकि आज की तारीख में उसे भी यह डर लगा रहता है कि यदि वह हिंदू-हिंदू न चिल्लाए तो उसकी झोली में क्या रह जाएगा, क्योंकि मुसलमान तो उसे वोट देगा नहीं। जब उसके पास भी अन्य दलों की तरह मुस्लिमों का साथ होगा तो फिर ये हिंदू-मुस्लिम बंद होकर वोट का पैमाना किसी सरकार का काम ही होगा।

मुझे लगता है कि यदि मुसलमान ऐसा प्रयोग करके देखते हैं तो इसमें नुकसान कुछ भी नहीं है। होगा तो लाभ ही होगा। स्वयं मुसलमानों का भी, हिंदुओं का भी और देश का भी।