उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है और पाले खींचे जा चुके हैं , कुछ अप्रत्याशित यदि नहीं हुआ तो अब यही स्थिति रहने वाली है। अभी तक रोज़ बदलने वाली स्थिति में मुझे अपनी विवेचना बदलनी पड़ती थी परन्तु अब लगता है कि चुनाव पुर्व सभी पार्टियाँ निर्धारित पाले को चुन चुकी हैं।

यह निश्चित है कि इस चुनाव के हार जीत में मुसलमानों का वोट अहम होगा और इस बार सपा-कांग्रेस गठबंधन हो जाने से मुस्लिम वोटर की वोट करने की दुविधा समाप्त हो गयी है।

मुस्लिम कयादत की दिल में इच्छा रखे प्रदेश के 20% मुसलमानों के पास ऐतिहासिक रूप से दो विकल्प हैं जो वोट प्रतिशत की दृष्टि से बराबर हैं 21% दलित वोट वाली बसपा तो लगभग 21%(11% सपा+10% कांग्रेस) वोट वाली सपा-कांग्रेस गठबंधन।

मुसलमान वोटों का यदि इन दोनों पार्टियों में विभाजन होगा तो पहली बार ऐसा होगा कि उनका वोट बेकार नहीं जाएगा और विभाजन की स्थिति में मुसलमानों के 10-10% भी वोट यदि सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा को मिले तो दोनों को 31% वोट मिलेगा और इतने वोटों से 20-22% वोट वाली भाजपा हार जाएगी यह निश्चित है।

चुनाव बाद क्या होगा ?

मुसलमानों के वोटों के विभाजन से भाजपा तो सत्ता से दूर हो जाएगी पर त्रिशंकू विधानसभा बनकर उभर सकती है और चरित्र और इतिहास कहता है कि मायावती भाजपा के साथ सरकार बना सकती हैं , ध्यान दीजिए कि “तिलक तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चार” के नारे और तिव्र कटुता के बाद भी उन्होंने 3 बार भाजपा के साथ सरकार बनाई तो इसबार भी ऐसा संभव है , और भाजपा इनको पार्टी फंड और इनके भाई आनन्द कुमार की संपत्ती को लेकर घेर चुकी है , इससे बचने के लिए मायावती-भाजपा सरकार बन सकती है , मायावती सदैव अप्रत्याशित फैसले लेती रही हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के सपा और भाजपा से नाराजगी है और लोकदल यह भाँप कर अकेले चुनाव लड़ रही है , जाट भी अपनी नेतृत्वविहीनता दूर करने के लिए इस बार अजीत सिंह को समर्थन कर सकते हैं।

फिर बेहतर विकल्प क्या है ?

गठबंधन में सीटों का बंटवारे पर ध्यान दीजिए , कांग्रेस 105 और समाजवादी पार्टी 297 सीट। और इसी बंटवारे में पूरा भविष्य है। चुनाव बाद की बाजी कांग्रेस के हाथ में है।

कांग्रेस 2012 विधानसभा चुनाव में 23 सीटों पर विजयी हुई थी और 35 सीटों पर दूसरे स्थान पर थी , गठबंधन के बाद वह अपनी इन परम्परागत सीटों पर जीत दर्ज करेगी। और वह इसलिए कि 2014 लोकसभा चुनाव में मोदी के प्रचंड लहर में भी जहाँ सबके वोट प्रतिशत नीचे आ गये वहीं कांग्रेस अपने परंपरागत वोट प्रतिशत बचाने में कामयाब रही है इसलिए कांग्रस 50-60 सीट पर जीत प्राप्त कर सकती है। यद्धपि सपा वोटर अपने जाति के उम्मीदवार ना होने की स्थिती में भाजपा को वोट देते रहे हैं परन्तु बिना ऐन्टी इनकंबेसी के अखिलेश सरकार को वापस लाने के लिए इस बार ऐसा नहीं करेंगे और गठबंधन के पक्ष में ही वोट देंगे।

समाजवादी पार्टी 297 सीटों पर कितना भी जीते परन्तु कम से कम अकेले 202 सीट नहीं जीत सकती और सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का समर्थन उसके लिए आखिरी विकल्प होगा। और यहीं 2019 के भविष्य की रूप रेखा तैय्यार होगी जब इन संघी नरपिचास राक्षसों को सत्ता छोड़कर भागना पड़ेगा।

प्रदेश सरकार को कांग्रेस की बैसाखी पर चला रहे अखिलेश यादव 2019 में कांग्रेस गठबंधन से ही लोकसभा चुनाव लड़ेंगे , उनके पास या तो सरकार खोने या कांग्रेस की शर्तें मानने का विकल्प होगा और वह मुलायम सिंह यादव जैसे कांग्रेस विरोधी नहीं हैं तो 2019 लोकसभा चुनाव कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल ही होंगे , सबसे बड़ी बात कि 2019 के गठबंधन के लिए कांग्रेस भी ममता बनर्जी को लगभग साध चुकी है। और गठबंधन की मजबूती पाते ही शेष भाजपा विरोधी दल भी इसमें शामिल होंगे , रालोद और जदयू पहले से ही कांग्रेस के साथ है। 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में नरपिचास संघियों को सत्ता से हटाने के लिए 2017 के विधानसभा चुनाव में मजबूत पृष्ठभूमि बनना आवश्यक है।

मुसलमान अपनी कयादत की टीस दिल में रखकर ही इस बार वोट करेंगा क्युँकि कयादत बनाने से ज़रूरी अपना वजूद बचाना है यदि उत्तर प्रदेश जीती तो भाजपा और उसके लम्पट संगठन सड़कों पर नंगा नाच कर डालेंगे।

2019 के मद्देनज़र मुसलमानों को रणनीतिक वोट करना होगा और अपने कातिलों से एक कम दर्द देने वाला कातिल चुनना होगा और बिल्कुल एकतरफा वोट इस गठबंधन को करना होगा क्युँकि इस गठबंधन की जीत में ही 2019 का भविष्य है और इन संघी राक्षसों से मुक्ती का मार्ग प्रशस्त होगा। क्युँकि मायावती कभी किसी गठबंधन के पक्ष में नहीं रहीं तो 2019 में भी नहीं रहेंगी।

यही स्थिति रही तो मुस्लिम कयादत की तीनों पार्टियों से दिली हमदर्दी रखते हुए “सपा-कांग्रेस” गठबंधन मुसलमानों के लिए बेहतर विकल्प होगा। हाँ तीनों मुस्लिम पार्टियों का हौसला भी बढ़ाते रहना ज़रूरी है तो जहाँ ये बेहद मज़बूत स्थिति में हों वहाँ मुसलमान उनको वोट कर दें परन्तु फिलहाल बड़े दुश्मन को हराना मुसलमानों के लिए आवश्यक होगा।

वक्त आने पर मुस्लिम कयादत को और भी मौके मिलेंगे और इंशाआल्लाह यह उभर कर रहेगी , काम करते रहने की आवश्यकता है।