जाति, धर्म, नस्ल और रंग के आधार पर होने वाली राजनीति ने आज धर्म की परिभाषा ही बदल डाली जो धर्म मानव की रक्षा मानवता की सुरक्षा के लिए आया है उसका दुरूपयोग मानव के विनाश और मानवता के सर्वनाश में हो रहा है जो धर्म देश और समाज के ज़िम्मेदारों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।आज धर्म के नाम पर चन्द व्यक्तियों और संगठनों ने धार्मिक ग्रथों और निर्देशों की गलत एवं निराधार व्याख्या करके जहां एक तरफ धर्म एवं धार्मिक शिक्षाओं, मर्यादाओं और उसकी छवि को खराब किया वहीँ दूसरी ओर उसका अपमान करके हमारी युवा पीढ़ी को गुमराह करने की कोशिश भी की है।

कहीं धर्म के नाम पर माथे पर कलम-ए-शहादत पट्टी बांधकर, झंडे पर कलम-ए-तौहीद लिखकर खुद को बम से उड़ाकर, मस्जिदों पर बुलडोजर चलाकर और बेगुनाहों का खून बहाकर मज़हब को बदनाम कर रहे हैं।कहीं धर्म के नाम पर पूरी बस्ती को आग लगा कर, औरतों की इज्ज़त लूट कर, बच्चो को जिंदा जलाकर और मर्दों को त्रिशूल की नोक से ज़बह कर के धर्म की सेवा, धर्म का पालन और धर्म की रक्षा का नाम दिया जाता।जिहाद और धर्म युद्ध की ऐसी व्याख्या की कल्पना किसी भी धर्म ने नही की होगी। जब वेदों ने किसी भी जीव जंतु को मारना हत्या और पाप बताया है और कुरान एक बेगुनाह इन्सान का क़त्ल पूरी इंसानियत का क़त्ल बताता है तो भला किसी व्यक्ति को चाहे तलवार से मारा जाये या त्रिशूल से वो जिहाद या धर्म युद्ध कैसे हो सकता है?
दरअसल मेँ इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस तरह के सरफिरे लोगों की टोली जानबूझ कर बनाई जाती है। उस के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाये जाते हैं। साम्प्रदायिक दंगे, अन्याय और अत्याचार प्रमुख हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है। एक दूसरे को उत्तेजित करने वाली बयान बाज़ी भी इस का एक हथियार है।इन सब के पीछे विश्व पूंजी बाजार के धुरंधर खिलाड़ी लगे हौवे हैं !!!

एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं —-जर्मनी में, जहां दुनिया की सबसे विकसित सर्वहारा पार्टियां मौजूद थीं, जिनके पास न सिर्फ विशाल जन-संगठन मौजूद थे, बल्कि बड़ी संख्या में सशस्त्र दस्ते भी थे, कैसे पराजित हुईं, इसे समझना नई पीढ़ियों के लिए, उन सबके लिए जो फासीवाद, पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष करना चाहते हैं, बहुत महत्वपूर्ण है.।सारे प्रचार के साधन,अख़बार,पत्र,पत्रिकायें हिटलर के प्रचार में थे ! हिटलर ने तमाम मजदूर आन्दोलनों को कुचल दिया था ! आज भारत क्या ऐसी स्थिति के दौर से नहीं गुजर रहा ? रोहित वेमुला की हत्या के बाद…1. यूनिवर्सिटीज में जाति उत्पीड़न के खिलाफ कानून की बात चल रही थी,2. SC, ST, OBC बैकलॉग भरने की मांग तेज हो रही थी, 3. सरकार दबाव में थी, 4. ब्राह्मणवादी टीचर्स की शिनाख्त हो रही थी, 5. JNU मे हो रहे विवाद ,और आरक्षण का बेकाबू होना RSS का दम फूल रहा था, 6. बीजेपी अपने गढ़ हैदराबाद में हार रही थी,7. नरेंद्र मोदी गो बैक हो रहा था, 8. मनुस्मृति ईरानी कैंपसों में घुस नहीं पा रही थीं, 9. 30% दलित आबादी के दबाव में अकाली दल में बीजेपी से गठबंधन तोड़ने की धमकी दे दी थी.10 यह सब चल ही रहा था की ओबीसी ,दलित एक जुट होते ताबतक ”नोट बंदी ….. सारे क़िले धराशायी !!!! ..!!कोई कुछ भी सोचे इस सामाजिक परिवर्तन की अंगड़ाई को चकनाचूर करने वाले समाजवादियों ने ही इस तरह के उन्मादियों का मनोबल बढ़ाया । वरना सांघी आज भारत को मूलनिवासियों से विहीन करने का मंसूबा कामयाब ना कर पाते ? आसाम से कश्मीर तक दलितों का शोषण परवान न चढ़ता ! थर्ड फ्रंट एक अच्छा कदम था इनके प्रभाव को रोकने के लिए परंतु हश्र क्या हौवा ? मुलायम सिंह यादव से अविश्वसनीय राजनीतिज्ञ कोई नहीँ फिर भी मुसलमान उनको एकमुश्त वोट देते रहे हैं और उस 2014 के चुनावों में भी जबकि उनके अपने यादव वोट ही नरेन्द्र मोदी के मायाजाल में फंसकर भाजपा की ओर चले गये । तो मान्यवर नेता जी लोग और आप जनता जी लोग, आप सब कबीर से लेकर रविदास की तरह खुद को जुलाहा और चमार, SC, ST, OBC, पसमांदा कहकर समस्या से टकराते रहिए । आँख बंद करना आपका रास्ता नहीं हो सकता । कबीर और रविदास ने खुद को जुलाहा और चमार कहकर, जातिवाद से सीधी भिड़ंत की थी । तुलसीदास ने कभी अपनी जाति नहीं बताई और घनघोर जातिवादी रचनाएँ लिखीं। कास्ट ब्लाइंड होना अपर कास्ट की सुविधा है। कास्ट ब्लाइंड होना आपके लिए नहीं है ।
सभी पार्टियों की नीति एक है। अब ये तो वही बात हुई न की छय रोगी का इलाज न होकर खांसी और ज्वर का एलाज हो ?? दरअसल बीजेपी फंसती है सामाजिक न्याय के मुद्दे पर. वह तब फंसती है, जब देश का हिंदू, बीजेपी के लिए हिंदू वोटर बनने से इनकार कर देता है।


मछलियां पानी में होती हैं, तो वे जिंदा रहती हैं और उनमें काफी ताकत होती है। लेकिन वही मछलियां जब पानी के बाहर होती हैं तो छटपटा कर दम तोड़ देती हैं। ‘जनता परिवार’ की कुछ पार्टियों ने हाल में एका की जो हुई है, उसमें सेक्युलरवाद को मूल विचार के तौर पर पेश किया जा रहा है। यह इन पार्टियों का पानी से बाहर आना या पानी से बाहर बने रहना है। सेक्युलरिज्म का खोखला नारा इन पार्टियों के लिए मारक साबित हो सकता है। उपरोक्त समस्या छय रोग ही है मगर ये क्या है ?? सेक्युलरिज्म का पिटारा मोहर्रम के ढ़ोल तासे की तरह पीटे जा रहे हैं । ससुरा फट्बे करेगा ॥आज मुलायम सिंह यादव कौन सी सियासत कर रहे हैं ?? एक बार सोचिए तो ???मुलायम जी का खोखला नारा मुसलमानो के लिए ये , मुसलमानो के लिए वो …….. और इसके पीछे अपने वर्ग को लाभ पहुंचाना …… ये और सब पार्टियां सेक्युलरिज्म के नाम पर एकजुट होने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन वे भूल रही हैं कि सेक्युलरिज्म के मैदान में भाजपा उन्हें और कांग्रेस और माकपा जैसे दलों को लगातार पटक रही है। भाजपा ने सेक्युलरिज्म का राजनीतिक अनुवाद ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ के रूप में किया है और इस अनुवाद को हिंदू मतदाताओं ने खारिज नहीं किया है। अर्थार्त सेमीग्रेसन अगर भाजपा के हिंदू बहुसंख्यकवाद से अन्य पार्टियों का अल्पसंख्यक सेक्युलरवाद टकराएगा, तो इस मुकाबले में जीतने वाले का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। अर्थार्त यह मुसलमानो को सेकुलरिज़्म के नाम पर तुष्टीकरण का थोथा खेल ??सेक्युलरिज्म तो दरअसल कभी राजनीतिक नारा होना ही नहीं चाहिए था। यूरोपीय सामाजिक लोकतंत्र की शब्दावली से आए इस शब्द का भारत आते-आते अर्थ भी बदल चुका है। बल्कि नेताओ के स्वार्थीपन के कारण अर्थ का अनर्थ हो चुका है।

*लगभग अस्सी फीसद हिंदू आबादी वाले देश में सर्वधर्म-समभाव के नारे का हिंदू वर्चस्व में तब्दील हो जाना स्वाभाविक ही था। आजादी के बाद कांग्रेस के शासन में भी हिंदू प्रतीकों और मान्यताओं को राजकाज में मान्यता मिली। और विपक्ष के नेता भी इसमे भागीदार रहे मुलायम सिंह की समाजवादी हो या नितीश की बीजेपी से अलग हुई पार्टी जेडीयू हो सभी सरकारी कामकाज की शुरुआत और उद्घाटन से लेकर लोकार्पण तक में नारियल फोड़ने, सरस्वती वंदना करने, राष्ट्रपतियों के द्वारा मंदिरों को दान देने से लेकर सरकार द्वारा मंदिरों के पुनरुद्धार कराने तक की पूरी शृंखला है, जो यह बताती है कि राजकाज में हिंदुत्व के हस्तक्षेप की शुरुआत भाजपा ने नहीं की है। यहां तक कि माकपा ने भी पश्चिम बंगाल में अपने तीन दशक से अधिक लंबे शासन में बेहद हिंदू तरीके से राजकाज चलाया और दुर्गापूजा समितियों में कम्युनिस्ट हिस्सेदारी के माध्यम से सांस्कृतिक हस्तक्षेप किया । यही हाल सेकुलरवादी राग अलापने वाले नेताओ का रहा । हिंदू तुष्टीकरण की शक्ल में भारतीय सेक्युलरवाद का जो प्रयोग कांग्रेस ने लंबे समय तक किया, उसी को भाजपा अब आगे बढ़ा रही है। जी भाजपा की शब्दावली में अपेक्षाकृत तीखापन जरूर है, लेकिन इसे भारतीय सेक्युलरवाद का ही थोड़ा चटक रंग माना जा सकता है। कांग्रेस हिंदू वर्चस्ववाद पर अमल कर रही थी और विपक्ष के नेता और लोहिया लोहिया चिल्लाने वाले लोग भी यही कर रहे थे और कर रहे हैं । सेक्युलर हिंदू वर्चस्ववाद के प्रयोग के ये दो मॉडल हैं। इसमें से कांग्रेसी मॉडल की खासियत यह है कि उसने जो शब्दावली और नारे गढ़े हैं, वे मुसलमानों को आहत नहीं करते मगर जड़ जरूर काट देते थे और इस वजह से उसे मुसलमानों का समर्थन मिलता रहा । मुलायम सिंह यादव ने यही प्रयोग किया मुसलमान दलित से भी नीचे चला गया ॥

आज मुस्लिम दलित और हिन्दू दलित एक राह की तलाश मे अंगड़ाई ले रहा है *नतीजा यह लगता है कि उत्तर प्रदेश में मुसलमान अब ”सपा” के अतिरिक्त मजबूत विकल्प की तलाश करेगा जो भाजपा के विरूद्ध हो और उस खाँचे में मायावती कुछ हद तक या वास्तविक नेता दलित ही , मुलायम सिंह यादव से अधिक विश्वसनीय हो सकता है । युवा मुसलमानों और गल्फ देशों में रह रहे मुसलमानों को असदुद्दीन ओवैसी निश्चित रूप से आकर्षित कर रहे हैं लेकिन वो भी सीधे संघियों को मदद ही पहुंचा रहे हैं ? , मेरा व्यक्तिगत मत है कि दलित- मुस्लिम गठजोड़ जमीनी स्तर पर मुस्लिम-यादव गठजोड़ से अधिक व्यवहारिक और निर्णायक भूमिका अदा करेगा। यदि 2017 के चुनावों में मायावती ओवैसी के साथ गठबंधन कर लेती हैं तो मेरा यह दावा है कि मुलायम सिंह यादव की अवसरवादी राजनीति और मुसलमानो को बेवकूफ़ बनाने का अंत हो जाएगा क्युँकि उनकी जाति का ही वोट अब भाजपा में अपना भविष्य देखने लगा है ।शहर तो शहर अब गांव के यादव लोग भी बीजेपी का राग अलापने लगे हैं ।

अल्पसंख्यक वोट और दलित वोट भाजपा को हराने में कारगर हो सकता है,इसकी शक्ल किसी भी रूप मे हो सकता है बशर्ते हिंदू मतदाताओं का एक हिस्सा वास्तविक सेकुलरवादी पार्टियों से जुड़े। यानी हिंदू मतों के विभाजन अर्थार्त यूरेशियन हिन्दू और मूलनिवासी हिन्दू वोटों के बँटवारे के बिना उन राज्यों में गैर-भाजपा राजनीति का कोई भविष्य नहीं है, जहां हिंदू आबादी बहुसंख्यक है। क्या भारतीय राजनीति के किसी पिछले या पुराने मॉडल में गैर-भाजपा राजनीति के सूत्र मिल सकते हैं ? इसके लिए हमें 1990 के दौर में जाना होगा।यादव जी ने चिड़िया रोकते रोकते वो जख्म दिया मुसलमानो को की इतिहास भी रो रहा होगा ? आज दलित मूलनिवासी टूट रहा है कल मुस्लिम टूटा है अब ओबीसी का नंबर है !!मुझे लगता है कि बिहार चुनाव में महागठबंधन से अलग होकर और भाजपा के विरूद्ध लड़ने की अपनी इमेज को मुलायम सिंह यादव ने खुद तोड़ दिया है जिसकी कीमत उनको 2017 में चुकानी पड़ सकती है ।