अब तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी कह दिया है कि नरेन्द्र मोदी युवा आइकन हैं, और खादी को लोकप्रिय बनाने के उनके प्रयासों के कारण ही खादी की बिक्री में अभूतपूर्व ढंग से 34% की बढ़ोत्तरी हुई वरना तो यह 2 से 7% तक ही रहती थी. सन्देश साफ़ है. गाँधी तो युवा आइकन हैं नहीं, मोदी हैं! खादी मोदी के नाम से बिकती है, गाँधी के नाम से नहीं. तो तसवीर किसकी लगनी चाहिए? समझदार को इशारा काफ़ी कि मोदी की तसवीर किसके कहने पर और क्यों लगायी गयी होगी!

बहुत हो गये गाँधी. अबकी बार मोदी खादी! इस साल खादी भी मोदीमय हो गयी. इस साल गाँधी नहीं, मोदी जी खादी के ‘ब्रांड एम्बेसेडर’ हैं. ज़माना बदल गया है!

वह हर हर मोदी, घर घर मोदी महज़ एक चुनावी नारा नहीं था, जो चुनाव बीतते ही बीत जाता. वह एक अदम्य आत्ममुग्ध आकांक्षा थी, विराट फिर विराटतम होने की, महामहामहानायकत्व पाने की, ‘न कोई भूतो, न कोई भविष्यति’ होने की, जो हर नये दिन कुछ डग और नाप लेती है, नापती जाती है. खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर इससे पहले कब चर्चा में आये? कब उन पर कोई विवाद उठा, कब कोई सवाल हुए?

गाँधी की जगह चरख़े पर मोदी!
लेकिन पिछले दो सालों से ये कैलेंडर सवालों में आ रहे हैं? क्यों? उसी ‘घर-घर मोदी’ की उत्कट इच्छा के कारण, जिसे हर जगह सिर्फ़ एक चेहरा चाहिए, अपना! इसीलिए इस बार कैलेंडर से गाँधी जी ग़ायब हो गये, मोदी जी बैठे चरख़ा कात रहे हैं.

खादी ग्रामोद्योग से जुड़े एक वरिष्ठ कर्मी का कहना है कि पिछले साल भी खादी के कैलेंडर पर जब नरेन्द्र मोदी की तसवीर को भी साथ में जगह दी गयी थी, तभी आपत्तियाँ उठी थीं. तब आश्वासन दिया गया था कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा! लेकिन आश्वासनों का क्या?

अगर सरकार नोटबंदी पर हर दिन पिछले दिन की अपनी बात ‘भूल’ सकती है, तो खादी वाले एक साल पहले का एक आश्वासन क्यों नहीं ‘भूल’ सकते? लिहाज़ा इस साल गाँधी बाबा कैलेंडर से पूरी तरह हटा दिये गये!

आश्चर्य नहीं अगर कल को ‘मोदी खादी’ आ जाय!
मोदी नाम का माहात्म्य है. किसी ज़माने की नेहरू जैकेट मोदी जैकेट हो गयी! आश्चर्य नहीं कि कल को ‘मोदी खादी’ बिकने लगे. आख़िर खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष विनय कुमार सक्सेना कह ही रहे हैं कि ‘वास्तव में मोदी ही खादी के सबसे बड़े ब्राँड एम्बेसेडर हैं, उन्होंने ख़ुद खादी पहन कर इसे जनता के बीच लोकप्रिय बनाया है और इसके अलावा वह युवा आइकन भी हैं.’

सक्सेना जी के तर्क में दम तो है. जब मोबाइल फ़ोन और इ-वॉलेट का विज्ञापन मोदी जी के नाम पर हो रहा हो, तो खादी वालों को मोदी नाम भजने में हिचक क्यों हो, शर्म क्यों आये? और यह किसे पता कि खादी वालों ने ऐसा ख़ुद से सोचा या उन्होंने चुपचाप ‘आज्ञापालन’ कर दिया!

और अब तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी कह दिया है कि नरेन्द्र मोदी युवा आइकन हैं, और खादी को लोकप्रिय बनाने के उनके प्रयासों के कारण ही खादी की बिक्री में अभूतपूर्व ढंग से 34% की बढ़ोत्तरी हुई वरना तो यह 2 से 7% तक ही रहती थी.

सन्देश साफ़ है. गाँधी तो युवा आइकन हैं नहीं, मोदी हैं! खादी मोदी के नाम से बिकती है, गाँधी के नाम से नहीं. तो तसवीर किसकी लगनी चाहिए? समझदार को इशारा काफ़ी कि मोदी की तसवीर किसके कहने पर और क्यों लगायी गयी होगी!

‘नया राजधर्म’ है चुपचाप ‘आज्ञापालन’
‘आज्ञापालन’ तो ‘नये राजधर्म’ का अनिवार्य संस्कार बन चुका है. अब यह बात तो जगज़ाहिर हो चुकी है कि नोटबंदी का फ़ैसला रिज़र्व बैंक का अपना फ़ैसला नहीं था. यह फ़ैसला तो सरकार का था. रिज़र्व बैंक ने तो बस ‘आज्ञापालन’ किया था!

रिज़र्व बैंक ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति को लिख कर यह बात बतायी है कि 7 नवम्बर को भारत सरकार ने रिज़र्व बैंक को नोटबंदी पर विचार करने की ‘सलाह’ दी थी, जिस पर अगले दिन ‘विचार’ कर बैंक के बोर्ड ने सरकार को नोटबंदी की सिफ़ारिश कर दी थी.

इतना बड़ा मौद्रिक फ़ैसला रिज़र्व बैंक बोर्ड ने कुछ मिनटों में ले लिया! क़ानूनी तौर पर प्रक्रिया पूरी हो गयी. कहने को सिफ़ारिश रिज़र्व बैंक की थी, जिस पर सरकार ने अमल किया. लेकिन सच क्या है, यह रिज़र्व बैंक के बयान से स्पष्ट है.

‘आज्ञापालन’ का इससे बड़ा नमूना और क्या हो सकता है? रिज़र्व बैंक जैसी संस्था अगर सरकार के सचिवालय की तरह काम करने लगे, तो उसकी उपयोगिता ही क्या? ऐसी संस्थाएँ लोकतंत्र में सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए बनायी जाती हैं, न कि सरकार की हाँ में हाँ मिलाने के लिए.

क्या यही ‘पारदर्शिता’ का पैमाना है?
नरेन्द्र मोदी बार-बार कहते हैं कि तमाम सांविधानिक संस्थाओं को बहुत मज़बूत होना चाहिए, तभी लोकतंत्र मज़बूत होगा. वह पारदर्शिता की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. लेकिन संस्थाओं की ‘मज़बूती’ और ‘पारदर्शिता’ का उनका पैमाना क्या है?

संस्थाएँ ‘जेबी’ हों और वही करें, वही दिखाएँ, जो मोदी जी करना और दिखाना चाहते हैं. अब मोदी जी की बीए की डिग्री का मामला लीजिए. बहुत दिनों से इस पर विवाद चल रहा है. दिल्ली विश्विद्यालय का कहना है कि नरेन्द्र मोदी ने बीए पास किया है. लेकिन पता नहीं क्यों विश्विद्यालय इसका कोई रिकॉर्ड दिखाने को तैयार नहीं हैं.

और जब एक सूचना आयुक्त एम. श्रीधर आचार्युलू ने दिल्ली विश्विद्यालय को रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के निर्देश दिये, तो उनके हाथ से मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़े काम वापस ले लिये गये! आख़िर नरेन्द्र मोदी ने जिस साल बीए पास किया है, उसके रिकॉर्ड दिखाने में परेशानी क्या है? और ऐसी परेशानी क्या है कि जो सूचना आयुक्त ऐसा निर्देश दे, उसे इस काम से ‘मुक्त’ कर दिया जाय? यही है ‘नये राजधर्म’ की ‘पारदर्शिता!’

सीबीआइ प्रमुख की नियुक्ति का मामला
सीबीआइ के प्रमुख की नियुक्ति का विवाद चल ही रहा है. नियुक्ति के लिए चयन समिति की बैठक बुलायी ही नहीं गयी. जो सबसे वरिष्ठ अधिकारी थे, उन्हें ‘बड़े महत्त्वपूर्ण काम’ पर दूसरी जगह लगा दिया गया और उसके बाद एक तदर्थ प्रमुख बैठा दिया गया. बहाना कोई भी हो. बात एक ही है. संस्था हो या व्यक्ति, हमेशा ‘आज्ञापालन’ करता हो तो ठीक. जो मोदी कहें, वही सही मानता हो तो वह ‘मज़बूत’ और ‘पारदर्शिता’ का पालन करने वाला है!

क्यों नहीं चाहिए नेहरू-गाँधी?
इसलिए खादी ग्रामोद्योग वाले गाँधी को हटा कर अपने कैलेंडरों में मोदी को छापने लगें तो उसमें आश्चर्य कैसा? इतिहास की ‘धुलाई’ कर मोदी जब तक नेहरू और गाँधी को स्मृतियों से ‘साफ़’ नहीं कर देंगे, तब तक ख़ुद को देश का पर्यायवाची बना देने का उनका सपना कैसे पूरा होगा और तब तक संघ के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा कैसे दूर होगी? नेहरू और गाँधी ही वह सबसे बड़ी वैचारिक दीवार हैं, जिसे ध्वस्त करने में संघ वर्षों से लगा है.

इसीलिए नेहरू के ‘छवि-भंजन’ के लिए मनगढ़न्त कहानियों और फ़र्ज़ी आरोपों के हथियारों से लैस संघ-ब्रिगेड पूरी ताक़त से जुटा है. गाँधी पर भी ऐसे हमले होते ही रहे हैं, हो ही रहे हैं, लेकिन अगर उन्हें 2 अक्तूबर को सिर्फ़ ‘स्वच्छता’ के पिंजड़े में बैठा दिया जाये और बाक़ी जगहों से उनकी याद मिटा दी जाय, तो ‘मोदीमय भारत’ और संघ के ‘हिन्दू राष्ट्र’ का रास्ता आसान हो जायगा. हो जायगा कि नहीं!
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