बीजेपी प्रफुल्लित है कि एक ओपिनियन पोल बता रहा है कि नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी को वोट देने की मंशा रखनेवाले वोटर तीन प्रतिशत बढ़ गये! अगर यह सही है, तो यह जनता की ‘कंडीशनिंग’ की नयी कला है, जिसे मोदी आज़मा रहे हैं. इसलिए इस चुनाव में नोटबंदी की ‘सफलता’ या विफलता तय करेगी कि 2019 का चुनाव जीतने के फ़ार्मूले क्या होंगे? यह विधानसभा चुनाव यह भी तय करेगा कि राजनीति के क्षितिज पर अपने उभार के जो संकेत अखिलेश यादव अभी दिखा रहे हैं, उनमें कितना दम है. उधर, पंजाब और गोआ में ‘आप’ पर झाड़ू फिर गयी तो केजरीवाल के लिए राजनीति में कोई अगली बड़ी कहानी लिखना आसान नहीं होगा.

अबकी बार, तीन सवाल! नोटबंदी, अखिलेश और केजरीवाल. चुनाव तो होते ही रहते हैं, लेकिन कुछ चुनाव सिर्फ़ चुनाव नहीं होते, वह समय के ऐसे मोड़ पर होते हैं, जो समय का नया लेखा लिख जाते हैं, ख़ुद बोल कर समय के कुछ बड़े इशारे कर जाते हैं, कुछ सवालों की पोटलियाँ खोल जाते हैं. जो पढ़ना चाहे, पढ़ ले, सीख ले, समझ ले, आगे की सुध ले, वरना काँग्रेस बन कर निठल्ला पड़ा रहे! एक 2014 का चुनाव था, जो देश को बदल गया कई तरीक़ों से. और एक यह 2017 के विधानसभा चुनाव होंगे, जो 2019 की कहानी लिख जायेंगे, जो बूझना चाहे, बूझ ले!

विधानसभा चुनाव के तीन सवाल
पाँच राज्यों के इस विधानसभा चुनाव के तीन सवाल हैं, नोटबंदी, अखिलेश और केजरीवाल. और इनसे जुड़ा एक चौथा सवाल भी है. वह यह कि 2019 में नरेन्द्र मोदी का रथ सरपट निकल जायेगा या विपक्ष की रंग-बिरंगी टुकड़ियाँ मिल कर उसे रोकने का कोई व्यूह रच पायेंगी? और अगर ऐसा हुआ तो विपक्ष का सेनापति कौन होगा, एक होगा या कई?

वैसे छोटे-छोटे सवाल तो कई और हैं, जो हर चुनाव में होते हैं. मसलन, यह चुनाव तय करेगा कि 2018 में राज्यसभा की जो 68 सीटें ख़ाली हो रही हैं, उन पर किन पार्टियों के कितने लोग बैठेंगे? और 2017 में ही होनेवाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए बीजेपी की राह कुछ आसान हो पायेगी या नहीं? लेकिन राजनीति में ऐसे सवाल आते हैं और जाते हैं, इनसे राजनीति का ढर्रा नहीं बदलता है.

नोटबंदी : मुद्दा नहीं, नया राजनीतिक कौशल
बहुत-से लोगों के लिए नोटबंदी दो विपरीत विचारधाराओं के बीच विवाद का सवाल होगा, उस पर अन्तहीन बहसें होती रहेंगी. लेकिन नोटबंदी का मामला एक नये तरह का राजनीतिक कौशल बन कर उभरा है, यह हम देख रहे हैं. विपक्ष के लोगों को भले यह दिखे या न दिखे.

लेकिन यह एक अनोखा कौशल है कि अपनी विफलताओं और अपने विरुद्ध जानेवाले मुद्दों का मुँह मोड़ कर उन्हें ही अपना हथियार बना लिया जाय! प्रधानमंत्री मोदी, बीजेपी और संघ ने पिछले ढाई सालों में इस कौशल का इस्तेमाल बार-बार बड़ी दक्षता से किया है और हर बार विपक्ष को कुंद किया है.

क्या बीजेपी के वोटर 3% बढ़ गये?
बीजेपी प्रफुल्लित है कि एक ओपिनियन पोल बता रहा है कि नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी को वोट देने की मंशा रखनेवाले वोटर तीन प्रतिशत बढ़ गये! अगर यह सही है, तो यह जनता की ‘कंडीशनिंग’ की नयी कला है, जिसे मोदी आज़मा रहे हैं. जनता के मन में बस यह बात बैठा दो कि नोटबंदी से काला धन निकलेगा, जाली नोट पकड़ में आ जायेंगे, लम्बे समय में देश का बड़ा भला होगा. हो गया काम!

ग़रीब बनाम अमीर, ‘ईमानदार’ बनाम ‘बेईमान’
नोटबंदी से सबसे ज़्यादा पिसा ग़रीब, लेकिन उसे अपने ‘पिसने’ की परवाह नहीं. क्योंकि उसके सीने को ठंडक पड़ी कि नोटबंदी की चक्की में उनसे ज़्यादा वह पिसे होंगे, जो ‘कार-मकान’ वाले हैं, ‘बेईमान लोग’ हैं! मोदी के पिछले भाषणों को सुनिए. ‘बेईमान’ बनाम ‘ईमानदार’, ‘काले धनी’ बनाम ग़रीब-मज़दूर-किसान, ‘हम’ बनाम ‘वह’ की विभाजक रेखाएँ कितनी चतुराई से खींची गयीं.

ठीक वैसे ही, जैसे पिछले लोकसभा चुनाव में अमित शाह ने ‘इज़्ज़त का सवाल’ उठा कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों और मुसलमानों के बीच ‘हम’ बनाम ‘वह’ की दीवार खड़ी की थी. फ़ार्मूला पुराना है. बार-बार आज़माया जा चुका है. बस, इस बार उसका छिड़काव ‘नयी फ़सल’ पर किया गया है!

‘निगेटिव’ को ‘पाज़िटिव’ बना दो!
इसलिए नोटबंदी के बावजूद अगर इन चुनावों में बीजेपी अच्छी सफलता पाती है, तो यह मुद्दे की सफलता नहीं, बल्कि ‘निगेटिव’ को ‘पाज़िटिव’ बना कर बेच देने की राजनीतिक ब्रांडिंग और पैकेजिंग के नये अस्त्रों का चमत्कार होगा, जिसे 2014 से अब तक हमने देश में भी और विदेश में भी ब्रेक्ज़िट और ट्रम्प के चुने जाने तक में बार-बार देखा है.

लेकिन लगता नहीं कि ज़्यादातर विपक्षी नेताओं ने इस नये ‘ट्रेंड’ का कोई नोटिस लिया है. अब भी वह अपने पुराने घिसे-घिसाये तीरों को ही चलाते दीखते हैं. वरना काँग्रेस ने प्रशान्त किशोर के साथ यों ही औने-पौने ‘टाइमपास’ न किया होता!

अखिलेश में कितना दम है?
इसलिए इस चुनाव में नोटबंदी की ‘सफलता’ या विफलता तय करेगी कि 2019 का चुनाव जीतने के फ़ार्मूले क्या होंगे? यह विधानसभा चुनाव यह भी तय करेगा कि राजनीति के क्षितिज पर अपने उभार के जो संकेत अखिलेश यादव अभी दिखा रहे हैं, उनमें कितना दम है. पिछले एक-डेढ़ साल में अखिलेश ने अपनी राजनीतिक शैली और इरादों को नये और करिश्माई तरीक़े से परिभाषित किया है. उनकी अपील सपा के परम्परागत यादव-मुसलिम समीकरण से कहीं आगे तक जाती है.

वैसे तो अभी तक जो ओपिनियन पोल आये हैं, वे उत्तर-दक्खिन हैं, लेकिन एक बात की तरफ़ लोगों का कम ध्यान गया है. जब चुनाव सिर पर हों, और पार्टी में महीनों से संकट चल रहा हो तो आमतौर पर उसके नेताओं में ‘डूबते जहाज़’ से भगदड़ का आलम होता है. लेकिन सपा के लगभग सारे विधायक और छोटे-बड़े नेता अखिलेश का दामन थामे खड़े हैं. यानी पार्टी के लोगों को लगता है कि जनता में उनका नेता पूरी मज़बूती से टिका हुआ है. एक युवा नेता के लिए यह कम बड़ी बात नहीं.

केजरीवाल करिश्मा न कर पाये तो क्या होगा?
पंजाब और गोआ में केजरीवाल अगर कुछ कर दिखा पाते हैं, तो आम आदमी पार्टी देश के दूसरे हिस्सों में पंख फैलाने के सपने पाल सकती है. लेकिन अगर इन दो राज्यों में ‘आप’ पर झाड़ू फिर गयी तो ‘आप’ के लिए राजनीति में कोई अगली बड़ी कहानी लिखना आसान नहीं होगा.

‘आप’ अगर इन दो राज्यों में कुछ ज़ोर न दिखा पायी तो नरेन्द्र मोदी दिल्ली में उसके लिए सरकार चलाना और भी दूभर कर देंगे. अभी ही एक बड़े पत्रकार का ईमेल लीक हो जाने से अब शक की कोई गुंजाइश नहीं बची कि मोदी सरकार किस तरह केजरीवाल सरकार के पीछे पड़ी है!

2019 की चुनावी लड़ाई कैसी होगी
और यह विधानसभा चुनाव यह संकेत भी देगा कि 2019 की चुनावी लड़ाई कैसी होगी. इस बार अगर बीजेपी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती तो नरेन्द्र मोदी के लिए अगले ढाई साल बहुत चुनौती भरे होंगे. विपक्ष तो उन्हें हर तरफ़ से घेरने की कोशिश करेगा ही, संघ और बीजेपी के भीतर भी उनके आलोचक मुखर हो जायेंगे.

और तभी यह सवाल भी खड़ा होगा कि 2019 में मोदी के मुक़ाबले विपक्ष कैसे उतरेगा, उसका नेता कौन होगा? इसके लिए अब तक नीतीश कुमार दावेदारी ठोकते दीख रहे थे, लेकिन मोदी के साथ उनकी हालिया जुगलबन्दियों के बाद विपक्ष में क्या वह फिर से वैसी विश्वसनीयता बना पायेंगे, यह एक बड़ा सवाल है.

फिर विपक्ष में और चेहरे कौन-से हैं? राहुल गाँधी, ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल और अखिलेश यादव. क्या 2019 में विपक्ष की धुरी इन्हीं के आसपास बनेगी? 2017 के चुनाव में इस सवाल का जवाब भी तलाशा जायेगा.

और अगर इन चुनावों में बीजेपी ढंग की जीत हासिल कर लेती है, तो फिर 2019 में निस्सन्देह ‘अबकी बार, फिर से मोदी सरकार!’
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