जर्मनी ने भी अब पूरे चेहरे को ढकने वाले परदे (बुर्के) पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, फ़्रांस पहले ही इस पर प्रतिबंधित लगा चुका है, स्विट्ज़रलैंड ने 2010 में मीनारों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। इस्लाम के प्रति नफरत पैदा कर राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञों को समाज में स्वीकृति मिल रही है, डोनाल्ड ट्रम्प को पहले ही राष्ट्रपति चुना जा चुका है; इन सबके बावजूद मुस्लिम समुदाय समय की नाजुकता को समझ नहीं पा रहा है,वह यह समझना नहीं चाहते कि क्यों हर एक समाज में इस्लाम को लेकर खौफ बढ़ रहा है और भारत भी इस बात का अपवाद नहीं है।

मुस्लिम समाज को पर्दे (बुरका) और मीनार पर प्रतिबन्ध लगाना अपने धर्म की आजादी पर आक्रमण लगता है,जबकि मुस्लिम समुदाय कभी भी मुस्लिम समाज में कम होती धार्मिक आजादी पर चिंतित नहीं होता, यहाँ तक की उन्होंने खुद मुस्लिम वर्ग के अल्पसंख्यकों और धर्म के प्रति खुले विचार रखने वालों की धार्मिक आजादी पर चुप्पी साध रखी है।

धार्मिक आजादी इन्सान का अभाज्य हिस्सा है और मुस्लिम समुदाय यह समझने को तैयार नहीं है।

विध्वंस

हाल ही में भारतीय मुसलमान बाबरी मस्जिद विध्वंस की २४वीं बरसी के गवाह बने;लेकिन पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिन्दू मंदिरों को तोड़ा गया है, हिन्दू लड़कियों का लगातार अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और शादी के नाम पर बलात्कार हो रहा है; लेकिन किसी उलेमा या इस्लामिक संस्था के द्वारा इन जघन्य कृत्यों का विरोध करते नहीं सुना गया।

क्या इस्लाम धार्मिक आजादी की स्वीकृति देता है ?

सऊदी अरब अपनी जमीन पर मंदिर या चर्च बनाने की अनुमति नहीं देता। कुरान की शिक्षा अगर किसी ज़ेहाद की अनुमति देती है तो वो सऊदी अरब के खिलाफ होनी चाहिए ताकि सऊदी अरब को बाध्य किया जा सके कि वह दूसरे धर्मों के धार्मिक स्थल को अपने यहाँ स्वीकृति दे। इस्लाम के आगमन के 13 सालों बाद जब मुसलमानों को खुद की रक्षा के लिए हथियार रखने की इजाजत दी गयी थी तो वह वास्तव में धर्म की रक्षा के लिए थी, केवल मुसलमानों या मुस्लिम धर्म की के लिए नहीं। कुरान के शब्दों में (२२:40) “अगर अल्लाह ने अलग-अलग तरह के लोगों को नियंत्रित न किया होता तो मठ, चर्च, उपासना स्थल और मस्जिद जहां-जहां ईश्वर की भरपूर पूजा की जाती है, उन्हें बिलकुल ही तबाह कर दिया जाता।“

गौर करने वाली एक बात और है, मामला जब किसी मस्जिद या तथाकथित इस्लामिक परदे (बुर्के) का हो, तभी मुस्लिम समुदाय को चिंता होती है और उन्हें इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं है, कि इस्लामिक या स्वघोषित इस्लामिक देश अपने यहाँ धार्मिक आज़ादी की अनुमति नहीं दे रहे हैं।

यही नहीं, हमारे पास कुछ ऐसे भी शोधकर्ता हैं जिनका मानना है कि गैर मुस्लिमों को इस्लामिक देशों में पूरी धार्मिक आजादी है (वास्तव में,हम जानते हैं कि यह बात पूर्णतया सच नहीं है) और मुस्लिमों को पूरी धार्मिक आजादी नहीं है। एक बार आप मुस्लिम अभिभावक के घर पैदा हो गए तो आप जिंदगी भर मुस्लिम बने रहने के लिए अभिशप्त है और अगर इससे विचलित होते हैं तो आपकी गर्दन भी काटी जा सकती है। वास्तव में, विभिन्न इस्लामिक वैचारिक संस्थाओं के कई सम्माननीय उलेमा ऐसे भी हैं जिनका मानना है कि ज़ुमे की नमाज़ में अगर कोई लगातार शामिल नहीं होता उसकी गर्दन काट देनी चाहिए।

शोधकर्ता

जाने माने पाकिस्तानी शोधकर्ता सलमान तारिक खुरेशी लिखते हैं, “एक व्यक्ति जो हज़रत मौलाना रशीद गंगोही का काफी सम्मान करते हैं और वह देवबंद मदरसा के संस्थापको में से एक थे।”

मैं यहां जिन सज्जन की बात कर रहा हूं, वह एक दयालु व्यक्ति हैं और लोग उन पर मदद के लिए निर्भर रहते हैं। एक बार बातचीत के दौरान मैंने उनसे ज़िक्र किया कि मानवता की आधारभूत चीज दया है तो उनके विचार अलग थे, उनका मानना था कि दया केवल पवित्र धर्मनिष्ठ मुस्लिमों के लिए है। जहां तक दूसरों की बात है, उन्हें सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए और अगर वह तब भी न सुधरें तो वे वजिबुल कत्ल (क़त्ल के योग्य) होंगे।

व्यापार और अर्थ जगत से जुड़े एक और व्यक्ति से मुझे मिलने का मौका मिला; उनका भी मानना था की जो ज़ुमे की नमाज में शामिल न हो “उसे मार देना चाहिए, उनकी गर्दन काट देनी चाहिए।”

धर्म

मुस्लिमों और पूर्व मुस्लिमों को धार्मिक आजादी से वंचित रखना, गैर मुस्लिमों के बारे में बात न करना, वास्तव में इसका एक लम्बा और रक्तरंजित इतिहास रहा है।

कुरान की एक सूक्ति: (2:256) ला इकारहा फीद दीन (धर्म में कोई बाध्यता नहीं होनी चाहिए) मुहम्मद साहब (pbuh) के जाने के बाद यह सूक्ति कोई असर नहीं छोड़ सकी। जबरन धर्म परिवर्तन की सबसे पहली लड़ाई खलीफा हज़रत अबू बकर के समय से ही शुरू हो गयी थी, जब उन्होंने रिदा (स्वधर्म त्याग) की लड़ाई उन कबीलों के खिलाफ शुरु की, जिन्होंने पैगम्बर साहब के निधन के बाद इस्लाम धर्म को छोड़ दिया था। उन्हें या तो जबरन मुसलमान बनाया गया या फिर मार दिया गया।

ऐसा ही मामला चौथे खलीफा हजरत अली के समय भी रहा और आज भी नव ख्वार्ज़ी, के रूप में ज़ारी है।, जिन्हें सलाफी या वहाबी विचारधारा के नाम से भी जाना जाता है

ये समूह शिया और अहमदी समुदाय समेत अधिकतर उन मुस्लिमों को मारते हैं जिन्हें वे “विधर्मी” समझते हैं।

हम मुसलमानों को इतिहास ध्यान में रखते हुए अपने वर्तमान को समझने की कोशिश करनी चाहिए। जब तक हम दूसरे धर्मों को स्वीकार करके उन्हें सम्मान नहीं देंगे और जो इन्सान इस्लाम त्याग चुका है, उसे उसके अधिकार नहीं देंगे तब तक हमें भी दूसरों से सम्मान की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हमें दूसरों की उदारता को लेकर अपने अधिकारों के बारे में भ्रमित नहीं होना चाहिए। हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि अधिकार हमेशा कर्तव्य से जुड़े हुए हैं। हम मुसलमानों को इस्लाम की सर्वश्रेष्ठता को नकारते हुए,यह स्वीकार करना होगा की अनेक धार्मिक मार्गों की तरह इस्लाम भी मोक्ष पाने का एक रास्ता है। मैं यह जानता हूं कि आत्म निरीक्षण करके यह जानना कि हम कैसे इस्लाम के प्रति नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं, एक कठिन कार्य है; लेकिन हमारे पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
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