आज के ‘टेलिग्राफ’ में एक विस्तृत खबर है – करेंसी ‘कुलियों’ के रूप में सेना की तैनाती (Soldiers on duty as currency ‘coolies’) । इस खबर में विस्तार से बताया गया है कि पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर के साल्बनी करेंसी प्रिंटिंग प्रेस में भारतीय वायुसेना के 120 जवानों को तैनात किया गया है, ताकि यहां छप रहे नोटों को वे देश के सभी इलाकों में जल्दी से पहुंचा सके। इसी प्रकार मध्यप्रदेश के देवास के प्रेस में भी सेना के जवानों की टुकडि़यां तैनात की गई है।

खबर में बताया गया है कि पहले तक यह काम बैंकों और हवाई सेवाओं के कर्मचारी कर रहे थे। आज इस काम में शत्रु से लड़ने के लिये प्रशिक्षित सेना के जवानों को लगाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्हंि लड़ाई का प्रशिक्षण मिला हुआ है, नोटों की छपाई का नहीं। आज वे शुद्ध रूप में कुली का काम कर रहे हैं। रिपोर्ट में सेना के एक अधिकारी की बात को उद्धृत करते हुए कहा गया है – ‘‘आज सैनिक कुली बन गये हैं। हम कायिक श्रम करते हैं देश के शत्रुओं से लड़ने के लिये। अब सरकार ने हमें इस काम में लगा दिया है।’’ (”Soldiers are coolies today”, one officer admitted. “We do physical labour, but to fight against enemies of the country. Now the government has ordered us to do this,” he said)

यह सिलसिला एक महीने से चल रहा है। वे अब तक नोटों से भरे जहाजों की तकरीबन एक सौ फेरियां लगा चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि एयर चीफ मार्शल अरूप राहा, जो जल्द ही सेवानिवृत होने वाले है और जो लड़ाकू विमान के पायलट रहे हैं, आज अपने सैनिक जीवन की अंतिम वेला में वे नोटों की ढुलाई की तदारिकी कर रहे हैं। इसीप्रकार, उनकी जगह कमान संभालने के लिये आने वाले एयर मार्शल बिरेन्दर सिंह धानोआ भी लड़ाकू विमानों की योजनाओं और युद्ध की रणनीति से जुड़े व्यक्ति हैं, उन्हें भी अब वायुसेना प्रमुख के पद पर आने के बाद नगदी की ढुलाई के काम की देख-रेख में लगना पड़ेगा।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस काम में किस प्रकार वायु सेना की शक्ति जाया की जा रही है, क्योंकि उनके लोगों को नोटों की छपाई होने तक के लिये बेकार बैठे रहना पड़ता है। इसके अलावा सेना के ये विमान जितना बोझ उठा सकते हैं, उससे बहुत कम बोझ के साथ उनको उड़ना पड़ता है। और तो और, इस काम के लिये लेह या थोइसे की तरह के दूर दराज के इलाकों में सेना के जवानों को ले जाने के लिये लगने वाले हवाई जहाजों को इस काम से एक बार के लिये हटाया गया है।

अभी चंद दिन पहले ही अपने एक लेख, ‘सरकार के स्वेच्छाचार के दुष्परिणामों का डर’ में हमने सिविलियन कामों के लिये सेना के लगातार दुष्प्रयोगों के खतरों की ओर गंभीरता से संकेत किया था। यहां उस टिप्पणी को ‘टेलिग्राफ’ की इस रिपोर्ट के साथ फिर एक बार पढ़े जाने की जरूरत है। उसमें हमने लिखा था –
“आज नोटबंदी के कारण वैसे ही समूचा जन-जीवन अस्थिर है। ऊपर से इस सरकार ने सभी स्थापित संस्थाओं की मर्यादाओं को भी दाव पर लगा दिया है। जजों की नियुक्ति के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ मोर्चा खोल कर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच एक स्थायी तनाव बना हुआ है। इसके अलावा, घरेलू सुरक्षा और सीमा की सुरक्षा की तरह के हर मामले में राजनीतिक और कूटनीतिक सूझबूझ की कमी के चलते इस सरकार की सेना पर बढ़ती हुई भारी निर्भरशीलता के बहुआयामी खतरे हैं। यह एक ओर जहां सेना को अलग, नये शक्ति केंद्र के रूप में विकसित कर सकती है, वहीं सेना के लगातार मनमाने दुष्प्रयोग से भारत में सिविलियन और नागरिक सत्ताओं के बीच एक ऐसे तनाव के बीज डाल सकती है, जिससे अब तक का भारत पूरी तरह से अपरिचित रहा है।

“वैसे ही, सेना और सरकार के बीच एक लंबे अर्से से वेतन आयोग की सिफारिशों और वन रैंक वन पेंशन (ओरोप) की तरह के मुद्दों पर अंदर ही अंदर एक तनाव बना हुआ है। अब तक के वेतन आयोगों की सिफारिशों से सेना संस्थान कभी भी खुश नहीं रहा है। सभी सेना-प्रमुखों ने पिछले मसलों का बिना हल किये सेना के बारे में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को अभी लागू न करने की मांग की है। सेना की ओर से वेतन आयोग में अपने प्रतिनिधित्व की मांग लगातार उठती रही है, लेकिन आज तक किसी भी सरकार ने उसे स्वीकृति नहीं दी है। पिछले दिनों जब दिवाली के मौके पर नेताओं ने जवानों के प्रति उद्गार व्यक्त करते हुए उन्हें दीवाली की भरपूर बख्शीश देने की बात कही तो उस पर बाज हलकों से तीखी प्रतिक्रिया आई थी कि क्या जवानों को बख्शीश के नाम पर भीख देने की बात कही जा रही है !

“अगर यह सब इसी प्रकार चलता रहा तो वह समय ज्यादा दूर नहीं है जब कोई भी सेनाध्यक्ष उठ कर खुले आम सरकार के फैसलों में सामरिक तर्क के अभाव के नाम पर उसे चुनौती दे सकता है। नागरकोट हमले के बाद खुद सेना प्रमुख दलबीर सिंह नागरकोट पहुंचे थे। अब तक उन्होंने वहां के सैनिक शिविर की सुरक्षा की स्थिति के बारे में कुछ नहीं कहा है, लेकिन वे निश्चित तौर पर देख रहे होंगे कि लाल फीताशाही की जकड़नों ने इन शिविरों की क्या दुर्दशा बना रखी है। ऐसे में, शासक दल की पसंद के जजों की तलाश की तरह ही सरकार अपनी पसंद के सेना के अधिकारियों की तलाश की अंधी दौड़ में लग जाती है तो उससे कौन सा नया संकट पैदा हो सकता है, इसका सही-सही अनुमान लगाना अभी कठिन है। हाल में सीबीआई के प्रमुख के पद पर गुजरात कैडर के उस आईपीएस अधिकारी की अस्थायी नियुक्ति की गई है जिसने मोदी सरकार के इशारे पर गुजरात में गोधरा कांड की पहली तफ्तीश की थी। इस प्रकार, जब सरकार का संचालन राजनीतिक विवेक और सूझबूझ के बजाय अज्ञान और तुगलकी सनक से किया जाने लगे तो उससे कई प्रकार की विकृतियों के पैदा होने की आशंका बनी रहती है।

“कहना न होगा, भारत-पाक सीमा पर बने हुए तनाव और कश्मीर की समस्या के प्रति मोदी सरकार के कोरा शौर्य-प्रदर्शन वाले इस रुख में ऐसे सभी खतरे निहित हैं।

“इस पूरे संदर्भ में हाल में पश्चिम बंगाल के 19 टोल नाकों पर अचानक हुई सेना की कार्रवाई और उससे उठा विवाद और भी ज्यादा तात्पर्यपूर्ण दिखाई देने लगता है। इस विषय पर संसद में बयान देते हुए सरकार की ओर से कहा गया कि यह सेना की एक सामान्य कार्रवाई है। भारत के और भी कई स्थानों पर यही व्यायाम किया गया है ताकि किसी भी ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ के वक्त सेना अपना काम कर सके। सरकार का यह बयान कितने खतरनाक संकेतों से भरा हुआ है, इसे कोई भी आसानी से समझ सकता है। राष्ट्रीय आपातकाल में सेना की भूमिका का क्या अर्थ है ? क्या यह प्रत्यक्ष तौर पर घरेलू प्रशासन में सेना की भूमिका को आमंत्रण देने की तरह नहीं है ? ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और नोटबंदी की तरह के मोदी जी के अब तक के सभी सनकी कदमों को देखते हुए, जिनके मूल में अपने अहम की तुष्टि ज्यादा दिखाई देती है, सेना की इस कार्रवाई में अगर कोई किसी प्रकार के नये आंतरिक आपातकाल के अशनि संकेत देखता है, तो इसे कोई अतिशयोक्ति नहीं कहा जा सकता है।

“कार्ल मार्क्स की प्रसिद्ध कृति ‘लुई बोनापार्त की अठारहवीं ब्रूमेर’ में एक जगह फौज के बार-बार इस्तेमाल किये जाने के बारे में वे लिखते हैं -‘‘ इस प्रकार फौजी बारिक और पड़ाव का दबाव फ्रांसीसी समाज के मस्तिष्क पर डालकर उसे ठंडा कर देना ; इस प्रकार तलवार और बंदूक को समय-समय पर न्यायाधीश और प्रशासक, अभिभावक और सेंसर बनने देना, उन्हें पुलिसमैन और रात के संतरी का काम देना; इस प्रकार फौजी मूंछ और फौजी वर्दी को समय-समय पर, ढिंढोरा पीट कर, समाज की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता एवं समाज का उपदेष्टा घोषित करना – यह सब करने के बाद क्या अंत में यह लाजिमी न था कि फौजी बारिक और पड़ाव, तलवार और बंदूक, मूंछ और वर्दी को एक दिन यह सूझ पैदा होती कि क्यों न अपने शासन को सर्वाच्च घोषित करके एक ही बार समाज का उद्धार कर दिया जाये तथा नागरिक समाज को अपना शासन आप करने की चिंता से सब दिनों के लिए मुक्त कर दिया जाये ?’’

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