nationalism

राष्ट्रवाद पर बात करने का ये माक़ूल वक़्त है। सरल शब्दों में राष्ट्रवाद एक ऐसी भक्ति है जिसमें वे (राष्ट्रवादी) अपने साझा इतिहास, पारंपरिक मूल्य, भाषा, जातियता और संस्कृति को पैमाना मानकर खुद को एक बताते हैं। इस परिभाषा से आप तय कर लीजिए कि आप इस पैमाने पर खरे उतर रहे हैं? अंग्रेजों के ख़िलाफ लड़ाई का साझा इतिहास अगर छोड़ दें, तो आप पूरी तरह से अलग हैं। हिंदी पट्टी को ही अगर देश समझ लिया है तो ‘डियर जिंदगी’ देखिए। राष्ट्रवाद-राष्ट्रवाद चिल्लाने से पहले हमें इसकी पूरी अवधारणा समझ लेनी चाहिए। राष्ट्रवाद की अवधारणा कभी भी पवित्र नहीं रही है। खासतौर से भारत में राष्ट्रवाद कोई तिरंगाई दर्शन नहीं है। अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में पनपा और इक्कसवीं सदी में जवान हुआ राष्ट्रवाद दरअसल एक संकुचित विचार का निर्वाह करता है। हिंदुत्व के विश्व वंधुत्व और वसुधैव कुटुम्बंकम, भगत सिंह के अंतरराष्ट्रीयतावाद, रवींद्रनाथ टैगोर के मानवतावाद, नेहरू के आधुनिकतावाद और अंबेडकर के समता और समानतावाद के सामने ट्रंप के राष्ट्रवाद को कोई कैसे सही ठहरा सकता है? चलिए, थोड़ा-सा राष्ट्रवाद के बारे में जान लेते हैं। 19वीं सदी में भूमंडलीकरण के साथ-साथ राष्ट्रवाद भी पनप रहा था। एक तरफ ‘पूरी दुनिया एक गांव है’ कि बात हो रही थी तो दूसरी तरफ ‘मेरा गांव सबसे बेहतर है’ का नारा बुलंद किया जा रहा था। इसी नारे की सवारी करते हुए इटली में मुसोलिनी तो जर्मनी में हिटलर शासन करने लगता है। पूरी दुनिया के महान चिंतको ने राष्ट्रवाद को खारिज़ कर दिया, और इसको कोई ख़ास तवज्ज़ो नहीं दी। स्तालिन ने थोड़ा बहुत काम राष्ट्रवाद पर किया। राष्ट्रवाद की अगर बात होती है, तो दो लोगों का नाम ख़ासतौर से सामने आता है। फ्रेंच लेखक और दार्शनिक अल्वेयर कामू और रवींद्रनाथ टैगोर। कामू ने कहा- ‘मैं राष्ट्रवादी नहीं हो सकता क्योंकि मुझे अपने देश से प्यार है।’ टैगोर ने कहा ‘मैं देश को बचाने के लिए तैयार हूं, लेकिन मैं किसकी पूजा करूंगा ये मेरा अधिकार है जो देश से भी कहीं ज्यादा है।’ रवींद्रनाथ टैगोर ने 1910 में लिखे अपने उपन्यास ‘गोरा’ में राष्ट्रवाद की कड़ी आलोचना की है। टैगोर को ख़ारिज़ कर ही रहे हैं, तो टैगोर के बारे में जान लीजिए- 1911 में टैगोर ने जन गण मन की रचना की थी। 1913 में टैगोर को नोबेल प्राइज़ मिला था। 1916 और 1917 में टैगोर जापान और अमेरिका में राष्ट्रवाद पर स्पीच दे रहे थे।

राष्ट्रवाद इतना ख़तरनाक क्यों है, इसे जानने के लिए आशुतोष तिवारी की ये पंक्तियां पढ़िए- “विविधताओं से भरे भारत के बाशिंदों के बीच एक ही समता है और वह है ‘उनका इतिहास’ | अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई ने एक सीमा के भीतर रहने वालों को भारतीय राष्ट्र के रूप में संगठित किया है | इस संघर्ष का एका ही भारतीय राष्ट्रवाद का आधार है और इसीलिए इससे पनपे मूल्य ही राष्ट्रवादी होने की जरुरी शर्तें होनी चाहिए | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का कीमती ऑउटकम् श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अम्बेडकर और नेहरू जैसे तमाम वैविध्य वैचारिक श्रोतों से मिलकर बनी संविधान सभा का बनाया हुआ भारतीय संविधान है जिसकी प्रस्तावना के मूल्य ही भारतीय राज्य में राष्ट्रवादी होने की पहली और आखिरी शर्त हैं। हम भारत के लोगों के बीच यदि कोई जना या जन समूह समानता , स्वतंत्रता और न्याय के विरुद्ध मानवीय गरिमा का हनन करता है तो वह 207 फ़ीट का झंडा उठाकर, गाल पर तिरंगा चिपकाकर या फिर सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान गाकर भी राष्ट्रवादी नही है।” आशुतोष ने ये लेख उस वक्त लिखा था, जब पटियाला हाउस कोर्ट में झंडा लेकर भारत माता की जय के नारे लगाते लोगों ने कोर्ट में घुसकर पत्रकारों को पीटा था। राष्ट्रवाद फांसीवाद नहीं है, लेकिन राष्ट्रवाद फासिस्ट बनने का पहला चरण जरूर है। सिनेमा हॉल में ‘बी.ए. पास’ मूवी देखने से पहले राष्ट्रगान बजाएंगे, कोई खड़ा नहीं होगा तो उसे डंडे से खड़ा किया जाएगा। कानून के डंडे से। ये जो राज्य का कानूनी डंडा है ना, ये बड़ा निर्दयी होता है।

पहले ये दूसरों पर पड़ता है तब आप चुप रहते हैं, धीरे-धीरे बैन और कानूनों की इतनी बड़ी श्रृंखला बन जाती है कि उसकी चपेट में आप भी आ जाते हैं, फिर यही डंडा आप पर चलता है। डंडा गोली का रूप भी ले लेता है, आप को भी मार सकता है। पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद उफान पर है। लिबरल खत्म हो रहे हैं, या फिर सिमट रहे हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में एडम स्मिथ ने अंतराष्ट्रीय गांव का सपना देखा था। अब हर देश में एक ‘ट्रंप’ बैठ गया है जो कहता है कि ‘उस देश के नागरिक हमारे देश से भाग जाएं।’ अब सवाल ये भी आता है कि 1947 की लड़ाई बिना राष्ट्रवाद की धारणा के कैसे लड़ी गई? जब 1947 की बात करते हैं, तो 1857 के आंदोलन की भी बात कर लेते हैं। यह दोनों लड़ाईयां अंग्रेजों को भगाने के लिए, शोषण के विरूध, आजादी के लिए लड़ी गईं, क्यूंकि सभी के ऊपर अंग्रेज ही राज कर रहे थे, तो सभी साथ लड़ रहे थे। राष्ट्रवाद के नाम पर कोई नहीं लड़ रहा था। काली टोपी लगाकर राष्ट्रवाद के नाम पर घुमने वाले सिर्फ चार लोग थे। राष्ट्रवाद और देशप्रेम में अंतर एक लाइन में समझ लीजिए- देशप्रेम अपने आप होता है, राष्ट्रवाद में जबर्दस्ती देश से प्रेम कराया जाता है। अगर प्रेम किया होगा, तो ‘जबर्दस्ती’ का अंजाम आप बखूबी जानते होंगे। अंत में वस इतना ही कि डेविस ने कहा था कि ‘राष्ट्रवाद एक हथोड़े की तरह है, जो निर्माण भी कर सकता है और विनाश भी।’ जब आप राजनीतिक पार्टियों के हाथ में हथोड़ा दे रहे हैं तो आप बेहतर जानते हैं कि वे निर्माण करेंगे या विनाश। फिलहाल तो दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियों के साथ बोलिए- भारत माता की जय—

‘कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं

गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।‘