hindustan-chorh-do
by — इस्मत चुगताई

नन्ही की नानी के माँ बाप का नाम तो अल्लाह जाने क्या था लोगो ने कभी उन्हें इस नाम से याद नहीं किया . जब छोटी थी और गलियों में नाक सड़सड़ाती फिरती थी तो बफातन की लोंड़िया के नाम से पुकारी गयी . फिर कुछ दिन बशीरे की बहु कहलाई फिर बिस्मिल्लाह की माँ के लकब से याद की जाने लगी और जब बिसिमिल्लाह जापे के अंदर ही नन्ही को छोड़ कर चल बसी तो वे नन्ही की नानी के नाम से आखिर दम तक पहचानी गयी . दुनिया का कोई ऐसा पेशा नहीं था जो नन्ही की नानी ने अख्तियार ना किया हो . कटोरा गिलास पकड़ने की उम्र से वे तेरे मेरे घर दो वक्त की रोटी और पुराने कपड़ो की एवज़ में धर ली गयी यह ऊपर का काम कितना नीचा होता हे यह कुछ खेलने कूदने की उम्र से काम पर जोत दिए जाने वाले ही जानते हे नन्हे मिया के आगे झुनझुना बजाने की अरुचिकर ड्यूटी से लेकर बड़े सरकार के सर की मालिश तक ऊपर के काम की सूची में आ जाते हे जिंदगी की भागदौड़ में कुछ भूनना झुलसना भी आ गया और जिंदगी के कुछ साल मामागिरी में बीत गए . मगर जब दाल में छिपकली बघार दी और रोटियों में मक्खियां परोसने लगी तो मजबूरन रिटायर होना पड़ा .इसके बाद तो नन्ही की नानी बस लगाई बुझाई करने और इधर की उधर पहुचाने के सिवा किसी काम की न रही . यह लगाई बुझाई का पेशा भी खासा लाभदायक होता हे मोहल्ले में खटपट चलती ही रहती हे . विरोधी केम्प में जाकर अगर होशियारी से मुखबरी की जाए तो खूब आवभगत होती हे लेकिन यह पेशा भी कितने दिन चलता नानी लुतरी कहलाने लगी और दाल गलती ना पाकर नानी ने आखिर और सबसे लाभदायक पेशा यानी सभ्य ढंग से भीख मांगनी शुरू कर दी —————————– —————————— — नानी अपने हाथ की सफाई के लिए सारे मोहल्ले में मशहूर थी . खाने पीने की चीज़ देखी और लुकमा मार गयी बच्चे के दूध की पतीली मुह में लगाई और दो घूंट गटक लिए शक्कर की फंकी मार ली ————————सब जानते थे पर किसी को मुह खोलने की हिम्मत नहीं थी .क्योकि नानी के बूढ़े हाथो में बिजली की सी तेजी थी और बिना चबाय निगल जाने में वे कोई ऐब नहीं समझती थी . दूसरा जरा से संदेह पर ही वे शोर मचने पर तुल जाती थी और इतनी कसमे खाती थी अब कौन उनसे ——- अपनी कब्र में कीड़े पड़वाए

लुतरी चोर और चकमाबाज़ होने के आलावा नानी परले दर्जे की झठी भी थी . सबसे बड़ा झूठ तो उनका वह बुर्क़ा था जो हरदम उनपर सवार रहता था कभी इस बुर्के में नक्काब भी था पर ज्यो ज्यो मोहल्ले के बूढ़े चल बसे या नीम अंधे हो गए तो नानी ने नक्काब को खैरबाद कह दिया मगर कंगूरेदार फैशनेबल टोपी उनकी खोपड़ी पर चिपकी रहती आगे चाहे महीन कुर्ते के नीचे बनियान ना हो पर पीछे बुरका बादशाहो के झोल की तरह लहराता रहे और यह बुरका सिर्फ सत्तर ढापने के लिए ही नहीं था बल्कि दुनिया का हर सम्भव और असम्भव काम भी इसी से लिया जाता था , ओढने बिछाने और गुड़ी मुढ़ी करके तकिया बनने के आलावा जब कभी खेर से नहाती तो इसे तौलिये के तौर पर इस्तेमाल करती थी ——— और जब मोहल्ले के कुत्ते दांत निकोसे तो उनसे बचाव के लिए अछि खासी ढाल कुत्ता पिंडली पर लपक और नानी के बुर्के का घेरा उसके मुह पर फुंकारा . नानी को बुर्क़ा बहुत प्यारा था . फुरसत में बैठ कर उसके बुढ़ापे पर विसुरा करती जहा कोई चन्दी क़तर मिली सावधानी से पैबंद पर चिपका लिया . वे उस दिन के ख्याल से ही कांप उठती जिस दिन ये बुरका भी चल बसेगा आठ गज़ लट्ठा कफ़न को जुड़ जावे यही बहुत जानो . नानी का कोई स्थायी हेडक्वार्टर नहीं सिपाही जैसी जिंदगी हे . आज उसके दालान में तो कल उसकी सहनची में . जहां जगह मिली पड़ाव डाल लिया , जब धतकार पड़ी कूच करके आगे चल पड़ी आधा बुरका ओढा आधा बिछाया लंबी तान ली .

मगर बुर्के से भी ज़्यादा वे जिसकी चिंता में घुली रहती थी वह थी उनकी इकलौती नवासी नन्ही . कुड़क मुर्गी की तरह नानी पर फैलाये उसे पोर तले दबे रहती थी . क्या मजाल जो नज़र से ओझल हो जाए . मगर जब हाथ पैर ने जवाब दे दिया और मौहल्ले वाले चौकन्ने हो गए . उनकी जूतियो की घिस घिस सुनकर ही चाक चौबंद होकर मोर्चो पर डट जाते . नानी के इशारे से मांगे को अनसुना कर जाते तो नानी को इसके सिवा कोई चारा न रहा की नन्ही को पुश्तेनी पेशे यानी ऊपर के काम पर लगा दे . बड़े सोच विचार के बाद उसे—— महीने पर छोड़ ही दिया गया पर वह हर दम साये की तरह लगी रहती नन्ही नज़र से ओझल हुई और वह बिलबिलाई . पर नसीब का लिखा कही बूढ़े हाथो से मिटता हे दोपहर का वक्त था डिप्टाइन अपने भाई के घर गयी हुई थी नानी मुंडेर पर जामुन की छांव में झपकी ले रही थी ——- सरकार आराम फरमा रहे थे नन्ही पंखे की डोरी हाथ थामे ऊंघ रही थी , पंख रुक गया और सरकार की नींद टूट गयी शैतान जाग उठा और नन्ही की किस्मत सो गयी . कहते हे की बुढ़ापे के आसेब से बचने के लिए तरह तरह की दवाओ और शक्तिवर्धक तेलो के साथ साथ हाकिम वैध चूज़ों की यखनी भी तजवीज करते हे नन्ही भी चूज़ा ही तो थी !

मगर जब नन्ही की नानी की आँख खुली तो नन्ही गायब . मोहल्ला छान मारा मगर कोई सुराग ना मिला , मगर रात को जब नानी थकी मांदी कोठरी को लौटी तो कोने में दीवार से टिकी हुई नन्ही जख्मी चिड़िया की तरह अपनी फीकी फीकी आँखों से घूर रही थी नानी की घिग्गी बन्द गयी और अपनी कमजोरी छिपाने के लिए वे उसे गालियाँ देने लगी यहाँ आकर मरी हे ढूंढते ढूंढते पिंडलियाँ सूज गयी ठहर तो जा ,के सरकार से कैसे चार चोट की मार लगवाती हु . मगर नन्ही की चोट ज़्यादा देर तक छुप न सकी . नानी सर पर हाथ मार मार कर चिंघाडने लगी पड़ोसन ने सूना तो सर पिट कर रह गयी . अगर साहबज़ादे की डगमगाहट होती तो डांट डपट हो जाती पर डिप्टी साहब मोहल्ले के मुखिया …तीन नवासों के नाना , पंजावक्ति नमाज़ी . अभी पिछले दिनों ही मस्ज़िद में चिट्ठाइयां और लोटे रखवाये मुह से फूटने वाली बात नहीं . लोगो की दयादृष्टि की आदी नानी ने आंसू पीकर नन्ही की कमर सेंकी ,आटे गुड़ का हलवा खिलाया और अपनी जान को सब्र करके बैठ रही . . दो चार दिन लोट पीट कर नन्ही उठ खड़ी हुई और चन्द दिनों में वह सब कुछ भूल गयी . मगर मोहल्ले की शरीफज़ादिया न भूली नन्ही को बुलाती ” ले यह चुडिया पहन लीजो नानी को क्या खबर होगी ” बीवियां बेक़रार होकर फुसलाती . क्या हुआ कैसे हुआ का विवरण पूछा जाता . नन्ही कच्ची कच्ची मासूम तफसीले देती बीवियां नाक पर दुपट्टा रख कर खिल खिलाती . नन्ही भूल गयी मगर कुदरत न भूल सकी . कच्ची कली वक्त से पहले तोड़ कर खिलाने से पंखुड़िया झाड़ जाती हे . ठूंठ रह जाता हे . नन्ही के चेहरे से भी जाने कितनी मासूम पंखुड़िया झड गयी चहरे पर फटकार और रोडापन . नन्ही बच्चे से लड़की नहीं बल्कि छलांग मारकर एक औरत बन गयी . वह वक्त के अभ्यस्त हाथो की संवारी भरपूर औरत नहीं बल्कि टेढ़े मेढ़ी सूरत जिस पर किसी देव ने दोगज लंबा पाँव रख दिया हो . ठिगनी मोटी कचौड़ी जैसे कच्ची मिटटी का खिलौना कुम्हार के पाँव तले दब गया हो मैली साफी से कोई नाक पूछे चाहे कूल्हे कौन पूछता हे . राह चलते उसकी चुटकियां भरते , मिठाई के दोने पकड़ाते . नन्ही की आँखों में शैतान थिरक उठता मगर अब नानी बजाए उसे हलवे मांडे ठुसाने के उसका धोबी घाट करती मगर मैली साफी की धूल भी ना झड़ती जानवर रबड़ के गेंद टप्पा कह्या और उछल गयी . चन्द सालो में ही नन्ही की चौमुखी से पूरा मोहल्ला काँप उठा . सूना की डिप्टी साहब और साहबजादे में कुछ ठन गयी . फिर सूना की मुल्ला जी को रजवा कहर ने मारते मारते छोड़ा . फिर सूना सिद्दीक पहलवान का भांजा स्थाई हो गया . आये दिन नन्ही की नाक कटते कटते बचती और गलियो में लट्ठ पोंगा होता —————————— —————————— ——————- जिस दिन नन्ही भागी उस दिन नानी के फरिश्तो को भी संदेह न हुआ . दो तीन दिन से निगोड़ी चुप चुप सी थी नानी से बदजबानी न की चुपचाप आप ही आप बैठी हवा में घूरा करती —————————— —————————— ——— कोई कभी दूर से आता हे तो खबर आ जाती हे कोई कहता हे की नन्ही को एक बड़े नवाब साहब ने डाल लिया हे मनो सोना हे बेगम की तरह रहती हे कोई कहता हे की हीरामंडी में देखा था कोई कहता हे की फारस रोड पर और किसी ने सोना गाछी में देखा था मगर नानी कहती हे की नन्ही को हैजा हुआ था चार घडी लोटपोट कर मर गयी नन्ही का सोग मानाने के बाद नानी कुछ खब्ती भी हो गई लोग राह चलते चलते छेड़खानी करते ” ए नानी निकाह कर लो ” भाभी जान छेड़ती , ” किस्से कर लू अपने खसम से करा दे नानी बिगड़ती ” ए नानी मुल्ला जी से कर लो अल्लाह कसम तुम पर जान देते हे और नानी की गालिया शुरू हो जाती मिल तो जाए ———दाढ़ी ना उखेड़ लू तो कहना मगर जब मुल्ला जी कभी गली के नुक्कड़ पर मिल जाते तो नानी सचमुच शर्मा सी जाती !

मोहल्ले के लड़को के आलावा नानी के जन्म जन्मांतर के दुश्मन तो मुए निगोड़े बंदर थे जो पीढियो से इसी मोहल्ले में पलते बढ़ते ए थे —————- और बंदरो से आये दिन उनकी बासी टुकड़ो पर चख चख चलती रहती थी मोहल्ले में जहां कही शादीब्याह चालीसवाँ होता , नानी झूठे टुकड़ो का ठेका ले लेती .लंगर खेरात बटता तो भी चार बार चकमा देकर हिसा लेती , मनो कहना बटोर लेने के बाद वो हसरत से तकती . काश अल्लाह पाक ने उनके पेट में भी कुछ ऊंट जैसा इंतज़ाम किया होता तो कितने मज़े रहते . मज़े से चार दिन की खुराक पेट में भर लेती छुट्टी होती . अल्लाह ने अन्न का इतना ऊट पटांग इंतज़ाम करने के बाद पेट की मशीन को इस कदर अपूर्ण बना डाली की एक दो वक्त के खाने से ज़्यादा का भंडार जमा करने का ठौर ठिकाना नहीं . इसलिए नानी झूठे टुकड़े फैलाकर सूखा लेती फिर उन्हें मटकियों में भर देती जब भूख लगी जरा से सूखे टुकड़े चूर मुर किये पानी का छींटा दिया चुटकी भर लूँ मिर्च बुर्का और स्वादिष्ट भोजन तैयार . लेकिन गर्मियों और बरसात के दिनों में बहुत बार यह नुस्खा उन्हें हैजा का शिकार बना चुका था अतः वे मजबूरन इन टुकड़ो को आने पोन दामो में बेच डालती ताकि लोग अपने कुत्तो और बकरियो को खिला दे मगर आम तौर पर कुत्तो और बकरियो के पेट नानी के ढीठ पेट का मुकाबला ना कर पाते और मूल्य तो क्या भट के तौर पर भी लोग इन टुकड़ो को स्वीकार करने को तैयार ना होते .वही जान से प्यारे झूठे टुकड़े जिन्हें बटोरने के लिए नानी को हज़ारो गालिया और ठोकर साहनी पड़ती और जिन्हें धुप में सुखाने के लिए उन्हें पूरी बन्दर जाती से लड़ाई मोल लेनी पड़ती थी ————————- सारा दिन लगे लगे करके शाम को बचा खुचा कूड़ा बटोर बंदरो की जान को कोसती नानी थक कर अपनी कोठरी में सो रहती .—————– ( इसके बाद कहानी में एक दिन बन्दर नानी का तकिया बिस्तर ले भागते हे और उन्हें चिन्दी चिन्दी कर देते हे जिसमे से सारे मोहल्ले से चोरी किया हुआ सामान मिलता हे कुछ सामान नानी का भी होता हे ) —————————— बिस्मिल्लाह का सूखा हुआ माल और कलावा म बन्धुए हुई नन्ही की पहली सालगिरह की हल्दी की गाँठ , दुब और चांदी का छल्ला और बशीर खान का गिलट का तमगा जो उसे जंग से ज़िंदा लौटकर आने पर सरकार से मिला था . मगर किसी ने इन चीज़ों को ना देखा , बस देखा तो उस चोरी के माल को जिसे वर्षो की छापामारी के बाद नानी ने लखलूट जोड़ा था !

” चोर बईमान कमीनी ” निकालो बुढ़िया को इस मोहल्ले से पुलिस में दे दो ————— गरज जो जिसके मुह में आया कह गया . नानी की चीख एकदम रुक गयी आंसू खुश्क , सर नीचा और जुबान बंद . काटो तो खून नहीं . रातभर ज्यो की त्यों पड़ी रही . दोनों घुटने मुठियो में दबे हिल हिल कर सूखा सुखी हिचकिया लेती रही . कभी अपने माँ बाप का नाम लेकर , कभी मियाँ को याद करके कभी बिस्मिल्लाह कभी नन्ही को पुकारकर बैन करती ……. दम भर को ऊंघ जाती . फिर जैसे पुराने नासूरों से बिलबिलाकर चोंक उठती . कभी चहकी पनकी रोती खुद से बाते करने लगती , फिर आप ही आप मुस्कुरा उठती और अँधेरे में पुरानी याद का भाला खेंच मारताऔर वे बीमार कुत्ते की तरह नीम इंसानी आवाज़ से सारे मोहल्ले को चोंका देती . दो दिन इसी हालात में बीत गए मोहल्ले वालो को आहिस्ता आहिस्ता शर्म का अहसास होना शुरू हुआ . किसी को भी तो इन चीज़ों की अधिक जरुरत न थी वर्षो की खोई चीज़ों को वे कभी के रो पाट कर भूल चुके थे वे बेचारे कौन से लखपति थी थे तिनके का बोझ भी ऐसे मोके पर लोगो को शहतीर लगता हे लोग इन चीज़ों के बगेर ज़िंदा थे ——- ———————–मुन्नी का गरारा किस काम का वह तो कभी की गुड़ियों की उम्र से गुजर कर जवानी की उम्र को पहुच चुकी थी मोहल्ले वालो को नानी की जान लेना थोड़ी ही मंजूर था पुराने ज़माने में एक देव था , उस देव की जान थी एक भवरे में ————————-नानी की जान भी तकिये में थी और बन्दर ने वह जादू का तकिया दांतो से चिर डाला और नानी के कलेजे में गर्म सलाख उतर गयी

दुनिया का कोई दुःख जिल्लत कोई बदनामी ऐसी न थी जो नसीब ने नानी को न बख्शी हो . जब सुहाग की चूड़ियों पर पत्थर गिरा था तो समझी थी अब कोई दिन की मेहमान हे . पर जब बिस्मिल्लाह को कफ़न पहनाने लगी तो यकीं हो गया की ऊंट की पीठ पर यह आखिरी तिनका हे और जब नन्ही के मुह पर कालिख लग गयी तो नानी समझी बस आखिरी घाव हे ज़माने भर की बीमारियाँ जन्म के वक्त से ही झेली सात बार तो चेचक ने उनकी सूरत पर झाडू फेरी हर साल तीज त्यौहार के अवसर पर हैजे का हमला होता था तेरा मेरा गो मूत धोते धोते उंगुलियो के पोते सड़ गए , बर्तन मांझते मांझते छलनी हो गयी . हर साल अँधेरे उजाले में ऊँची नीची सीढियो से लुढक पड़ती . दो चार दिन लोट पोटे होकर फिर घिसटने लगती . पिछले जन्म में नानी जरूर कुत्ते की कल्ली रही होगी तभी तो इतनी सख्त जान थी की मौत का क्या वास्ता जो उनके करीब फाटक जाए . चीथड़े लगे फिरेगी मगर मुर्दे का कपडा तन से छू न जाए . कही मारने वाला सिलवटो में मौत ना छुपा गया हो जो नाज़ो की पली नानी को आन दबोचे . मगर अंत यु बंदरो के हाथ होगा इसकी किसे खबर थी ——– ? सुबह सवेरे भिश्ती मशक डालने गया तो देखा की नानी खपरेल की सीढ़ियों पर अकड़ू बैठी हे मुह खुला हुआ हे यु नानी को सोता देख कर लोग उन्हें मुर्दा समझ कर डर जाया करते थे मगर नानी हमेशा हड़बड़ाकर बलगम थूकती जाग पड़ती थी और हँसने वाले को हज़ार गालिया दे डालती थी . मगर उस दिन सीढ़ियों पर अकड़ू बैठी हुई नानी दुनिया को एक स्थाई गाली देकर चल बसी . जिंदगी में कोई कल सीधी नहीं थी , करवट करवट कांटे थे , मारने के बाद कफ़न में भी नानी अकड़ू लिटाई गयी हज़ारो खेंच तान के पर भी अकड़ा हुआ जिस्म सीधा ना हुकयामत के दिन बिगुल फूंका गया – नानी हड़बड़ाती खँखारती हुई उठी जैसे लंगर की भनक कानो में पहुच गयी…. फरिश्तों को गालिया देती हुई उलटी सीधी पुल सरात पर से अकड़ू घिसटती , खुदा के हुज़ूर में लपकी . इंसानियत का इतना बड़ा तिरस्कार देखकर खुदा का सिर शर्म से झुक गया और वह खून के आंसू रोने लगा —-.
( प्रस्तुति सिकंदर हयात )