quran-and-music कुछ साल पहले पाकिस्तान में एक फिल्म आई थी ‘खुदा के लिये’. फिल्म में नसीरुद्दीन शाह एक ऐसे प्रगतिशील मौलवी के किरदार में थे जिन्होंने इस्लाम के एक बिलकुल अलग चेहरे को पेश किया था जो कट्टरपंथ और जड़वाद से आजाद था। उन्होंने उन सब बातों को इस्लाम से साबित किया था जिसकी मनमानी व्याख्या लगातार मुल्ला-मौलवियों द्वारा की जाती रही है. आज इस्लाम के कट्टरपंथी संस्करणों के अंदर गीत-संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला आदि को लेकर बड़ा कट्टर नजरिया है कि ये गैर-इस्लामिक और हराम है। अफ़सोस की बात ये है कि मुस्लिम उम्मा कभी इस बात की तहकीक करने नहीं जाती कि गीत-संगीत, चित्रकला को लेकर क्या इस्लाम और उसके पैगंबर का नजरिया भी वही है जो इन कट्टरपंथी संस्करणों के मौलानाओं का है ? अगर वो अपने मजहबी किताबों का और अपने नबी की सीरत का ठीक से मुतायला करते तो उन्हें कट्टरपंथी संस्करणों के जाहिलाना फतवों से लड़ने का हौसला मिलता। मगर उन्होंने ये किया नहीं इसलिये इन जाहिलाना सोचों का खामियाजा भी उन्हें ही भुगतना पड़ रहा है। कहतें हैं कि इस्लाम के शुरूआती दौर में जिन लोगों ने इस्लाम कबूल किया था वो एक शेर कहा करते थे जिसका भावार्थ था कि ये तो नई जिंदगी की रोशन सुबह है पर इस रोशन सुबह पर कट्टरपंथ का ऐसा ग्रहण लगा कि आज कमोबेश पूरी मुस्लिम उम्मा कला, संगीत और काव्य को लेकर अंधेर में है। पैगंबरे-इस्लाम की सीरत में दसियों ऐसे प्रमाण मौजूद हैं जो साबित करतें हैं कि उन्हें न तो गीत-संगीत, काव्य और शेरो-शायरी से तकलीफ थी और न ही उनको खुशी मनाने के लिये इन तरीकों को चुनने पर ऐतराज़ था। रसूल जब मक्का से हिजरत कर मदीना पहुंचे तो मदीना की औरतें अपने-अपने मकानों की छतों पर चढ़ गई और आने की खुशी में झूम-झूम कर अश्आर पढ़ने लगी, छोटी बच्चियाँ दफ बजा-बजा कर गीत गाने लगीं। मज़े की बात है कि झूम रहीं और जश्न मना रही लड़कियों को नबी ने मना नहीं किया ये तुम लोग क्या जाहिलाना काम कर रही हो बल्कि खुश होकर उनसे पूछा कि ऐ बच्चियों, क्या तुम मुझसे मुहब्बत करती हो? लड़कियों ने हाँ में जबाब दिया तो खुश होकर नबी ने उनसे फरमाया, मैं भी तुम सबसे बेइंतेहा मुहब्बत करता हूँ। इसी तरह एक हदीस हजरत अम्र-बिन-शरीद अपने वालिद से रिवायत करते हुए कहतें हैं कि एक दिन मैं अल्लाह के रसूल के पीछे सवारी पर बैठा हुआ था कि आप (सल्ल०) ने मुझसे कहा, क्या तुम्हें उमैय्या बिन अबिस्सल्त के कुछ अशआर याद हैं? मैंने कहा, हां। आपने फरमाया, अच्छा सुनाओ। मैंने आपको उसका एक पद सुनाया। आपने कहा, और सुनाओ। मैंने फिर एक पद सुनाया। आपने फिर कहा, एक और सुनाओ, मैंने फिर सुनाया। इस तरह आप सुनाने की इच्छा व्यक्त करते रहे और मैं सुनाता रहा और आखिर में मैंने उन्हें एक सौ अशआर सुना दिया। यहाँ रोचक बात ये है कि शायर उमैय्या बिन अबिस्सल्त मुसलमान तो नहीं ही थे नबी के सख्त मुखालिफ भी थे पर उसके मुतल्लिक नबी ने फरमाया, उसका दिल भले काफिर हो पर उसके शेर मोमिन हैं। बुखारी और मुस्लिम शरीफ में अबू हुरैरा से रिवायत एक हदीस के अनुसार नबी का कथन था कि पीप (मवाद) से किसी व्यक्ति के पेट का भरना जो उसके पेट को खराब कर दे से ज्यादा अच्छा है कि वह अपना पेट काव्य से भरे। काव्य और शेरो-शायरी को नबी-करीम कितना अज़ीम मानते थे इसका पता हजरत बरा से रिवायत एक हदीस से चलता है जिसमें नबी ने एक शायर हस्सान-बिन-साबित से फरमाया था कि अपने शेर में मुशरिकों पर व्यंग्य करो तुम्हारे साथ जिब्रील हैं। नबी के कहने का मतलब ये था कि काव्य अच्छी हो तो ईश्वर अपने फरिश्तों के जरिये प्रेरणा देता है। जिन लोगों ने भी अरबी में कुरान पढ़ा है उन्हें मालूम है कि कुरान शरीफ के किसी सूरह की आयतें परस्पर लयबद्ध होती हैं, बेहतर कीरत (काव्यात्मक पाठ) उन्हें और खूबसूरत बना देता है, इसलिये नबी के जमाने में अबू मूसा अश्अरी की कीरत से खुश होकर नबी ने उनसे कहा था कि लगता है अल्लाह ने तुम्हारे गले में हजरत दाऊद का साज़ रख दिया है। हजरत दाऊद भी एक पैगंबर थे जिन्हें मोज़िज़े में अल्लाह ने बेहद सुरीली आवाज़ दी थी। पूरा जबूर हजरत दाऊद के संगीत के इल्म का जिंदा मोजिज़ा है। हजरत दाऊद की सुरीली आवाज़ के बारे में तो कुरान कहता है कि वो जब राग उठाते थे तो मदहोश होकर उनकी आवाज़ के साथ पहाड़ भी गाने लगते थे और परिंदे मदहोश होकर उनकी आवाज़ की ओर खींचे चले आते थे। खुद अपने वक़्त में जब नबी किसी अंसार के यहाँ शादी में गये तो बीबी आयशा से उन्होंने पहला सवाल यही पूछा था कि अंसार गीत-संगीत के बड़े प्रेमी होतें हैं तो क्या तुमने कुछ गाने वालियों को भी बुलाया है कि नहीं ? जहाँ तक चित्रकला का ताअल्लुक है तो मैंने तो कुरान की एक भी ऐसी आयत नहीं देखी जो इसकी मनाही करती हो इसके बरक्स सूरह सबा की 13 वीं आयत से पता चलता है कि एक पैगंबर हजरत सुलेमान तो बाकायदा जिन्नातों से तस्वीरें बनवाया करते थे। मतलब बड़ा साफ़ है कि गीत-संगीत, चित्रकला को गैर-इस्लामिक और हराम मानना मूल और हकीकी इस्लाम में कहीं भी नहीं दिखता अलबत्ता इसके कट्टरपंथी संस्करणों में यह जरूर हराम है। प्रश्न मुस्लिम उम्मा के सामने है कि इंसानी रूह को सुकून पहुंचाने वाले इन अज़ीम नेअमतों को वो स्वीकार करतें हैं या फिर जड़वादियों की व्याख्याओं में फंस कर इन खुदाई नेअमतों का इंकार कर देतें हैं। – See more at: http://www.newageislam.com/hindi