heera-moti

सैयद एस.तौहीद

आजादी बाद देश के समक्ष नवनिर्माण का बडा लक्ष्य था। सभी क्षेत्रों की सहभागिता जरूरी थी । सिनेमा भी इस दिशा में काम कर रहा था। साहित्य में उपलब्ध कहानियों को अधिक लोगों तक पहुंचाने की प्रक्रिया में फ़िल्मों का निर्माण हुआ । हिन्दी व अन्य भाषाओं की महत्त्वपूर्ण कृतियों पर फिल्मों का निर्माण इसी का उदाहरण है । बांग्ला कथाकार शरतचंद्र ,विभूतिभूषण बंधोपाध्याय,रवीन्द्रनाथ टेगोर से लेकर हिन्दी के मुंशी प्रेमचंद,फणीश्वर नाथ रेणु,निर्मल वर्मा,मोहन राकेश,राजेन्द्र यादव की रचनाओं पर फ़िल्में बनी । साहित्य का फिल्म की दुनिया से रिश्ता स्वतंत्र व्याख्या का विषय है । बहरहाल कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद की बात करें तो ‘मजदूर’ से शुरू हुआ सफर कृशन चोपडा की ‘हीरा-मोती’ से होकर ‘गोदान’ ‘ग़बन’ फिर ‘शतरंज के खिलाडी’ एवं ‘सदगति’ तक पहुंचा। उनकी ग्रामीण परिवेश की रचनाओं पर बनी फ़िल्में सबसे अलग हैं। कथाकार के स्मरण में गुलजार साहेब ने टेलीविजन पर ‘तहरीर’ चलाई। प्रेमचंद की कहानियों को घर-घर लाने में सफलता मिली। हीरा-मोती इस सफर में एक महत्त्वपूर्ण अध्याय मानी जा सकती है । क्योंकि इसके बाद कथाकार की रचनाओं पर व्यापक रचनात्मक अभियान आरंभ हुआ । कह सकते हैं कि फ़िल्म प्रस्थान बिंदु थी। साहित्य में दर्ज किसान की बात को अन्य माध्यमों के साथ बताने की पहल हुई। सबसे पहले बाबूराव पेंटर ने ‘साहूकारी पाश’ के माध्यम से गांव-समाज की व्यथा को रखा। फिर सत्यजित राय ने ‘पाथेर पांचली’ बनाकर गांव-किसान की समस्या पर विश्व स्तर का विमर्श जागृत किया। रितविक घटक की फिल्मों ने भी हाशिए के हित कुछ ऐसा ही किया। इसी क्रम में बिमल राय की ओर से ‘दो बीघा जमीन’ का निर्माण हुआ। महबूब खान से लेकर दिलीप कुमार फिर नरगिस राजकपूर और सुनील दत्त तथा मनोज कुमार एवं अमिताभ बच्चन ने भी गांव-किसान को महत्त्व दिया। सुधेंदु राय की ‘सौदागर’ अमिताभ को एक अलग लीग में स्थापित करती है। कृशन चोपडा का संकल्प भी सराहनीय था। भारत को ‘गांवों का देश’ मानने संदर्भ में हीरा मोती का योगदान महत्त्व रखता है।

झूरी (बलराज साहनी) और रजिया(निरूपा राय) का मेहनतकश परिवार खेती-किसानी पर गुजर बसर करता है। झूरी एक स्वालंबी किसान है, मेहनत मजदूरी की कमाई को बहुत महत्त्व देता है । उसमें एक समर्पित किसान की बहुत सी विशेषताएं हैं । उसका निश्छल स्वभाव मुसीबत का एक बडी वजह हो जाती है । झूरी के परिवार में रजिया की छोटी ननद ‘चंपा’(शोभा खोटे) और बैलों की एक सुंदर जोडी भी है । मालिक के साथ मुस्तैदी से खेतों में डटे रहते हैं। झूरी और समूचा गांव इन्हें स्नेह से ‘हीरा-मोती’ संबोधित करता है । झूरी के परिवार को जोडी से बहुत लगाव है। पशुओं के प्रति झूरी का निश्छल प्रेम इन पंक्तियों में समझा जा सकता है ‘हीरा मोती के ऊपर तो खलिहान वार दूं’ दो पसेरी अनाज के बदले उनके लिए घुंघरू के मनभावन पटटे लाकर देता है । अनाज से साहूकार का कर्जा चुकाया जा सकता था । कर्ज बकाया रहते ‘प्यार का कर्ज’ पूरा करता है। खुशियों के पल गंगा-जमुनी भाव से सजे गीत ‘कउन रंग मूंगवा,कउन रंग मोतिया’ में महसूस किए जा सकते हैं ।

इधर जमींदार(कैलाश) पशुपति(असीम कुमार) को पुरखों की अच्छी सेवा का हवाला देते हुए, अपने बैलों की देखरेख का जिम्मा उसे देता है । अबकी बार मेले में जोडी की जीत पर लगान माफ हो जाने के वायदे के साथ उसे यह काम सौंपा गया । कुछ दिनों के बाद बैलों की एक दौड आयोजित हुई । जमींदार के सेवक पशुपति की जोडी के मुकाबले हीरा-मोती की जोडी दौड में विजयी हुई । पराजय से विचलित होकर वह पर पशुपति से झूरी को हीरा-मोती के साथ हवेली में हाजरी का संदेश देता है । जमींदार के कोप से बचने के लिए झूरी ने हीरा-मोती को अपने संबंधी गया के साथ रवाना कर दिया । मालिक द्वारा झूरी के बैलों का हाल पूछने पर पशुपति सूझ-बूझ से स्वयं एवं झूरी को जमींदार से बचा लेता है।

उधर गया हीरा-मोती को लेकर अपने गांव की ओर निकला है, बैलों की जोडी बडी मुश्किल से नए घर आई,घर तक लाने में गया के पसीने छूट गए । पशु में अपने असल मालिक की बडी परख होती है, नए हांथ में सौंपे जाने बाद असहज दिखाई देते हैं । नए घर में हीरा-मोती के साथ झूरी जैसा अपनत्व नहीं होता । हां, गया काका की असहाय लडकी(बेबी नाज़) में उन्हें अपनी सुध लेने वाला कोई जरूर मिला। पशु को स्नेह की बडी पहचान होती है, झिडक व मार के बीच में थोडे से अपनत्व की वजह से कुछ दिन वहां टिक सके । इस दरम्यान गांव में हाट-मेले का वक्त आया । खूब उमंग,उत्साह,उत्सव से मेला आयोजित होता है, बैलगाडियों की दौड में जमींदार की जोडी के साथ दूसरे प्रतिभागी भी आए। हीरा-मोती को लेकर गया भी यहां आया । दौडने की बात तो छोडें, पहले पहल लाख कोशिश बाद भी हीरा-मोती डोले तक नहीं । लेकिन झूरी की आवाज पर भागना शूरू किया तो फिर जीतने बाद ही ठहरे । पशुपति की जोडी को हराकर पहला ईनाम मिला,लेकिन सिक्के की दूसरी ओर जमींदार साहेब के सम्मान व रसूख को खुली चुनौती देने का दुस्साहस घटित हो गया । जमींदार ने बैलों की हार को रसूख के विरूध माना । मामले की गंभीरता को भांपते हुए झूरी जमींदार के द्वार पर आकर माफी तलब करता है । गरीब किसान को उसके दुस्साहस का एहसास कराते हुए जमींदार कहता है ‘ जो हांथ खिलाफ उठेगा वह तोड दिया जाएगा,जो हमारी बराबरी करेगा वह मसल दिया जाएगा’। एक बार फिर से झूरी पर जमींदार के रसूख को चुनौती देने का गंभीर इल्जाम है । झूरी को माफी तो जरूर मिली,लेकिन यूं ही जा ना सका। कृपा के एवज़ में हीरा-मोती की जोडी को हवेली की ड्योढी पर बांध जाने का हुक्म मिला । बैलों को लाने के लिए साहूकार बंसी(रशीद खान) झूरी के घर आया । किन्तु हुक्म के विरूध जाकर रजिया साहूकार को हीरा-मोती नहीं सौंपती है ।

जमींदार इस दुस्साहस को चुनौती स्वरूप लेता है। पिछली बार तो झूरी किसी तरह जमींदार के कोपभाजन से निकल आया,लेकिन अबकी बार मामला बहुत गंभीर है । अपमान का जवाब देने के लिए अपने सेवक पशुपति को मोहरा बनाता है । पशुपति के नाम से झूरी पर झूठे कर्ज का मामला थोप दिया गया, समय व परिस्थितियां झूरी के विरूध हैं । जमींदार के भयवश पंच का कोई भी सदस्य झूरी के पक्ष में गवाही देने को राजी नहीं हुआ। पंचायत तो झूरी के हक़ में सुनवाई के लिए बुलाई गई, लेकिन फैसला रसूख का हुआ । विपदा की इस घडी में झूरी स्वयं को निस्साहय पाता है, अब हीरा-मोती को जमींदार के सुपूर्द करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं । बैलों को उस ड्योढी को सौंप कर झूरी मुक्त हुआ। लेकिन हवेली की रस्सी तोडकर वे जल्द ही वापस मालिक पास लौट आएं। हीरा-मोती को देखकर झूरी के परिवार को हर्ष हुआ,लेकिन उन्हें उसी समय वहां से हटा देने का कठोर निर्णय लिया गया । कचहरी का फैसला होने तक झूरी उन्हें फिर से गया के पास छोड आता है । इसी बीच साहूकार बंसी बैलों को ढूंढते हुए झूरी के घर की ओर आया,लेकिन जोडी को वहां भी न पाकर चला गया।

जाहिर है कि पराए घर में मालिक जैसा अच्छा व्यवहार संभव नहीं, गया हीरा-मोती से चाबुक के जोर पर काम ले रहा है । अडियल रवैये की वजह से अच्छा चारा भी नहीं दिया जाता। एक रात गया की लडकी उन्हें इस कष्ट से रिहा कर देती है । उधर न्याय की आस में बैठे झूरी के साथ कचहरी भी इंसाफ न कर सकी । वहां बंसी कर्ज अदाएगी का गवाह है, जोकि शासन तंत्र का अत्याचारी तत्व है । जाहिर है सुनवाई झूरी के पक्ष में संभव नहीं । न्यायालय झूरी को बकाया कर्ज अदा करने का फैसला देती है । जिसके समय पर न चुकाए जाने की सूरत में झूरी की संपत्ति नीलाम हुई ।

उधर गया के घर से छूटी बैलों की जोडी आजाद होकर वापस झूरी के गांव की ओर आती है । हीरा-मोती को सही-सलामत देखकर झूरी के मुख से ‘कहां बनवास ले लिया था तुमने हीरा मोती’ स्नेह में फूट पडा । बैलों के पीछे- पीछे उन पर दावा करने वाले खरीददार भी चले आए । जोर जबरदस्ती के दम पर उन्हें साथ ले जाना चाहते हैं, लेकिन असहमति में हीरा-मोती ने दावेदारों को गांव के बाहर खदेड दिया । इस तरह ‘प्रतिकार’ के दम पर जुल्म की खिलाफ अपनी रक्षा की । हीरा-मोती का साहस व जज्बा देखकर गांव वालों में अपनी सीमाओं/मजबूरियों के विरूध उठ खडा होने की हिम्मत विकसित हुई । बेजुबान पशुओं का प्रतिकार मनुष्यों में बदलाव आंदोलित करने में प्रेरक रहा। जमींदार के निरंकुश शासन के खिलाफ विद्रोह का स्वर मुखर होता है। न्याय की लडाई में समूचा गांव झूरी के पक्ष में एकजुट हो गया । झूरी की अगुवाई में लोग घर-द्वार छोड उसका खेत मुक्त कराने निकल पडे। जनता की एकता,साहस एवं शक्ति के समक्ष जुल्म की सियासत मिट जाती है । किसानों को खेतों पर हक़ मिलने साथ जमींदारी व्यवस्था का सांकेतिक पटाक्षेप हुआ। फिल्म का एक गीत नवोदय को कुछ यूं बयान कर गया… ‘नाच रे धरती के प्यारे, अरमानों की दुनिया सामने है तेरे…आज तेरे घर होने को है फिर खुशियों के फेरे’

‘हरगिज ना चलता है जोर सितम… मजबूर ना बन,सिर उठा के चल। मजबूत राहें बना कर चल’ समापन संदेश आदमी को सीमाओं के परे जाने को प्रेरित करता है । यह विचार जिंदगी का रुख पलटने का हौसला रखते हैं

‘हीरा मोती’ के कथानक में जमींदारी व्यवस्था की पृष्ठभूमि में मानव की सीमाओं को चुनौती देकर शोषण के विरूध लडने को प्रेरित किया गया। शासन तंत्र आम लोगों की सहनशीलता को भय के समकक्ष मानकर अन्याय की व्यवस्था कायम करता है । व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का मतलब शासक को चुनौती देना होता है। किसानों को साहूकारी पाश में जकड कर अपनी ही खेतों पर बंधुआ बनाकर काम करवाना जमींदारी की पहचान बन चुकी थी । आम जन की संपत्ति शासन की मिल्कियत मानी जाती थी,जिसपर साहूकारों एवं जमींदारों एकाधिकार हुआ करता। मालिक जनता को हमेशा शोषण का पात्र बनाए रखना चाहता है। वह कदापि नहीं बर्दाश्त करेगा कि जनता में कोई या कुछ भी उसकी बराबरी का हो। प्रस्तुत कहानी में सामंती शोषण के इसी चक्र के विरूध आवाज़ उठाई गई है ।

झूरी ने जमींदार के बैलों की प्रतिस्पर्धा में हीरा-मोती को विजयी कर सामंत से बराबरी का अपराध किया । जो व्यवस्था नजरें मिलाने को दुस्साहस मानती हो, उसके लिए आमजन के अधिकार कोई मायने नहीं रखते हैं । हक़ की लडाई को विद्रोह मानता है। निरंकुश शासक को स्वहित प्रिय होता है। किंतु इसे स्वीकार कभी नहीं करता कि वो किस हद तक शासन की नीति का प्रतीक है। जिसे आईना दिखाना एक बडा अपराध है। शासक वर्ग का चरित्र उसकी नीतियों में व्यक्त होता है। दौड में भाग लेकर झूरी ने मुसीबत को न्योता दिया है । उत्सव के उत्साह में उसे संज्ञान ना रहा कि दौड में जमींदार की जोडी को चुनौती देना, दरअसल शासन से नजरें मिलाना है । रजिया ने भी जमींदार की हुक्म की अनदेखी कर संकट को आमंत्रण दिया। घटना कथानक को जमींदारी व्यवस्था की पहचान कराने वाले हालात से रू-ब-रू कराते हैं। समय हाशिए की विवशता को प्रकट करता है । विपदा की घडी में पीडित अक्सर स्वयं को अकेला ही पाता है। शोषण ‘बांटों और राज करो’ की रणनीति पर खडा रहता है । इसलिए जब कभी उसका शक्ति से विरोध हुआ, वह धाराशायी हो गया । किन्तु दीपक को प्रज्वलित करने लिए कोई चिंगारी जरूरी है, हीरा-मोती का ‘विरोध’ वही है । जिस सामाजिक व्यवस्था में इस अदभुत प्रतिकार ने जन्म लिया, वहां सर्वहारा वर्ग असहाय शोषण का शिकार है । सामंतवादी भय उन्हें मौन होकर सबकुछ सहन करने को विवश करता है। अधिकारों की लडाई के स्वर जिस समाज में नहीं,उसी में अपने स्वामियों की हक़ में ‘हीरा-मोती’ का प्रतिकार क्रांतिकारी घटना है। संघर्ष व प्रेरणा की घटना कथा में काल्पनिक मोड न होकर एक सहज अनुभव है। वंचित समाज की लडाई में हर छोटी घटना को नोटिस करने की दक्षता से इस स्तर की कहानी निकलकर आई।

सामानांतर फिल्मों ने भी एक आंदोलन चलाया। सिनेमा को ‘एक्टिव चेंज’का माध्यम बनाकर समाज व देश की खातिर चिंतन किया गया। जीवन के यथार्थ को सामने रखने की पहल हुई । नवनिर्माण लक्ष्य को नजर में रखते हुए ग्रामीण परिवेश को प्राथमिकता दी गई । मृणाल सेन से लेकर श्याम बेनेगल एवं गौतम गोष तथा प्रकाश झा तक ने गांव की व्यथा को फ़िल्म का विषय बनाया। प्रेमचंद व सामानांतर सिनेमा ने जिन पात्रों के उत्थान के लिए संघर्ष किया,आज भी हाशिए पर हैं। शोषण, गरीबी, भूखमरी की विक्राल समस्याओं से उभर नहीं सके हैं। मनरेगा जैसी महत्त्वकांक्षी योजना भी इनका भला नहीं कर सकी। समकालीन व्यवस्था सामंतवादी सत्ता के मौन समर्थन की दिशा में है। हरियाणा एवं यूपी द्वारा खाप पंचायतों को मिली क्लीन चीट इस संदर्भ में उल्लेखनीय थी। झूरी-जोखू-होरी जैसे लोगों के साथ आज भी अन्याय हो रहा। जिन पात्रों की कहानी आदमी में संवेदना का सृजन करती है, उनकी स्थिति में बदलाव के लिए इस ओर से सार्थक प्रयास आवश्यक है। हिंदी सिनेमा की आमजन धारा में ‘हीरा-मोती’ का योगदान महत्त्व का विषय है । सर्वहारा वर्ग संदर्भ में फिल्म तत्कालीन हालात को सक्षम रूप में व्यक्त करती है। शोषण का स्वरूप अब बदल गया है, लेकिन उसका दमनकारी चक्र वही है । उदारवादी-नव उदारवादी नीतियों की एक बडी कीमत झूरी,रजिया जैसे लोगों को चुकानी पडी। जबकि लाभ दूसरों को मिला। किसान की मेहनत पूरे देश का पेट भरने की क़ुव्वत रखती है । किंतु उसी भोजन को ग्रहण करते समय शायद ही कोई किसान को धन्यवाद कहता है। सिनेमा में भी इस किस्म के किरदारों को अपेक्षित महत्त्व नहीं मिल रहा।

‘हीरा मोती’ने सिनेमा से जनसेवा को ग्रामीण संदर्भ में रखा था। इस परिवेश की कहानियां अब हिंदी सिनेमा में नहीं। आज की अधिकांश फिल्में नगर-महानगर की कहानियों को बढा रही हैं। आधुनिकता के आवरण में लिपटी यह नगरीय कहानियां हिंदी सिनेमा को वैचारिक बारंबारता की ओर ले जा रही हैं। व्यावसायिक आकर्षण के मददेनजर परिवर्तन का हौसला सीमित है। लोकप्रिय सिनेमा का वर्त्तमान ग्रामीण परिवेश से कटा है । जडों से विमुख नगरीय आबादी को गांवों (जडों) की झांकी के लिए अतीत की ओर देखना है। आज का सिनेमा अतीत से मिले वैचारिक तत्त्वों को लागू नहीं कर सका है। बहुत समय हुआ किसी फिल्मकार ने ग्रामीण परिवेश की दमदार फ़िल्म नहीं बनाई। अधिकांश लोग नगरीय ‘हैंगओवर’ से जूझ रहे हैं। नगरों की तुलना में गांव की संख्या बहुत अधिक है। फिर भी ‘ग्रामीण परिवेश सिनेमा’ जैसी विचारधारा का समर्थन नहीं। आज हीरा मोती और ग्रामीण परिवेश से सजी सभी फ़िल्मों की याद आती है। लेकिन हिंदी सिनेमा इस ओर से कटा हुआ मालूम पडता है । गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में अब भी सकारात्मक रूचि नजर आती है। ग्रामीण जीवन की बागडोर क्षेत्रीय सिनेमा (हिंदी क्षेत्र में भोजपुरी सिनेमा) के पाले में है। जिसे वो बहुत से मामलों में सक्षम रूप से नहीं रख रहा । हालात के मददेनजर सकारात्मक उत्थान समय की जरूरत है। इस दिशा में पहल से हमारा सिनेमा एक बडे दायित्त्व को निभा सकेगा।