मालिनी श्रीवास्तव

याद आए अबरार अल्वी !

pyasa

आज मशहूर लेखक,डायरेक्टरऔर एक्टर अबरार अल्वी की पुण्यतिथि है.2009 को आज के ही दिन यानि 18 नवंबर को 82 साल की उम्र में दुनिया को कह दिया था अलविदा.जी हां,वहीं अबरार अली जिन्हें गुरुदत्त की फिल्म साहब बीवी और गुलाम के लिए 1962 में बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला थाशायद हीं कोई ऐसा हिंदी सिने प्रेमी होगा जो गुरुदत्त के जादू से अछूता रह जाए…गुरुदत्त का दिवाना कौन नही है..और फिल्मीदुनिया के इस शंहशाह ने अपने दरबार में एक से एक से एक नगीने जड़ रखे थे जिनमें राज खोसला, वीके मूर्ति, वहीदा रहमान, जॉनी वॉकर, रहमान, गीता दत्त, वही उन पर फिल्माए गानों के लिए उनकी आवाज़ बने मोहम्मद रफ़ी,और हेमंत कुमार,तो ओपी नैयर, एसडीबर्मन, ने संगीत रचे और देवा नंदऔर गुरु दत्त तो एक दुसरे के लिए कमिटेड थे हीं.. लेकिन सबसे करीबी कोई था तो वो थे अबरार अल्वी ….

gurudattअबरार अल्वी ने 50 की दशक में गुरदत्त के साथ काम करना शुरु किया और ये सिलसिला 1960 तक चला….अबरार के जीवन का ये गोल्डन पिरियड माना जा सकता है….अबरार अल्वी जैसे हीरे की परख गुरुदत्त जैसा कोई जौहरी ही कर सकता था…लिहाजा अबरार जब उनकी टीम के साथ फिल्म जाल के लिए काम कर रहे थे उस वक्त गुरुदत्त एक दृश्य को फिल्माने के लिए बड़ी उलझन में थे कि आखिरकार किस तरह के डॉयलॉग यहां पर फिट किए जाएं…और तभी अबरार अल्वी जी ने अपने सुझाव गुरुदत्त जी के सामने रखे जो कि गुरुदत्त को बेहद पसंद आए….और इसके बाद उन्होंने फौरन

अबरार अल्वी को अपनी अगली फिल्म आरपार के डॉयलॉग लिखने का प्रपोसल दे दिया.

अब गुरदत् अपने भाई आत्मा राम के बाद अबरार अल्वी पर ही सबसे ज्यादा भरोसा रखते थे.

और अबरार ने उनके भरोसे को अंत तक कायम रखा.गुरुदत् की फिल्म कागज के फूल बुरी तरह से फ्लॉप हो गई तो गुरुदत्त इतने टूट चुके थे क उनपर खुद से भी भरोसा टूट चुका था लेकिन उस दौर मे भी उन्हे खुद पर तो नही लेकिन अबरार पर भरोसा था….और उन्हे पूरा यकिन था फिल्मी आकाश

गुरुदत् के मिटते सितारे को फिर से अगर कोई रौशन कर सकता है तो वो सिर्फ अबरार अल्वी ही है.

और उन्होंने अपनी अगली फिल्म की बागडोर अबरार को हाथों सौंप दी…अबरार ने भी उनके भरोसा को सच करने के लिए खुद को इस फिल्म में झोंक दिया…..और इसका नतीजा फिल्मी दुनिया के इतिहास सुनहरा अक्शर साबित हुई…किसी फिल्म मेकर को अमर बनाने के लिए साहब बीवी और गुलाम जैसी सिर्फ एक ही फिल्म काफी है…. अपनी इस क्लासिक फिल्म के लिए उन्हें फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला. फिल्म को राष्ट्रपति का रजत सम्मान तो मिला ही, 1963 में बर्लिन फिल्म समारोह में स्क्रीनिंग और ऑस्कर के लिए भी चुना गया पर चूँकि फिल्म गुरु दत्त फिल्म्स के बैनर पर बनी थी, विवाद उठा कि कहीं इस फिल्म का निर्देशन गुरुदत्त ने तो नहीं किया था, हालाँकि गुरुदत्त ने कभी ऐसा कोई दावा नहीं किया, पर अबरार ने खुद एक बार ये स्वीकार किया कि फिल्म के सभी गाने गुरुदत्त ने फिल्माए थे.

इसके अलावा बतौर एक्टर अबरार ने दो फिल्मों में काम किया ये फिल्में थीं 12 O’Clock जो 1958 में बनी थी जिसमें वो एक पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार में नजर आए वही दुसरी बार वो 1976 की सुपर हिट फिल्म लैला मंजनू गेस्ट एपिरिएंस में नजर आए….

अबरार ने गुरुदत्त से अलग भी कई हिट फिल्मों के लिए लिखा जिनमें संघर्ष, सूरज, छोटी सी मुलाकात, मनोरंजन, शिकार और साथी,जैसी सफलतम फिल्में शामिल हैं….लेकिन अबरार अल्वी की असली पहचान तो गुरुदत्त बैनर से ही मानी जाती है….अबरार अल्वी गुरुदत् और उनकी क्लासिक फिल्में , प्यासा, कागज़ के फूल, चौदहवीं का चाँद और साहिब बीबी और गुलाम बस यही मानों एक दुसरे पूरक जैसे हों.हालांकि शाहरुख़ खान की फिल्म “गुड्डू” उनकी अंतिम फिल्म रही…जो उतनी सफल नही रही…

सच तो ये है कि अबरार अल्वी जैसा महान फिल्म मेकर साहब बीवी और गुलाम जैसी सुपर क्लासिक फिल्म देने के बाद किसी और हिट फिल्म या अवॉर्ड का मोहताज नही रह जाता.उनकी पुणयतिथि के मौके पर उन्हे हर हिंदी फिल्मों को चाहने वालों की तरफ से शत-शत नमन

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9 thoughts on “याद आए अबरार अल्वी !

  1. सिकंदर हयात

    कहते हे की अबरार अल्वी गुरुदत्त के जाने के बाद सारी जिंदगी अफ़सोस में ही रहे क्योकि खुदखुशी की रात देर तक अबरार अल्वी और गुरुदत्त साथ बैठे शराब पीते रहे थे अबरार अफ़सोस में रहे की काश उस रात वो गुरुदत्त के साथ ही वही रह जाते तो कोन जाने वो उस रात बच जाते फिर कोन जाने वो और चलते यही होता हे जब हमारा कोई दोस्त या कोई भी डिप्रेशन एंग्जाइटी घबराहट में हो तो उस समय उसके साथ अधिक से अधिक रहना चाहिए बाते करनी चाहिए डिप्रेशन घबराहट आदि मानसिक समस्याए एक कुए की तरह होती हे इस कुए से किसी तरह आदमी निकल जाए तो सब ठीक हो जाता हे वार्ना उस कुए में बहुत जबरदस्त घबराहट टेंशन होती हे इतनी अधिक की इसके दर्द दुखन को ठीक से समझया भी नहीं जा सकता हे और सबसे अधिक ये प्यार रिलेशन से रिलेटिड मामलो में ही होती हे खासकर लड़को या मर्दो में क्योकि बहुत अधिक मेल ईगो होती हे और लड़की लेडी उन्हें घास ना डाले तो ठीक . मगर अगर वो किसी और के साथ दिखाई दे तो लड़को का बुरा हाल हो जाता हे इस ” कुए ” में पड़े पड़े वो अपना या किसी का भी खासा नुक्सान भी कर बैठते हे ऐसे में दोस्तों का ही फ़र्ज़ होता हे की वो अगले को उस कुए से बाहर निकाले ये कुआ बहुत डरावना होता हे

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    1. सिकंदर हयात

      डिप्रेशन एंग्जाइटी पैरानॉइड आदि मनोरोगों का मुझे खासा तजुर्बा रहा हे हुआ ये था की फादर की डेथ हो गयी हमारे परिवार की हालात खस्ता थी ददिहाल बईमान थी तो ननिहाल मानसिक शारीरिक आर्थिक तीनो ही हिसाब से कमजोर थी एक और परिवार था जो साथ दे सकता था मगर आदर्शो के चक्कर में वो भी साथ छोड़ गयाhttp://khabarkikhabar.com/archives/2633 कमेंट बताया क्यों – ? ऐसी भयानक इनसिक्योरिटी के बीच हमारे घर का एक सदस्य मनोरोग का शिकार हो गया कई साल इलाज़ चला बहुत पैसा समय ख़राब हुआ बहुत तकलीफ हुई खेर आख़िरकार जीनियस डॉक्टरसुमन मिल गयी और उन्होंने ठीक कर दिया इस हादसे से मेरा बहुत नुकसान हुआ खासकर पढाई का , लेकिन जैसा की दुष्यंत कुमार साहब नेअपने इस लेख मेंबतायाhttp://khabarkikhabar.com/archives/2586की ये बेहद विचलित तोड़ देने वाले हालात आप कैसे भी करके झेल जाओ भले ही विनर ना बनो मगर बस झेल जाओ तो ये आपको बहुत कुछ सिखा देते हे

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      1. सिकंदर हयात

        ये सब अनुभव बाद में काम आये हमारे घर का एक और करेक्टर जिसकी पढाई पर सबसे अधिक इन्वेस्टमेंट ( आज की तारीख लगभग दस लाख आस पास ) हो चूका था और फाइनल एग्जाम से ठीक पहले वो बहुत ही खतरनाक एंग्जाइटी में घिरा हुआ था एक लड़की ने उसका दिल तोड़ दिया था ( शायद अपना कुछ काम निकाल कर ) अब अगर मुझे पहले से तजुर्बा ना होता तो कुछ समझ ना आता क्या करे क्या करे. मगर अब मुझे बहुत कुछ पता था तो पहले तो मेने उसे वहां से शिफ्ट किया जहां आस पास वो लड़की थी फिर तय किया की वो अकेला ना रहे फिर में उसे लेकर डॉक्टर सुमन के पास पंहुचा ( जिनका अहसान में कभी नहीं उतार सकता ) और उन्होंने उसे लगभग तीन महीने में पूरी तरह से नार्मल कर दिया उसके बाद फिर मेरा एक पि एच डी कर रहा कज़िन था उसका एक अफ़ेयर लेडी के दिल्ली से वापसकलकत्ता चले जाने से दी एन्ड हुआ तो उसकी याद में उसे डिप्रेशन के दौरे से पड़ने लगे उसका बुरा हाल था खेर मेने उसके साथ काफी वक्त गुजारा खेल खिलाये बात करते रहे किताबे दी इस तरह धीरे धीरे वो भी इस डिप्रेशन और एंग्जाइटी के कुँए से बाहर निकल आया एक बार दोस्तों से दवाइयों से आप इस कुँए से निकाल आओ तो सब कुछ ठीक हो जाता हे वर्ना ये कुआ मर्लिन मुनरो गुरुदत्त से लेकर प्रतुषा बनर्जी तक की जान ले चुका हे बात केवल सुसाइड की ही नहीं हे दिल्ली मेट्रो हत्याकांड जिसमे लड़की को उसके एक्स ने केंची से ही मार डाला ऐसे ऐसे हत्याकांड भी यही मनोरोगों का कुआ करवाता हे सारी दुनिया में ही मनोरोग बेहद बढ़ रहे हे दवाइयों और दोस्ती का हाथ बढ़ा कर ही लोगो को इस अंधे कुँए से निकाला जा सकता हे

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        1. सिकंदर हयात

          5 करोड़ से ज़्यादा मरीज़ों के साथ डिप्रेशन भारत के लिए है एक बड़ी चुनौतीPosted by Gaurav Raj in #LetsTalk, Hindi, Mental Health, SocietyMarch 30, 2017अवसाद (डिप्रेशन) भारत और पूरी दुनिया के लिए एक चिंता का विषय है। पिछले मन की बात में हमारे प्रधानमंत्री ने इससे ग्रसित लोगों के लिए चिंता दिखाई। ये अपने-आप में एक बेहतर क़दम है। लेकिन क्या सिर्फ़ बात करने से इतनी बड़ी चिंता हल हो जायेगी? या फिर ज़रूरत है इसके कुछ पहलुओं पर बहस करने की? ऐसा क्यों है? कितने प्रतिशत लोग इससे पीड़ित है? विषय क्या है? इसके कारण क्या हैं? दुनिया भर के आंकड़े क्या कहते हैं? समाधान क्या है?अवसाद की दुनिया में कोई मुख्य वजह नहीं है। कई अलग-अलग कारणों से एक अच्छा-भला व्यक्ति, कुछ सवालों के जवाब ढूंढते हुए, अवसाद के अंधेरे कोने में जा पहुंचता है। पारिवारिक कलह, आपसी मतभेद, करियर, नौकरी, रिश्ते, शारीरिक कमज़ोरी, बेरोज़गारी, आशा-निराशा, समाज, कुरीति और उम्मीदों के बोझ के कारणों से अवसाद की स्थिति पैदा हो सकती है। लेकिन एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वो है इसके लक्षण की पहचान करना। ज़्यादातर परिस्थिति में अवसाद को परखने में देर हो जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि लोगों को इसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होती या फिर वो इसे नज़रंदाज़ करने लगते हैं और गाड़ी छूट जाती है। तो क्या करें?एक नज़र आंकड़ों पर। हिंदुस्तान टाइम्स में छपी वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (WHO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया भर में 322 मिलियन यानि कि लगभग 32 करोड़ लोग, अवसाद से पीड़ित हैं। ये विश्व की कुल आबादी का 4.4% प्रतिशत है। ये समस्या महिलाओं में ज़्यादा (5.1%) है और 3.6 % पुरुष इससे ग्रसित हैं। भारत में लगभग 57 मिलियन यानी कि 5 करोड़ 70 लाख लोग अवसाद से पीड़ित हैं। इनमें 3.8 करोड़ लोग ‘एंग्ज़ाइटी’, यानी कि बेचैनी से पीड़ित हैं। रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में हर 45 सेकंड में डिप्रेशन से एक मौत होती है। सालाना, उपचार के आभाव में 7,88,000 लोग आत्महत्या करते हैं। चिंता बढ़ा देने वाले इन आंकड़ों से कहीं ज़्यादा चिन्तनीय है इसके उपचार, लक्षण और इलाज के बारे में जानकारी न होना या इस पर परिवार के बीच बात न होना।
          सबसे पहले तो आपको ये समझना है कि अवसाद एक बीमारी है; ठीक वैसे ही जैसे टीबी, मधुमेह, आदि। तो इसका मतलब ये कि इसका इलाज है। जैसा मैंने पहले कहा कि अवसाद के कोई मुख्य कारण नहीं होते। ये कई कारणों से पनपते हैं। जैसे हमारे दिमाग़ में रसायन ऊंच-नीच के कारण, कोई पुरानी बीमारी के कारण, ज़्यादा चिन्ता करने, दुःख, विपरीत परिस्थति और पैसे की तंगी आदि। ये तमाम चीज़ें एक इंसान को बीमार कर सकती हैं। युवाओं में अपने पार्टनर से रिश्ते की टूटने की वजह से अवसाद होता है, ये एक सबसे आम कारण है जो समय के साथ ठीक हो जाता। धैर्यपूर्वक अगर वो इसे समझें तो इससे पार पाना मुश्किल नहीं है।
          इसे परखने के और भी कई उपाय हैं। अगर आप बार-बार किसी एक मुद्दे को लेकर अपने विचारों को बदल रहे हैं तो कहीं न कहीं अवसाद की तरफ़ बढ़ रहे हैं। अगर आप किसी के साथ में रिलेशन में हैं और अचानक आपको उसपे प्यार आता है, फिर अचानक उसी व्यक्ति को आप नापसन्द करने लगते हैं तो आप अवसाद की तरफ़ बढ़ रहे हैं। अकेले होने पर आप अपने करियर को लेकर चिंतित होते हैं, ख़ुद को प्रेरित करते हैं कि प्रशासनिक सेवा में उत्तीर्ण हो जाएंगे, फिर अचानक आपको ये सब बेकार लगने लगता है तो आप अवसाद के काफ़ी नज़दीक हैं।
          लंबे समय तक अपने दोस्तों से नहीं मिलना और उनको नज़रंदाज़ करना आपको अवसाद से ग्रसित करता रहेगा। ख़ुद की परेशानियों को ख़ुद तक रखना आपकी इस परिस्थिति को और गहरा करता जाएगा। बेरोज़गारी के बारे में सोचते-सोचते लोग डिप्रेस हो सकते हैं। टूटे हुए रिश्ते को दोबारा जोड़ने की जिद्द आपको कमज़ोर करती रहेगी। आप ज़िंदगी की रेस में पीछे छूटते रहेंगे। आपके साथ वाले आगे निकल जाते हैं, आप तब भी अपनी किसी परेशानी का रोना रो रहे होंगे। ऐसा मत कीजिये…
          ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है इसे व्यर्थ न गंवाएं, इसके उपाय मौजूद हैं। बस थोड़ी मेहनत और फिर आसमान ही सीमा है। इसके बारे में बात करने से लोग क्या कहेंगे, ये सोचने में समय न गंवाएं। अपने परिवार के लोगों को अपनी मनोस्थिति के बारे में बताएं। ऐसा नहीं करने आप ख़ुद को और संकट में डाल रहे हैं। ख़ुद को समाज व दोस्तों से अलग न करें। आईसोलेट रहकर समाधान निकालने में बहुत लंबा वक़्त निकल सकता है। अपनी ऊर्जा को व्यर्थ न जाने दें, इसे सही दिशा में इस्तेमाल करें, मैडिटेशन करें। ये सबसे कारगर माना जाता है।
          दुनिया में ‘एंटी-डिप्रेस्सन्ट पिल्स’ की बढ़ती मांग इस बात का संकेत है कि हर मिनट, हर सेकंड डिप्रेस लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है। 2013 से 2016 के बीच इन दवाईयों का कारोबार 750 करोड़ से बढ़कर 1093 करोड़ हो गया है। सिर्फ़ 3 सालों में कुल 30% की ये बढ़ोतरी एक ख़तरे की घंटी है। भारत में 15-29 के उम्र के बीच वाले युवा सबसे अधिक आत्महत्या करते हैं या कोशिश करते हैं।
          हमारा देश युवाओं का देश कहा जाता है। अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ेंगे तो राष्ट्र के लिए ये एक सबसे गंभीर समस्या है। शायद इसलिए प्रधानमंत्री ने अवसाद का ज़िक्र किया। आज अपने आस-पास हम ऐसे लोगों से मिलते तो हैं कहीं न कहीं उन्हें गंभीरतापूर्वक नहीं लेते। समय है उनको उनकी बीमारी से बाहर निकालने की, उनसे बात करने की। लेकिन सबसे पहले पीड़ितों को ख़ुद आगे आना होगा और इस प्रयास में परिवार और दोस्तों का सहयोग सर्वोपरि है। ये देश अपने प्रतिभावान युवाओं का भविष्य यूं बिगड़ते नहीं देख सकता। इसका इलाज आसान है, संभव है और बेहद कम ख़र्चीला है।Gaurav Raj Gaurav Raj

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  2. upendra prasad

    बहुत अच्छी जानकारी दी मालिनी सिंह — धन्यवाद !

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  3. ramesh kumar

    ABRAAR ALVI KE BAARE ME PAHLI BAAR SUNA HU , GURU DATT KO SAB LOG JAANTE HAI ! MALINI JI KO MUBARAKBAAD EK ACHCHE LEKH KE LIYE !

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  4. सिकंदर हयात

    अच्छे कलाकार बहुत ही सवेंदनशील भी होते हे गुरुदत्त जहां शायद वहीदा जी के प्यार में उलझ कर चले गए वही एक दूसरे महान कलाकार संजीव कुमार की बात करे तो वो भी कहते हे की हेमा मालिनी दुआरा ठुकराए जाने वो भी एक बड़ी उम्र और शादीशुदा कई बच्चो के बाप धर्मेद्र के लिए का सदमा नहीं झेल पाए और ह्रदय रोग का शिकार होकर गुरुदत्त की तरह ही कम उम्र में चले गए मुझे भी लगता हे की क्या संजीव कुमार दिलीप कुमार से भी बेहतर अभिनेता तो नहीं थे — एक सीन बताता हु की प्रेमचन्द की महान कहानी शतरंज के खिलाडी पर बनी फिल्म शतरंज के खिलाडी में कहानी का एक वाक्य की ” मीर साहब की बेगम किसी अज्ञात कारण से उनका घर से बाहर रहना ही ठीक समझती थी ” यह वाक्य का सीन फिल्म में एक घँटा अठारह मिनट पर से दीखता हे और क्या एक्टिंग हे संजीव कुमार की की जब नवाब मीर साहब अपनी बेगम की खूबियां ( शतरंज की छूट और खेलने को बेगम दुआरा बढ़ावा और रात को रोगन बादाम की मालिश ताकि नींद गहरी आये ) बता रहे होते हे तो मिर्जा संजीव कुमार सिर्फ अपने हाव भाव से ही दर्शाते हे की वो ” सब कुछ सारी बात समझ गए हे ” क्या बात हे संजीव कुमार की कोई जवाब नहीं . अफ़सोस अगर हेमा मालिनी जी वाला हादसा ना हुआ होता तो हमे संजीव कुमार को और देखना का सुख मिलता धरम हेमा की जोड़ी भी अजीब हे की दो इतने महान कलाकार संजीव कुमार मीना कुमारी ————— ?

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  5. सिकंदर हयात

    Urmilesh Urmil
    20 mins ·
    शशि कपूर दो कारणों से मुझे पसंद थे। एक तो वह बहुत अच्छे कलाकार थे और दूसरा कारण कि वह तरक्कीपसंद सोच के संवेदनशील इंसान थे। अपने पिता और बड़े भाई की शख्सियत का उन पर असर पड़ना लाजिमी था। उनकी पत्नी जेनिफर आजीवन कला-संस्कृति के लिए समर्पित रहीं! बेटी संजना उसी रास्ते पर हैं। बालीवुड के बहुत सारे नायकों-महानायकों की तरह इस परिवार की रूचि कभी भी अरबों-खरबों का देशी-विदेशी खजाना बटोरने में नहीं रही। शशि साहब से मेरी सिर्फ दो बार मुलाकात हुई। दोनों संयोगवश।पहली अति संक्षिप्त थी और दूसरी एक कार्यक्रम में थी। दूसरी और अंतिम मुलाकात कुछ साल पहले IIC, Delhi में पत्रकार मित्र इफ्तिखार गिलानी की किताब My Days in Prison के उर्दू संस्करण के विमोचन के मौके पर हुई। उस दिन भी मुझे महसूस हुआ, यह फिल्म कलाकार अलग ढंग का इंसान है! उस दिन उन्हें देखकर मैं एक तरफ खुश था तो दूसरी तरफ कुछ मायूस भी। मायूस इसलिए कि युवा दिनों में जब मैं उनकी फिल्में देखता था तो मुझे उनसे आकर्षक, स्मार्ट और मस्त अभिनेता कोई नहीं नजर आता था पर उस दिन आईआईसी में वह काफी थके और बीमार लग रहे थे। चलने में दिक्कत हो रही थी। वह बहुत मोटे भी हो गये थे और हवील-चेयर पर थे। हमारे जैसे समाज में उनकी हैसियत वाले कितने कलाकार या कुलीन लोग एक कश्मीरी पत्रकार की जेल डायरी के विमोचन में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का बेमिसाल साहस और सम्बदधता दिखाते हैं! वह मेरे आगे वाली कतार में आकर बैठे। मैंने उनके पास जाकर नमस्कार किया और अपना परिचय दिया। साथ में यह भी पूछा कि उनकी इजाजत हो तो मैं मंच पर बैठे पुस्तक के लेखक को बता दूं कि आप यहां एक श्रोता के तौर पर मौजूद हैं। वह आपको पाकर खुश होंगे और चाहेंगे कि आप मंच पर आकर दो शब्द कहें! जानते हैं, शशि साहब ने मुझसे क्या कहा, ‘माई डियर जर्नलिस्ट, मैं यहां एक श्रोता बनकर आया हूं। कश्मीरी पत्रकार की यह किताब भी मुझे खरीदनी है!’—- तो ऐसे थे, हमारे प्यारे शशि साहब! उनके निधन से मुझे गहरा दुख हुआ कि एक और महान् भारतीय आज हमारे बीच से उठ गया! श्रद्धांजलि और सलाम शशि कपूर!———————–https://www.youtube.com/watch?v=QOm4L3_inII https://www.youtube.com/watch?v=fQck-fX7zZ8

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