second-world-war

एक ही शहर में दस लाख आम नागरिको की मौत , ऐसी ददर्नाक घटना विश्व इतिहास में कोई दूसरी नहीं दिखाई पड़ती हे ये हुआ था आज के रूस के महान और पुराने शहर सेंट पीटसबर्ग में जो दूसरे विश्वयुद्ध के समय” लेनिनग्राद ” के नाम से जाना जाता था रूस के साथ संधि के बाद भी अचानक हिटलर को फितूर उठा की अगर वो रूस और सोवियत संघ का विनाश कर दे तो उसे ईसाई सभ्यता का रक्षक मान लिया जाएगा इसीलिए उसने अचानक तीस से पचास लाख सेनिको की तीन सेनाओ को २२ जून 1941 से मास्को स्टालिनग्राड और लेनिनग्राद की तरफ भेज दिया था हिटलर का ख्याल था की अक्टूबर से पहले पहले सोवियत संघ को खत्म कर दिया जाएगा लेकिन सोवियत संघ और लेनिनग्राद के लोगो ने तय कर लिया था की वह हर मुसीबत को सहन कर लेगी लकिन हिटलर की फौजो को शहर पर कब्ज़ा नहीं करने देंगे जिस समय जंग शुरू हुई उस समय लेनिनग्राद की आबादी तीस लाख थी जब तक सूरज की रौशनी रहती हर आदमी औरत और बच्चा शहर के चारो तरफ खंदक खोदने और बचाव के दूसरे कामो में व्यस्त रहता था जनता के इस निश्चय और बहादुरी के बाद भी अकाल का खतरा दिखाई दे रहा था शहर के गिर्द जर्मन घेराबंदी लंबी खिंच रही थी 6 सितंबर को शहर के मेयर पोलॉ ने मास्को सन्देश भेजा ” शहर में 28 लाख शहरी और पांच लाख फौजी हे लेकिन उनके लिए सिर्फ 18 दिन का मांस चौदह दिन का आटा और 23 दिन का अनाज शेष रह गया हे जर्मन हवाई हमले से शहर का सबसे बड़ा खुराक का गोदाम तबाह हो गया था सख्त राशनिग के बाद भी लोगो के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना बहुत मुश्किल था जर्मन फौजो ने इतनी सख्त घेराबंदी कर रखी थी की रेलो के रास्ते भी जाम हो चुके थे रसद सिर्फ हवाई मार्ग से पहुचाई जा सकती थी जिस पर जर्मन विमान भी हमला करते थे क्योकि इसके लिए डेढ़ सौ मील तक ऐसे क्षेत्रो पर उड़ना पड़ता था जिस पर जर्मन कब्ज़ा था . रात दिन लेनिनग्राद पर बमो की बारिश होती थी सितंबर का पूरा महीना इसी तरह गुजर गया हज़ारो नागरिक मारे गए अकटूबर में जर्मन फौज के साथ साथ एक और बड़ा दुश्मन सामने आया रूस का भयंकर जाड़े का मौसम . न कोयला था न तेल न कोई ईंधन मकानों दफ्रतरों और कार्यलयों को गर्म रखने का पूरा निजाम ध्वस्त हो चुका था 9 नवंबर को जर्मन फौज ने तखुन पर भी कब्ज़ा कर लिया जिससे आकाश मार्ग से भी लेनिनग्राद में रसद पहुचने का रास्ता बन्द हो गया अब कड़ाके की ठंड में कम उम्र लडकिया उन जंगलो से लकड़िया काट कर लाती थी जहां अभी जर्मन फौजो का कब्ज़ा नहीं हुआ था लेकिन जंगलो से काटी गयी लकड़िया शहर के लिए नाकाफी थी अब जो मकान बमबारी से खत्म हो चुके थे उनमे बची लकड़ियां निकाल कर इस्तेमाल की गयी कारखानों की मशीन जमकर रह गयी थी उनका लोहा इतना ठंडा हो चुका था की मज़दूर उस पर रात भी नहीं रख सख्ते थे शहर तक रसद लाने का अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा था लाडूगा झील जिस पर जर्मन फौज का कब्ज़ा नहीं हुआ था ताबूत बनाने के लिए लकड़ी नहीं थी इसलिए कई कई लाशें एक साथ दफ़न कर दी जाती थी कुछ दिनों में लोग इतने कमजोर हो गए थे की लाशें उठाना उनके लिए मुश्किल हो गया . अब लाशो को अपनी जगह बर्फ के निचे डूबने के लिए छोड़ दिया जाने लगा और कर भी क्या सकते थे !

18 नवंबर को सुबह पांच आदमी एक घोडा गाडी पर सवार होकर झील की तरफ बढे घोडा भी भूख से निढाल होकर हड्डियों का ढांचा हो चुका था घोडा गाड़ी पर पांच आदमी यह देखने के लिए सवार हुए थे क्या झील पर बर्फ की सतह इस योग्य हे की उस पर से ट्रक और गाड़िया गुजर सके बर्फ का तूफान उनका रास्ता रोक रहा था लेकिन वह रुके नहीं उन्होंने हिम्मत नहीं हारी . थोड़ी थोड़ी दुरी पर वह बर्फ में सुराख़ करके उसकी तह देखते थे गहराई नापते थे साठ घंटे में वह झील के दूर किनारे पहुचे थे वहां पहुचने के बाद उन्होंने लेनिनग्राद टेलीफोन किया बर्फ की तह अभी भी ज़्यादा मोटी नहीं हे लेकिन बढ़ती हुई सर्दी को देखते हुए उमीद की जा सकती हे की कुछ समय बाद सतह मोटी हो जायेगी यह सुचना जब लेनिनग्राद के बाहर पहुची तो इसी उमीद में दस ट्रक सामान लेकर लेनिनग्राद की और रवाना हुए लेकिन यह सामान लेनिनग्राद की जरूरतों के मुकाबले बहुत ही कम था झील तक जाने वाले सड़क पर भी जर्मन फौज का कब्ज़ा हो चूका था अब यही तरीका था की नई सड़क बनाई जाए अब हज़ारो महिलाओ आदमियो ने मिलकर सिर्फ दो हफ्ते में दोसो मील लंबी सड़क बना ली हर साल जाड़े में झील जम जाती थी बर्फ इतनी सख्त होती थी की उससे सड़क का काम लिया जा सकता था यही नहीं उस पर लाइन बिछा ट्राम तक चलाई जाती थी मगर सन 1941 के झाड़ो में उस पर बर्फ तो जमी मगर उसकी सतह इतनी मज़बूत नहीं हो सकी की उस पर सामान से लदा ट्रक जा सके उसके बाद तो शहर के लोग जर्मन बमबारी से कम मगर भूख से अधिक मरने लगे लोग काम पर जाते हुए लकड़ी काटते हुए या रास्ते पर चलते हुए गिर जाते और मर जाते पुरे के पुरे परिवार अपनी जान से हाथ धोने लगे लोग अपने अपने बिस्तरों , कुर्सियों पर इस तरह से बेजान पड़े मिलते जैसे वहां पत्थर की मुर्तिया रख दी गयी हो लेवन गोर नामक लेखक लेनिनग्राद पर अपनी किताब में एक दिल दहला देने वाला वाकया बताते हे ” जब में मकान के अंदर दाखिल हुआ तो कमरा अँधेरे में डूबा हुआ था दीवारों पर धुँआ की कालिख जमी हुई थी फर्श पर पानी जमा हुआ था कुर्सियों के निकट एक चौदह वर्ष के लड़के की लाश पड़ी हुई थी पालने में एक छोटे बच्चे की लाश पड़ी हुई थी बिस्तर पर वह महिला मर्त पड़ी हुईथी जो उनकी माँ थी उसकी लाश के निकट एक लड़की अपनी माँ का कन्धा हिला हिला कर उन्हें जगाने की कोशिश कर रही थी सिर्फ एक दिन में उस लड़की का भाई बेटा और माँ सर्दी और भूख का शिकार हो गए थे सड़को और मैदानों में चारो तरफ विभन्न मुद्राओ में जमी हुई लाशें पड़ी थी किसी के हाथ फैले हुए किसी का मुह खुला हुआ किसी की आँखे फटी हुई ”

मगर जो ज़िंदा थे वह कुदाल और फावड़े लेकर टोलिया बनाकर जर्मन फौजो की गोलाबारी की भी चिंता ना करते हुए चौबीसो घंटे काम में जुटे रहते ट्रेक्टरो के लिए पेट्रोल नहीं था कटे हुए बड़े पेड़ो को आदमी औरते खिंच कर रास्ते से हटाते थे जो सड़क उन्होंने बनाई थी ट्रक उस रास्ते से झील पर करके लेनिनग्राद की तरफ बढ़ने लगे रास्ता बन जाने के बाद लाल सेना ने उन रास्तो पर भी अधिकार कर लिया जिनसे रेलो का आना जाना भी शुरू हो गया इस प्रकार लेनिनग्राद को भूख से तो मुक्ति मिल् गयी लेकिन वहां की जरुरत से बहुत कम माल पहुच रहा था क्योकि पूरी दुनिया की ही सबसे बड़ी जंग सोवियत संघ और नाज़ी रूस में ही लड़ रहे थे अब अकाल के कारण जो बीमारिया फैली उन्होंने अपना तांडव शुरु कर दिया था लेनिनग्राद का हर आदमी एक चलती फिरती लाश नज़र आ रहा था आँखे अंदर धसी हुई गाल पिचके हुए हड्डिया उबरी हुई मांस का नाम नहीं खाल हड्डियों से चिपकी हुई बच्चो के पेट फुले हुए आँखे उदास सुस्त . दस लाख लोग 1942 में शहर छोड़ कर जा चुके थे . मौसम सामान्य होते ही रुसी फौजो ने बहादुरी से लड़ना शुरू कर दिया था जर्मन फौजो को भी इस घेराबंदी की ज़बरदस्त कीमत चुकानी पड़ रही थी मगर जर्मन सेना का संघटन अदभुत था कठिन से कठिन हालात में भी वो खुद को संभाले रखे हुए थी उन्होंने भी घेराबंदी हटाई नहीं . फिर से जाड़े का मौसम आया और झील की बर्फ पर सड़क बनाई गयी सन 43 में लालफौज ने जर्मनसेन की घेराबंदी तोड़ कर सात मील लंबा रास्ता बना लिया उसके बाद धीरे धीरे जर्मन फौज पर दबाव बढ़ने लगा 28 जनवरी 1944 में बर्फ से ढकी सड़को पर लेनिनग्राद के लोगो ने एक खास एलान सूना जो लेनिनग्राद के लीडर आंद्रे जवानोफ़ ने किया ” आज की लड़ाई के दौरान एक ऐतिहासिक कारनामा अंजाम दिया जा चुका हे लेनिनग्राद को दुश्मन की गोलाबारी से पूरी तरह से आज़ाद कर लिया गया ये एलान सुनते ही लोग नाचने गाने लगे तोपो की सलामी दी जाने लगी जर्मन फौज की घेराबंदी लगभग 900 दिनों तक कायम रही थी इस दौरान कितने नागरिक मारे गए इसका सही सही अंदाज़ा कभी नहीं लग सका लेकिन यह संख्या दस लाख कम से कम थी सारी दुनिया के इतिहास में एक ही शहर में इतने बेकसूर नागरिको के मारे जाने की कोई और ऐसी दर्दनाक मिसाल नहीं मिलती हे . ( एक पुरानी मैगज़ीन और डाइजेस्ट से साभार )
( (सिकंदर हयात से इस नंबर पे 9911631954 संपर्क कर सकते है !)