संघ के एक बहुत पुराने और खाँटी विचारक हैं, एम. जी. वैद्य. उनका सुझाव है कि जो लोग यूनिफ़ार्म सिविल कोड को न मानें, उन्हें मताधिकार से वंचित कर देना चाहिए. ख़ास तौर से उनके निशाने पर हैं मुसलमान और आदिवासी. उन्होंने अपने एक लेख में साफ़-साफ़ लिखा है कि ‘जो लोग अपने धर्म या तथाकथित आदिवासी समाज की प्रथाओं के कारण यूनिफ़ार्म सिविल कोड को न मानना चाहें, उनके लिए विकल्प हो कि वह उसे न मानें. लेकिन ऐसे में उन्हें संसद और विधानसभाओं में वोट देने का अधिकार छोड़ना पड़ेगा.’

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परतें खुल रही हैं. धीरे-धीरे. यूनिफ़ार्म सिविल कोड पर अब एक नया सुझाव है. शायद लोगों का ध्यान उधर गया नहीं. लेकिन सुझाव बहुत ख़तरनाक है. और उससे भी कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है उसके पीछे छिपी मंशा. संघ के एक बहुत पुराने और खाँटी विचारक हैं, एम. जी. वैद्य. उनका सुझाव है कि जो लोग यूनिफ़ार्म सिविल कोड को न मानें, उन्हें मताधिकार से वंचित कर देना चाहिए.

निशाने पर मुसलमान और आदिवासी
उनके निशाने पर कौन हैं? ख़ास तौर से मुसलमान और आदिवासी. उन्होंने कुछ छिपाया नहीं है. अँगरेज़ी दैनिक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में (1 नवम्बर 2016) अपने लेख में एम. जी. वैद्य ने साफ़-साफ़ लिखा हैClick to Read. कि ‘जो भी लोग अपने धर्म या तथाकथित आदिवासी समाज की प्रथाओं के कारण यूनिफ़ार्म सिविल कोड का विरोध कर रहे हैं, उन्हें हमें एक सीमित विकल्प देना चाहिए.’ क्या है वह विकल्प? देखिए. वह आगे लिखते हैं, ‘जो लोग यूनिफ़ार्म सिविल कोड’ को न मानना चाहें, उनके लिए विकल्प हो कि वह उसे न मानें. लेकिन ऐसे में उन्हें संसद और विधानसभाओं में वोट देने का अधिकार छोड़ना पड़ेगा.’

सिविल कोड न मानने की क़ीमत चुकाएँ
वैद्य जी आगे कहते हैं कि मुसलमानों को या आदिवासियों को अगर पुराने ज़माने के रिवाजों को मानना है, तो उन्हें उसकी क़ीमत तो चुकानी पड़ेगी! उनका कहना है कि ऐसे लोग देश के नागरिक तो माने जायेंगे और उन्हें बाक़ी सारी नागरिक सुविधाएँ पाने का हक़ होगा. और इसलिए (इन नागरिक सुविधाओं को पाने के अधिकार के तहत) वह स्थानीय निकायों जैसे ग्राम पंचायत, ज़िला परिषद या नगर पालिका आदि के लिए वोट कर सकेंगे.

यूनिफ़ार्म सिविल कोड लागू करना अनिवार्यता है
वैद्य जी का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में अँगरेज़ी का शब्द ‘शैल’ (shall) इस्तेमाल किया गया है, इसलिए यूनिफ़ार्म सिविल कोड लागू करना सरकार के लिए अनिवार्य है. और चूँकि संसद और विधानसभाओं का गठन अनुच्छेद 179 और अनुच्छेद 79 के तहत हुआ है, इसलिए जो लोग अनुच्छेद 44 के तहत नहीं आना चाहते, उन्हें संसद और विधानसभाओं में वोट देने का अधिकार छोड़ना पड़ेगा.

वैद्य जी ने अपने यह सुझाव यूनिफ़ार्म सिविल कोड पर जारी की गयी विधि आयोग की प्रश्नावली पर भेजे हैं. प्रश्नावली में पाँचवा सवाल है कि क्या यूनिफ़ार्म सिविल कोड वैकल्पिक होना चाहिए. इसी सवाल के जवाब में यह सारी बातें कही गयी हैं.

संविधान मानते नहीं, लेकिन संविधान की दुहाई!
कितना बड़ा मज़ाक़ है! यह बात वह लोग कह रहे हैं, जो देश के ‘सेकुलर’ संविधान को मानते ही नहीं. उनके लिए भारत एक ‘सेकुलर गणराज्य’ नहीं, बल्कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ है. किस संविधान में लिखा है, कहाँ लिखा है कि भारत ‘हिन्दू राष्ट्र’ है? तो आप जिस संविधान का हवाला देकर यूनिफ़ार्म सिविल कोड न मानने पर मुसलमानों, आदिवासियों और ऐसे ही दूसरे समूहों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की वकालत कर रहे हो, उसी संविधान से इतर राष्ट्र बनाने की बात करने पर आपके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई होनी चाहिए, यह भी आप बता दें!

ज़रा इतिहास में पीछे जाइए
और ज़रा इतिहास में पीछे जाइए. जब कई हिन्दुत्ववादी नेता हिन्दू कोड बिल में लाये जानेवाले तमाम सुधारों का विरोध कर रहे थे. तब वैद्य जी के तर्क से उनके ख़िलाफ़ क्या किया जाना चाहिए था? थोड़ा और पीछे जाइए. सवा सौ साल पहले. 1890 की घटना है. फूलमनी नाम की दस साल की बच्ची का विवाह पैंतीस साल के पुरुष से हुआ. पति के बलात्कार से लहूलुहान फूलमनी की मौत हो गयी. अँगरेज़ों ने चाहा कि यौन सहमति की उम्र बढ़ा कर 12 साल तय करने का क़ानून बने. इसका बड़ा विरोध हुआ. बाल गंगाधर तिलक ने कहा, ‘सरकार का क़ानून चाहे समाज के लिए बहुत फ़ायदे का ही क्यों न हो, लेकिन हमें यह मंज़ूर नहीं कि सरकार हमारी सामाजिक प्रथाओं और रहन-सहन को किसी प्रकार नियंत्रित करे.

तो हिन्दू नेता ऐसे सुधारों का विरोध करें तो कोई बात नहीं. मुसलमान, आदिवासी या ईसाई उसका विरोध करें तो मताधिकार छीनने की बात हो! यह है वैद्य जी का ‘राष्ट्रवाद!

हाँ, यह अलग बात है कि संघ अपनी सुविधानुसार गाहे-बगाहे वैद्य जी की बात से यह कह कर कन्नी काट लेता है कि वह बहुत बुज़ुर्ग हैं, अब संघ के कामकाज से उनका लेना-देना नहीं और ज़रूरी नहीं कि संघ उनकी बातों से सहमत हो.

गोलवलकर से भागवत तक
ठीक है. लेकिन विचारधारा और विचारों की धारा तो वही है, स्रोत तो वही है. संघ-प्रमुख मोहन भागवत ने भला अपने किस भाषण में कहा कि भारत ‘हिन्दू राष्ट्र’ नहीं है. संघ प्रमुख पहले यह बात साफ़-साफ़ कह चुके हैं कि ‘मुसलमानों को भारत में हिन्दू तरीक़े से रहना होगा.’ इस बयान और वैद्य जी के विचारों में अन्तर कहाँ है? और ज़रा कुछ और पीछे लौटिए. माधव सदाशिव गोलवलकर अपनी विवादास्पद पुस्तक ‘वी, आर अॉवर नेशनहुड डिफ़ाइंड’ में कहते हैं कि “हिन्दुस्थान अनिवार्य रूप से एक प्राचीन हिन्दू राष्ट्र है और इसे हिन्दू राष्ट्र के अलावा और कुछ नहीं होना चाहिए. जो लोग इस ‘राष्ट्रीयता’ यानी हिन्दू नस्ल, धर्म, संस्कृति और भाषा के नहीं हैं, वे स्वाभाविक रूप से (यहाँ के) वास्तविक राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा नहीं हैं…ऐसे सभी विदेशी नस्लवालों को या तो हिन्दू संस्कृति को अपनाना चाहिए और अपने को हिन्दू नस्ल में विलय कर लेना चाहिए या फिर उन्हें ‘हीन दर्जे’ के साथ और यहाँ तक कि बिना नागरिक अधिकारों के यहाँ रहना होगा.”
यूनिफ़ार्म सिविल कोड मतलब ‘हिन्दू सिविल कोड’
तो एम. जी. वैद्य, मोहन भागवत और गोलवलकर जी की बातों में कहीं कोई अन्तर है? बात तो एक ही है. इन तीनों वक्तव्यों को मिला कर पढ़िए तो बात साफ़ हो जायेगी. यानी यूनिफ़ार्म सिविल कोड मतलब ‘हिन्दू सिविल कोड’ जो ‘हिन्दू संस्कृति’ से निर्धारित होगा और इसी संस्कृति को माननेवाले देश के ‘पूर्ण नागरिक’ होंगे, बाक़ी सब ‘हीन दर्जे’ के!

हिन्दू संस्कृति यानी वैदिक क़ालीन ‘सवर्ण संस्कृति!’
अब इस ‘हिन्दू संस्कृति’ की बात को ज़रा और आगे बढ़ाइए, तो बात और साफ़ हो जायेगी. क्या है हिन्दू संस्कृति? वही जो वैदिक क़ालीन ‘सवर्ण संस्कृति’ है. इसमें आदिवासी तो हैं ही नहीं, वह तो वैद्य जी ने स्पष्ट ही कर दिया. लेकिन इसमें दलित कहाँ हैं? वाल्मीकि, महिषासुर और शम्बूक को लेकर दलित आख्यान और वैदिक आख्यानों में इधर ज़बरदस्त टकराव उभरता दिख रहा है. याद कीजिए महिषासुर के सवाल पर स्मृति ईरानी का संसद में भाषण!

दलित कैसे बनें ‘हिन्दू संस्कृति’ का हिस्सा?
तो दलित तो तब ही इस ‘हिन्दू संस्कृति’ का हिस्सा बन सकते हैं, जब वह अपने आख्यानों को छोड़ कर वैदिक मिथकों और आख्यानों को जस का तस स्वीकार कर लें! अपने पूरे विमर्श को संघ परिभाषित ‘हिन्दू संस्कृति’ में समाहित कर दें! संघ उन्हें भी और आदिवासियों को भी अपनी छतरी के नीचे लाना तो चाहता है, क्योंकि जब तक वह छतरी से बाहर रहेंगे, तब तक ‘हिन्दू राष्ट्र’ बन ही नहीं पायेगा, लेकिन शर्त यह है कि संस्कृति का आख्यान तो वही होगा, जो संघ कहे, माने और गढ़े.

मुसलमानों के ‘परिष्कार’ का मतलब
मुसलमानों के ‘परिष्कार’ की बात अभी हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दीनदयाल उपाध्याय जी को याद करते हुए उठायी. यह वही बात है, जो गोलवलकर से लेकर भागवत तक कहते आ रहे हैं. यानी मुसलमान ‘हिन्दू तरीक़े’ से रहें! सवाल उठाया जाता है कि भारत के मुसलमान अपने अरबी नाम क्यों रखते हैं? इंडोनेशिया में मुसलमानों को तो सुकर्ण और कार्तिकेय जैसे नामों से परहेज़ नहीं. और कहा जाता है कि भारत में ईसाई तो भारतीय नाम रखते हैं, जैसे नवीन, रतन आदि. मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर सकते? अच्छा पल भर के लिए मान लीजिए कि मुसलमान ऐसा करने ही लगें. तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ जायेगा? हिन्दुत्ववादी संगठनों ने ईसाइयों को निशाना बनाना बन्द कर दिया क्या?

सिविल कोड के नामसे क्यों भड़कते हैं मुसलमान?
यह है कुल मिला कर संघ की सोच और मंशा. यानी कि देश की राष्ट्रीयता का मतलब यह है कि हर नागरिक, हर समूह चाहे आदिवासी हो, दलित हो ईसाई हो, मुसलमान हो या और किसी धर्म का हो, उसे ‘हिन्दू संस्कृति’ में समाहित होना पड़ेगा. यही वह सबसे बड़ा डर है, जिसके कारण देश के मुसलमान हमेशा यूनिफ़ार्म सिविल कोड के नाम पर भड़क उठते हैं. हालाँकि मैं आज से नहीं, 1985 में शाहबानो मामले के उठने के समय से ही यूनिफ़ार्म सिविल कोड का कट्टर समर्थक रहा हूँ, क्योंकि मुझे पक्का यक़ीन है कि इससे मुसलमानों की सामाजिक चेतना और उनकी मौजूदा स्थिति में ज़बरदस्त सुधार होगा.

संथारा और तीन तलाक़
लेकिन मुसलमानों का डर जायज़ है. ख़ास कर तब, जब ऐसे मामलों पर हमेशा दोहरे पैमाने अपनायें जायें. पिछले साल अपने विजयदशमी भाषण में मोहन भागवत ने कहा था कि जैन समाज में संथारा जैसी पद्धतियों पर आचार्यों के साथ गहराई से विचार किये बिना उससे छेड़छाड़ करना देश के लिए घातक होगा. लेकिन क्या तीन तलाक़ पर भी संघ और बीजेपी की यही राय है?

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