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2 जनवरी 2016 सुबह के 8 बजे तक लगभग सभी चैनलों पर पठानकोट हमले के दृश्य और बड़े बड़े टेक्सट में ख़बरें हिलोरें मारने लगीं थीं। पठानकोट एयरबेस वाला वो फ्लाईओवर, फ्लाईओवर के पास एयर फोर्स के नीले कलर के बोर्ड और उड़ता हुआ हेलीकॉप्टर हमले के प्रतीक बन गए। इसके दो दिन बाद यानि की 4 जनवरी को दिन में 12.25 बजे से 12.31 बजे की रिपोर्टिग के कारण एनडीटीवी इंडिया को सरकार ने एक दिन के लिए ऑफ एयर कर दिया। इस 6 मिनट में एनडीटीवी ने सबसे अलग ऐसा क्या दिखाया जो राष्ट्र की सुरक्षा के लिए ख़तरा बन गया..? सरकार ने आदेश जारी करते हुए कहा है कि कंपनी ने केबल टीवी नेटवर्क अधिनियम 1994 का उल्लंघन किया है। खैर, सरकार से पूछना चाहिए कि कौन-सा चैनल इस एक्ट का उल्लंघन नहीं करता? खैर, हर दो मिनट बाद आपातकाल और इमरजेंसी की सोशल मीडिया पर रट लगाने से पहले निम्न बातें जान लीजिए!

2003 में एनडीटीवी लॉन्च हुआ। इसके लॉन्च होने के साथ ही एक विरोधी वर्ग भी लॉन्च हुआ, जो इसे पाकिस्तान का चैनल मानता/बताता है। 16 मई, 2014 के बाद परिस्थितयां बदल गईं। अब उसी संघ/समूह में से एक स्वयंसेवक जनता के बहुमत का ताज़ पहनकर 7 लोक कल्याण मार्ग पर बैठ गया। एनडीटीवी से दुश्मनी पुरानी थी, सत्ता अब मिली तो बदला अब। 8 मार्च, 2015 को एनडीटीवी ने रात को 9 बजे से 10 बजे तक अपने चैनल की स्क्रीन ब्लैक रखी। मामला था, बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ के प्रसारण का। विरोध करने का ये तरीका एनडीटीवी ने शायद ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समेन’ से सीखा है। इन दोनों अखबारों ने भी 1975 में इंदिरा की इमरजेंसी के विरोध में अख़बारों के पन्ने खाली छोड़ दिए थे। इसके बाद जब राष्ट्रवाद की आंधी तले दिल्ली जल रही थी. जेएनयू से पकड़े गए कन्हैया कुमार को पटियाला हाउस कोर्ट में पीटा जा रहा था। तभी एक रात प्राइम टाइम एंकर रवीश कुमार ने स्क्रीन को ब्लैक कर दिया। टीवी को रेडियो बना दिया और कह दिया!

‘ये अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर है।‘ दिक्कत तब और ज्यादा होने लगी जब सरकार और बीजेपी के प्रवक्ताओं से केवल एनडीटीवी ही सवाल पूछने लगा, बाकी सब धारा के साथ बहकर कथित राष्ट्रवादी हो गए। फिर कुछ दिन पहले चिंदबरम का इंटरव्यू एनडीटीवी को पता नहीं क्यों रोकना पड़ा? इसके अलावा सोशल मीडिया में उसे ट्रोल कराना हो या फिर बुरहान बानी को आतंकवादी, चरमपंथी, उग्रवादी या फिर कमांडर लिखने का मामला। सवाल करने वालों से ही गालियों समेत सवाल पूछे जाने लगे। प्राइम टाइम एंकर के लिए जब गालियों की कमी पड़ने लगी तो उनकी मां को भी गालियां दी गईं। इसलिए हमें ध्यान रखना चाहिए, कि ये तो होना ही था। बस, होने में थोड़ा टाइम लग गया। थोड़ा-सा एनडीटीवी के बारे में आपको बता दूं, दो दिन पहले जिस क्रेडिबिलिटी और विश्वसनीयता की बात प्रधानमंत्री जी रामनाथ गोयनका अवॉर्ड फंक्शन में कर रहे थे, उस पैमाना पर एनडीटीवी के मुकावले कोई नहीं ठहरता। चाहे कोई विजुअल दिखाना हो, ऑडियो सुनाना हो, रेप, मर्डर, लूट, डकैती इन सब मामलों में एनडीटीवी के समकक्ष कोई प्राईवेट न्यूज़ चैनल नहीं दिखेगा। अंदाजा सिर्फ इससे लगा लो कि जब दूसरे चैनल रामकिशन और उनके बेटे की अंतिम बातचीत की रिकॉर्डिंग टैक्सट और ग्राफिक्स के साथ दिखा रहे थे, एनडीटीवी ने प्राइम टाइम में ‘रिश्तों की संवेदनशीलता’ का हवाला देकर उसे नहीं दिखाया।

मत भूलिए एनडीटीवी ‘सबसे तेज’ और ‘आपको रखे आगे’ की दौड़ में रहने वाला चैनल नहीं है। इसलिए एनडीटीवी को इस एक दिन के प्रतिबंध को ‘बैज ऑफ ऑनर’ की तरह लेना चाहिए। साथ ही हमें आपातकाल को हल्का शब्द बनाने से बचना चाहिए. इससे पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है जबकि चैनल्स को किसी ना किसी वजह से ऑफ एयर किया गया हो। 19 अक्टूबर, 2007 को लाइव इंडिया को एक टीचर का फेक स्टींग दिखान को लेकर ऑफ एयर किया गया था। 11 मार्च, 2010 को एएक्सएन को लेट नाइट अडल्ट कंटेट दिखाने को लेकर ऑफ एयर किया गया था। फेशन टीवी, कॉमिडी सेंटर और अल जज़ीरा तक को ऑफ एयर किया जा चुका है। सरकार की तानाशाही के खिलाफ आवाज़ उठाइए, लिखिए लेकिन इमरजेंसी शब्द को बार-बार इस्तेमाल करके ‘विकास’ (आज के दौर का निहायत ही अर्थहीन शब्द) मत बनाइए।