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सर्जिकल स्ट्राइक साबित करने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर किए जा रहे हंगामे की वजह से पाकिस्तान के अंदरूनी घटनाचक्र पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पा रही है जबकि भारत के लिए वहां का ताजा घटनाचक्र सकारात्मक तौर पर बेहद दूरगामी महत्व का है। पाकिस्तान में इस बीच राजनीतिक बिरादरी और मीडिया कट्टरपंथियों के खिलाफ मुखर होकर सामने आ गए हैं। पाकिस्तान में प्रस्तावित सार्क शिखर सम्मेलन में बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम देशों ने भी भारत के बायकाट का साथ देने का फैसला घोषित कर दिया जिससे पाकिस्तान का भद्रलोक हिलकर रह गया। पाकिस्तानी संसद के संयुक्त सत्र में पीपीपी के सीनेटरों ने तो हाफिज मुहम्मद सईद को संरक्षण देने की नीति पर सवाल दागे ही थे खुद सत्तारूढ़ मुस्लिम लीग नवाज के सांसद राणा मुहम्मद अफजल ने भी इस मसले पर नवाज शरीफ को मुश्किल में डालने में कसर नहीं छोड़ी।पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के अखबार डॉन के स्तम्भ लेखक सिरिल अलमीड़ा ने आतंकवाद की नीति पर सेना और राजनीतिक प्रतिष्ठान के बीच अनबन की खबर इसलिए छापी कि जम्हूरी रंग चटख हो जाने के बाद पाकिस्तान में बुर्जुआ चेतना को फैलने का अवसर मिला है जिसकी वजह से प्रेस और राजनीतिक बिरादरी सेना के जरूरत से ज्यादा हावी रहने की व्यवस्था से क्षुब्ध होने लगी है। जब सिरिल अलमीड़ा के खिलाफ पाकिस्तान की हुकूमत ने देश के बाहर जाने पर पाबंदी कार्रवाई की तो पीछे हटने की बजाय डॉन के संपादक ने अग्रलेख लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि अलमीड़ा की खबर पर उनके स्तर से पूरी छानबीन की गई और खबर की सत्यता पर विश्वास पुख्ता होने के बाद उन्होंने ही इस प्रकाशित कराया, इसलिए पाकिस्तान में सत्ता प्रतिष्ठान में तनाव के खुलासे की खबर छापने की पूरी जिम्मेदारी सम्पादक की यानी उनकी है, कार्रवाई अलमीड़ा पर नहीं उन पर होनी चाहिए।

अकेले डान ने ही नहीं पाकिस्तान के दूसरे प्रमुख अखबार द नेशन ने भी दिलेरी दिखाई जिसने कहा कि हाफिज मुहम्मद सईद और मसूद अजहर को संरक्षण क्यों दिया जा रहा है जबकि यह दोनों पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके हैं। पाकिस्तान में भी जैसा कि इस तरह के संदर्भ में भारत में करने की कोशिश की जा रही है, हुकूमत ने अलमीड़ा के उत्पीड़न की कार्रवाई पर जनसमर्थन जुटाने के लिए राष्ट्रवाद के उन्माद की आड़ ली, लेकिन पाकिस्तान में यह कार्ड बिल्कुल नहीं चला। पाकिस्तानी मीडिया नकली राष्ट्रवाद के रंग में रंगने से इंकार करते हुए अलमीड़ा के साथ एकजुटता दिखाने में कदापि दिलेर नहीं हुई।
इस संदर्भ में पीपीपी की एक और सीनेटर एतराज अहसान को भी उद्धृत करना जरूरी है जिन्होंने संसद के बाहर और अंदर दोनों जगह कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा आतंकवादी करार हाफिज मुहम्मद सईद को पालने की जरूरत क्या है, सईद पाकिस्तान के लिए कौन से अंडे दे रहा है। हाफिज मुहम्मद सईद राजनीतिक समुदाय की अपने प्रति सख्त होती धारणा के बाद घबराहट में है। उसने नवाज शरीफ से कहा है कि वह अपने सांसद राणा मुहम्मद अफजल पर कार्रवाई करें।

पाकिस्तान की राजनीतिक बिरादरी कट्टरपंथियों को लेकर सतर्क होने लगी है। अल्लाह एक है नमाज, रोजा, हक, जकात मुसलमानों के लिए फर्ज है। हजरत मुहम्मद साहब आखिरी पैगम्बर हैं और उनके बाद एकमात्र आसमानी किताब कुरान ही मुसलमानों के लिए दिशानिर्देशक है। यह चीजें इस्लाम का फंडामेंटल हैं जिन पर कोई बहस नहीं हो सकती, लेकिन कट्टरपंथियों का इस्लाम का फंडामेंटल तय करने का पैरामीटर तो कहीं तय ही नहीं है। उनकी अराजक दुनिया में इस्लाम इतना जकड़न भरा और छुई-मुई है कि पहनने, खाने, बोलने से लेकर किसी मामले में मुसलमान को कोई आजादी नहीं है। हर मुसलमान उनका मुंह देखने के लिए मजबूर है। हालांकि यह अल्लाह ने जो हर आदमी को अक्ल की जो नेमत दी है उसको नकारने का प्रयास होने की वजह से एक कुफ्र से कम गुनाह नहीं है। इस्लाम के इन स्वयंभू झंडाबरदारों के इस हठधर्मी रवैये की वजह से ही पाकिस्तान की राजनीतिक बिरादरी को अब यह सोचना पड़ रहा है कि वह इनको नजरंदाज या बर्दाश्त करे इसकी सीमा क्या है। अगर यह सीमा पार कर चुकी है फिर भी वे प्रतिकार के लिए खड़े नहीं होते तो कहीं उनका वजूद ही न मिट जाए। इस्लाम दानिशमंदों का मजहब है। जाहिलों ने अगर इसका ठेका संभाल लिया तो मुस्लिम समाज का भस्मासुरी अंत तय हो जाएगा। अगर दो मुल्लाओं में इस बात पर जंग शुरू हो गई कि इस पहलू में इस्लाम के मुताबिक यह सही है और दूसरे ने कहा कि वह सही है तो अपने ऊपर के किसी मर्मज्ञ से समाधान बूझने की बजाय बंदूकों के जोर पर यह तय किया जाएगा कि इस्लाम की असली समझ किसको है। इस लड़ाई में जो जाहिल जीतेगा वह दूसरे की बात मानने वाले अकीदतमंदों को भी नहीं बख्शेगा भले ही वह अमल में कितने भी सच्चे मुसलमान क्यों न हों। इस अंधेरगर्दी पर तटस्थ रहना इस्लाम के प्रति निष्ठा में कितनी बड़ी खोट का कारण बन जाएगा यह समझदारी पाकिस्तान के दानिशमंद तबके में घर करने लगी है।

लोकतंत्र की हवा लगने के बाद पाकिस्तान का बुर्जुआ वर्ग जिस सामाजिक वातावरण का अभ्यस्त हो गया है उसमें इस तरह के पागलपन की व्यवस्था की कल्पना तक उसके लिए असह्य है इसलिए आतंकवाद का प्रतिकार पाकिस्तानी समाज के अंदर से शुरू होने लगा है जिसे हिंदुस्तान का हर समझदार आदमी बल देना चाहेगा क्योंकि पड़ोसी को तरक्की और अमन का चस्का खुद की हिफाजत की सबसे बड़ी गारंटी है। हालांकि हिंदुस्तान में माहौल इस समय कुछ विचित्र सा है। इस समय तो अपने देश की भलाई के लिए भी किसी मामले में पाकिस्तान को शुभकामना व्यक्त करना खतरे से खाली नहीं रह गया।
इसके अलावा एक और बात यह हुई कि पाकिस्तान में सेना को छोड़कर हर कोई यह मानने लगा है कि कश्मीर को ताकत के बलबूते हिंदुस्तान के चंगुल से पाकिस्तान कभी नहीं छुड़ा सकता। इसके बाद हिंदुस्तान से बैर को अगर वहां के लोग निरर्थक मानने की स्थिति में पहुंच गए हों तो यह एक बहुत ही शुभ संकेत है। बशर्ते कि भारत में भी इसके लिए सदाशय माहौल बना रहे।

मुद्दा सर्जिकल स्ट्राइक पर छिड़ी बहस का है। राष्ट्रीय सुरक्षा के संवेदनशील मामले में बिग बी की फिल्म की फंतासी को सच मानने का कोई औचित्य नहीं है। सर्जिकल स्ट्राइक का महत्व एक प्रतीकात्मक कार्रवाई से और अधिक कुछ नहीं है। अगर इस स्ट्राइक ने कोई निर्णायक प्रभाव डाला होता तो काफी दिनों तक आतंकवादी दुस्साहस की घटनाओं पर विराम लग गया होता लेकिन बारामुला में सैन्य शिविर पर हमला, पंपोर की ईडीआई बिल्डिंग में 60 घंटे तक चला इनकाउंटर और इस लेख के जारी होने तक श्रीनगर के पास जकूरा में सीमा सशस्त्र बल की कानवाई पर आतंकवादी आक्रमण जिसमें एक जवान के शहीद होने और 7 के जख्मी होने की खबर आ चुकी थी। यह बताती हैं कि इसने केवल सरकार के पक्ष में मनोवैज्ञानिक माहौल बनाने में ही भूमिका अदा की है। शत्रु के हौसलों पर इसका कोई असर नहीं है। दूसरी ओर सरकार और उसके समर्थक हैं कि उन्हें देश की वास्तविक सुरक्षा से ज्यादा फिक्र अपने नेता की हीरोशिप को मजबूत करने की है, जिसकी वजह से वे सिक्योरिटी फ्रंट पर देश के ही प्रदर्शन को नहीं दुनिया के किसी भी देश के प्रदर्शन से ज्यादा बड़ा कारनामा इसे साबित करने के लिए जूझे पड़े हैं। हालांकि बांग्लादेश की लड़ाई में 5 हजार भारतीय सैनिकों के सामने कारगर रणनीति की वजह से 90 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सेना को सरेंडर के लिए मजबूर किया जाना युद्ध इतिहास की इतनी बड़ी परिघटना है जिसकी मिसाल ढूंढना मुश्किल है।

अगर इतिहास में बहुत पीछे तक न भी जाया जाए तो ऑपरेशन कारगिल का कारनामा भी भारतीय सेना के शौर्य का ऐसा नमूना है कि जब भी उसका उदाहरण दिया जाएगा सारी दुनिया दांतों तले उंगली दबाकर उसे सुनने-पढ़ने और देखने के लिए प्रस्तुत होगी। पाकिस्तानी सेना की सरपरस्ती में खूंखार आतंकवादी इतनी ऊंची चोटी पर काबिज हो चुके थे कि कभी यह कल्पना नहीं की जा सकती थी कि यहां से अब उनको आसानी से खदेड़ा जा सकेगा, लेकिन भारतीय सेना के बहादुर युवा अफसरों ने बलिदान का तांता लगा दिया और एक के बाद एक कई बेशकीमती भारतीय सैन्य अफसरों के शहीद होने के बावजूद कारगिल को खाली कराने के जारी रहे अभियान ने दुश्मन सेना की खाट खड़ी कर दी। यह भी पूरी दुनिया के लिए ऐसा कारनामा है जिसे किसी अन्य देश की सेना के लिए मौत से इस तरह अपने वतन की इज्जत के लिए आंखें लड़ाने की दिलेरी दिखाना असंभव कार्य की तरह है। फिर भी सर्जिकल स्ट्राइक को महिमामंडित करने में राष्ट्रीय हित निहित होने की वजह से किसी को ऐतराज नहीं था। अरविंद केजरीवाल और पी. चिदंबरम को भी नहीं। केजरीवाल लोगों की उम्मीदों पर अपने आपको खरा साबित करने में विफल रहे हैं, यह एक बात है लेकिन इस मामले में उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया को पीओके में ले जाकर जिस तरह से पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सर्जिकल ऑपरेशन के बारे में गुमराह किया है और जिसका असर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की खबरों में झलका है उसके मद्देनजर बहुत अच्छा होगा अगर सरकार सर्जिकल ऑपरेशन का कोई पुख्ता सबूत अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने पेश कर देने की पहल करे। इस पर किंतु-परंतु किए जाने में भी कोई कोई दिक्कत नहीं है। सेना ने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो पेश करना सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं होगा तो केजरीवाल और उनकी गुजारिश से इत्तफाक रखने वाले लोगों को सेना की इस दलील से कोई गुरेज नहीं हुआ। बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी लेकिन जिस तरह से सरकार समर्थक एक तबके ने बात का बतंगड़ बनाकर केजरीवाल के लिए सोशल मीडिया में अशोभनीय पोस्टिंग की वह बेहद आपत्तिजनक है।

राष्ट्रभक्ति का दंभ भरने वाले सरकार समर्थक युवाओं को भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे इस धरा पर पैदा हुए महान क्रांतिकारियों से सीख लेनी चाहिए, जिनका गांधीजी ने एक तरह से बड़ा नुकसान किया। फिर भी उन्होंने बापू के प्रति राष्ट्रीय श्रद्धा का अनुभव करते हुए उनका इतना शालीनतापूर्वक प्रतिवाद किया कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता का सिर ऊंचा हो गया लेकिन जो लोग यह पोस्टिंग डालते हों कि केजरीवाल अपने असल बाप की पैदायश हैं इसे साबित करने के लिए अपने मां-बाप के संबंधों का वीडियो पेश करें, तभी सेना से ऐसी मांग करें। सेना को बेवजह राजनीतिक विवाद में घसीटना और असहमति के लिए इतना भद्र हो जाना यह राष्ट्रीय साख का अपमान है जो कोई राष्ट्रवादी किसी तरीके से नहीं कर सकता।सरकार समर्थक बहुत उतावले हैं कि उनकी सरकार को हर मामले में बढ़-चढ़कर श्रेय मिले इसलिए वे मर्यादाएं लांघने में किसी भी हद तक बढ़ जाने की गलती कर रहे हैं लेकिन समस्या यह है कि चुनाव के पहले यह भाजपा का ही दिया हुआ इंप्रेशन है कि अगर उसकी सरकार आई तो पाकिस्तान को ताड़-फाड़ जवाब मिलेगा। अगर हिंदुस्तान के एक जवान की जान गई तो पाकिस्तान के हजार सैनिक मारे जाएंगे। इसलिए मौजूदा सरकार के लिए एक अव्यवहारिक कसौटी बन गई है जिस पर अपने को खरा साबित करने की कठिन चुनौती का सामना उसे करना पड़ रहा है। पहले की सरकार में लोग मानसिक रूप से तैयार थे कि आतंकवाद से लंबे समय तक लड़ना पड़ेगा इसलिए तुरंत कोई नाटकीय और असाधारण जवाब पाकिस्तान को दिए जाने की अपेक्षा भी लोगों को नहीं रहती थी लेकिन मोदी सरकार के साथ ऐसा नहीं है इसलिए उरी हमले के बाद सरकार पर दबाव का जो माहौल बना वह स्वाभाविक था लेकिन सरकार ने इस दबाव को न्यूट्रल करने का जो हथकंडा अपनाया उसे विवेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता इसलिए लोग यह सवाल पूछेंगे ही कि असाधारण कार्रवाई के दावे में क्या कोई झोल है जिसकी वजह से आतंकवादी हमले नहीं थम पा रहे। एक झटके में आतंकवाद कंट्रोल हो जाने की जो कृत्रिम आशा सरकार ने अपने हथकंडे से लोगों में जमा दी है उसके कारण उसे आगे चलकर लोगों के मोहभंग जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

जबकि एक सच यह भी है कि इस सरकार ने पाकिस्तान को रक्षात्मक होने के लिए मजबूर करने के मामले में जो सफलता हासिल की है वह बहुत बड़ी उपलब्धि में शुमार होगी। सार्क सम्मेलन के निरस्त होने से पाकिस्तान का मनोबल बहुत बुरी तरह टूटा है और यह अपने आप नहीं हुआ यह मौजूदा सरकार के असाधारण कूटनीतिक कौशल का नतीजा है। अगर आज हाफिज मुहम्मद सईद जैसे कुख्यात आतंकवादी को अपनी मौत का खतरा सताने लगा है तो यह अपने आप नहीं हुआ। सईद भारतीय सेना की संभावित कार्रवाई से नहीं डर रहा है क्योंकि वह पाकिस्तान में इतने अंदर है कि भारतीय सेना आसानी से उस तक नहीं पहुंच सकती लेकिन इस सरकार ने पाकिस्तान के जनमत को इस तरह उद्वेलित कर दिया है कि हाफिज सईद को लग रहा है कि कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान का अवाम ही उसे खदेड़ने की ठान ले। सेना के वर्चस्व को लेकर भी पाकिस्तान में जिस तरह की मुखालफत तैयार हो चुकी है उसकी वजह से देर-सवेर सेना को अपने तरीके से देश को हांकने की छूट खत्म होना तय समझा जाना चाहिए। मोदी सरकार इसका गुणगान कराए या न कराए लेकिन इसका श्रेय और उसे मिलेगा ही क्योंकि आसार ऐसे हैं कि पाकिस्तान की आंतरिक उठापटक के जो नतीजे सामने आएंगे उससे वहां के विघ्नसंतोषी तत्वों को स्थायी शिकस्त मिलेगी।
इतने आशाजनक माहौल का मजा देश में ही कश्मीर नीति या पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई को लेकर गृहयुद्ध छिड़े होने का इंप्रेशन देकर खराब करने की चूक नहीं की जानी चाहिए। व्यर्थ के विवादों का घटाटोप न छा पाए इसकी जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की ज्यादा है क्योंकि कुल मिलाकर पाकिस्तान से निपटने के मामले में जितना आश्वस्तकारी माहौल इस समय नजर आ रहा है उतना हाल के दशकों में पहले कभी नहीं रहा था।