body-of-ravi-sisodia-one-of-the-19-people

कुछ बातें यूँ ही होती हैं जो एक बार होतीं हैं और कुछ बातें क्युँ होती हैं जो बार बार होतीं हैं ? ज़ाहिर सी बात है कि जो बातें बार बार होतीं हैं वह यूँ ही नहीं होतीं बल्कि की जातीं हैं।

भगवा गुंडो के गिरोह के जन्म से आज तक इसी भारत में “तिरंगे” और “राष्ट्रगान” का जितना अपमान किया गया है उतना इस देश में किसी प्रतीक चिन्ह का नहीं किया गया है। इसके बावजूद कि तिरंगा इस देश का “राष्ट्रीय ध्वज” है आन बान शान का प्रतीक है , इसके बावजूद कि इसी तिरंगे के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर देने वाली सेना के शौर्य के कामों को अपने 56″ के नपुंसक सीने पर तमगा लटकाने का काम किया जा रहा है , इसके बावजूद कि तिरंगे के लिए लाखों लाख लोगों ने अपनी जान देकर शहादत पाई है , इसके बावजूद कि पूरी दुनिया में कहीं भी लहराता तिंरगा भारत की आन बान और शान की गवाही देता है , उसी तिंरगे में अखलाक के हत्या के एक “आरोपी” के शव को लपेटा जाता है।

भगवा गुंडों के द्वारा यह यूँ ही नहीं हो गया बल्कि ऐसा जानबूझकर किया गया और किया जाता रहा है , दरअसल जब हृदय में किसी भी चीज़ के प्रति सम्मान ना हो तो उसका अपमान होता ही रहता है क्युँकि सम्मान होना ही उस अपमान होने को स्वयं रोकता है।

देश के स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों और आंदोलनकारियों तथा स्वतंत्रता सेनानियों से तिरंगे की अहमियत पूछिएगा ? फफक पड़िएगा , पर जिनका इतिहास ही अंग्रेज़ो की गुलामी और जासूसी का रहा हो वह “तिरंगे” का सम्मान क्युँ करेंगे और कैसे करेंगे ? सम्मान स्वतः होता है कराया नहीं जाता। आगे देखिए कैसे ? सिद्ध करता हूँ ।

इतिहास गवाह है कि देश की स्वतंत्रता के समय , जब तिरंगे को “राष्ट्रीय ध्वज” बनाने का निर्णय लिया गया तो इन्हीं भगवा गुंडो के दादा परदादाओं ने तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज बनाने का विरोध किया था , तिरंगे को पैरों तले कुचला और जलाया गया था। देखिए वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह का यह लेख।

http://old.bhadas4media.com/article…/8810—1948——-.html

इन्हीं भगवा गुंडों के हृदय में बसते नागपुर मुख्यालय स्थित “राष्ट्रीय स्वयं सेवक” संघ के कार्यालय में देश की आज़ादी के 55 सालों तक(सन् 2002) “तिरंगा” नहीं फहराया जाता रहा है , और यहीं तक नहीं नागपुर स्थिति राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय पर तिरंगा फहराने के प्रयास में दो लोगों पर इसी संघ ने मुकदमा दर्ज कराया और 12 साल तक मुकदमा लड़ा , सोचिएगा ज़रा कि यह कितने बड़े ढोंगी हैं कि जलते सुलगते काश्मीर के लालचौक में तिरंगे को तो फहरा कर अपनी राजनीति करना चाहते हैं पर अपने बाप दादाओं के पैतृक निवास “संघ मुख्यालय” पर तिरंगा फहराने पर दो लोगों पर मुकदमा दर्ज करा कर 12 वर्ष तक उनको प्रताणित करते हैं । तब ना मुरली मनोहर जोशी की देशभक्ति जगती है ना अटल आडवाणी की।

यही नहीं देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा मुंबई के घोषित “तानाशाह” और आतंक का पर्याय रहे “बाल ठाकरे” से 6 वर्षों तक वोट देने के अधिकार को छीन लिया गया , श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट चीख चीख कर दंगों में “गुंडे” की संलिप्तता को स्वीकार कर रही है , ध्यान दीजिए कि किसी भी नागरिक का प्रथम अधिकार “वोट” देकर देश में व्यवस्था को चलाने वाली अपनी पसंद की सरकार को चुनना है जिसे उच्चतम न्यायालय ने बाल ठाकरे से छीन लिया था , ऐसे बदनाम और देश की व्यवस्था को जीवन भर अपने जूते की नोंक पर रखने वाले “ठाकरे” के मरने के बाद उसकी लाश को “तिंरगे” में लपेटकर जब तिरंगे का अपमान किया जाता है तो देश के भगवा गिरोह तो छोड़िए तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग भी चूँ नहीं बोलते।

कोई बता सकता है कि क्युँ ? ठाकरे शहीद सैनिक था ? या किसी संवैधानिक पद पर था ? मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी और के मरने पर उसके शव को तिंरगे में लपेटने का कोई नियम है पर यहाँ सब चुप रहे , तथाकथित धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस और एनसीपी की सरकार द्वारा महाराष्ट्र में राजकीय सम्मान के साथ देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा सजायाफ्ता घोषित एक व्यक्ति का अंतिम संस्कार किया गया।

माफ कीजिएगा , यदि आप दाऊद इब्राहीम और भारत के राष्ट्रीय पशु की खाल पर बैठकर मुंबई में अपनी समानांतर सरकार चलाने वाले ठाकरे में अंतर करते हैं तो आप दोगले हैं, दोनों ने देश के कानून को तोड़ा और लोगों को मारा , बस तरीका अलग अलग था। बाकी कौन देश के विरुद्ध है और कौन “हिन्दुत्व का गौरव” यह प्रमाणित किया जा चुका है। यह देश की व्यवस्था का दोगलापन ही है , और नहीं तो मुंबई दंगों के लिए सरकार द्वारा ही गठित श्रीकृष्ण आयोग को लागू करवाइए , ये चिता के सिंहासन पर बैठने वाले गुंडे की बची खुची औलादें चूहे की तरह फाँसी पर चढ़ते नजर आएंगी ।

यह भी केवल नहीं है , राजस्थान के राज्यपाल और उच्चतम न्यायालय का सजायाफ्ता मुजरिम कल्याण सिंह का राष्ट्रगान को छोटा करने और उसपर घटिया टिप्पणी हो , उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और घाटी संघी राम नाईक के द्वारा राष्ट्रगान को बीच में रोका जाना हो , देश के प्रधानमंत्री द्वारा कम से कम 5 बार राष्ट्रीय गान और तिरंगे का किया गया अपमान हो , 1- योग दिवस पर तिरंगे द्वारा नाक मुँह पोछना , 2-अमेरिका में तिरंगे पर हस्ताक्षर करना ,3- जापानी प्रधानमंत्री से मिलते समय तिरंगे का उल्टा लटकना ,4- रूस में राष्ट्रगान के समय ही चल देना और 5- तिरंगे को चार रंग में बदलने का सुझाव देना , इसके अतिरिक्त अन्य भगवा संघिओं के बार बार के तिरंगे के अपमान की घटनाएँ , यह सब यूँ हीं नहीं हो जातीं , बल्कि या तो जानबूझकर की जाती हैं या तिरंगे के प्रति सम्मानबोध ना होने के कारण होती हैं । सम्मानबोध ना होने का भी कारण है , मेरा मानना है कि शहीद सैनिकों के अतिरिक्त तिरंगे में किसी के भी शव को लपेटना पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए क्युँकि कल मोदी के शव को भी लपेटा जाएगा जिनके इतिहास को दुनिया जानती है। और कम से कम भगवा गुंडे तो इस योग्य नहीं ही हैं , आइए देखते हैं कि क्युँ ?

“हिंदुत्व’ शब्द को गढ़ने वाले सावरकर ने तिरंगे और संविधान के विपक्ष में दो तर्क प्रस्तुत किये थे जो उनकी ‘हिस्टोरिक स्टेटमेंट्स बाइ वीडी सावरकर’ नाम की किताब में संकलित हैं। उनके अनुसार भारतीय संघ या फिर ‘तथाकथित’ संविधान सभा अंग्रेजों द्वारा गठित की गई थी और इसका चुनाव देशवासियों ने राष्ट्रीय स्तर के जनमत संग्रह के माध्यम से नहीं किया था। इसके अलावा एक और कारण था भारत संघ का जिक्र उन्हें ‘भारत की एकता के टूटने’ की याद दिलाता था।

सावरकर आगे कहते हैं, ‘नहीं, हमारी मातृभूमि और देवभूमि हिंदुस्तान जो कि इंडस से लेकर सिंधु तक अविभाजित और अविभाज्य है का आधिकारिक ध्वज एक कृपाण और कुंडलिनी से परिपूर्ण भगवा ध्वज के अलावा और कुछ नहीं हो सकता… हिंदुत्व किसी भी सूरत में इस अखिल भारतीय भगवा ध्वज के अलावा किसी अन्य झंडे के सामने अपना सिर नहीं झुका सकता।’

कुछ इसी से मिलते जुलते विचार श्री गुरूजी के उपनाम से जाने जाने वाले एमएस गोलवलकर के भी थे। वे संघ के दूसरे सरसंघचालक और भारत में अभी तक सक्रिय हिंदुत्व आंदोलन के प्रेरणास्रोत रहे हैं। गोलवलकर ने न सिर्फ भारतीय तिरंगे के विचार का खुलकर विरोध किया बल्कि उनका तो भारतीय संविधान में भी विश्वास नहीं था।

अपनी किताब ‘विचार नवनीत’ जिसे अंग्रेजी में ‘बंच आॅफ थाट्स’ के नाम से अनुवादित किया गया है, में गोलवलकर कहते हैं, ‘हमारे नेताओं ने हमारे लिये एक नया ध्वज चुनने का फैसला किया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह हमारी समृद्ध विरासत को अस्वीकृत करने और बिना सोचे-समझे दूसरों की नकल करने का एक स्पष्ट उदाहरण है।’

वो आगे लिखते हैं, ‘कौन इसे सही और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण मानेगा ? यह सिर्फ एक जल्दबाजी में लिया गया राजनीतिक समाधान है। हमारा देश समृद्ध विरासत से भरपूर प्राचीन और महान देश है। क्या तब भी हमारे पास अपना एक झंडा तक नहीं है? बेशक हमारे पास है। तो फिर यह दिवालियापन क्यों?’

अब सोचिएगा जो मैं कह रहा हूँ कि भगवा गुंडो के बार बार तिरंगे के अपमान की वजह सावरकर और गोवलकर के सिद्धांत को साजिश के तहत एक चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना नहीं है तो ऐसे ही दुर्घटनावश आजादी के बाद इनसे कभी “भगवा झंडे” का अपमान क्युँ नहीं हुआ ? तिरंगे को हर किसी के कफन बनाने पर प्रतिबंध लगना ही चाहिए नहीं तो ठाकरे और अखलाक के हत्यारोपी के बाद चोर उचक्के भी कल तिरंगे में लपेटे जाएँगे।

सोचिएगा कि देश की आज़ादी के बाद तिरंगे और राष्ट्रगान के प्रति यही व्यवहार यदि मुस्लिम संगठन या मदरसे करते तो इस देश में क्या क्या हो जाता। सोचिएगा कि कुछ बातें यूँ हीं क्युँ बार बार होती हैं । फिर भी यह देशभक्त हैं ।