kashmir-and-uri-attackआज (18 सितंबर को) कश्मीर के उरी में सेना के एक शिविर में घुस कर आतंकवादियों ने हमारी सेना के सत्रह जवानों की हत्या कर दीं। कहते हैं कि पिछले लगभग पच्चीस सालों में कश्मीर में आतंकवादियों के हमले की यह अपने प्रकार की एक सबसे बड़ी घटना है जिसमें इतनी बड़ी संख्या में सेना के जवान मारे गये।

यह सच है कि कश्मीर के अभी के हालात को देखते हुए इस प्रकार के हमलों का होना किसी भी दृष्टि से अनपेक्षित नहीं कहा जा सकता है। और, इसीलिये जब भी कोई जिम्मेदार व्यक्ति ऐसे हमलों पर कुछ ऐसा भाव प्रदर्शित करता है कि जैसे वह इस हमले से विस्मित है, उसे विश्वास नहीं हो रहा है, तो हमारा सबसे पहला सवाल है कि आखिर उसकी ऐसी मासूम प्रकार की प्रतिक्रिया की क्या वजह है ? क्या वे सचमुच यह विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि कश्मीर में ऐसा हो सकता है ?

सच कहा जाए तो इस प्रकार का विस्मय, या हम कहेंगे कि क्षोभ का प्रदर्शन भी एक प्रकार की थोथी, रटी-रटाई राजनीतिक पुनरुक्ति भर है, कश्मीर के ठोस सच से इंकार करने वाली बातों की पुनरुक्ति। यह कुछ इस प्रकार के विडंबनापूर्ण कथन की तरह है कि ‘हम जानते हैं कि कश्मीर के लोग भारत को चाहते हैं, फिर भी हम यह यकीन करते हैं कि वे भारत को चाहते हैं।’ जिस बात को हम जानते हैं, उसी पर फिर विश्वास करने की हमें क्यों जरूरत पड़ती है ? क्यों और कब किसी के अपने ज्ञान को विश्वास के सहारे की जरूरत पड़ती है ?

इसी सवाल पर आकर हमारे अंदर आज की मोदी सरकार की क्षमताओं के बारे में गहरे संदेह पैदा होने लगते हैं। ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह होने की वजह से ही उसके बारे में ज्ञान को आस्था का सहारा लेना पड़ता है। सचाई यह है कि इस सरकार का कश्मीर के बारे में कोई सही वस्तुगत आकलन नहीं है। आरएसएस और मोदी की विचारधारा से नि:सृत छिछले ज्ञान पर टिका होना ही इस मामले में इस सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी है जो इसे न सिर्फ कश्मीर, बल्कि पाकिस्तान के मसले से भी निपटने में पूरी तरह से असमर्थ बना दे रही है। यह सचाई के जरिये अपने ज्ञान की कमियों को दूर करने के बजाय अपने कुछ जड़-विश्वासों और आस्थाओं के सहारे उन्हें पूरा करना चाहती है।

मसलन्, बार-बार ऐलानिया तौर पर यह कहना कि हम पाकिस्तान को देख लेंगे, ईट का जवाब पत्थर से देंगे – इसका क्या मायने है ? शत्रु को काबू में रखने के लिये शक्ति के प्रयोग के भी अपने तरीके होते हैं – किसी भी सरकार को इसका एक सम्यक ज्ञान होना जरूरी है। आज के जमाने में तो इसमें और भी दिक्कतें और जटिलताएं हैं। सारी दुनिया की नजर आपके एक-एक कदम पर टिकी हुई है। अभी दो दिन पहले ही ‘एपिक’ चैनल पर सन् ‘71 के बांग्लादेश युद्ध के समय हमारी खुफिया एजेंसी रॉ की उपलब्धियों पर एक बहुत अच्छी डाक्यूमेंट्री दिखाई जा रही थी, जिसमें बताया गया था कि किस प्रकार पाकिस्तान सरकार के बिल्कुल सर्वोच्च स्तर के वार-रूम में होने वाली बातों को हमारी खुफिया एजेंसी साफ तौर पर सुन पा रही थी। कहा जाता है कि आज अमेरिका को तो दुनिया के चप्पे-चप्पे में होने वाली गतिविधियों का काफी पुख्ता अनुमान होता है। ऊपर से, भारत और पाकिस्तान, दोनों नाभिकीय शक्ति संपन्न देश है। इसको भी दुनिया का कोई देश कभी भूल नहीं सकता है, और हमें भी नहीं भूलना चाहिए।

ऐसे में शक्ति का प्रदर्शन शक्ति का प्रयोग न करने के लिये ही किया जा सकता है। जैसा कि हमने वाजपेयी सरकार के वक्त सन् 2001 में संसद पर आतंकवादी हमले के समय देखा था। तब एक बार के लिये सीमा पर सेना को पूरी तरह से सक्रिय कर दिया गया था। लेकिन मामला उसके आगे नहीं जा सकता था, और न गया ही। उसकी तुलना में, आज के समय में तो शक्ति के प्रदर्शन के बजाय उसकी प्रतीकात्मक उपस्थिति को ही सबसे अधिक कारगर माना जाता है। अर्थात, हमारी शक्ति सबके सामने है भी, और नहीं भी है। हाजिर भी है, नाजिर भी।

मोदी सरकार की आंतरिक कमजोरी यह है कि उसके पास शक्ति के इसप्रकार के प्रयोग की सूक्ष्म विचारधारात्मक तैयारियां या कौशल की सख्त कमी है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है मोदी जी की सारी दुनिया की यात्राओं के बाद भी राजनय के क्षेत्र में इस सरकार की तमाम प्रकट विफलताएं। यह सरकार किस प्रकार दुनिया के सामने खुद अपनी विश्वसनियता को खोने का कारण बन रही है, इसका सबसे ताजा उदाहरण है प्रधानमंत्री का 15 अगस्त का भाषण। इसमें उन्होंने बलूचिस्तान के सवाल को उठा कर अपनी ही हेठी के सिवाय क्या हासिल किया ? आज अमेरिका तक को बयान देकर कहना पड़ रहा है कि ‘बलूचिस्तान का मामला पाकिस्तान का अंदुरूनी मामला है’।

कश्मीर के विषय पर भी इस सरकार के दृष्टिकोण में गहरी राजनीतिक सूझ-बूझ के बजाय एक बहुत बड़ा तत्व फौजी बूटों और मूंछों से निकलने वाले तर्कों का होता है, जो इस पेशे की भाषा से सबसे आसानी से पैदा होते हैं। लेकिन असल में यह मसला फौज का जितना नहीं है, उससे बहुत ज्यादा अपने ही देश के एक राज्य, कश्मीर की जनता के साथ भारतीय राजसत्ता के संबंधों का मसला है। किसी भी वजह से यदि कोई सरकार अपनी ही जनता के खिलाफ युद्धरत नजर आने लगती है, तो वह न सिर्फ अपने शासन का औचित्य ही गंवा देती है, बल्कि अपने शासन को बनाये रखने की शक्ति को भी खोने लगती है।

इसीलिये हर सरकार का यह एक प्रमुख दायित्व होता है कि वह ऐसी हर संभव कोशिश करें, जिससे वह कभी भी अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध करती हुई न दिखाई दें। इस बात का दुनिया में एक सबसे बड़ा उदाहरण चीन में 4 जून 1989 की तियेनमान स्क्वायर की घटना है। कहते हैं कि उस घटना में चीन की सेना के हाथों भारी तादाद में लोगों की जाने गई थीं। लेकिन आज तक दुनिया में किसी के पास भी उस घटना की एक तस्वीर तक नहीं है। जिस रात वह घटना घटी, चीनी सरकार ने सुबह होने के पहले ही तियेनमान स्क्वायर को इस तरह साफ-सुथरा और सामान्य बना दिया कि वहां आने-जाने वाले किसी को भी इतनी बड़ी घटना का एक चिन्ह भी नहीं मिल सकता था। यह इसीलिये किया गया क्योंकि चीन की सरकार इसे अपने शौर्य के प्रदर्शन का विषय बना कर अपनी ही जनता के खिलाफ खुद को युद्धरत नहीं बताना चाहती थी। वहां की सरकार का एक भी आदमी उस घटना का भूल से भी स्मरण नहीं करता है। इस बात का सीधा संबंध वहां की सरकार की राजनीतिक समझ से जुड़ा हुआ है।

लेकिन हमारे यहां तो स्थिति बिल्कुल उल्टी है। हमारे गृहमंत्री से लेकर इनके तमाम लोग आम तौर पर जिस प्रकार के बयान देते हैं, उनसे लगता है कि वे कश्मीर में जैसे कोई युद्ध लड़ रहे हैं। इसकी वजह है इस सरकार की विचारधारा, जो वस्तुथिति के ज्ञान के बजाय ‘हिंदुत्व’ के शौर्य-प्रदर्शन पर सबसे ज्यादा विश्वास करती है। कश्मीर की स्थिति के बारे में इनके छिछले ज्ञान और इस प्रकार की नाना आस्था और विश्वास की बातों से जाहिर होने वाली उनकी कमियां ही आज कश्मीर की, और पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों की स्थिति को भी और ज्यादा जटिल बना दे रही हैं। वे इसमें भारत के दूसरे हिस्सों में अपनी राजनीति का जो लाभ देखते हैं, वह भी इनका कोरा भ्रम ही है। देश के किसी भी अंश की जनता का दुश्मन बन कर आप आम जनता की सहानुभूति का पात्र नहीं बन सकते।

कहना न होगा, एक ओर पाकिस्तान और उसके द्वारा समर्थित आतंकवादियों के हत्यारे षड़यंत्र, और दूसरी ओर इस सरकार की बचकानी राजनीतिक और कूटनीतिक समझ – इन दोनों की कीमत आज हमारे पूरे देश को चुकानी पड़ रही है।
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