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अक्सर कुछ लोग बार बार बताते हैं कि नालंदा विश्वविद्यालय जो कि बौद्ध धार्मिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केन्द्र हुआ करता था उसे एक मुस्लिम आक्रान्ता बख्तियार खिलजी ने 1199 ईस्वी मे नष्ट कर डाला था, वैसे मैं इस बात पर तो जोर नहीं देता कि बख्तियार खिलजी दूध का ही धुला था और उसके द्वारा नालंदा को नष्ट किया जाना बिल्कुल असम्भव ही हो,एक सम्भवना है कि बख्तियार खिलजी इस्लाम की शिक्षाओं पर अमल से ज्यादा अपने राज्य प्रसार को महत्व देता हो …। पर मेरे पास ये बात मानने का कोई कारण नहीं है कि इतिहास के सारे धर्म विद्रोही मुस्लिम ही क्यों बताये जाते हैं, और अन्य धर्म वालों को पाप रहित किस कारण समझ लिया जाता है ??

इस्लामी शरीयत मे युद्ध के समय भी शत्रु पक्ष के स्त्रियों, बच्चों व बूढ़े लोगों, सन्यासियों, खेत खलिहान, फलदार पेड़ों, घरों, पानी के स्रोतों, पालतू जानवरों आदि को जलाने या काटने मारने आदि किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाने की सख्ती से मनाही की गई है (इस्लाम के पहले खलीफा हजरत अबू बक्र रज़ि. के मुस्लिम सेनापतियों को दिए निर्देशों के आधार पर )।
वहीं वेद निन्दक को चीर, फाड़, काट डालने व जला कर भस्म कर डालने की शिक्षा वेद मे दी गई है, तो फिर ये विश्वास कैसे कर लिया जाता है कि ऐसा धार्मिक निर्देश होने के बावजूद हिन्दुओं ने तो नालंदा को नष्ट नहीं किया जो वेद निन्दक बौद्ध लोगों की वेद निन्दक शिक्षा का केन्द्र था,

लेकिन इस्लाम मे धार्मिक निषेध के बावजूद मुस्लिमों ने उसे जला डाला ??
हमें मालूम है कि भारत में ज्ञात इतिहास मे सबसे पहले जो शासक थे वे जैन और बौद्ध थे न कि हिन्दू, । बहुसंख्यक जनता भी हिन्दू की बजाय बौद्ध और जैन ही थी … बौद्ध पांडुलिपियो से ज्ञात होता है उस समय भारत मे हजारों की संख्या मे बौद्ध धर्म स्थल हुआ करते थे असंख्य बौद्ध ग्रंथ पाए जाते थे,।
हमने ये भी पढ़ा है कि बौद्ध और जैन शासन को भारत से जिसने मिटा दिया वो हिन्दू शासक थे, वे मुस्लिम नहीं थे … । 187 ईसा पूर्व मे वैदिक धर्मी पुष्य मित्र शुन्ग ने बौद्ध शासक की हत्या कर के न सिर्फ शासन पर अधिकार कर लिया बल्कि उस ने पूरे राज्य मे बौद्धो की हत्याएं करवाई, और अशोक के बनवाये 84000 बौद्ध स्तूप तुड़वा डाले…. बौद्ध पुस्तकालयों को भी पुष्यमित्र ने बड़ी मात्रा मे जलवा डाला, आज भी बौद्ध पाण्डुलिपियो मे पुष्यमित्र के अत्याचारों की दास्तान लिखी हुई हैं ।

स्वामी दयानंद अपनी किताब “सत्यार्थ प्रकाश” मे लिखते हैं …” दस वर्ष के भीतर सर्वत्र आर्यावर्त देश मे घूम कर जैनियो का खण्डन और वेदो का मण्डन किया गया । परंतु शंकराचार्य के समय मे जैन विध्वंस अर्थात् जितनी मूर्तियां जैनियो की निकलती हैं, वे शंकराचार्य के समय मे टूटी थीं, और जो बिना टूटी निकलती हैं , वे जैनियो ने भूमि मे गाड़ दी थीं कि तोड़ी न जाएं ॥ वे अब तक कहीं कहीं भूमि मे से निकलती हैं ।
[ सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 11, शंकराचार्य का अध्याय ]… सन् 1038 के समय चोल वंश के राजेन्द्र चोल ने हर बौद्ध देश पर आक्रमण कर के उनपर कब्जा कर लिया जिनमें रूहमा (वर्तमान बंगाल) से लेकर जावा, सुमात्रा, मलाया और श्रीलंका तक शामिल थे ।

सबसे महत्वपूर्ण बात कि इसी राजेन्द्र चोल ने मगध के तत्कालीन बौद्ध शासक महीपाल को पराजित कर के उसका राज्य अपने अधीन कर लिया था, नालंदा इसी मगध राज्य मे था फिर आप मुझे नालंदा के सुरक्षित रह जाने का कोई ठोस कारण बता दीजिए न मान्यवर ??

खैर जाने दीजिए, मैं आपको मुस्लिमों के भारत का शासक बनने के समय और बाद तक की स्थिति के बारे मे बताता हूँ …. बौद्ध और जैन धर्मस्थल और साहित्य तो मुस्लिमों के भारत मे आने से बहुत पहले ही नष्टप्राय हो चुके थे, हां हिंदू धार्मिक साहित्य यानी चारों वेद, उपनिषद, रामायण के अनेक संस्करण, महाभारत, और अनेकों पुराण आदि प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध थे , और अनेकों हिन्दू मन्दिर देश भर मे मौजूद थे जिन मन्दिरो और धार्मिक साहित्य को मुस्लिम चाहते तो नष्ट कर के अपने धर्म “इस्लाम” के प्रचार का मार्ग प्रशस्त कर सकते थे .पर मुस्लिमों के उत्तर भारत मे पहले शासक यानि मोहम्मद गौरी के समय से ही मुस्लिम शासकों ने सर्वधर्म समभाव की नीति अपनाई थी और गौरी ने अपने सिक्को पर हिन्दू देवी लक्ष्मी की आकृति उकेरवाई थी

एक भाई साहब कहते हैं कि मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं का तलवार के बल पर जबरन धर्म परिवर्तन करवाए… देख रहा हूँ कि आगरा की घटना के बाद “जबरन धर्म परिवर्तन” के मामले पर भाई लोग कुछ ज्यादा ही आत्मरक्षात्मक मुद्रा मे आ गए हैं, और मौका बेमौका, मांगे बेमांगे जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर सुने सुनाए, पिटे पिटाए तर्क दिए डाल रहे हैं …।
लेकिन न तो ये भाई लोग इस्लाम को समझते हैं कि जो एकमात्र ऐसा धर्म है जिसमें जबरन धर्मान्तरण की मनाही है … न हिन्दू धर्म त्यागकर मुस्लिम बन गए हमारे पूर्वजों के बारे मे ये भाई कुछ जानते हैं … बस हिसाब बराबर करने को कुछ भी बोल देते हैं । करो बराबर किसने रोका है फिर भी सिमट ही रहे हो ना !!!
खैर आपको इतिहास से इतना तो जानना चाहिए कि भारत के मुस्लिम शासकों की राजनीति क्या हुआ करती थी …. जैसा कि मैंने बताया कि धर्म के प्रचार प्रसार को लेकर इस्लाम कभी धर्मातुर होना नहीं सिखाता, इतिहास के कुछ तथ्यों के गलत अर्थ लगाकर भारतीय मुस्लिम शासकों पर जबरन धर्मान्तरण के आरोप यूं ही गढ़ लिए गए हैं … ।
लेकिन जब भारतीय मुस्लिम शासकों का इतिहास पढ़ें तो पता चलता है कि मुस्लिम शासकों ने किसी भी अन्य धर्म के शासक की अपेक्षा सबसे ज्यादा खुले दिल से दूसरे धर्मों के रीति रिवाजों को न सिर्फ आज़ादी दी बल्कि खुद उन रीति रिवाजों मे खुलकर भाग भी लिया,।

तुगलक ने जमकर होली खेली तो मुगलों ने दीवाली, और पारसी त्योहार नवरोज़ जमकर मनाए… अकबर तो बाकायदा अपने महल मे लक्ष्मी गणेश की पूजा भी करवाता था, और इस्लाम मे अनुमति न होने के बावजूद पूजा मे भाग भी लेता था ..अरे भाई जोधा बाई जैसे आई थी अकबर के महल मे वैसे ही तो रहती थी न ……….एक लल्ला भी जना शेखू !! ……. बहरहाल …!!
मोहम्मद गोरी ने अपने राज्य के सिक्कों पर देवी लक्ष्मी की आकृति उकेरवाई, तो अकबर ने राम और सीता जी की अवध और आन्ध्र के नवाबों, रूहेलखण्ड के शासकों, टीपू सुल्तान व सभी मुगल बादशाहों ने कई हिन्दू मन्दिरो व अन्य धर्मों के धर्मस्थल बनवाने मे भरपूर सहयोग दिया … और मुगलों ने हिंदू धार्मिक साहित्य, जैसे रामायण, महाभारत, गीता आदि का तुर्की और फारसी आदि मे अनुवाद कर के उसे देश विदेश तक पहुंचाया…. कहाँ गया मुस्लिमों का धर्म को लेकर पागलपन ???

आज भारत मे इतनी भारी संख्या मे हिंदू इसीलिए हैं, क्योंकि 800 साल के अपने शासनकाल मे मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं या अन्य धर्मावलम्बियों को धर्मान्तरण के लिए कभी मजबूर नहीं किया …॥हां इसी मुस्लिम शासनकाल मे हम जैसे अनेकों हिन्दुओं ने इस्लाम स्वीकार किया था तो उसके पीछे हिंदू धर्म की जटिल जाति व्यवस्था यानी मनुस्मृति के बरअक्स इस्लाम की वैश्विक बंधुत्व की भावना का सम्मोहन था, मुस्लिम संतों का प्रभाव था, और इस्लाम की व्यावहारिक शिक्षाओं के प्रति आकर्षण था …. न कि किसी तलवार का भय…!!!

मुस्लिमों ने किसी गैरधर्म की पवित्र पुस्तकों को नष्ट किया हो ऐसा कहीं लिखा नहीं मिलता उल्टे इन्हीं मुसलमानों ने दूसरे धर्म (हिन्दू धर्म, क्योंकि बौद्ध साहित्य उस समय भारत मे न के बराबर उपलब्ध था ) की धार्मिक किताबों का विदेशी भाषाओं (फारसी तुर्की आदि) मे अनुवाद कर के भारतीय धर्म के प्रचार प्रसार मे सहयोग ही किया …। मुगलकाल मे ही महाभारत का तुर्की और फारसी मे नकीब खान और बदायूंनी द्वारा अनुवाद किया गया, बदायूंनी ने रामायण का भी फारसी मे अनुवाद किया । हरिवंश पुराण का मौलाना शेरी ने, भगवद् गीता का दारा शिकोह ने, राज तरंगिणी का मुल्ला शेख मुहम्मद ने अनुवाद किया …। इसके अतिरिक्त सिंहासन बत्तीसी, नल दमयंती, पंचतन्त्र और लीलावती का भी तुर्की फारसी आदि मे मुगलकाल मे ही अनुवाद किया गया जिन्होंने विदेशों मे भारतीय संस्कृति का विज्ञापन करने का काम किया था ॥ दूसरी ओर इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि तुलसीदास जी ने रामचरित मानस, और मीराबाई व सूरदास ने कृष्ण भक्ति के पद मुगलकाल व मुस्लिम शासकों के शासन के भीतर ही लिखे, जिनका धार्मिक तानाशाही के दौर मे लिखे जाना और सुरक्षित रह जाना बिल्कुल असम्भव था,…।

फिर मुस्लिमों के आने से पहले के अनेकों मन्दिर जैसे कैलाश मन्दिर, खजुराहो के मन्दिर, कोणार्क का सूर्य मन्दिर, भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर, पुरी के जगन्नाथ मन्दिर आदि जैसे अनेकों मन्दिर आज भी सुरक्षित मिलते हैं । यदि मुस्लिम मन्दिर तोड़ने ही भारत आए थे तो इन्हें तोड़ा क्यों नहीं …. बल्कि इतिहास तो ये बताता है कि उत्तर भारत के तीर्थ नगरों मे सर्वाधिक मन्दिरो का निर्माण तो मुस्लिम शासकों के सहयोग से ही हुआ …. यानी जिन्हें मन्दिर तोड़ने वाला प्रचारित किया गया है उन्होंने ही मन्दिर बनवाए थे ।

….. इसलिए मुस्लिम अपने धर्म का प्रचार और अन्य धर्मों का दमन करने की मानसिकता से भरे हुए थे मुझे इन आरोपों मे सच्चाई नही बल्कि साजिश ज्यादा नजर आती है ।
हां कुछ इतिहासकारों का ये मत जरूर तर्कपूर्ण लगता है कि (यदि बख्तियार खिलजी ने नालंदा को नष्ट किया तो) समाभवत: खिलजी ने नालंदा को सैन्य दुर्ग समझकर नष्ट कर दिया था … ऐसा भी तब हो सकता है जब नालंदा का इस्तेमाल तत्कालीन शासक की सेना किले के तौर पर खिलजी पर आक्रमण करने के लिए कर रही हो … यही तर्क विश्वास योग्य है …. क्योंकि किसी भी तर्क और तथ्य से ये सिद्ध नहीं होता कि मुस्लिमों की प्रवृत्ति दूसरे धर्म का नाश करने की रही हो ॥