आम आदमी पार्टी का बनना देश की राजनीति में एक अलग घटना थी. वह दूसरी पार्टियों की तरह नहीं बनी थी. बल्कि वह मौजूदा तमाम पार्टियों के बरअक्स एक अकेली और इकलौती पार्टी थी, जो इन तमाम पार्टियों के तौर-तरीक़ों के बिलकुल ख़िलाफ़, बिलकुल उलट होने का दावा कर रही थी. उसका दावा था कि वह ईमानदारी और स्वच्छ राजनीतिक आचरण की मिसाल पेश करेगी. इसलिए ‘आप’ के प्रयोग को जनता बड़ी उत्सुकता देख रही थी कि क्या वाक़ई ‘आप’ राजनीति में आदर्शों की एक ऐसी लकीर खींच पायेगी कि सारी पार्टियों को मजबूर हो कर उसी लकीर पर चलना पड़े.
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अबकी चलेगी झाड़ू! दिल्ली में तो चली, ख़ूब चली, इतनी चली कि सारी की सारी पार्टियाँ साफ़ हो गयीं. कमाल की बात थी वह. आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ राजनीति की सफ़ाई करने का नारा लगा कर आयी थी. तो पार्टियों को तो साफ़ कर दिया उसने. लोगों को लगा कि बस अब राजनीति की गन्दगी पर भी झाड़ू फिरेगी. झाड़ू तो फिरी. लगातार फिर रही है, लेकिन राजनीति पर नहीं, अपने आप पर, ख़ुद ‘आप’ पर!

Aam Aadmi Party continuously mired in Controversies
झगड़े, अलगौझे, विवाद, स्कैंडल और तमाशे!
अपने चार साल से भी कम के सफ़र में आम आदमी पार्टी कहाँ से चल कर कहाँ पहुँची? कितनी बड़ी-बड़ी बातें थीं, कितने नेक इरादे थे, कितने त्याग के संकल्प थे. और चार साल में दिखा क्या? झगड़े, अलगौझे, विवाद, स्कैंडल और तमाशे! राजनीति कितनी साफ़ हुई, पता नहीं. आम आदमी पार्टी की सरकार ने काम क्या किया, किया भी या नहीं किया, लोगों को यह बात पता हो या न हो, उसकी चर्चा हो या न हो, चटख़ारों में चर्चा जिन बातों की होती रही है और हो रही है, वह पार्टी के भविष्य पर बड़ा सवाल है.

सपना जो केजरीवाल ने गली-गली घूम कर बेचा था!
बात सिर्फ़ एक पार्टी के भविष्य की नहीं है. पार्टियाँ तो आती हैं, जाती हैं, बनती हैं, बिगड़ती हैं, टूटती हैं, बिखरती हैं. एक पार्टी के अन्दर से कई-कई पार्टियाँ निकल आती हैं. फिर ख़त्म भी हो जाती हैं. कहने को तो सब पार्टियाँ सपने बेचती हैं, सबका कोई न कोई ‘यूएसपी’ है, तभी उनके तम्बू में समर्थक और ‘भक्त’ जुटते हैं. तो सपना तो अरविन्द केजरीवाल ने भी गली-गली घूम कर बेचा था, लेकिन वह ज़रा सबसे अलग सपना था. वह यह कि वह राजनीति को बदल कर दिखायेंगे. जितनी गन्दगी है, जितना कीचड़ है, जितना ग़लीज़ है, सब साफ़ कर देंगे. वह इसलिए राजनीति में नहीं आ रहे हैं कि उन्हें राजनीति करनी है, या उन्हें कुर्सी चाहिए, या उन्हें सत्ता चाहिए. नहीं! केजरीवाल लोगों को बता रहे थे कि वह इसलिए राजनीति में उतरे हैं कि देश के राजनीतिक तंत्र ने उन्हें चुनौती दी है कि राजनीति में, व्यवस्था में वह जो बदलाव चाहते हैं, भ्रष्टाचार ख़त्म करना चाहते हैं तो धरने देने के बजाय ख़ुद राजनीति में उतरें, चुनाव जीत सकते हों तो जीतें और फिर जो बदलना चाहें, बदलें.

देश की राजनीति में एक अलग घटना
इसलिए आम आदमी पार्टी का बनना देश की राजनीति में एक अलग घटना थी. वह दूसरी पार्टियों की तरह नहीं बनी थी. बल्कि वह मौजूदा तमाम पार्टियों के बरअक्स एक अकेली और इकलौती पार्टी थी, जो इन तमाम पार्टियों के तौर-तरीक़ों के बिलकुल ख़िलाफ़, बिलकुल उलट होने का दावा कर रही थी. उसका दावा था कि वह ईमानदारी और स्वच्छ राजनीतिक आचरण की मिसाल पेश करेगी. इसलिए ‘आप’ के प्रयोग को जनता बड़ी उत्सुकता देख रही थी कि क्या वाक़ई ‘आप’ राजनीति में आदर्शों की एक ऐसी लकीर खींच पायेगी कि सारी पार्टियों को मजबूर हो कर उसी लकीर पर चलना पड़े. लकीर ऐसी तो कोई खिंची नहीं कि लोगों को दिखे. बस ‘आप’ ने सबको टोपी ज़रूर पहना दी! अब हर पार्टी की रैली और धरनों में तरह-तरह की छाप की टोपियाँ ही टोपियाँ दिखती हैं. और जनता में भी बहुतों को लगता है कि जैसे तमाम दूसरी पार्टियाँ हर बार तरह-तरह के भेस बदल कर उन्हें टोपियाँ पहनाती रहीं, इस बार झाड़ू चलाने के नाम पर उन्हें फिर टोपी पहना दी गयी!

केजरीवाल अपने को कितने नम्बर देंगे?
क्यों? जनता को ऐसा क्यों लगता है? इसलिए कि ‘आप’ से जनता की उम्मीदें वह नहीं थीं, जो दूसरी पार्टियों से होती हैं. मिसाल के तौर पर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी से जनता को एक ही उम्मीद थी, वह थी विकास की. उधर, हिन्दुत्व ब्रिगेड को मोदी जी से विकास के रैपर में कुछ अलग ही प्रोडक्ट चाहिए था! तो विकास वाले लोग उन्हें विकास पर और हिन्दुत्व वाले लोग उन्हें हिन्दुत्व की ही कसौटी पर तौलेंगे. सत्ताइस महीनों से मोदी जी इसी के बीच सन्तुलन साधने की क़वायद में लगे हैं. लेकिन अरविन्द केजरीवाल और ‘आप’ से क्या उम्मीद थी? यही कि वह देश को एक नयी वैकल्पिक राजनीति देंगे. अरविन्द केजरीवाल अपने दिल पर हाथ रख कर बतायें कि वह इस कसौटी पर अपने को कितने नम्बर देते हैं? हम जानते हैं कि अरविन्द जी तो कह देंगे, सौ में सौ. काश, यही सच होता!

पार्टी में ऐसे लोग कैसे आ गये?
बात सिर्फ़ इतनी नहीं है कि एक मंत्री पर फ़र्ज़ी डिग्री का आरोप लगा, एक पर भ्रष्टाचार का, एक की सेक्स सीडी सुर्ख़ियों में है और तीनों के ख़िलाफ़ पार्टी ने कार्रवाई कर दी. फ़र्ज़ी डिग्री के मामले में पार्टी ज़रूर काफ़ी दिनों तक हीलाहवाली करती रही, लेकिन जब अदालत में लग गया कि मंत्री महोदय नहीं ही बच पायेंगे, तो क्या करते कार्रवाई करनी ही पड़ी. ख़ैर बाक़ी के दोनों मामलों में देर नहीं लगायी, यह अच्छी बात है. लेकिन सवाल यह है कि जो पार्टी तमाम आदर्शों के बिगुल बजा कर राजनीति के युद्ध क्षेत्र में उतरी हो, उसमें ऐसे लोग कैसे आ गये? और अगर आ गये, तो टिकट कैसे पा गये. यह सवाल इसलिए बहुत बड़ा है कि दिल्ली के पिछले चुनाव में ‘बिना छानबीन ग़लत लोगों को टिकट दिये जाने’ के मुद्दे पर पार्टी में बड़ी लम्बी बहस हुई थी और पार्टी टूट गयी थी.

कानाफ़ूसियों में इतने क़िस्से क्यों?
केजरीवाल जी कहते हैं सन्दीप कुमार ने पार्टी को धोखा दिया. जितेन्द्र तोमर के मामले में भी उन्होंने बहुत दिनों बाद यह बयान दिया कि तोमर ने उन्हें धोखे में रखा, जबकि तोमर के बचाव में सबूत ही नहीं थे, सबको पता था यह. फिर एक और मंत्री आसिम अहमद को पार्टी ने भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया. पंजाब में अपने बड़े नेता को भी भ्रष्टाचार के आरोपों में हटाना पड़ा. लेकिन कहानी यहीं कहाँ ख़त्म होती है? कानाफ़ूसियों में तो तरह-तरह के क़िस्से हैं. और ऐसे क़िस्से जाने कब से चल रहे हैं. आप कह सकते हैं कि सब बेबुनियाद हैं. सही बात है. जब तक सबूत न हों, आरोप तो बेबुनियाद ही कहलायेंगे! लेकिन बस एक छोटा-सा सवाल. ऐसी कानाफूसियाँ दूसरी पार्टियों के लोगों के बारे में इतनी ज़्यादा क्यों नहीं होतीं? ‘आप’ ही के बारे में क्यों होती हैं? अब यह जवाब किसी को नहीं पचेगा कि यह सब तो ‘आप’ को बदनाम करने की साज़िशों के तहत किया जा रहा है.

क्या चुनावी जीत ही लक्ष्य है?
पंजाब को लेकर पार्टी अब नये विवादों में है. मैं इस बहस में नहीं जाना चाहता कि पार्टी में पंजाब में या दिल्ली में या और भी कहीं जो हुआ या हो रहा है, उसका चुनाव पर क्या असर पड़ेगा? हो सकता है कि सारे विवादों के बाद भी समीकरण ऐसे बैठें कि ‘आप’ पंजाब में चुनाव जीत जाये या न भी जीते. लेकिन अगर चुनावी जीत ही ‘आप’ का लक्ष्य है और अगर चुनावी जीत को ही ‘आप’ अपने सही होने का सर्टिफ़िकेट मान लेती है, तो उसमें और दूसरी पार्टियों में क्या फ़र्क़ रह जायेगा? क्या ‘आप’ सत्ता के और राजनीति के उसी दुष्चक्र में नहीं फँस गयी, जिसके ख़िलाफ़ लड़ने का संकल्प लेकर वह जन्मी थी?

‘आप’ के लिए सोचनेवाली बात
‘आप’ के लिए सोचनेवाली और तय करनेवाली बात यही है. अगर उन्हें बाक़ी राजनीतिक दलों के ही तरीक़े की राजनीति करनी है, तो यह सारी बहस यहीं ख़त्म हो जाती है. लेकिन अगर वह वाक़ई अपने इस संकल्प को लेकर बेईमान नहीं हुए हैं कि उन्हें राजनीति को साफ़-सुथरा करना है, तो उन्हें पार्टी के भीतर कड़ाई से कुछ पैमाने लागू करने पड़ेंगे, अपने नेताओं, विधायकों, सांसदों, मंत्रियों के लिए कड़ी आचारसंहिता लागू करनी पड़ेगी और राजनीतिक त्याग भी करने पड़ेंगे. आत्मनिरीक्षण करना होगा. हर मामले में पारदर्शी भी होना पड़ेगा. लेकिन क्या ‘आप’ और उसके नेता इसके लिए तैयार हैं या होंगे? शायद नहीं. क्योंकि राजनीतिक सफलता का पैमाना ही चुनावी जीत माना जाता है और दुर्भाग्य से अपने यहाँ चुनाव साफ़-सुथरे तरीक़ों से जीते नहीं जाते!

जन मोर्चा की कहानी
मुझे याद है कि 1987 में वीपी सिंह ने जनमोर्चा बनाते समय कहा था कि यह दस साल तक राजनीति से दूर रहेगा, झुग्गी-झोंपड़ियों में जनता के बीच काम करेगा. लेकिन यह संकल्प तो गिनती के कुछ दिन भी नहीं चला. और कुछ ही महीनों बाद 1988 में वीपी सिंह इलाहाबाद संसदीय उपचुनाव में मैदान में उतर गये! उन्हें जिताने के लिए एक तरफ़ जहाँ संघ के लोग जुटे थे, वहीं मुसलमानों के बीच सैयद शहाबुद्दीन की अपील घुमाई जा रही थी! और शाहबानो के पक्ष में बोलने के कारण जनमोर्चा के संस्थापक सदस्य आरिफ़ मुहम्मद ख़ाँ को इलाहाबाद में प्रचार तक नहीं करने दिया गया कि कहीं मुसलिम वोटर बिदक न जायें. चुनाव जीतने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता है!

http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi