सिकंदर हयात

हिन्दू कठमुल्लावाद के कारण खेल की दुर्गति हुई है !

Category: खेल, सिकंदर हयात 1423 views 33

Rio-LOGOओलम्पिक दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन होता हे फुटबॉल जैसे खेल को छोड़ दे तो बाकी सभी खेलो में वर्ल्ड कप चेम्पियन होने से भी अधिक सम्मान और गौरव की बात ओलम्पिक चेम्पियन होना या ओलम्पिक में कोई भी पदक जीतना माना जाता हे सभी खिलाड़ियों के लिए कहा जाता हे की वो अपना बेस्ट ओलम्पिक के लिए बचा कर रखते हे ओलम्पिक में जीत क्या मायने रखती हे इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाइये की ओलम्पिक चेम्पियन खिलाडी फिर ताउम्र ओलम्पिक चेम्पियन ही कहलाता हे उसे पूर्व चेम्पियन नहीं कहा जाता हे रियो ओलम्पिक में उमीद तो थी की भारत पहली बार दो अंको में मैडल जीतेगा ( वैसे जीत तो सिर्फ गोल्ड ही होती हे इसलिए टेली सिर्फ गोल्ड से ही बनती हे लेकिन ओलम्पिक भावना की वजह से बाकी दो ओलम्पिक पदको का भी भारी सम्मान होता हे ) हर बात की तरह ही हमारे पी एम् की भारत को पदक जिताने के विषय में कुछ भी लफ़्फ़ाज़िया सामने आयी थी लेकिन नतीजा पिछले तीन ओलंपिक में सबसे ख़राब प्रदर्शन के रूप में सामने आया सवा अरब के देश की ओलम्पिक या कहे की खेलो में ही असफलता कितनी जबरदस्त हे इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइये की दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश हॉकी टीम से इतर सिर्फ एक गोल्ड मैडल सौ सालो के इतिहास में ले पाया हे वो भी पसीने के कम और एकाग्रता के खेल में ( अभिनव बिंद्रा शूटिंग ) इससे भी ज़्यादा शर्मनाक बात की भारत से दस नहीं बीस गुना अधिक मैडल और गोल्ड मैडल सिर्फ कुछ देशो ने भी नहीं बल्कि सिर्फ कुछ खिलाड़ियों ने अकेले ही जीत रखे हे जेसे की माइकल फेल्प्स बोल्ट कार्ल लुइस नुरमी आदि पदको की लिस्ट पर गौर करे तो कई कठमुल्लावादी हास्यपद पाबंदियों वाले बिहार से भी छोटे देश ईरान तक ने तीन गोल्ड और टोटल 8 मैडल जीते पूर्व युगोस्लाविया के कई टुकड़े हुए थे उसके टुकड़े के भी टुकड़े से बना शायद हमारी किसी बड़ी विधानसभा सीट से भी छोटा देश कोसोवो तक एक गोल्ड जित लेता हे इसके अलावा भारत से भी अधिक भ्र्ष्टाचार और गृहयुद्ध , छोटे छोटे और अराजकता गरीबी भुखमरी बेहद कम आबादी के देश जैसे जॉर्जिया अल्जीरिया उज्बेकिस्तान इथोपिया अजरबेजान कोलोम्बिया मिस्र ट्यूनेशिया जोर्डन जैसे देशो ने भी ओलम्पिक में भारत से तो बहुत बेहतर किया हे!

अब आप देखे की हमेशा की तरह इस भयंकर हार के बाद चारो तरफ हज़ारो लेख छप रहे हे जिसमे हार की चीर फाड़ हो रही हे और वो ही कारण बताय जा रहे हे जो की उन छोटे छोटे देशो में भी हे ही जिनका पर्दशन भारत से तो बहुत बेहतर रहा ही जैसे क्रिकेट जैसे आरामतलब फालतू खेल के लिए दीवानगी सुविधाओ की कमी भ्र्ष्टाचार नेताओ की मनमानी आदि आदि ये सब भी सही हे और ये भी सच हे की पिछले सालो में फिर भी क्रिकेट से इतर खेलो के लिए फिर भी हालात बनिस्पत बेहतर ही हुए हे पहले तो ये हाल था की जीत पर भी कुछ नहीं मिलता था जबकि अब खिलाड़ियों को कम से कम इतना तो पता हे की एक जीत उन्हें करोड़ो में लाद देगी दूसरे खेलो को अब स्पांसर भी मिलने लगे ही हे वो भी अब ठीक ठाक कमा रहे ही हे वार्ना भारत के कितने ही पुराने ओलम्पिक एशियाड होकि फुटबॉल के खिलाड़ियों की दुदर्शा की खबरे आती रही हे वास्तव में अगर भारत जैसे की आस लगाई गयी थी दस बीस ओलम्पिक मैडल जीत लेता तो भी वो चीन जैसे देश से सात गुना कम ही होते वो भी बड़ी विफलता ही होती तब ये जो कारण विभिन्न लेखों में आजकल चारो तरफ पेले जा रहे हे जिनमे हालात को सुविधाओ को फण्ड की कमी नेताओ आदि को कोसा जा रहा हे तब तो वो सही होते और हे भी . और चलिए मान लिया की चारो तरफ छप रहे लेखों की बात मान भी ली गयी जैसे ये बता रहे हे वैसे हो भी गया और भारत ने अगली बार दो की जगह दस भी मैडल जीत भी लिए ( गोल्ड की तो बात ही ना करे ) तो भी तो हम चीन जैसे देशो से बहुत बहुत बहुत पीछे होंगे ही ——– ? भारत की ओलम्पिक में विफलता तो शायद मानव इतिहास की ही खेलो में सबसे बड़ी विफलता कही जा सकती हे आखिर क्यों इतना बड़ा देश जहां अब अरबपतियों करोड़पतियों लखपतियों की कतार लगी हे ( अभिनव बिंद्रा ने भी शायद खुद की ही वेल्थ के दम पर सुविधाय जुटा कर भारत का एकलौता नॉन हॉकी गोल्ड जीता था ) वो इथोपिया जैसे अकालग्रस्त भुखमरे जैसे देश से भी पिछड़ा हुआ हे मेरा अन्दाज़ा हे की भारत की खेलो में इस अदभुत विफलता का सबसे बड़ा राज़ हे ”हिन्दू कठमुल्लावाद ” !

भारत में सबसे अधिक पैसा और संसाधन इसी हिन्दू कठमुल्लावादी सोच और वर्ग के पास ही हे और साफ़ हे की ये वर्ग ना तो खुद खेलो में कुछ करता हे ( हिंदुत्व की प्रयोगशाला पेसो में सबसे आगे पर खेलो में फिसड्डी ) ना ही किसी और को ही कोई प्रोत्साहन देता हे जैसे की चीनी मिडिया ने साफ़ साफ़ लिखा हे की भारत की खेलो में इतनी बेमिसाल विफलता का एक बड़ा राज़ हे शाकाहार . और शाकाहार पर सबसे अधिक जोर भारत में हिन्दू कठमुल्लावादी वर्ग ही देता हे अगर में गलत नहीं हु तो इस वर्ग की हरकत देखिये की इसने शाकाहार के नाम पर शायद मध्यप्रदेश में गरीब आदिवासी दलित बच्चो से अंडा तक बन्द करवाने की कोशिश की थी इसका मतलब ये नहीं हे की में शाकाहार के खिलाफ हु नहीं शाकाहारी होना भी बहुत अच्छी और सेहतमंद बात हे मगर क्या करे की अधिकतर खेलो में जीतने के लिए आपको सिर्फ सेहतमंद और रोगों से दूर ही नहीं रहना होता हे बल्कि बहुत ही ज़बरदस्त दमखम भी चाहिए होता हे ( इस दमखम की हमारे देश में कितनी कमी हे की अंदाज़ा लगाइये जिस क्रिकेट के लिए भारत में इतनी दीवानगी हे इतनी सुविधाय हे उस तक में भारत आज तक एक भी शुद्ध खूंखार फास्ट बोलर देने में विफल रहा हे इस विफलता को इस तरह से ढंका गया की भारत के बनियो ने क्रिकेट को अपने पेसो और आबादी के दम पर अपने कब्ज़े में लेकर फ़ास्ट बोलिंग को ही बधिया करवा दिया उसका रूप ऐसा बदलाhttp://khabarkikhabar.com/arch ives/1770 की पिछले दिनों महान फ़ास्ट बोलर ग्लेन मैक्ग्रा ने भी शिकायत की की अब फ़ास्ट बोलिंग बर्बाद हो रही हे लेकिन ये सब मक्कारियां चालाकियां और पेसो का रुतबा क्रिकेट जैसे दुनिया के लिए बेमतलब बेमकसद फालतू और आलसियों के खेल में तो चल सकता हे बाकी खेलो ओलम्पिक एशियाड कॉमनवेल्थ और फुटबॉल आदि में नहीं ) इस दमखम के लिए जो खाना जरुरी होता हे वो खाया जाता ही हे साइना नेहवाल की ही बात करे तो वो शुद्ध शाकाहारी थी मगर कोच पुलेला गोपीचंद की सलाह मानकर उन्होंने चिकन खाना शुरू किया और मैडल जीते अब चाहे तो वो और मैडल जीत जीत कर अपना कॅरियर खत्म कर फिर से वेजेटेरियन हो जाए तो कोई हर्ज़ नहीं हे .

अब अंदाज़ा लगाइये देश की सबसे अधिक वेल्थ को अपने कब्ज़े में लिए बैठा हिन्दू कठमूल्लवादी कट्टरपन्ति वर्ग ने शुद्ध शाकाहार के प्रति कट्टरपंथ दिखाकर भारत को खेलो में कितना नुक्सान पहुचाया होगा इसी कारण ये वर्ग खुद भी खेलो में कुछ भी तो ना कर सका हे —- ? ऊपर से कोढ़ में खाज ये भी की इस वर्ग ने खेलो में खुद तो कभी कुछ किया ही नहीं देश का भारी आर्थिक शोषण करके देश में भारी असमानता फैलाकर इसने दुसरो को भी खेलो में कुछ नहीं करने दिया करे कैसे भला जब आर्थिक शोषण लूट और असामनता की वजहों से देश के एक बड़े हिस्से को तो रोटी कपड़ा मकान की समस्याओ से ही कोई निजात नहीं हे खेलो के लिए ऊर्जा कहा से लाये ज़ाहिर हे शाकाहार के प्रति इस वर्ग की सनक को सम्मान ही दिया जा सकता था की भाई जब आपको जानवरो से इतना प्रेम हे तो इंसानो से दस गुना अधिक होना चाहिए था मगर ये वर्ग कभी भी इंसानो के शोषण से बाज़ नहीं आया शोषण लूट भी ऐसी जो शायद ही दुनिया में कही और भी होती हो प्रेमचंद की ” सवा सेर गेंहू ” जैसी शोषण की कहानिया शायद ही किसी और देश में लिखी गयी हो यानी बात बिलकुल साफ हे यानी जब तक देश के सबसे अधिक संसाधन और पैसा हिन्दू कट्टरपन्ति कठमुल्लावादी वर्ग के कब्ज़े में रहेंगे तब तक भारत की खेलो में इसी तरह से दुदर्शा होती रहेगी और हमें क्रिकेट की फ़र्ज़ी खरीदी हुई फालतू उपलब्धियों पर बाकी खेलो में इक्कादुक्का व्यक्तिगत उपलब्धियों से ही सन्तोष करना पड़ेगा और दुनिया हम पर हँसती रहेगी

Related Articles

33 thoughts on “हिन्दू कठमुल्लावाद के कारण खेल की दुर्गति हुई है !

  1. beeru yadav

    मांसाहारी कठमुल्ले ही कितने मेडल लाये?

    Reply
    1. उमाकान्त

      शाकाहार या मांशाहार ये सिर्फ कुतर्क हैं अगर आप के स्कुल में मेथ पढ़ाने की फेस्लीटी नही हैं तो आप मैथेमेटिशीयन पैदा नही कर सकते

      Reply
  2. ramesh kumar

    आपके इस लेख से सहमत नहीं क्योके आप जो कह रहे है वह प्रैक्टिकाली ऐसा नहीं है !

    Reply
  3. wahid raza

    آپ جے سچ لکھا ہے مگر سوال یہ ہے کے مسلم ملکو نے بھی کون سا کمال کیا ہے . اصل مے ہمارے دیش مے کوئی جذبہ ہی نہیں ہے ملک کے متھالک اور دشو مے کون سے ادھک ہے –

    Reply
    1. सिकंदर हयात

      वाहिद साहब ट्रांसलेट से देखा की आपने शायद मुस्लिम देशो की भी नाकामी का मुद्दा उठाया हे तो हम उसकी भी चर्चा कर चुके हे उनकी भी नाकामी का राज़ हे मुस्लिम कठमुल्लावाद कट्टरपंथ ये इंसान को ना तो सोचने देते हे ना कुछ करने देते हे जैसे यहाँ उमाकांत साहब जैसे समझदार आदमी भी सोचने को राजी नहीं हे की आखिर गोपीचंद ने कैसे साइना को कैसे चेम्पियन बनाया —-? कठमूल्लवाद और कटरपंथ केवल एक ही खेल में माहिर होते हे वो हे शोषण का खेल . इसलिए हम लोगो को अपने अपने धर्म आस्था पर कायम रहते हुए ही , और भी शुद्ध और 100 % सेकुलर लिबरल बनने को कहते हे तभी शोषण कम होगा जब शोषण कम होगा तभी आम आदमी भी बेफिक्र होकर कोई खेल खेल पायेगा तभी मैडल आएंगे याद रखिये की हर जीते हुए खिलाडी के पीछे और निचे सेकड़ो हारे हुए और इंजर्ड हुए खिलाडी हो सकते हे यही खिलाडी ही प्रेक्टिस करवा करवाकर खुद हार कर चेम्पियन खिलाडी को आगे बढ़ाते हे यानी हारे हुए खिलाड़ियों का भी पूरा पूरा मान सम्मान हक़ होना चाहिए उनको भी इतना पैसा जरूर ही मिलना चाहिए की कम से कम जिंदगी की बेसिक जरूरतों की तो उन्हें बिलकुल चिंता ना करनी पड़े लेकिन यहाँ हाल देखिये क्या हे की दो मैडल जितने वालो को करोड़ो दिए जा रहे हे जो हारे जैसा की महावीर फोगाट बता रहे हे की उनकी बेटीयो को प्रेक्टिस तक उधार के गद्दों पर करनी पड़ी

      Reply
  4. सिकंदर हयात

    रमेश जी जब भी आपके पास समय हो तब आप डिटेल में बता सकते हे की लेख में आपको क्या गलत लगा दूसरा की ऐसा नहीं हे की सिर्फ यही एक वजह हे खेलो में भारत की दुर्गत की और बहुत सी वजह हे और वो वजह आजकल चारो तरफ आ रहे लेखों में डिस्कस हो भी रही हे सही भी हे लेकिन ये जो वजह ये कही डिस्कस नहीं हो रहि तो मेने ये भी मुद्ध उठा दिया फिर ये ना समझे की में मांसाहार का गान कर रहा हु या शाकाहारियों को कमजोर बता रहा हु बिलकुल नहीं में तो खुद बहुत से लोगो को अधिक मांसाहार से चेताता रहता हु में खूब बहुत ही मिनिमम लेता हु अंडे भी कम कर दिए हे जरुरी हुआ तो में फिट रहने के लिए शुद्ध शाकाहारी भी बन सकता हु लेकिन जैसा की लेख में बताया गया चीनी मिडिया ने भी बताया की फिट सेहतमंद दुबला निरोग रहना एक अलग बात होती हे बहुत अछि बात हे . मगर खेलो में एक खास समय में खास पॉवर चाहिए होती हे किस कदर दमखम चाहिए होता हे में समझ सकता हु क्योकि में भी एमच्योर ( नॉन प्रोफेशनल ) फुल मैराथन ( 42 किलोमीटर छह घंटे से कम में ) की तैयारी कर रहा हु दौड़ना मेरे लिए बहुत आसान हे मगर यकीन कीजिये की अगर आपने रफ़्तार बढ़ानी हो तो इतनी पॉवर लगानी पड़ती हे की जान निकल जाती हे आखिर वो जीतने की पॉवर कहा से आएगी — ? उसके लिए बहुत से लोगो मांस अंडे की जगह सूखे मेवे भी लेते हे मगर वो तो और भी महंगे हे और ना उनका उत्पादन बढ़ सकता ना हो सकता तो करे तो क्या करे आखिर हम कैसे जीतेंगे —–? और भला इसमें क्या शक हे की भारत में सबसे अधिक दौलत के ढेर पर शुद्ध शाकाहारी जैन बनिए गुजराती आदि समाज बैठे हे में इनके शाकाहार का पूरा पूरा सम्मान करता हु मगर अगर इन्हें खुद नहीं खेल खेलने हे तो दूसरे समाजो को आगे बढ़ाए ये नहीं की एम् पि में गरीब बच्चो से अंडा तक छीनने की कोशिश का आरोप हे क्या उन्हें काजू बादाम खिलाओगे — ? या फिर ये हे की जैसा की शुद्ध संघी और पत्रकारिता के नाम पर कलंक —— कुमार झा ने लिखा की खेलो में हार से परेशान होने की जरुरत नहीं हे ठीक हे फिर हिस्सा ही लेना बंद कर दीजिये ऐसा कर लीजिये .

    Reply
  5. umakant

    स्तरहीन लेख वास्तविकता से कौसो दूर

    Reply
  6. सिकंदर हयात

    उमाकांत जी जब भी भी समय हो तो वास्तविकता आप ही लेख या कमेंट से बता सकते हे शुक्रिया . आपकी बात जायज़ हे लेख स्तरहीन भी हो सकता हे मगर लेख का मुद्दा ध्यान देने के काबिल तो हे ही सच हे की लेख में गहराई नहीं हे क्योकि में कोई काबिल आदमी नहीं हु ना ही मुझे कोई ऐसी एजुकेशन मिली हे ना ही मेरी सात पुश्तों में भी कोई लेखक या कोई अकादमिक हुआ हे ना ही मुझे कोई भी कैसा भी किसी का भी कभी भी कोई सपोर्ट मिला हे ऊपर से जीवन में प्रॉब्ल्म्स के अम्बार लगे रहते हे जिससे फोकस में बहुत दिक्कत आती हे इसलिए हो सकता हे की मेरा लेखन स्तरहीन हो उसमे गहराई ना हो सही भी हे मगर मेरा इरादा पूरी तरह से नेक था ,हे , और रहेगा इस दुनिया में बहुत से लोग बेहद काबिल होते हे मगर उनके इरादे अच्छे या नेक नहीं होते हे भारत तो अब चारो तरफ ऐसे ही काबिल लोगो के कब्ज़े में हे —- ? और बीरू यादव भाई आपने पूछा की मांसाहारी कठमुल्लाओ ने कितने पदक जीते तो हां ये भी हे की अगर ईरान जैसे देशो में तरह तरह की मुस्लिम कठमुल्लावादी पाबंदिया और बेन ना होते तो वो भी आठ की जगह बीस मैडल ले सकते थे पाकिस्तान की भी खेलो में भारी दुर्गत हो रही हे उसका भी कारण भि उनकी कठमुल्लावादी सोच हे जिसके कारण पकिस्तान में मांसाहार की सनक , खफ्त हे वहां जरुरत से बहुत ज़्यादा मांसाहार किया जाता हे जिससे हो सकता हे वहां भी लोगो की बच्चो की फिटनेस ख़राब हो रही हो खेर जो भी हो हम तो भारतीय हे हमें सिर्फ भारत से मतलब हम सिर्फ भारत को मैडल लेते देखना चाहते हे

    Reply
  7. brijesh yadav

    Ye sikandar hayaat sahab jo hai….inhe mai 3-4 salo.se lagaatar pdh raha hu….ye sahab secularism ka naqaab pahankar aate hai..darasal ye ek samprdaayik tatv hain jinhe ham ‘Soft Jihadi ‘ keh sakte hai….muslim samaz aise hi karta hai kuch logo ko aage rakhkar jo jhootmuth ka secularism ka dhong karte hai..dusre samudayo ko bhrm me rkhta hai…aur apne mansubo ko anzaam dene me laga rehta hai….ye bat yad rkhne ki hai ki agar koi muslim islam me aastha rkhte hue secularism ki bat karta hai to sawdhaan rehne ki jarurat hai….kyoki islam me secularism ki koi jagah nhi hai…aise insan kabhi bhi asli rang dikha sakte hai….ye khulkar hindu kattrata ki mukhalfat karte hai…par jo asli samsya hai vo islami kattrata hai us par do ek bat keh kar puri kar dete hai….inse sawdhan rahe.

    Reply
    1. rajk.hyd

      कुरान खुद सेकुलर नहेी है तब कुरान को सहेी समज्हने वाले उन्के भक्त कैसे सेकुलर हो सक्ते है

      Reply
  8. brijesh yadav

    Jo sampradayik tatv khulkar samne aa jaaye vo utne khatarnaak nhi…jitne ki vo jo secularism ka naatak karte hain….islami kattrata jo nit naye aayamo ko chhu rahi hai ….uska ek aayam ye bhi hai ki kuch apne logo ko secular samaz me entry karwa dete hain. Islami kattrata jo puri duniya ke liye naasur ban chuki hai. Uska udgam kya hai ham sabhi jaante hai….usi par se dhyaam hatane ke sikandar hayat jaiso ko aage kar diya jata hai….ye sahab bhi apne krtvya ko bakhubi nibha bhi rahe hain….islami kattrta jisne puri duniya ko nafrat ki aag me jhonk diya hai….uski chapet me aa gaya hai hindu samaz jo ki swabhawik rup se secular hai..

    Reply
  9. सिकंदर हयात

    इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ में 2005 से प्रिंट में और 2010 से नेट पर लिखता आ रहा हु विस्फोट मोहल्ला नवभारत पर , फिर यहाँ लाखो लाइने लिखने की मेहनत की होगी वो भी तब जबकि आई प्रॉब्लम्स और इंजिरी की वजह से स्क्रीन यूज के थोड़ी ही देर बाद मेरा सर बहुत ज़्यादा दुखने लगता हे इसलिए में स्मार्ट फोन तक यूज नहीं करता हु खेर मेरा अधिकतर लेखन मुस्लिम कट्टरता के खिलाफ ही हुआ हे http://khabarkikhabar.com/archives/category/writers/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4

    Reply
  10. brijesh yadav

    To janab aap apna focus kewal islami kattrta tak hi rakhiye….aur usme hi asfal prayaas jari rakhiye…hindu kattrta ki aap fikr na kare…uska gala pkdne wale unihi samaz me bahut hai…hindu kattrpanth majboori me paida huwa hai….jo ki islami kattrta ke karan aaya….aur uper se hindu samaz me hi uski bakhiya udhedne wale bahut hai….kyoki ye naturally…secular dharm hai…mujhe garv hota hai….uske ulta islami kattrta jnmjaat swaghosit swaposit manmani hoti hai….jo dharm ki chasni me dubi hui hai…hindu kattrta islami kattrta ka hi parinam hai…vo khud me damit hai shoshit hai….islami kattrpan kisi ki nhi sunta….usme se hi kuch secularism ka dhong karne wale jo gini chuni sankhya me hai…apni seemao ke daayre me…bhala kya kar sakte hai….aapne ek bar kaha tha ki kewal islami kattarpan pe bolunga to muslim samaz me galt samdesh jayega…..are bhai aaj ke jo mahan secular neta patrkar buddhjiwi aadi jo kewal majburiwash khade hue hindu kattarpan ko paani pee pee ke koste hain aur muslim kattrta pe muh me dahi jama lete hai..unhe to iski parwah nhi rahti ki hindu samaz me kya sandesh jayega…aur mahan secular bhi kehlaate hai…aur aapki nazro me deshi ghee ki tarah shuddh secular bane rahte hai…mai NDTV pe mahan secular patrkar Ravish kumar ko dekh raha tha…love jehad ke topic pe bat ho rahi thi….mahan secular patrkar ne ulta love jehad ka topic uthane wale ko hindu ko hi buri tarah lataad diya….abhi kisi hindu kattrpanthi ne kisi muslim ladki ko is tarah se kiya hota to vo mahan patrkar us kartrpanthi ko noch khata…..ikhlaq mudde pe screen black kar li…is mudde pe apna muh kala kyo na kar liya….aise me koi kattarpanth ki taraf jhuk sakta hai….javed akhtar ka kehna hai tum hindu log musalmano ki tarah kattar mat bano unhe apni tarah liberal banao….bilkul javed sahab ham secular hi hai…aur aisa kehna ka sahas kewal atheist muslim hi kar sakta hai…asthawan muslim kabhi shuddh secular nhi ho sakta..kyoki vo islami daayre me bandha hota hai….kitna bhi secularism ka dawa koi muslim kar le uski secularism ek hindu kattarpanthi ki bhi seclurism ke aage kuch nhi hai…..kyoki vo secularism seemao me nhi bandhi hai….aur hame us par naaz hai..kisi ko prove karne ki jarurat bhi nhi hai..isliye Sikandar sahab apna naqab nikal fekiye…aur asli rup me aa jaeye..ladna hai jhut me hi to islami kattrta se hari hui ladai ladiye..jo ki aapke bas ka bhi nhi hai….

    Reply
  11. सिकंदर हयात

    एक तो भाई नागरी में लिखे पूरी बात नहीं पढ़ पाया सिर्फ इतना समझ आया की आपकी ये बात जायज़ हे की हिन्दू कट्टरता के खिलाफ लिखने वाले तो बहुत हे मुस्लिम कट्टरता के खिलाफ लिखने वाले बहुत कम ले दे कर हम चार पांच ही हे अफ़ज़ल भाई जाकिर हुसेन सैफुल्लाह खान ताबिश सिद्दकी , में , और इक्का दुक्का कुछ और हे सोशल मिडिया पर , पर वो भी संदिग्द और फ़र्ज़ी ही अधिक लगते हे बाकी लोगो का खास कर पढ़े लिखे ऊँचे लोगो का क्या रवैया हे ये मेने ज़ाहिद साहब के लेख पर उनकी और मेरे कज़िन जेसो की क्या मानसिकता हे हे इस पर कमेंट दिया ही हे खेर ये लेख मेने इसलिए लिखा की ओलम्पिक में करारी हार के बाद हज़ारो लेख छपे मगर ये मुद्दा कही डिस्कस नहीं हो रहा था ये मुद्दा चीनी मिडिया और मध्य प्रदेश की खबर से मेरे मन में आया था इसलिए मेने ये लेख लिखा और इसमें तो शक ही नहीं हे की ये भी एक बड़ी वजह हे जिससे सवा अरब की आबादी का देश कुछ लाख की आबादी के कोसोवो से भी ओलम्पिक में मात खा जाता हे इसमें तो कोई शक नहीं हे की आगे भी जहा जहा मोदी भाजपा संघ बजरंग वि एच पि अदि आदि मज़बूत होंगे तो फिर जैसा की आप सोचते होंगे की वो इलाका स्वर्ग बन जाएगा ईश्वर करे ऐसा ही हो हमें उससे कोई ऐतराज़ नहीं मगर तब खेलो में भारत की दुर्गत होती ही रहेगी ये तो तय हे. आपका शुक्रिया

    Reply
  12. rajk.hyd

    ओलम्पिक मे जेीत नहेी मिलेी उस्का दोश शाकाहार नहेी है , दश्को से क्रिकेत कि गुलामेी है हर गलेी मे २-४ बच्हे क्रिकेत खेल्ते है क्योकि तेी वेी मे अन्य मिदिया मे वहेी च्हया रहता है शकाहारेी कुश्ति मे क्यो जिते ? सिन्धु को ३ माह बिर्यनेी नहि देी गयेी थेी ! वैसे सिन्धु मन्साहारेी हेी है
    इस बार ओल्मपिक कि हार के लिये मोदेी सर्कार को दोश दिया जायेग कि २५ माह मे अनेक खिलादेी मज्बुतेी से तैययर हो स्कते थे जिस्को सर्ककर ने ध्यान नहेी दिया ! जब इस देश मे क्रिकेत को काफेी हल्का किया जायेगा तब नये खेलो मे भि लोगो कि रुचि बनेगि ! गलेी गलेी मे क्रिकेत खेल्ने वाले बच्हे आगे बध भि नहेी पाते और अन्य खेलो मे उन्कि रुचि भि नहि बन पातेी है !

    Reply
  13. brijesh yadav

    सिकन्दर सहब पुर लेख पद्ध लिजिये मुस्किल से दो मिनुते लगेन्गे. आगे से नाग् रेी मे लिख्ने कि कोसिस करुन्गा..

    Reply
  14. सिकंदर हयात

    में” जीरो स्प्रिचुअल नीड ” का आदमी रहा हु किसी भी धर्म या अक़ीदे आस्था की मेरी कोई ख़ास जानकारी या अध्ययन नहीं हे इसकी जगह मेरे पास जीवन के अनुभव बहुत ज़्यादा हे क्योकि में एक बहुत ही ज़्यादा आम आदमी हु जिसे जीवन में कोई सुविधा या कोई भी सिक्योरिटी ज़ोन या कोई कम्फर्ट ज़ोन नहीं मिला ऐसे में में जो कुछ लिखता हु वो जमीनी और इंसानी अनुभवो हालातो से लिखता हु जो मेने खुद झेले ठीक अपने ऊपर . अब जब में मुस्लिम कठमुल्लावाद पर लिखता हु तो लोग इसे इस्लाम के खिलाफ भी मान लेते आये हे दो बार ” धमकी ” सी भी मिली हे जबकि हमारे लेखन का विषय इस्लाम नहीं बल्कि मुसलमानो की गतिविधियां होती हे में इस्लाम के बारे में नहीं मुसलमानो के बारे में लिखता हु जो मेने खुद देखा महसूस किया वो . ऐसे ही जैसे अब मेने यहाँ हिन्दू कठमुल्लाववाद शब्द प्रयोग किया, चीनी मिडिया और गोपीचन्द दुआरा बताये खान पान का मुद्दा उठाया आदि जिस पर हमारे प्रिय मित्र रमेश कुमार जी तक भी नाराज़ हुए तो बता दू की लेख का हिन्दू धर्म या आस्था से कोई लेना देना नहीं था हमारा विषय इंसान होते हे धर्म आस्था नहीं , हमें ना किसी भी धर्म की जयजयकार में करने में ही और ना ही कभी किसी भी आस्था के अपमान करने में कोई भी दिलचस्पी नहीं रही हे न आगे कोई चांस हे . ” हिन्दू कठमुल्लावाद ” शब्द से आशय कुछ लोगो से था न की हिन्दू आस्था से .

    Reply
  15. zakir hussain

    बृजेश यादव जैसे लोगो के लिए इतना ही ” ज़ाहिद ए तंग नज़र ने मुझे काफ़िर समझा, और काफ़िर ये समझता है, मुसलमान हूँ मैं”

    Reply
    1. सिकंदर हयात

      समझ नहीं आता जाकिर भाई की हंसे या रोये— ? ये हमें कट्टर मुस्लिम बता रहे हे जबकि अभी मेरा ठीक ठाक लिबरल ही डॉक्टर कज़िन तक भि रात में रुक कर एक बजे तक और सुबह नाश्ते के समय तक मुझे हिन्दू सपोटर होने और ” जीरो स्प्रिचुअल एक्टिविटीज़ ” के लिए खूब भला बुरा कह कर गया हे यही नहीं मेरी मदर से भी अपील करके गया हे की ” पुपो आप ही क्यों नहीं इसे मार मार कर मुसलमान करती ”————-? खेर जाकिर भाई विषय की बात करे तो मैडल से इतर भी खेल ( हर उम्र के लोगो के लिए ) और पढ़ने का कल्चर भारत को चाहिए ही चाहिए वार्ना बड़ी तबाही होगी हो ये रहा हे की भारत में पैसे वाले लोगो के जीवन में एक खालीपन आता जा रहा हे जिसे वो दो चीज़ों से भर रहे हे स्प्रिचुअल एक्टिविटीज़ या फिर सेक्स . इसलिए गौर करे की भारत में ” सेक्स और धर्म का बाजार ” बेहद उफान पर हे इस विषय पर लेख की कोशिश रहेगी

      Reply
  16. umakant

    1- करीब १०-१२ saal का था एक बार एक मित्र के साथ दौड़ाने गया था गया पिता जी को पता चला तो डंडा कर दिया उन्होंने की क्यों गया था चेहरा जल्दी बड़ा दिखने लगेगा फलन हो जायेगा ढिमकाना हो जायेगा और पता नही क्या क्या बोला था
    २-एक मिडिल स्कूल में टीचर है एक बच्चे को बी टेक करवा रहे है दूसरा तयारी कर रहा है तीसरा फुटबॉल खेलता है तो उसके लिए काफी परेशान कई बार समझाया बच्चे को खेलने दो तुम्हारे दोनों बच्चो से पहले कामयाब हो जाएगा लेकिन समझ नहीं आता उन्हें सोचते है बी टेक करवाना चाहते है उसे ताकि फ्यूचर सेफ रहे
    ये कहानी एक दो पिता की नहीं है बल्कि मेरे आस पास के हर पिता की उसे यही लगता है की पढाई में ही फ्यूचर सेफ है
    आप कहते है की काठमुल्ला वाद के कारन खेलो का ये हाल हुआ है पर मई कहता हु की बुनियाडी ही नहीं है तो ईमारत कैसे कड़ी होगी
    ३-पडोसी गाम की एक लड़की दौड़ाने में नेशनल लेवल तक खेली पारिवारिक समस्याएं आयी तो रेलवे ज्वाइन कर लिया फिर ८ घंटे की job फिर सुबह साम की प्रैक्टिस बाद में खेल छोड़ना ही पड़ा
    जहा सपोर्ट मिलता भी है तो मज़बूरी में खेल छूट जाता है
    मैंने आप से पूछा था की मुजफ्फर नगर में कितने स्टेडियम है खेल है जहा तक मेरा अनुमान है ८००-९०० गाम तो होंगे ही आप मालूम करे की स्कूल लेवल पर खेल एक्टिविटी कितने स्कूल में हो रही है आप ये भी बताइये की यदि स्कूल ही नहीं होने हो शिक्षा कहा से मिलेगा
    हमारी सरकार जितना पदक जितने पर इनाम देती है उसका आधा भी क्या खिलाड़ियों को बनाने (इनिशियल लेवल ) पर खर्च कर रही है

    Reply
  17. सिकंदर हयात

    माफ़ी चाहूंगा उमाकांत जी आपकी पुरानी बात का जवाब ना दे सका आपने जो पुरानी विफलताओं और हमारे मुज्जफरनगर की बात की तो भाई जो आप या राज़ साहब बता रहे हे सब सही बात हे इनसे भी खेलो में दुर्गत हुई हे सही हे में भी वो सब कारण डिस्कस कर रहा हु लिख रहा हु सब सही बात हे मगर ये तो वो बाते हे जिनसे भारत चालीस पचास मैडल नहीं ले पाता हे सही हे की इन्ही वजहों से हम चीन की तरह खेलो में अच्छा करने से रह गए लेकिन लेख का विषय अच्छा करने से क्यों रह गए —- ? वो नहीं हे लेख का विषय ये हे की हम तो खेलो में बुरा भी नहीं कर पाते हे बुरा तो वो करते हे जो किसी गिनती में होते हे हम तो किसी गिनती में ही नहीं हे मेरा मुद्दा वो नहीं हे की चालीस मैडल कब आएंगे—- ? मेरा मुद्दा हे की एक या दो भी गोल्ड क्यों नहीं आते हे मेरा मुद्दा तो ये हे की भारत में कुछ लोगो की वेल्थ इतनी हे की सिर्फ अपनी वेल्थ से ही वो भी अभिनव बिंद्रा की तरह गोल्ड ले सकते थे यानी दो चार गोल्ड तो हमें नसीब होते ( हलाकि वो भी घटिया ही पर्दशन होता क्योकि ईरान और उत्तर कोरिया तक इससे ज़्यादा लेते हे ) लेकिन हमारे वो दो चार गोल्ड या पदक तक तक तक भी कौन सी विचारधारा खा जाती हे ये इस लेख का विषय हे

    Reply
    1. उमाकान्त

      आप ओर मैं पचासा पार कर जायेगें अगर अभी इसी वक्त शुरूवात करे तो क्योकि सफल होने के लिये १० se २० साल का समय चाहिये आप देखिये जो मैडल उठा रहे हैं उन्होने ४-६ साल की उम्र से तैयारी की हैं

      Reply
      1. zakir hussain

        बिल्कुल, लेकिन इसके लिए खेल को संस्कृति मे बसाना होगा. अभी संस्कृति मे धार्मिक पाखंड बसे हैं.

        Reply
  18. ramesh kumar

    मेरे कहने का मतलब है के खेल में कट्टरवाद नहीं है बस हमारे देश में माहौल और प्रशिक्षण की कमी है और खेल बजट काम है उससे ज्यादा भष्ट्राचार बहुत है और जेन्यूइन लोगो को मौक़ा नहीं मिलता !

    Reply
    1. सिकंदर हयात

      रमेश जी सही हे की खेल में कट्टरवाद नहीं हे मगर एक खास किस्म के कट्टरवाद के कारण भारत का बहुत बड़ा और पैसे वाला तबका दमखम वाले खेलो में कुछ करना तो बहुत दूर की बात हे ”कदम तक नहीं हि रख पाता हे ” ( मेने कहा ना की भाई ओलम्पिक एशियाड में जीतेंगे तो हम तब जब हमारे पास ढेर सारे खेलने वाले हारने वाले खिलाडी होंगे यही खिलाडी हार हार कर किसी चेम्पियन को आगे बढ़ाते हे ) और फिर उसी कट्टरवाद के कारण उसी का दिल इतना बड़ा भी नहीं हो पाता की वो दुसरो को ही खेल के मैदान में आगे बढ़ाने में इन्वेस्ट करे ” प्रयोगशाला ” जहां जिनके पास सबके अधिक पैसा हे उन्ही का खेलो में हाल देख लो खेल ही नहीं वास्तव में जीवन के हर फिल्ड हमें उदार सेकुलर सहअस्तित्व वाला होने की जरुरत हे

      Reply
  19. सिकंदर हयात

    एक बार फिर से साफ़ कर दू की इस लेख में जो चीनी मिडिया की कही बात और पुलेला गोपीचन्द और साइन नेह्वाल के हवाले की बात हे उनसे मेरा मकसद ये बिलकुल भी नहीं था की जो आमतौर पर होता हे की शाकाहारियों को कमजोर बताना और मांसहाहरियो को ताकतवर शेर चीता आदि बताना ये सब बकवास हे. और भी मुझे मुझे किसी के भी अक़ीदे ,संस्कर्ति , इलाके , देश सूरत रंग कद परम्पराओ नाकनक्श खानपान आदि का मजाक उड़ाना बिलकुल भी पसंद नहीं हे में कभी ये नहीं करता हे ये सच हे की शाकाहार भी सेहत के लिए बहुत अच्छा होता हे इसी तरह जो लोग मांसाहार को अच्छा मानते हे( में उनके भी कुछ खून चूसने वाले शाकाहारियों दुआरा राक्षसीकरण के भी खिलाफ हु ) उन्हें भी इसकी लिमिट समझनी चाहिए याद रखिये की कुदरत का निजाम हे की जितनी भी चीज़े खाने में बेस्वाद होती हे वो सब सेहत के लिए अच्छी होती हे और जितनी भी टेस्टी चीज़े होती हे वो सब एक लिमिट के बाद मोटापा चढ़ा कर हेल्थ खराब ही करवाती हे तो मांसाहार का भी गुणगान ना करे लेख का मकसद ये भी बताना था की हेल्थी फिट रहना वजन कम रखना एक बहुत अछि बात हे मगर एक खास समय में खास पावर अगर खेलो में जितने के लिए चाहिए तो उसके लिए जो एक्सपर्ट बताएँगे वो खाना पडेगा वार्ना हारते रहो खेलो में . यही बात गोपीचन्द की मान कर साइना ने मैडल जीते और जित के बाद मध्यप्रदेश में गरीब आदिवासी कुपोषित बच्चो से अंडा तक छीनने की कोशिश करने वालो ने भी कोई ऐतराज़ नहीं किया इसी को मेने कठमुल्लावाद कहा इसी का विरोध इस लेख में हे शाकाहार का बिलकुल नहीं अभी तो खेर में भी एक थर्ड क्लास ही सही पर एथलीट हु पर अगर कल को मुझे पावर की नहीं सिर्फ वेट कंट्रोल की जरुरत हुई में भी अगर कल को जरुरत पड़ी तो शाकाहारी भी बन सकता हु आप भी यही करे जैसी जरुरत वैसा खाना ले शाकाहारी या मांसाहारी कटटरपन्तियो की ना सुने

    Reply
  20. सिकंदर हयात

    पता चलता हे की खबर की खबर के काफी पाठक तो बाहर के देशो अमेरिका कनाडा अमीरात आदि के हे यहाँ तक की आइसलैंड ( इंग्लैंड और ग्रीनलैंड के बीच एक छोटा सा देश ) तक से भी पाठक आज दिखाई दिए इन सभी का बहुत बहुत शुक्रिया आगे और बेहतर लेखन विचार पेश करने की कोशिश रहेगी विदेशी पाठको का एक बार फिर शुक्रिया और वेलकम

    Reply
  21. qutubuddin ansari

    sikandar hayat ji aap se puri tarah sahmat hu aur iske liye govt. bhi jimmedaar hai.

    Reply
  22. सिकंदर हयात

    शुक्रिया अंसारी जी . अंसारी जी सरकार जिम्मेदार हे की की हम खेलो में अच्छा नहीं कर पाते हे हिन्दू कठमूल्लवाद जिम्मेदार हे की हम खेलो में अच्छा छोड़ो बुरा भी नहीं कर पाते हे बुरा तो वो करते हे जो मुकाबले में होते हे हम तो किसी गिनती में ही नही हे और एक ज़हरीला संघी संपादक लिखता हे की ” ———– कुमार झा10 August at 15:59 · अगर ओलम्पिक आप ज्यादे जीत नही पाते तो यह कोई ऐसी बात नही है जिससे शर्मिंदा हुआ जाय. ठीक है कि राष्ट्रों के जीवन में हर प्रतीक का अपना महत्व है. हर मामले में अव्वल होने की ईमानदार कोशिश होती रहनी चाहिए. अव्वल आने पर जश्न भी मनाना ही चाहिए, लेकिन किसी देश की सफलता-असफलता ‘खेल’ से नही नापा जा सकता. खेल सफलता नही है, न ही सफलता खेल है.
    हर देश की अपनी विशेषता होती है, उनकी अपनी ख़ास संस्कृति है. मुट्ठी भर खेल थोड़े उसका मापदंड हो सकता है भला? फिर भी सरकारों को ख़ूब सुविधा देनी चाहिए खिलाड़ियों के लिए. जीते तो बड़ी बात न जीत पाए तो अगली बार.एक सीमा से ज्यादे जीत की भूख भी समाज को बीमार ही बनाती है. ऐसी हवस राष्ट्र को भी स्वस्थ नही रहने देता. ” बताइये हे नहीं संघी ज़हालत का नमूना की जीत का तो अभी कही कही दूर दूर तक नाम भी नहीं ( जीत सिर्फ गोल्ड ही होती हे ) और ये लिखता हे की ”एक सीमा से ज्यादे जीत की भूख भी ”

    Reply
  23. सिकंदर हयात

    यहाँ ये भी साफ़ कर दू की शाकाहार भी सेहत के लिए बहुत ही अच्छा होता हे जो लोग शाकाहार को घास फुस बताते हे वो मुर्ख ही हो सकते हे हमेशा की तरह दिल्ली पर बुखार का आतंक हे हमारे यहाँ भी कई को हो चुका हे तो में अपना ही बता दू की बचपन में मेरी इम्युनिटी अच्छी नहीं थी बात बात पर तीनो सीजन में मुझे बुखार जरूर होता था 95 में तो ऐसा बुखार हुआ था की भरी लू में आठ दस चादर ओढे पड़ा था उसके बाद फिर मुझे सलाद खाने का शौक लग गया सभी तरह की सलाद प्याज़ मूली गाजर खीर ककड़ी वगेरह में पुरे साल सलाद जरूर ही लेता हु उसके बाद मेरी इम्यून सिस्टम इतना बढ़िया हुआ की पिछले 21 साल से मुझे कभी भी बुखार या कोई और बीमारी नहीं हुई हे इस दौरान मेने कभी बिस्तर नहीं पकड़ा . आँखे मेरी चोट और पेसो की कमी से सही समय पर ट्रीटमेंट ना मिलने की वजह से काफी वीक हे पर बाकी बॉडी मेरी लोहे की हो चुकी हे सर्दी गर्मी लू बरसात मेरे ऊपर कोई असर नहीं डाल पाती हे मेरे कज़िन के शब्दो में ”इसे तो डेंगू के मच्छरों से पकड़ पकड़ भी कटवाओ तो भी इसे कुछ नहीं होगा ” इस इम्युनिटी सिस्टम का क्रेडिट में सलाद को ही देता हु

    Reply
  24. सिकंदर हयात

    ओलम्पिक के बाद आज के हालात पर भी चीनी मिडिया ने सही लिखा हे ”ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ‘भारत के पास काफी पैसा है लेकिन यह कुछ नेताओं, अधिकारियों और कुछ पूंजीवादियों के पास इकट्ठा हो गया है. ये सभी लोग देश में उपलब्ध धन को खर्च नहीं करना चाहते जो वास्तव में भारत के लोगों का ही है. भारत के ये एलीट लोग देश के बजाय खुद के लिए इस धन को खर्च कर रहे हैं और पीएम मोदी की अव्यवहारिक ‘मेक इन इंडिया’ जैसी स्कीम से यह उम्मीद कर रहे हैं कि विदेशी कंपनियां आकर वहां निवेश करें।’ ”

    Reply
  25. सिकंदर हयात

    संघी सोच से कैसे खेलो में कामयाबी मिलेगी सोचे ? Devanshu Jha
    22 October at 22:30 ·
    कबड्डी में भारत की जीत उतनी ही बड़ी है, जितनी बड़ी जीत क्रिकेट में भारत का दुबारा चैंपियन बनना थी । ईरान की हार में भारत का राष्ट्रवाद जीता है, नरेन्द्र मोदी की ताकत जीती है । मोदी असाधारण नेता हैं, अदभुत व्यक्तित्व जिन्होंने एक मरते हुए देश को जीने के सैकड़ों कारण दिये हैं । भारत की टीम को प्रणाम, भारत के बेजोड़ नेता के आगे नतमस्तक । भारत आगे बढ़ेगा, प्रदीप्त होगा, जलने वाले कीट पतंगों की तरह भस्म होते रहेंगे ”
    शमाएल ग़ज़नफ़र बिन फ़ाएक़
    शमाएल ग़ज़नफ़र बिन फ़ाएक़ कबड्डी की विश्व विजेता टीम एयरपोर्ट पर मायूस यह आज हिंदुस्तान की मुख्य हैडिंग है कबड्डी में भारतीय टीम को विश्व विजेता बनाने वाले खिलाड़ियों का रविवार को स्वागत करने नई दिल्ली हवाई अड्डे पर हरियाणा सरकार का कोई नुमाइंदा नहीं पहुंचा
    यह उदासीनता तब है जब 14 सदस्य टीम में प्रदेश के 8 खिलाड़ी थे क्रिकेट के प्रति दीवानगी किसी से छुपी नहीं है लेकिन पारंपरिक खेलों के प्रति सरकार के नजरिया अब भी नहीं बदला है जबकी जीत पर सोशल मीडिया पर ट्वीट कर प्रधानमंत्री अभिनेता अमिताभ बच्चन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह खेल मंत्री अनिल गोयल क्षेत्र की बड़ी हस्तियों ने बधाई दी थी इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर पहुंचे कबड्डी खिलाड़ियों की सुरक्षा उनके घर तक पहुंचाने और स्वागत की चिंता किसी ने नहीं दिखाई घर पर माँ ने तिलक लगाकर किया स्वागत #माता की जय

    Reply

Add Comment