Rio-LOGOओलम्पिक दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन होता हे फुटबॉल जैसे खेल को छोड़ दे तो बाकी सभी खेलो में वर्ल्ड कप चेम्पियन होने से भी अधिक सम्मान और गौरव की बात ओलम्पिक चेम्पियन होना या ओलम्पिक में कोई भी पदक जीतना माना जाता हे सभी खिलाड़ियों के लिए कहा जाता हे की वो अपना बेस्ट ओलम्पिक के लिए बचा कर रखते हे ओलम्पिक में जीत क्या मायने रखती हे इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाइये की ओलम्पिक चेम्पियन खिलाडी फिर ताउम्र ओलम्पिक चेम्पियन ही कहलाता हे उसे पूर्व चेम्पियन नहीं कहा जाता हे रियो ओलम्पिक में उमीद तो थी की भारत पहली बार दो अंको में मैडल जीतेगा ( वैसे जीत तो सिर्फ गोल्ड ही होती हे इसलिए टेली सिर्फ गोल्ड से ही बनती हे लेकिन ओलम्पिक भावना की वजह से बाकी दो ओलम्पिक पदको का भी भारी सम्मान होता हे ) हर बात की तरह ही हमारे पी एम् की भारत को पदक जिताने के विषय में कुछ भी लफ़्फ़ाज़िया सामने आयी थी लेकिन नतीजा पिछले तीन ओलंपिक में सबसे ख़राब प्रदर्शन के रूप में सामने आया सवा अरब के देश की ओलम्पिक या कहे की खेलो में ही असफलता कितनी जबरदस्त हे इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइये की दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश हॉकी टीम से इतर सिर्फ एक गोल्ड मैडल सौ सालो के इतिहास में ले पाया हे वो भी पसीने के कम और एकाग्रता के खेल में ( अभिनव बिंद्रा शूटिंग ) इससे भी ज़्यादा शर्मनाक बात की भारत से दस नहीं बीस गुना अधिक मैडल और गोल्ड मैडल सिर्फ कुछ देशो ने भी नहीं बल्कि सिर्फ कुछ खिलाड़ियों ने अकेले ही जीत रखे हे जेसे की माइकल फेल्प्स बोल्ट कार्ल लुइस नुरमी आदि पदको की लिस्ट पर गौर करे तो कई कठमुल्लावादी हास्यपद पाबंदियों वाले बिहार से भी छोटे देश ईरान तक ने तीन गोल्ड और टोटल 8 मैडल जीते पूर्व युगोस्लाविया के कई टुकड़े हुए थे उसके टुकड़े के भी टुकड़े से बना शायद हमारी किसी बड़ी विधानसभा सीट से भी छोटा देश कोसोवो तक एक गोल्ड जित लेता हे इसके अलावा भारत से भी अधिक भ्र्ष्टाचार और गृहयुद्ध , छोटे छोटे और अराजकता गरीबी भुखमरी बेहद कम आबादी के देश जैसे जॉर्जिया अल्जीरिया उज्बेकिस्तान इथोपिया अजरबेजान कोलोम्बिया मिस्र ट्यूनेशिया जोर्डन जैसे देशो ने भी ओलम्पिक में भारत से तो बहुत बेहतर किया हे!

अब आप देखे की हमेशा की तरह इस भयंकर हार के बाद चारो तरफ हज़ारो लेख छप रहे हे जिसमे हार की चीर फाड़ हो रही हे और वो ही कारण बताय जा रहे हे जो की उन छोटे छोटे देशो में भी हे ही जिनका पर्दशन भारत से तो बहुत बेहतर रहा ही जैसे क्रिकेट जैसे आरामतलब फालतू खेल के लिए दीवानगी सुविधाओ की कमी भ्र्ष्टाचार नेताओ की मनमानी आदि आदि ये सब भी सही हे और ये भी सच हे की पिछले सालो में फिर भी क्रिकेट से इतर खेलो के लिए फिर भी हालात बनिस्पत बेहतर ही हुए हे पहले तो ये हाल था की जीत पर भी कुछ नहीं मिलता था जबकि अब खिलाड़ियों को कम से कम इतना तो पता हे की एक जीत उन्हें करोड़ो में लाद देगी दूसरे खेलो को अब स्पांसर भी मिलने लगे ही हे वो भी अब ठीक ठाक कमा रहे ही हे वार्ना भारत के कितने ही पुराने ओलम्पिक एशियाड होकि फुटबॉल के खिलाड़ियों की दुदर्शा की खबरे आती रही हे वास्तव में अगर भारत जैसे की आस लगाई गयी थी दस बीस ओलम्पिक मैडल जीत लेता तो भी वो चीन जैसे देश से सात गुना कम ही होते वो भी बड़ी विफलता ही होती तब ये जो कारण विभिन्न लेखों में आजकल चारो तरफ पेले जा रहे हे जिनमे हालात को सुविधाओ को फण्ड की कमी नेताओ आदि को कोसा जा रहा हे तब तो वो सही होते और हे भी . और चलिए मान लिया की चारो तरफ छप रहे लेखों की बात मान भी ली गयी जैसे ये बता रहे हे वैसे हो भी गया और भारत ने अगली बार दो की जगह दस भी मैडल जीत भी लिए ( गोल्ड की तो बात ही ना करे ) तो भी तो हम चीन जैसे देशो से बहुत बहुत बहुत पीछे होंगे ही ——– ? भारत की ओलम्पिक में विफलता तो शायद मानव इतिहास की ही खेलो में सबसे बड़ी विफलता कही जा सकती हे आखिर क्यों इतना बड़ा देश जहां अब अरबपतियों करोड़पतियों लखपतियों की कतार लगी हे ( अभिनव बिंद्रा ने भी शायद खुद की ही वेल्थ के दम पर सुविधाय जुटा कर भारत का एकलौता नॉन हॉकी गोल्ड जीता था ) वो इथोपिया जैसे अकालग्रस्त भुखमरे जैसे देश से भी पिछड़ा हुआ हे मेरा अन्दाज़ा हे की भारत की खेलो में इस अदभुत विफलता का सबसे बड़ा राज़ हे ”हिन्दू कठमुल्लावाद ” !

भारत में सबसे अधिक पैसा और संसाधन इसी हिन्दू कठमुल्लावादी सोच और वर्ग के पास ही हे और साफ़ हे की ये वर्ग ना तो खुद खेलो में कुछ करता हे ( हिंदुत्व की प्रयोगशाला पेसो में सबसे आगे पर खेलो में फिसड्डी ) ना ही किसी और को ही कोई प्रोत्साहन देता हे जैसे की चीनी मिडिया ने साफ़ साफ़ लिखा हे की भारत की खेलो में इतनी बेमिसाल विफलता का एक बड़ा राज़ हे शाकाहार . और शाकाहार पर सबसे अधिक जोर भारत में हिन्दू कठमुल्लावादी वर्ग ही देता हे अगर में गलत नहीं हु तो इस वर्ग की हरकत देखिये की इसने शाकाहार के नाम पर शायद मध्यप्रदेश में गरीब आदिवासी दलित बच्चो से अंडा तक बन्द करवाने की कोशिश की थी इसका मतलब ये नहीं हे की में शाकाहार के खिलाफ हु नहीं शाकाहारी होना भी बहुत अच्छी और सेहतमंद बात हे मगर क्या करे की अधिकतर खेलो में जीतने के लिए आपको सिर्फ सेहतमंद और रोगों से दूर ही नहीं रहना होता हे बल्कि बहुत ही ज़बरदस्त दमखम भी चाहिए होता हे ( इस दमखम की हमारे देश में कितनी कमी हे की अंदाज़ा लगाइये जिस क्रिकेट के लिए भारत में इतनी दीवानगी हे इतनी सुविधाय हे उस तक में भारत आज तक एक भी शुद्ध खूंखार फास्ट बोलर देने में विफल रहा हे इस विफलता को इस तरह से ढंका गया की भारत के बनियो ने क्रिकेट को अपने पेसो और आबादी के दम पर अपने कब्ज़े में लेकर फ़ास्ट बोलिंग को ही बधिया करवा दिया उसका रूप ऐसा बदलाhttp://khabarkikhabar.com/arch ives/1770 की पिछले दिनों महान फ़ास्ट बोलर ग्लेन मैक्ग्रा ने भी शिकायत की की अब फ़ास्ट बोलिंग बर्बाद हो रही हे लेकिन ये सब मक्कारियां चालाकियां और पेसो का रुतबा क्रिकेट जैसे दुनिया के लिए बेमतलब बेमकसद फालतू और आलसियों के खेल में तो चल सकता हे बाकी खेलो ओलम्पिक एशियाड कॉमनवेल्थ और फुटबॉल आदि में नहीं ) इस दमखम के लिए जो खाना जरुरी होता हे वो खाया जाता ही हे साइना नेहवाल की ही बात करे तो वो शुद्ध शाकाहारी थी मगर कोच पुलेला गोपीचंद की सलाह मानकर उन्होंने चिकन खाना शुरू किया और मैडल जीते अब चाहे तो वो और मैडल जीत जीत कर अपना कॅरियर खत्म कर फिर से वेजेटेरियन हो जाए तो कोई हर्ज़ नहीं हे .

अब अंदाज़ा लगाइये देश की सबसे अधिक वेल्थ को अपने कब्ज़े में लिए बैठा हिन्दू कठमूल्लवादी कट्टरपन्ति वर्ग ने शुद्ध शाकाहार के प्रति कट्टरपंथ दिखाकर भारत को खेलो में कितना नुक्सान पहुचाया होगा इसी कारण ये वर्ग खुद भी खेलो में कुछ भी तो ना कर सका हे —- ? ऊपर से कोढ़ में खाज ये भी की इस वर्ग ने खेलो में खुद तो कभी कुछ किया ही नहीं देश का भारी आर्थिक शोषण करके देश में भारी असमानता फैलाकर इसने दुसरो को भी खेलो में कुछ नहीं करने दिया करे कैसे भला जब आर्थिक शोषण लूट और असामनता की वजहों से देश के एक बड़े हिस्से को तो रोटी कपड़ा मकान की समस्याओ से ही कोई निजात नहीं हे खेलो के लिए ऊर्जा कहा से लाये ज़ाहिर हे शाकाहार के प्रति इस वर्ग की सनक को सम्मान ही दिया जा सकता था की भाई जब आपको जानवरो से इतना प्रेम हे तो इंसानो से दस गुना अधिक होना चाहिए था मगर ये वर्ग कभी भी इंसानो के शोषण से बाज़ नहीं आया शोषण लूट भी ऐसी जो शायद ही दुनिया में कही और भी होती हो प्रेमचंद की ” सवा सेर गेंहू ” जैसी शोषण की कहानिया शायद ही किसी और देश में लिखी गयी हो यानी बात बिलकुल साफ हे यानी जब तक देश के सबसे अधिक संसाधन और पैसा हिन्दू कट्टरपन्ति कठमुल्लावादी वर्ग के कब्ज़े में रहेंगे तब तक भारत की खेलो में इसी तरह से दुदर्शा होती रहेगी और हमें क्रिकेट की फ़र्ज़ी खरीदी हुई फालतू उपलब्धियों पर बाकी खेलो में इक्कादुक्का व्यक्तिगत उपलब्धियों से ही सन्तोष करना पड़ेगा और दुनिया हम पर हँसती रहेगी