dalitहाँ बहुत ग़रीब है
दाना मांझी
इसीलिए
ढोनी पड़ रटी है
एक चादर में
पाँव उसके भी
हैं चादर से बाहर
ग़रीब ज़िंदा हो
या हो मुर्दा
पाँव उसके सदा ही …..
और घर
अस्पताल से सिप़र्फ ही है उसे
पत्नी की लाश
रखकर सर पर
अस्पताल से घर तक
लाश जो लिप
साठ किलोमीटर ही तो है
उसका घर
जिस रास्ते से
जा रहा है
दाना मांझी
पत्नी की लाश
और
बारह बरस की
रोती-बिलखती
बेटी के साथ
अकेला
पर
अकेला कहाँ है दाना मांझी?
रास्ते के दोनों ओर
खड़े हैं बहुत से लोग
लिए हुए हाथों में
अपने-अपने मोबाइल पफोन
बना रहे हैं वीडियो
जिसे अपलोड करेंगे
सोशल मीडिया पर
दाना मांझी जब
थक जाता है
कुछ दूर चलने के बाद
तो उतारकर रख देता है शव
ध्रती पर
साथ चल रहे लोग भी
रुक जाते हैं
देखने के लिए ये
कि कैसे दोबारा
दाना मांझी उठाएगा
अपनी पत्नी का शव
ले जाने के लिए
साठ किलोमीटर दूर स्थित
अपने गाँव
कोई नहीं देता
दाना मांझी की
पत्नी की अरथी को
कंध
दें भी तो कैसे?
अरथी कहाँ है?
अरथी तो बनती है
मृतक की चारपाई की
बाहियाँ निकालकर
ग़रीब के पास
कहाँ होती है चारपाई
चारपाई के बिना
कैसे बने अरथी
हम अरथियों को
बड़ी-बड़ी अरथियों को
कंध देते हैं
हम वो हैं
जो
अपनी लाश ख़ुद
अपने कंधें पर
ढोते हैं
हम ख़ुद मुर्दा हैं
और ये निराली शवयात्रा
सिप़र्फ दाना मांझी की
पत्नी की शवयात्रा नहीं
ये शवयात्रा है
हमारी संवेदनहीनता की
ये शवयात्रा है
हमारे समाज की निरर्थकता की
ये शवयात्रा है
हमारे प्यारे राष्ट्र की
राष्ट्र जो सारे जहाँ से अच्छा है
उस अच्छाई की नपुंसकता की
और आप?
आप क्यों कसमसाने लगे
ये शवयात्रा है
आपकी
मेरी
हम सब की

 

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