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अलीगढ़ के कुंवर पाल सिंह जी जन्म 1937 अलीगढ़ में ही पले बढे पढ़े और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से तीन दशक तक जुड़े रहे और 1997 में कला संकाय के डीन और हिंदी विभाग के अध्य्क्ष पद से 1997 में सेवानिर्वत्त हुए उनकी किताब ”साहित्य और हमारा समय ” के एक लेख”कुलीन संस्कर्ति बनाम जन संस्कर्ति” में उन्होंने अलीगढ़ के मुस्लिम मार्क्सवादियों का रोचक वर्णन किया हे पेश हे कुंवर पाल सिंह जी के लेख के कुछ अंश ————————- एक थे लाल सिद्दीक जब पार्टी पर प्रतिबंध था और जिले के तमाम नेता जेल चले गए तो वो जिला पार्टी के मंत्री हो गए घोर क्रन्तिकारी स्वयं अभिजात वर्ग से थे और उस संस्कर्ति का जाने अनजाने प्रदर्शन भी करते थे . 1950 में वे अंडर ग्राउंड थे बस से किसी देहात जा रहे थे सर पर साफा , धोती पहनकर ऊपर से बढ़िया विलायती ओवरकोट पहने हुए थे और इस किसान वेशभूषा में पाइप पी रहे थे किसी किसान ने उन्हें पहचान लिया और पूछा सिद्दीक साहब ये क्या हुलिया बना रखा हे उन्होंने पूछा तुमने मुझे कैसे पहचान लिया में तो अंडर ग्राउंड हु आपका ओवरकोट और पाइप देख कर किसान ने कहा . उनके बारे में एक और लतीफा मशहूर हे उन्होंने एक नौजवान महिला पार्टी कॉमरेड को मेंडेट किया की तुम मुझसे शादी करो ये परतु हित में हे यह मामला प्रांतीय पार्टी तक गया तब उस महिला कामरेड को राहत मिली अब पूछेंगे लालसिद्दिक कहा हे ? कश्मीर के उग्रवादियों के पक्ष में पुस्तके और लीफलेट लिख रहे हे वो भी मार्क्सवाद के फ्रेम वर्क में इन अभिजात्य लोगो की एक पूरी क्लास रही हे जिन्होंने अपने हित में पार्टी का इस्तेमाल किया और जब मौका लगा तो पार्टी को छोड़ दिया 42 साल के पार्टी जीवन में ऐसे कई लोगो को जानता हु!

वर्ग सहयोग की राजनीति के प्रवक्ता जेड ए अहमद थे अलीगढ़ पार्टी के इंचार्ज वे जब भी आते हमें यह समझते की कोंग्रेस में एक बहुत बड़ा प्रगतिशील तबका हे वह पर्तिकिरियावादियो से घिरा हुआ हे उनकी हमें मदद करनी चाहिए वे समाजवादी शक्तियों को मज़बूत करने में हमारा हाथ बटाएंगे और फिर धीरे से कहते थे वे लोग भी हमारी पूरी मदद करने को तैयार हे हम नौजवान उनसे पूछते थे ” कामरेड अहमद क्या कोंग्रेस सरकार हमारी मदद करके अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारेंगी वो डांटेते ——————- में जन कवि मूढ़ जी की बात से इस प्रसंग को समाप्त करना चाहता हु . डॉ अहमद की बात से आहात होकर उन्होंने कहा था- मेने तो ऐसा मुर्ख जमींदार और पूंजीपति नहीं देखा जो अपनीजड़ खोदने के लिए आपको औजार उपलब्ध कराय !

पिछले दशक ( नब्बे का ) में यह तय हो गया हे की देश की एकता अंखडता बिना मार्क्सवादियों के सम्भव नहीं हे साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष भी मार्क्सवादियों के बिना अकेले सम्भव नहीं हे धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई बिना वामपंथी राजनीति के आधार के बिना नहीं लड़ी जा सकती हे यदि कोई सांस्क्रतिक या साहित्यिक संस्था यह दम भर्ती हे की वे केवल साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हे उन्हें किसी राजनति से कोई अर्थ नहीं हे तो वे स्वयं तो भर्मित हे ही , समाज में भी भरम का कुहासा फैलाते हे वे यह भूल जाते हे की साहित्य कला और सन्सक्रति का भी एक वर्गीय आधार होता हे उस मूलाधार को छोड़ कर इनकी इस्थिति कटी पतंग की तरह होती हे जिन्हें हवा के झोंके कहा फेंक दे कोई नहीं बता सकता !

इस बात को स्पष्ट करने के लिए में कुछ और उदाहरण देना चाहता हु पचास और साठ के दशक में अली सरदार जाफरी का एक क्रन्तिकारी व्यक्तिव और कवि के रूप में बहुत नाम था हम नौजवानों को उनके तथा उनके काव्य के प्रति बड़ा आकर्षण था उन्ही दिनों स्टूडेंट फेडरेशन के उमीदवारो ने छात्रसंघ के चुनावो में भारी सफलता प्राप्त की . हम लोग बहुत प्रसन्न थे उन्ही दिनों सरदार जाफरी अलीगढ़ आये थे हम दस छात्र उनसे मिलने उनके साले साहब के बंगले फलकनुमा पर पहुचे उनकी सुराल बहुत कुलीन घराने से थे हम लोगो ने उत्स में उन्हें अपनी सफलता सुनाई और उमीद थी के वे जरूर हमें शाबाशी देंगे हमारे साथ इंजिनयरिंग के दो बहुत सकिर्य साथी मकसूद हामिद रिजवी और सिराजुरहमान भी थे जाफरी साहब ने उन दोनो की और मुखातिब होकर कहा की ” भाई पढ़े लिखो ये राजनितिक काम उतने महत्वपूर्ण नहीं हे जितना की अपना कॅरियर बनाना पढ़ो लिखो और अच्छे नंबर लाओ इस समय समय की यही मांग हे . एक घंटे की बातचीत में कम से कम दस बार उन्होंने पंडित नेहरू और इंदिरा गाँधी का नाम लिया उनसे मिलकर हम लोग बहुत दुखी और परेशान हुए मकसूद ने तो जाफरी साहब को कुछ सख्त बाते भी कही जाफरी साहब ने कहा आज की सबसे बड़ी आवश्यकता हे पंडित नेहरू और इंदिरा गाँधी के हाथ मज़बूर करे ताकि देश को पर्तिकिर्यावादी और साम्प्रदायिक शक्तियों से बचाया जा सके . सरदार जाफरी व्यक्ति नहीं थे बल्कि पार्टी के भीतर पनप रही वर्ग सहयोग की राजनीती के प्रतिनिधि थे किसान मज़दूरों के गीत गाते गाते वे और उनके बहुत से सहयोगी नेहरू की कुलीन संस्कर्ति का गुणगान कर रहे थे इस पर विस्तार से कहने की आवश्यकता नहीं हे कोंग्रेस ने अपनी अवसरवादी नीतियों असैद्धान्तिक समझोतो से सम्पर्दयिकता जातिवाद और क्षेत्रीयता को जिस तरह से बढ़ावा दिया वह राजनीति का अ ब स जाने वक हर व्यक्ति भली भांति समझता हे !
(वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक” साहित्य और हमारा समय ” लेखक कुंवर पाल सिंह , से साभार )