ALIGARH
प्रस्तुति — सिकंदर हयात

अलीगढ़ के कुंवर पाल सिंह जी जन्म 1937 अलीगढ़ में ही पले बढे पढ़े और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से तीन दशक तक जुड़े रहे और 1997 में कला संकाय के डीन और हिंदी विभाग के अध्य्क्ष पद से 1997 में सेवानिर्वत्त हुए उनकी किताब ”साहित्य और हमारा समय ” के एक लेख”कुलीन संस्कर्ति बनाम जन संस्कर्ति” में उन्होंने अलीगढ़ के मुस्लिम मार्क्सवादियों का रोचक वर्णन किया हे पेश हे कुंवर पाल सिंह जी के लेख के कुछ अंश ”कुंवर पाल सिंह- अलीगढ़ के पुराने मार्क्सवादियों में सबसे ईमानदार जिनमे वैचारिक स्पष्ठता भी थी वे थे प्रो अब्दुल अलीम . प्रो अब्दुल अलीम प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम लखनऊ सम्मलेन से ही उसकी पृष्ठभूमि में रहे . 1936 से 1950 तक सभी महत्वपूर्ण प्रस्ताव सविधान की संरचना उसमे परिवर्तन आदि में प्रो अलीम की अग्रणी भूमिका रही दुर्भागयवश उन्हें वह महत्व नहीं मिला जिसके वो अधिकारी थे हिंदी उर्दू के परेशान को हल करने और दोनों भाषाओ को निर्धारित करने में डॉ अलीम और रामविलास शर्मा की समिति बनाई है थी ———-अलीम साहब का एक दिलचस्प प्रसंग हे जो आप लोगो के साथ बाटना चाहता हु 1968 से लेकर 1974 तक वे अलीगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति रहे . कुलपति बनने के बाद जब पहली ईद पड़ी तो बहुत से छात्र और अध्यापक उन्हें ईद की नमाज़ पढ़ने के लिए साथ ले आये . अलीम साहब ने कहा मेने तो कभी नमाज़ नहीं पढ़ी अब क्यों पढू लोगो ने कहा अब आप वाइस चांसलर हे अलीम साहब मुस्कुराये और बोले ये मेरे और अल्लाह के बीच का मामला आप लोग क्यों परेशान होते हे वाइस चांसलर होने के साथ साथ में अब्दुल अलीम भी हु में ईद का त्यौहार मनाता हु किसी तरह की इबादत नहीं करता अलीगढ़ के वाइस चांसलर का चाहे वो धार्मिक हो या नहीं , मस्ज़िद में न जाना अकल्पनीय था !

उन दिनों इंदिरा गाँधी का समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जोरो पर थी लेकिन अलीम साहब विश्विद्यालय की साम्प्रदायिक शक्तियों से बराबर समझौता कर रहे थे . हम लोग बहुत परेशान थे . एक इतवार की सुबह में में अलीम साहब के यहाँ पंहुचा मेने अपनी और साथियो की व्यथा कथा कही और कहा आप तो हम सबके नेता रहे हे हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिकता के खिलाफ आपने हमें लड़ना सिखाया फिर आप ये अनुचित समझौते क्यों कर रहे हे अलीम साहब बहुत देर तक चुप रहे उनके चहरे पर यह पीड़ा झलक रही थी काफी देर बाद मुझसे बोले तुम ठीक कहते हो मुझे यह समझौते नहीं करने चाहिए मेरा जी चाहता हे की ये वाइस चांसलरी छोड़ दू पर संघर्ष करते करते थक गया हु इसलिए यह कर रहा हु हर मध्यवर्गीय क्रन्तिकारी की यही नियति होती हे जब वाइस चांसलर बना था तो सोचा भी न था की इस तरह के अनुचित दबाव होंगे मेने पूछा कैसे दबाव डॉक्टर साहब , वे बोले मेडम गाँधी और कोंग्रेस के बड़े मंत्रियो के दबाव वे तीन चार दिन पहले ही इंदिरा गाँधी से मिले थे मेडम ने उनसे कहा था डॉक्टर साहब आप मुसलमानो को खुश रखिये आपकी और डॉक्टर नुरुल हसन की वजह से वे मुझसे नाराज़ हे अलीम साहब ने श्रीमती गाँधी से कहा मेडम कोंग्रेस के मुस्लिम नेता और मंत्री अनुचित कामो के लिए कहते हे जिसमे साम्प्रदायिकता की भी बू आती हे यह मेने जीवन में कभी नहीं किया श्रीमती गाँधी को यह बात अच्छी नहीं लगी उन्होंने कहा में यह सब नहीं जानती . अलीगढ़ के मुसलमानो की शिकायत नहीं आनी चाहिए मुझे उनके वोट चाहिए अलीम साहब व्यथित स्वर में बोले जी तो यह किया की उन्हें तुरंत इस्तीफा सौप दू लेकिन मज़बूरी हे की में यह नहीं कर सकता मेने कहा डॉक्टर साहब में आपकी मज़बूरी समझ गया आइंदा आपसे ऐसे सवाल नहीं करूँगा उनकी यह कितनी ईमानदार स्वीकाररोक्ति थी आज तो लोग चोरी भी करते हे और सीनाजोरी भी अपने गलत कामो और नीतियों को सैद्धान्तिकता जामा पहनाकर अपनी बौद्धिकता का आतंक फेल रहे हे !

भीष्म साहनी की एक कहानी हे नया मकान एक भूतपूर्व क्रन्तिकारी की कथा व्यथा बहुत कलात्मक ढंग से चित्रित हे इस कहानी में —————————– भीष्म साहनी की कहानी से पूर्व इस प्रकार के व्यक्तियों के सम्बन्ध में कामरेड हनीफ हाश्मी ( शहीद सफ़दर हाशमी के पिता ) मुझे बताते रहे आपसे सच कहु तब मेने उनकी बातो के यकीन नहीं किया कामरेड हनीफ हाशमी पुराने कम्युनिस्ट थे और जनसंघर्षो के उनके व्यापक अनुभव थे न किसी से समझौता किया न किसी के सामने हाथ फैलाया . बेहद शांत सौम्य गंभीर . मार्क्सवाद में अपूर्व आस्था और पार्टी के प्रति समर्पित व्यक्तित्व . में अक्सर उनसे मिलने उनके घर जाता था वे बहुत सी बाते करते वे कहते ‘ कामरेड जब तक हम निरंतर अपने को डी क्लास नहीं करते रहेंगे अपनी आत्मालोचना नहीं करेंगे तब तक हम अच्छे कम्युनिस्ट नहीं रह सकते . अपनी थ्योरी और प्रेक्टिस की खाई निरंतर कम करते रहिये और कुलीन कम्युनिस्टों के प्रभाव से बचते रहिये इन लोगो के बीच में अजीब अंतर्विरोध हे , दो नावों पर बराबर सवार रहने की कोशिश करते हे . वर्ग संघर्ष की जगह वर्ग सहयोग की राजनीति में इनकी अधिक दिलचस्पी हे जन संघर्षो से बचते हे जनता की वास्तविक समस्या से इनका परिचय अखबार और किताब के माध्यम से ही हे में कई बार उनसे सवाल करता , कामरेड हाशमी इनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका रही हे ‘ वे हसंते हे , हमें स्वीकार करना चाहिए लेकिन क्रन्तिकारी आंदोलनों में इनकी बहुत सीमित भूमिका रही हे ये लोग बहुत परिश्रमी लोग हे इनका अध्ययन भी बहुत व्यापक हे लेकिन साधारणजन को इनके ज्ञान का लाभ नहीं होता ये अपने ही वर्ग के लोगो को समझते रहते हे और उन्ही की प्रशंसा चाहते हे ———————-

आप कामरेड हनीफ हाशमी के बारे में जानना चाहते होंगे वे इतिहास विभाग में एक मामूली कर्मचारी थे और जिस सेक्शन में वो काम करते थे उनके बॉस के वे भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठने पर जब किसी कम्युनिस्ट ने उनका साथ नहीं दिया तो वे नौकरी छोड़ कर दिल्ली ( अलीगढ़ से ) चले आये जहां उनकी पत्नी अध्यापिका थी हाशमी साहब बेहद जुझारू व्यक्ति थे अपने सिद्धांतो के लिए कोई खतरा उठने में समर्थ थे मुझे एक घटना याद आ रही हे 1965 के भारत पाक युद्ध के बीच पार्टी पर बहुत दबाव पड़ा पुरे देश में उन्माद की इस्थिति थी पाकिस्तान और मुसलमानो के पार्टी नफरत की हवा बाह रही थी कामरेड ई एम एस नम्बूदरीपाद ( दुनिया की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार 1957 केरल बनने वाले ) उत्तर भारत का दौरा कर रहे थे हम लोगो ने उन्हें अलीगढ़ भी आमंत्रित किया कामरेड ई एम एस नम्बूदरीपाद के कार्यक्रम के लिए तैयारी समिति की बैठक होनी थी कांग्रेस सरकार और आर एस एस का उन दिनों बड़ा भ्रातभाव था इस उन्माद और युद्ध का विरोध करने वाले हर व्यक्ति को देशद्रोही ठहरा रहे थे . हमारे कई मार्क्सवादी बुद्दिजीवियों के घर ऐसे थे जहां बैठक हो सकती थी मगर नहीं हुई . कामरेड हाशमी ने अपने छोटे से घर में बैठक रखी उन्होंने न सरकारी दमन की परवाह की न आर एस एस की गुंडागर्दी की . उनके ही सुझाव पर हम लोग झंडे में मज़बूत डंडे लगाकर स्टेशन पहुंचे थे कामरेड ई एम एस आये और हम लोग भी अच्छी संख्या में थे लेकिन यूथ कांग्रेस और आर एस एस के लोगो का प्रदर्शन भी स्टेशन पर हुआ . आर एस एस के लोगो ने घोषणा की थी की हम लोग ई एम एस को शहर में नहीं घुसने देंगे हम नौजवानों ने कामरेड ई एम एस को चारो और से घेर रखा था कांग्रेस और आर एस एस के लोग निरंतर धक्के मार रहे थे और गालिया बक रहे थे और ई एम एस की और बढ़ रहे थे पुलिस मूकदर्शक बानी एक और खडी थी जब इस्तिथि बेकाबू होने लगी तो कामरेड हाशमी ने झंडे को जेब में रखा और डंडा निकाल कर पिल पड़े और आह्वान किया मारो —- इस इस्तिथि के लिए ये देशभक्त सूरमा तैयार नहीं थे और दस मिनट में दम दबा कर भाग गए अलीगढ़ में ई एम एस की शानदार मीटिंग हुई जिसकी अध्यक्षता प्रो अब्दुल अलीम ने की थी ————- जारी
(वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक” साहित्य और हमारा समय ” लेखक कुंवर पाल सिंह , से साभार )