kashmir

अरे कहाँ उलझे हैं आप लोग ? कहाँ आप काश्मीर में सेना की ज़्यादती और वहाँ विरोध कर रहे लोगों पर चल रहे पैटेल बुलेट पर रोना रो रहे हैं जो सैकड़ों लोगों को अंधा कर चुकी हैं और चालीस लोगों को मार चुकी है। सवाल यह है ही नहीं कि बुरहान वानी आतंकवादी था कि नहीं , बिलकुल आतंकवादी था इसके बावजूद कि उसपर मरते दम तक हिंसा की घटना का एक आरोप नहीं लगा , सेना और भारत की व्यवस्था में भी उसके विरुद्ध एक एफआईआर तक दर्ज नहीं। वह सोशलमीडिया में भारत विरोधी बयान देता था जो उसको मारने के लिए काफी था। अब 1925 से मेरी मंशा आपको मारना है तो , आप भोंकते रहिए मैं अपना काम करूंगा ही ? आईये छोड़िए यह सब बातें को , काश्मीरियों को मरने दीजिए और देश में कुछ लोगों को उनके मरने पर जश्न मनाने दीजिए । स्कोर करने दीजिए , पोस्ट करने दीजिए कि दाल का रेट भले ₹400/= किग्रा हो जाए काश्मीर में विकेट गिरते रहना चाहिए। खून की नदियाँ बहने दीजिये ? इंसानियत का बलात्कार होने दीजिये ? अरे आप भी तो जिम्मेदार हैं इन सबके ? गली गली में , भाई भाई में फिरका ? जातियों में बंट जाना ? अलग अलग इबादतगाह बना लेना ? अरे इंसान के रूप में पैदा हुवे थे , मुसलमान होने के लिए और आज खाना बदोशी भी हाथ से निकालने वाली है ?? एक नज़र इधर भी दौराओ ज़रा क्या ऐसा नहीं लगता की हिंदुस्तान उंदुलुस बनने के कगार पर है ??

आईये यह देखिए अपनी औकात !! “विकास उर्फ बालेश्वर उराँव” को , इसके सर पर देश की शासन व्यवस्था ने ₹25 लाख का इनाम रखा था जो आज झारखंड के डीजीपी डी के पांडेय से गले मिल रहा है। जानते हैं “विकास उर्फ बालेश्वर उराँव” कौन है ? एक शरीफ नक्सलवादी जिसपर लातेहर में 37 मुकदमे दर्ज हैं , गढ़वा में 17 और छत्तीसगढ़ में 22 कुल 76 अपराधिक मुकदमे दर्ज हैं जिनमें अधिकतर घटनाओं में पुलिस और सेना के चिथड़े चिथड़े कर दिये जाने के हैं। बारूदी सुरंग विशेषज्ञ यह “विकास” सैकड़ों सैनिक और अर्धसैनिकों के चिथड़े उड़ा देने का आरोपी है।
काश्मीर के लोग ऐसे किसी भी व्यवहार के हकदार नहीं हैं उनके लिए सिर्फ़ गोली है जो सीधे कब्र तक पहुँचाती है। ध्यान रखिएगा कि यह दोगलापन ही काश्मीरियों को हमसे और भारत से दूर कर रहा है । ** दरूनी जातिगत ब्यावस्था हैम और इन सब के असल जिम्मेदार हम खुद भी हैं हमारे नेता भी हैं ? हमने खुद में वो हस्ती पैदा ही नहीं की आपस में लड़ते रहे दूसरों को अपना रहनुमा का ताज पहनाते रहे ? खुद के मसले हल नहीं किए और पड़ोसी को मदद देने चले गए ?

आज सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि दलित वोट के दम पर राजनीति करने वाली पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत करने में व्यस्त हैं। पिछले लोकसभा चुनावो मे मायावती जगह-जगह बोल रही थीं कि मोदी की सत्ता का आना खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लग रहा था। लेकिन यह बात सभी लोग जानते हैं कि 1995 तक कोई भी पार्टी भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन जैसे ही 1996 में मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन लग गई। एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की यही भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और राजनीतिक ताकत बढने की वजह बनी। ।हद तो तब हो गयी जब सत्ता के तात्कालिक लाभ के लिये गुजरात दंगों के बाद 2004 मे वो मोदी के पक्ष मे प्रचार के लिये गुजरात तक चली गयीं।*************एक बा – असर आबादी के बाद भी हम थाली के बैगन हो कर रह गए हमने खुद गलती की ”दोस्तों याद रखना ! जो क़ौम अपने वफादार को इनाम और गद्दार को सजा ना दे सके वो क़ौम गुलाम हो जाती है ” । संघियों की मानसिकता समझना आपकेसात पुश्तों को भी नहीं समझ मे आएगी ? आपकी यानि मुसलमानो की जो जातिगत ब्यावस्था है वो ही हमारी कमजोरी है और इसी का फायेदा विदेशी यूरेशियन बाभन उठा रहे हैं ??

बाभनों की जो व्यवस्था है उस व्यवस्था को मूलनिवासियों पर थोपने का जो कार्यक्रम है उस कार्यक्रम को ब्राह्मणीकरण कहते हैं। क्योंकि बाभनों का जो धर्म है, उसे ये कहते हैं कि वह धर्म है। किन्तू हम कहते हैं कि वो एक षड्यंत्र है?? इस षड्यंत्र को भारत का मुस्लिम कुछ हद तक अब समझने लगा है।यूरेशियन ब्राह्मणों ने समाज नहीं बल्कि मूलनिवासियों को विभाजित करने का षड्यंत्र रचा था । यानि 3.5% ब्राह्मण 90% पर रूल कर सकें परन्तु और किन्तु का कशमकश एक नई धारा को जन्म दे देगी ये इन ब्राह्मणो को जब पता चला तो तिलमिलाहट मे जो दूरगामी परभाव , खतरनाक तो था ही बल्कि इनहोने इसे अपने अस्तित्व को हिला देने का दर सताने लगा । इसलिए इसे तत्काल लागू करना पड़ा । इसको आप ऐसे समझ सकते हैं ;-वे वर्ण व्यवस्था बनाकर हमें विभाजीत करते हैं फिर वर्ण व्यवस्था का विखंडन शने शने बिखण्डित होकर जाति व्यवस्था बनती जाती है और तब समाज चार टुकड़ों में विभाजित होने की बजाय 6000 हजार टुकड़ों में विभाजित हो जाता है ।अब यही प्रक्रिया अल्पसंख्यको के साथ भी रही । हमारे जितने टुकड़े होते है उतनी ही प्रभावशाली ढ़ंग से प्रतिकार करने की हमारी जो क्षमता है, वह कमजोर होती जाती है। चूंकि दुश्मन ( बाभन ) शेष मूलनिवासियों को गुलाम बनाए रखना चाहता है, और दबाना चाहता है । **दुनिया में प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है।** यह एक वैज्ञानिक नियम है मगर शासक जाति के लोगों ने योजना बनायी कि हम क्रिया तो करेंगे किन्तू लोगों को प्रतिक्रिया करने लायक नहीं छोड़ेंगे। इसलिए उन्होंने हमें हजारों जाति के टुकड़ों में विभाजित कर, जाति की उपजातियां बनाकर हमें प्रतिकार विहीन बना दिया । जब उपजाति बनाकर प्रतिकार विहीन बनाया जाता है तब कोई भी समूह अपने उपर थोपी जा रही गुलामी का प्रतिकार करनेलायक बचा ही नहीं रहता । तब थोपी गई गुलामी मानने के अलावा उसके पास दूसरा कोई भी विकल्प शेष नहीं रहता। मगर मुसलमानो के बढ़ते दबाव **( दलितों का मुस्लिम धर्म स्वीकार करना )*** के कारण यूरेशियन बाभनों का **तिलमिलाना** एक शाश्वत प्रकिरिया ही तो है ?? *******************************

जिससे पहले निपटना भी इनके लिए आवशयक था । और इसमें ब्यावधान इस्लाम के मानने वाले वे मुसलमान थे जो 712 ई के बाद ब्राह्मणो के अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए इसे स्वेकार किए थे यानि मूलनिवासी दलित । वास्तविकता यह है की जब मुसलमान भारत में नहीं थे तब भारत में ‘जाति की समस्या’ सबसे बड़ी समस्या थी। अर्थात ब्राह्मण और अब्राह्मण इनके बीच भारत में संघर्ष बहुत भयानक रूप मे शुरू था। यानि युद्ध शुरू था। ब्राह्मण अलग थे। वे खुद को अन्य लोगों की तुलना में श्रेष्ठ समझते थे मूलनिवासियों के गले मे हांडी और झाड़ू बांधना और कुनवे से पानी न भरने देना और भी शारीरिक शोषण जैसा की उपरोक्त बताया हमने दूसरों के साथ असमानता का व्यवहार करते थे,। इसलिए ब्राह्मण और अब्राह्मण (अर्थात जो ब्राह्मण नहीं है) इनके बीच आपस में लड़ाई शुरू थी।

मुसलमनों के भारत में आने से पूर्व यदि यह भारत की सबसे बड़ी समस्या वर्ण-जाति-अस्पृश्यता थी तो मुसलमान भारत में आने के बाद क्या यह समस्या किसी कपूर की तरह उड़ गई ? यदि वो उड़ी नहीं होगी तो फिर गई कहाँ ? यदि भारत में ही है तो ब्राह्मण जैसा बताते हैं कि भारत की वर्तमान सबसे बड़ी समस्या हिन्दू-मुसलसमान की समस्या तो अब है तो फिर वर्ण-जाति-अस्पृश्यता कितनी बड़ी समस्या होगी ?कल्पना करने से ही सिहरन सी दौर जाती है ।

खास बात यह कि वर्ण-जाति-अस्पृश्यता की समस्या मूलत: किसने निर्माण की? यह समस्या ब्राह्मणों ने निर्माण की है और यदि यह समस्या आज भी कायम हैं तो ब्राह्मण ऐसा प्रचार क्यों करते हैं कि भारत की वर्तमान सबसे बड़ी समस्या हिन्दू-मुसलमान’ की समस्या है ???** वास्तव में यही इनकी बगुला नीति है जो शिकार को भ्रमित कर तात्कालिक निशाना कहीं और लगाता है **!!!! जैसे की धुर्विकारण की नीति का निशाना ॥ जिस आतंकवाद का, दहशतवाद का प्रचार आज किया जाता है वह दहशतवाद या आतंकवाद न होकर वह धार्मिक धृवीकरण के कार्यक्रम का एक हिस्सा ही तो है । लव जिहाद ,मुस्लिम आतंकवाद एवं मुस्लिम विरोध का जितना ज्यादा प्रचार होगा उतना ज्यादा उस प्रचार का धार्मिक धृवीकरण हो तो होगा ॥ इसके बाद यह साबित हुआ की मुस्लिम इन ब्राह्मणो के म्ंतब्य मे अवरोध हैं ? तो इंका सेग्रिगेसन कैसे किया जाए जो धर्म के आधार पर हो ??

तब पता चला की मुसलमानों को धर्म के आधार पर सेग्रीगेट करने के पीछे का कारण राजनीति है। मुसलमानों को धर्म के आधार पर सेग्रीगेट करने के लिए मुसलमानों को धर्म के संदर्भ में टार्गेट (निशाना) बनाया गया। मुसलमानों के सेग्रीगेट करने के लिए बाबरी मस्जिद का मुद्दा उठाया गया। बाबरी मसिजद का मुद्दा उठाने से मुसलमान एक तरफ हो गया। मुसलमान कभी भी राम मंदिर बनाने के लिए खड़े नहीं हो सकते हैं, तो स्वाभाविक है कि जब मुसलमान बाबरी मस्जिद के तरफ खड़ा होगा, तो दूसरी तरफ ब्राह्मणो द्वारा एससी, एसटी और ओबीसी से ये कहा गया कि हम राम मन्दिर बनाना चाहते हैं और मुसलमान राम मन्दिर नहीं बनने देना चाहते हैं। इस मुद्दा के आधार पर ब्राह्राणों द्वारा भारत में बहुत बड़ा आन्दोलन चलाया गया और मुसलमानों को इसके परिणाम-स्वरूप मुसलमानों को धर्म के आधार पर टार्गेट बनाकर उनको सेग्रीगेट किया गया । भाई यही बात कश्मीर पर भी लागू होता है । वहाँ भी शुरू में ही नीव दाल दी गयी ।

इससे मुसलमान अलग हो गया और एससी, एसटी और ओबीसी अलग हो गये । इस तरह से बाबरी मसिजद को मुद्दा बनाकर मुसलमानों को धर्म के आधार पर सेग्रीगेट किया गया। अगर एससी, एसटी और ओबीसी को हिन्दू बनाना है तो मुसलमानों को धर्म के आधार पर टार्गेट करना होगा । तब जाकर एससी, एसटी और ओबीसी के ऊपर प्रतिक्रिया निर्माण किया जा सकता है और इनके ऊपर प्रतिक्रिया निर्माण करके एससी., एसटी. और ओबीसी को हिन्दू बना सकते हैं इस को बहुत शुछ्म और गहन – मनन से समझना होगा । अगर एससी का आदमी एससी के नाम पर संगठन बनाता है, तो ब्राह्राण उस संगठन का सदस्य भी नहीं बन सकता है। आदिवासी अगर आदिवासी के नाम पर संगठन बनाता है तो ब्राह्राण उसका सदस्य भी नहीं बन सकता है तो नेता कैसे बनेगा ??? ओबीसी अगर ओबीसी के नाम पर संगठन बनाये तो ब्राह्राण उसका सदस्य भी नहीं बन सकता, तो उसका नेता कैसे बनेगा? मगर मुसलमानो ने इनको अपना नेता जरूर बना लिया ? मगर एससी, एसटी, ओबीसी को अगर हिन्दू बनाया जाय तो धर्म के आधार पर एससी, एसटी और ओबीसी का ध्रुवीकरण होगा । *****अगर धर्म के आधार पर एससी, एसटी, ओबीसी का धु्रवीकरण होगा तो उसका नेता यकीनन ब्राह्राण ही होगा ******। इसका मतलब है कि मुसलमानों को धर्म के आधार पर टार्गेट करने के पीछे का मकसद एससी, एसटी और ओबीसी को हिन्दू बनाना है और एससी, एसटी, ओबीसी को हिन्दू बनाकर ब्राह्राणों का वोट बैंक बनाना है। ब्राह्राणों के लिए वोट बैंक बनाकर ब्राह्राणों के समर्थन में खड़ा करवाकर, उनको चुनावी राजनीति में सफलता हासिल करने के लिए एक हथकंडा अपनाया गया । इस तरह से मुसलमानों को सेग्रीगेट करने के लिए धर्म को आधार बनाकर अल्पसंख्यक ब्राह्राणों को बहुसंख्य बनाने का कार्य किया गया।