uthaigiri
प्रस्तुति सिकन्दर हयात

(साहित्य अकादमी दुवारा पुरुस्कृत मराठी आत्मकथा लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ अनुवादक सूर्यनारायण रणसुभे ) एक बार हम लोग करीब नो दिनों से भूखे थे केवल पानी पीकर जी रहे थे तब बाबा एक आना कही से उधर ले आया एक छटांक गुड वह ले आया और एक बर्तन में काफी पानी डालकर उसमे गुड उबाला गया बाद में इस गुड के पानी को हम सबने पी लिया उस दिन बाबा हम सबको बाँहो में लिए रोने लगा उन दिनों में दिन भर गहरे पर भटकता इमली के बीज या आम की गुठलियों को इकट्ठी करता उन्हें भून कर खाता कभी कभार बाबा या दादा किसी दूसरे गांव में जाकर सूअर के किसी पिल्लै को पकड़ कर ले आते उसे भून कर हम सब लोग खा लेते पेट की आग से परेशान होकर में कई बार बार चक्की के दो पाटो पर नमक छिड़क कर उन्हें चाटता .

कई बार तो इस्थिति इससे भी बदतर हो जाती तब बाबा दादा भाऊ अन्ना नयाँ तुलसीराम और भीमा सब इक्कठे होकर दूर किसी खेत में जाते जहां अच्छी फसल खड़ी हो उसे पहले ही देख आते रात में वहां चोरी छिपे घुसकर भुट्टे हरी मिर्च फलिया तोड़ कर लाते रात में ही चोरी का बटवारा होता इस चोरी का पता सवेरे किसी को न हो इसलिए रात में ही भुट्टो को तोड़ कर दाने निकाले जाते चूल्हा सुलगा कर वे कच्चे दाने भुने जाते चोरी का कोई संकेत न मिले इसलिए भुट्टो के अवशेष जलाय जाते उतनी रात औरते उन दनो को कूटती तबतक में चूल्हे पर बड़े बर्तन में पानी रखता कुत्ते हुए दाने पकाय जाते और तीन चार दिन की भूख इस तरह बुझाई जाती परन्तु पेट की आग इससे पूरी बुझती नहीं . सवेरे उठने पर में चूल्हे के आस पास बिखरे दाने के कणो को चुन चुन कर खाता . उन दिनों दो दो महीने मुझे रोटी नहीं मिलती थी हमारे घर के लोग जब चोरी करने जाते और अगर किसी कारण अथवा संदेह से किसान जाग जाते ———— एक बार शिवनी नमक गाँव के खेतों में चोरी हेतु जब हमारे लोग गए तब एक किसान ने भुट्टे तोड़ते हुए इन्हे देख लिया वह जोर जोर से चिल्लाने लगा और पथर बरसाने लगा तब हमारा गिरोह भाग खड़ा हुआ चुराए हुए भुट्टे उन्होंने फेंक दिए परन्तु दादा को इसका अहसास था की घर के सभी लोग दो दिन से भूखे हे , इस कारण उसने भुट्टे फेंके नहीं . भुट्टो को लेकर तेजी से दौड़ने सम्भव नहीं था इस आपाधापी में एक पथर उसे लग गया सर फट गया बववजूद इसके दादा भुट्टे फेंक ही नहीं रहा था काफी दूर आने के बाद गिरोह के साथियो ने उसकी सहायता की .उसके जख्म को जंगली पत्तो से भरा गया . देर रात घर आने के बाद खून से लथ पथ धोती को भाभी ने धो दिया दादा सुरक्षित आया इसकी हमें ख़ुशी ख़ुशी थी अगर उस दिन दादा पकड़ा जाता तो उसकी खेर न थी वे उसे जान से मार देते

हमारी बिरादरी के सम्भा भीमा और तुलसीराम हमे पड़ोस में रहते थे कभी कभार हमारे बीच झगडे होते थे और ये झगडे किसी एक का सर फूटने पर ही रुकते ——- कारण सूअर के पिल्ले तूक्या शशि नया हमारे सूअर के पिल्लो को चुरा कर ले जाते और भूनकर खाते ——– तुलसीराम पांडुरंग माणिक दादा भगवान अन्ना किसी बड़े त्यौहार के दूसरे दिन जवान सूअर या मादा सूअर को काटते इस समय हम छोटे बच्चे सूअर को पकड़ने में मदद करते तुलसीराम सूअर पकड़ने हेतु उनके पीछे जाल लेकर गलियों में दौड़ता जाल में फंसने के बाद सूअर के चार पैरो को वह रस्सी से बांधता और माणिक दादा के कंधो पर रखता झोपडी के पास ही सूअर को काटने की जगह बनाई गयी थी हमारी छोटी फौज पुरे गाँव में घूम घाम कर घास फुस लकड़ियाँ उपले आदि इकट्ठी करती सूअर भूनने की जगह पर हम इस जलावन को लेकर रख देते गाँव की सवर्ण औरते इसी स्थान पर शौच के लिए आती दादा अन्ना हम बच्चों को कहते देखो बच्चों हम तुम्हे सुर का सबसे बढ़िया मांस ( सूअर की पीठ के नीचे का मांस ) देंगे पहले किसी झाड़ू से पुरे मेले को हटाकर जमीं साफ करो हमारी फौज झाड़ू बनती और पुरे मैदान को साफ़ करती . फिर तुलसीराम लोहे की सब्ब्ल से उस सूअर को मारता धीरे धीरे सूअर निष्प्राण हो जाता उसके बाद उस सूअर के आस पास आग लगाकर उसे भून लिया जाता . उस समय गांव की सवर्ण औरते थोड़ी दूर शौच के लिए आती गाँव की सभी औरते दिशा मैदान के लिए हमारी झोपडी के पास आती . सवेरे सवेरे दर्जन औरते वहां आती सभी और मैल ही मैल हमें वहां से चलना भी मुश्किल हो जाता ऐसे में हम इस हगनहट को हम साफ़ करते यही सूअर भुनते और खाते सूअर को ठीक से भूनने के बाद तुलसीराम उसे काटता पहले पेट फाड़ उसकी अंतड़िया बाहर निकाल देता . माणिक दादा कलेजी निकाल कर उसके छोटे छोटे टुकड़े हम में बाँट देता हम बच्चे उस गरम कलेजी के टुकड़े को बगैर चबाय निगल लेते हाथ और मुंह खून से लाल हो जाता . बार बार हम हाथ फैलाते और कलेजा मांगते बस्ती के कुत्ते वहां इकट्टे हो जाते . वे अंतड़िया उठाने के लिए झगडते . तुलसी राम अंतड़िया दूर लेकर फेंकता . सभी कुत्ते इकठ्ठा होकर वह झपटते भोकते . तुलसीराम धीरे धीरे मांस के टुकड़े काटने लगता चर्बीदार मांस हम सीधे वाही कहना शुरू कर देते . कलेजा और चर्बी खाते समय मैदान में सवर्ण हगते हुए दिखती हमें यह सब खता देख वे नाक पर साडी औढ लेती . में सकता चर्बी और भी मिलती रही और में खाता रहू नारियल की तरह यह चर्बी जायकेदार लगती . सवर्ण औरतो को नाक पकड़ कर बैठना हमें कुछ न लगता अगर हमारे खाने से इतनी ही नफरत तो ये यहाँ हगने ही क्यों आती हे ऐसा में सोचता वैसे उनके हगने से हमारा फायदा ही होता था हमारे सूअर उनका गु खाकर ही तैयार होते थे इस कारण औरते यहाँ हमारे घर के आस पास हगती रहे ऐसा मुझे लगता