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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफ्रीकी देशों की यात्रा पर रवाना होने के पहले अपने मंत्रिमंडल के दूसरे विस्तार को अंजाम दिया। जिसमें एक मंत्री की पदोन्नति के साथ 19 मंत्रियों को शपथ ग्रहण कराई गई जबकि पांच मंत्री ड्राप कर दिये गये। संवैधानिक सीमा के तहत केंद्रीय मंत्रिमंडल में 82 मंत्री हो सकते हैं लेकिन मोदी ने फिलहाल 78 की संख्या पर ही ब्रेक ले लिया है। मंत्रिमंडल के विस्तार के पहले आसन्न विधानसभा चुनाव को देखते हुए उत्तर प्रदेश से कितने सांसदों को जगह मिलती है और किन-किन चेहरों का बेड़ा पार होता है इसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म था। लेकिन जब शपथ का मौका आया तो हालत खोदा पहाड़ निकली चुहिया जैसी बन गई। राजस्थान से चार लोगों को मंत्रिमंडल से जगह मिली लेकिन उत्तर प्रदेश से मोदी ने केवल तीन जूनियर मंत्री बनाये। हालांकि मंत्रिमंडल के विस्तार में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय संख्यात्मक तौर पर दलितों को वरीयता दिया जाना बना हुआ है। कहा जा रहा है कि मोदी ने इस पैतरे के जरिये कई निशाने साधने की कोशिश की है।

नये मंत्रियों में 19 में से पांच दलित हैं। इनमें सबसे उल्लेखनीय नाम महाराष्ट्र के फायर ब्रांड आरपीआई नेता रामदास अठावले हैं। उनकी दलित स्वाभिमान के मसले पर कड़क भाषा उन्हें मायावती के मुकाबले खड़ा करने के लिए मुफीद है। यह बात दूसरी है कि भाजपा के ही फिरोजाबाद से फायर ब्रांड सांसद रामशंकर कठेरिया की छुटटी मंत्रिमंडल से उनकी प्रगल्भता के कारण ही इस विस्तार में कर दी गई है। मंत्रिमंडल के अन्य नये दलित चेहरों में राजस्थान के बीकानेर से सांसद अर्जुन मेघवाल हैं जो कि दूसरी बार चुने गये हैं। राजनीति में आने से पहले मेघवाल नौकरशाह थे। बावजूद इसके उन्होंने सुविधा भोगिता के लिए मोह न दिखाते हुए संसद तक साइकिल से आने-जाने का जो तरीका अपनाया उससे वे लोगों के अलग ही आकर्षण का केंद्र बन गये। अजय टमटा उत्तराखंड से केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह पाने वाले पहले दलित नेता हैं। एक और दलित मंत्री रमेश सी जिगाजिनागी कर्नाटक के रहने वाले हैं।

नरेंद्र मोदी में लोकसभा चुनाव के समय तक दलितों के प्रति कोई खास गर्मजोशी नही थी। बल्कि उन्होंने एक कार्यक्रम में दलितों को लेकर विवादित टिप्पणी कर दी थी। जिससे वे आलोचनाओं में घिर गये थे। सरकार बनाने के बाद उन्होंने राज्यों के राज्यपाल बदले तो एक बार फिर दलितों के प्रति उपेक्षाभाव को लेकर उनकी घेराबंदी हुई। उन्होंने जितने राज्यपाल बनाये थे उनमें एक भी अनुसूचित जाति का नही था। हल्ला मचने पर उन्होंने गौ स्वभाव के निरापद रामनाथ कोविद को बिहार का राज्यपाल बनाकर इस विसंगति का निराकरण किया। लेकिन पिछले वर्ष से उनके मन में दलित प्रेम और बाबा साहब अंबेडकर के प्रति श्रद्धा का भाव इतने जोरों से ठाठे मारने लगा कि राजनीतिक पंडितों के लिए यह परिवर्तन शोध का विषय बन गया है। यह बात इसलिए और हैरत में डालने वाली मानी जा रही है कि भाजपा का मूल काडर सबसे ज्यादा चिढ़ता है तो दलितों से जिसके लिए दलितों का अधिकार मानना बेअदबी में शुमार है। दलितों में जो इयत्ता बोध आया है उसे वे अपने लहलहाते खेत उजाड़ने जैसा गुनाह मानते हैं। सोशल साइटस पर आरक्षण विरोध और अन्य बहाने से दलितों व बाबा साहब अंबेडकर के प्रति जैसी घृणापूर्ण पोस्ट इस कैडर के द्वारा डाली जा रही हैं, उससे इसकी जहनियत और इरादों का पता चलता है। ऐसी वर्ग शक्तियों कें हस्तक की भूमिका में होने की बावजूद अगर मोदी इन दिनों बाबा साहब का इतना जाप कर रहे है और दलितों पर इतना दुलार प्यार उड़ेल रहें हैं तो उसकी वजह तलाशा जाना स्वाभाविक ही है। मोदी कहते हैं कि वे जिस वर्ग के हैं उस वर्ग का कोई आदमी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा यह केवल बाबा साहब के प्रयासों का करिश्मा है। इससे लगता है कि उन्होंने सामाजिक न्याय में बाबा साहब के योगदान को जब महसूस किया तो कृतज्ञ होकर उनका हृदय परिवर्तन हो गया। लेकिन यह केवल अनुमान का विषय है। पर उनके दलित प्रेम के पीछे रणनीतिक कारण भी हैं जिसमंें दोराय नही हो सकती। मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का संकल्प लिया है। जिसे सफल करने के लिए उनके द्वारा दलितों को अपने पाले में खींचना अपरिहार्य है। कांग्रेस मुक्त भारत बनाकर ही वे राष्ट्रीय फलक पर भाजपा का निर्द्वंद साम्राज्य स्थापित कर सकते हैं। क्षेत्रीय दलों से किसी तरह की चुनौती का खतरा उन्हें महसूस नही होता। तीसरे मोर्चें का युग खत्म हो चुका है। कमोवेश सारे क्षेत्रीय क्षत्रप सौदागर मानसिकता के हैं जिन्हें केंद्रीय सत्ता साम, दाम, दण्ड, भेद की किसी न किसी नीति से आसानी से अपनी मुटठी में कर सकती है।

इस विश्वास के कारण वे क्षेत्रीय दलों से बेफिक्र होकर कांग्रेस का वट वृक्ष गिराने में लगे हैं। आज भी राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के बीच कांग्रेस की जबर्दस्त पैठ है। अगर कांग्रेस की यह नींव खोखली हो जाये तो उसको हमेशा के लिए ढहाने में कोई मुश्किल नही रहेगी। मोदी इसी मिशन पर काम करने में जुटे हुए हैं। लेकिन भाजपा को अपने पैरों पर खड़े दलित नेता पसंद नही हैं। संघप्रिय गौतम को इसी कारण भाजपा में तवज्जो नही मिली जबकि वे काफी ऊंचे कद के दलित नेता थे। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे सूरजभान को भी बाद में महसूस करना पड़ा कि भाजपा में दलित नेता की तभी निभ सकती है जब वह अपने जामें में रहना जानता हो। लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने उदितराज और कौशल किशोर जैसे चर्चित दलित नेताओं को पार्टी का उम्मीदवार बनाया लेकिन अब उनकों गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया गया है। रामविलास पासवान के लिए रामोवामों युग में कहा जाता था कि वे देश के पहले दलित प्रधानमंत्री होंगे लेकिन भाजपा के साथ रहकर वे बोनसाई हो चुके हैं। हालांकि कांग्रेस में भी दलित नेताओं के लिए कोई बहुत स्कोप नही रहा। दो साल पहले नई दिल्ली के कांस्टीटयूशन क्लब में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि मायावती ने अपने आगे कोई दलित नेता तैयार नही होने दिया। उन्होंने इस भाषण में ऐसा जाहिर किया था कि जैसे अब कांग्रेस में सभी स्तरों पर दलित नेता तैयार करने की मुहिम छिड़ जायेगी। लेकिन राहुल गांधी अपनी वह बात कब की भूल चुके हैं। यहां तक कि मायावती दलितों के बीच की ही नेता भले ही हों लेकिन दलित समाज के लिए उद्धारक बनने की उनसे जुड़ी आशाएं भी आज मृग मरीचिका साबित होकर रह गई हैं। नई सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जो प्रयोग उन्होंने किये उससे वर्ण व्यवस्था के खिलाफ बहुजन के धु्रवीकृत होने की प्रक्रिया अवरुद्ध हो गई है। पिछड़ों ने बसपा में अपनी उपेक्षा महसूस कर पार्टी के साथ दूरी बना ली और उनकी गफलत का फायदा बीजेपी मुसलमानों का हौव्वा उनके मन में भी बिठाकर उठाने में सफल होती नजर आ रही है। हालत यह है कि मायावती ने वर्णव्यवस्था विरोधी मोर्चा को बहुजन से अल्पजन का मोर्चा बनाकर दलितों को अलगाव की खाई में धकेल दिया है। जिससे उनके सामने पहले की तरह की ही सामाजिक और राजनीतिक असुरक्षा की स्थितियां गहराने लगी हैं।

मॉर्क्स ने इतिहास की व्याख्या का वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत किया था लेकिन द्वंदात्मक भौतिकवाद के कितने आयाम हो सकते हैं यह फिर भी मानवीय कल्पना के परे रहा जिसकी साफ नजीर भारतीय समाज की मौजूदा गतिशीलता में देखने को मिल रही है। भाजपा की ताकत बढ़ने को पुनरुत्थानवादी शक्तियों के वर्चस्व के रूप में देखा जाना सतही आकलन है क्योंकि इस प्रक्रिया में भी गुणात्मक बदलाव की झलक धार्मिक सत्ता में परम्परागत पुरोहित वर्ग से अधिक पिछड़े वर्ग के साधुसंतों और मठाधीश्वरों के बढ़ते बोल वाले के रूप में पहचानी जा सकती है। जिसे वर्ण व्यवस्था के उसूलों से परे होकर मिल रही मान्यता और स्वीकृति क्या मजेदार विपर्यास नही है।