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अशोक अंजुम

मोदी जी के शपथ-ग्रहण समारोह में नवाज़ शरीफ़ साहब पधारे ! अच्छी बात है, लेकिन इस मौके पर हिन्दी के मशहूर कवि अशोक अंजुम का एक गीत सभी के लिये—

अच्छा है गर हो जाती है यारी पाकिस्तान से ,
लेकिन दूध जला पीता है छाछ बड़े ही ध्यान से !

बेहतर हों सम्बन्ध पड़ोसी से तो अजी बुरा क्या है ?
लकिन बदनीयत हो जिसकी उसका कहो पता क्या है ?
सोच- समझकर सुलझाने ये प्रश्न नहीं आसान-से !
अच्छा है गर हो . . . .

जब-जब हाथ बढ़ाया हमने तब-तब धोखे खाये हैं ,
हर सच्ची कोशिश पर उसने सौ-सौ घाव लगाये हैं ;
हमने फूल दिये उसने तलवार निकली म्यान से !
अच्छा है गर हो . . . .

हमने बस-यात्रा के द्वारा उसको जब दिल भेंट किया ,
उसने हमको बदले में फिर युद्ध-कारगिल भेंट किया ,
सदा ग़लत होकर निकला है हर इक इम्तेहान से !
अच्छा है गर हो . . . .

हमें दोस्ती प्यारी है पर स्वाभिमान भी प्यारा है ,
ऐसे कैसे उसे सौंप दें जो कश्मीर हमारा है ,
वो तेज़ाबी बातें करता अक्सर खुली ज़ुबान से !
अच्छा है गर हो . . . .

एक-एक मिलकर ग्यारह हो जाते तो अच्छा होता ,
अपने शिकवे सब के सब खो जाते तो अच्छा होता ,
पाक निभाये पाक़ दोस्ती दुआ करें भगवान से !
अच्छा है गर हो . . . .